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10 जून 2026

72 भंडारा : अवचेतन पर विज्ञापनों के झूठ की हैमरिंग


साठ और सत्तर के दशक में छोटे शहरों में मेन रोड और शहर की बाहरी सीमा से गुजरने वाली बाईपास रोड के अलावा तमाम सड़कें कच्ची हुआ करती थीं ৷ देशबंधु वार्ड स्थित हमारे घर से यह मेन रोड बमुश्किल सौ सवा सौ साइकिल के पैडल की दूरी पर थी ৷ यह कच्ची सड़क गाँधी चौक तक जाती थी और जिस स्थान पर रोड से मिलती थी वहीं नन्द किशोर बैस यानी नन्दू काका की किराने की दुकान थी ৷ घर के निकट खेमराज की दुकान में खाता खुलवाने से पहले  तक यही बाबूजी की प्रिय दुकान थी । हमारे घर का किराने का सारा सामान वहीं से आता था । नन्दू काका केवल दुकानदार ही नहीं थे बल्कि बाबूजी के मित्र भी थे । 

नंदू काका यह बात बाबूजी को बेहतर तरीके से बता चुके थे कि दुकानदार अगर मित्र हो तो उससे मोल भाव नहीं किया जाता ৷ सत्ता और पूंजीपतियों के संबंधों में आज भी नंदू काका की यह बात हम चरितार्थ होते हुए देख सकते हैं ৷

बाबूजी किराना खरीदने के बहाने अक्सर नंदू काका की दुकान पर कुछ देर ठहरकर गपियाते थे ৷ एक बार नंदू काका ने बाबूजी को बताया कि उनके यहाँ हॉर्लिक्स पेय की एक ऐसी पेटी आ गई है जिसके भीतर की काँच की बर्नियाँ किसी दुर्घटना में या पैकिंग की लापरवाही के कारण टूट गई हैं । वह पेटी वापस नहीं हो सकती थी इसलिए नन्दू काका ने वह पेटी बाबूजी को दे दी यह कहकर कि “गुरूजी, देख लीजिये इसमें से यदि कुछ आपके काम आ सके तो अच्छा है ।“  

बाबूजी गत्ते की वह पेटी साइकिल के कैरियर पर रखकर घर ले आये और अगले ही दिन से काम में जुट गए ৷ कुछ बोतलों में नमी की वज़ह से पाउडर की गुठलियाँ बन गई थीं और कांच के टुकड़े उनमे धंस गए थे ৷ कई दिनों की मेहनत के बाद उन्होंने उस पेटी की टूटी हुई बोतलों में बंद हॉर्लिक्स पाउडर से बहुत सावधानी के साथ काँच के टुकड़ों को अलग किया और माँ को वह पाउडर देते हुए कहा “इस पाउडर का एक चम्मच  एक कप दूध में घोलकर रोज शरद को पीने के लिए देना ।“ 

माँ, बाबूजी के इस काँच विलगीकरण अभियान के प्रथम दिन से ही इसके खिलाफ़ थी, उन्होंने कुछ देर तो सब्र किया फिर बाबूजी से कहा “क्या यह ज़रूरी है कि इस पाउडर में काँच का कोई टुकड़ा या चूरा शेष न हो, मैं इसे किसी को पीने नहीं दूंगी ।“ बाबूजी ने यह प्रमाणित करते हुए कि अब यह पाउडर ठीक है और इसे पीने में कोई हर्ज नहीं उसे पानी में घोलकर स्वयं पी कर दिखाया ৷ लेकिन माँ की शंका दूर नहीं हुई ৷ बाबूजी पहले तो बहुत नाराज़ हुए लेकिन जब माँ अपने निर्णय से टस से मस न हुई उन्होंने सब कुछ उठाकर कचरे के डिब्बे में फेंक दिया । कई दिनों की अपनी मेहनत व्यर्थ हो जाने का उन्हें कई दिनों तक अफसोस रहा । 

बच्चे ही थे हम, इसलिए उन दिनों उनके चेहरे पर आत्मग्लानि का वह चित्र नहीं देख पाते थे जिसमें अपने बच्चों को बोर्नविटा या हार्लिक्स जैसी महंगे पेय या महंगे फल, मेवे बादाम आदि खरीदकर न दे पाने की विवशता शामिल थी । बाबूजी की हमेशा कोशिश होती कि हम लोगों के लिए कुछ बेहतर वस्तुएँ खरीद कर ला सकें । लेकिन जो बेहतर और पौष्टिक था वह महंगा था और आज भी है ৷ 

आज भले ही वैज्ञानिक सस्ती चीज़ों में विटामिन और पौष्टिक तत्व होने का दावा करते हों लेकिन सब जानते हैं यह ग़रीबों को फुसलाकर उन्हें ग़रीब बनाये रखने के लिए ही है ৷ ग़रीब बच्चों के लिए आज भी महँगे पौष्टिक पेय,खाद्य पदार्थ और मेवे आदि पहुँच से बाहर हैं, वे तो बस उन्हें दुकानों के शो केसों में सजा हुआ देखकर और टी वी पर रात दिन दिखाए जाने वाले विज्ञापनों में देखकर संतोष कर लेते हैं ৷ वर्गभेद का सबसे बड़ा प्रतिबिम्ब बाज़ार के इस संप्रत्यय में दिखाई देता है ৷ 

बाज़ार उन दिनों भी था लेकिन विज्ञापन, मुनाफ़े और लूट के अंतर्संबंध आज की तरह नहीं थे ৷ नन्दू काका की दुकान में  जब भी कोई नया प्रोडक्ट आता नंदू काका उसे बाबूजी को थमा देते । जब पहली बार रिन साबुन मार्केट में आया तब उसके नीले रंग को देखकर बाबूजी ने मज़ाक में कहा “ चलो अब कपड़ों में नील लगाने से मुक्ति मिलेगी । “ वह माउथ पब्लिसिटी का ज़माना था, तुरंत शहर में यह बात फैल गई कि रिन साबुन लगाने के बाद कपड़ों में नील लगाने की ज़रूरत नहीं है । साबुन खरीदते हुए किसीने यह नहीं सोचा कि साबुन से रंग निकल कर कपड़ों पर कैसे लग सकता है । 

उन दिनों तो लोग कम पढ़े लिखे हुआ करते थे इसलिए ऐसा हो जाना स्वाभाविक था लेकिन आज के पढ़े लिखे,सभ्य सुसंकृत लोग और अधिक उन्नत तरीके से ठगे जाते हैं ৷ विज्ञापन फिल्मों में कैमरे और कंप्यूटर के कमाल से किसी कपड़े को किसी साबुन की वज़ह से सबसे साफ़ बताया जाता है या कपड़े साफ न होने का कारण सफाई के तरीके को नहीं बल्कि किसी सस्ते साबुन को बताया जाता है और हम सहज रूप से उस पर विश्वास कर महँगा प्रोडक्ट खरीद लेते हैं । हमारे मस्तिष्क पर किसी प्रोडक्ट के बारे में इतनी हैमरिंग की जाती है कि हम झूठ को सच मान लेते हैं ৷ यह टेक्नीक केवल बाज़ार में ही नहीं राजनीति में भी चलती है ৷

आज हमारे जीवन में पाउच संस्कृति का प्रवेश हो गया है और ठोस और द्रव्य सभी वस्तुएँ पाउच  में मिलने लगी हैं ৷ उन दिनों कोई सोच भी नहीं सकता था कि तेल या दूध जैसे वस्तु बर्तन के अलावा किसी चीज में ली जा सकती है ৷ नंदू काका की दुकान में तेल के बड़े बड़े टिन हुआ करते थे जिनसे तेल निकालकर उसे घर से लाये बर्तन में तौल कर वे देते थे । हम लोगों के यहाँ मूंगफल्ली का तेल आया करता था जिसे बाबूजी एक कड़ी वाले पीतल के डिब्बे में लाया करते थे । । माँ उसे ‘तेल की डबकी’ कहा करती थी ৷

पहले तेल का यह बर्तन यानी डबकी तराजू के एक पलड़े पर रखा जाती और उसका वज़न किया जाता ৷इसके लिए बाँट रखना आवश्यक नहीं था ৷तराजू के दूसरे पलड़े पर गुड़ की डली, सुपारी या फल्ली दाने से भी काम चल जाता था ৷ फिर तेल नापने के लिए किलो, आधा किलो, सौ पचास ग्राम के बाँट रखे जाते ৷ नन्दू काका की दुकान में जब पहली बार पीतल की इस डबकी को भरकर तौला गया वह सवा किलो तेल से भर गई , फिर कभी उसे तौलने की आवश्यकता महसूस नहीं हुई । नन्दू काका उसे ऊपर तक पूरा भर देते थे और सवा किलो तेल के पैसे खाते में जोड़ देते थे । हाँ उस डब्बे का ढक्कन चूड़ी वाला नहीं था इसलिये उसे बाबूजी साईकल के हैंडल पर लटकाकर बहुत सम्भाल कर लाते थे । बाद में माँ ने उसके लिये एक थैली सिल दी थी । 

किराने का बाकी सारा सामान अखबारी कागज़ की पुड़िया में आता था, जिसे कच्चे धागे से लपेटा जाता था । धागे का यह बण्डल बीच दुकान में छत से बंधा लटकता रहता था ৷ बड़ी पुड़िया की जगह अखबार को नीचे से पकड़ कर गोल गोल घुमाते हुए शंकु के आकार का एक चोंगा बनाया जाता और सामान भरकर उसका मुंह बंद कर धागे से लपेट दिया जाता ৷ सामान घर आने के बाद धागा और कागज़ दोबारा किसी काम में आ जाते या जला दिए जाते ৷ 

यद्यपि दुनिया को कचराघर बनाने वाले प्लास्टिक का प्रवेश उन दिनों मनुष्य जीवन में हो रहा था लेकिन उसका  चलन उन दिनों बहुत कम था ৷ पॉलीथिन का आविष्कार नहीं हुआ था और सडकों पर आज की तरह कचरा नहीं दिखाई देता था ৷ पैकिंग के लिए कागज़, कपड़ा वनस्पति आदि का इस्तेमाल किया जाता था जो अगर फेंक भी दिया जाए तो कुछ समय बाद मिटटी बन जाता था ৷ माँ रद्दी कागज़ों का बहुत अच्छा उपयोग करती थी वे उन्हें पानी में भिगोकर उसकी लुगदी बना लेतीं और मटके की पीठ पर उसे थापकर उसकी छोटी छोटी टोकनियाँ बना लेतीं जिनके सूखने के बाद बाबूजी उस पर लाल नीली स्याही, महावर, या बाज़ार के रंगों से रंग कर दिया करते ৷ 

बड़े होने के बाद पता चला कि यह कला का एक रूप है और इसे पेपरमैशी कहते हैं लुगदी साहित्य यह शब्द भी जब पहली बार सुना तो माँ द्वारा बनाई गई रद्दी कागजों की वह लुगदी याद आई ৷  उन दिनों कई सस्ते नॉवेल , जासूसी उपन्यास आदि इसी लुगदी से बने कागज़ पर छपे जाते थे इसलिए उन्हें लुगदी साहित्य या पल्प लिटरेचर कहा जाता था ৷

आज हम विज्ञापनों में देखते हैं , सुबह सुबह ही हमें डरा दिया जाता है यदि आपने फलां फलां टूथपेस्ट से अपने दांत साफ नहीं किये तो एक दिन आपके सारे दांत ख़राब हो जायेंगे ৷ उन दिनों विज्ञापनों का ऐसा कोई आतंक नहीं था और  दांतों के लिए दातौन ही सबसे मुफीद मानी जाती थी ৷ टूथपेस्ट व टूथब्रश का समावेश लग्ज़री में था । 

बाबूजी दांतों की बहुत केयर करते थे इसलिए उन्होंने बीच का रास्ता अख्तियार किया था  वह था दंत मंजन । बिटको का काला दंत मंजन बाबूजी का प्रिय दंतमंजन था । लेकिन बाबूजी कुछ कीमियागरी से उसे और भी विशिष्ट बना देते थे । उस समय बिटको का दंतमंजन षटकोनी आकार की शीशी में आता था ৷ वे एक शीशी दंतमंजन खरीदते फिर घर आकर उस पाउडर को अखबार पर उंडेल देते ,फिर उसमें पहले से तैयार किया हुआ नमक, लकड़ी के कोयले का चूरा, सरसों का तेल व बादाम के जले हुए छिलकों का चूरा मिलाते ৷ यह सब सामग्री लगभग दोगुनी मात्रा में होती थी ৷ इस तरह वे एक बोतल मंजन का तीन बोतल मंजन बना लेते थे । शुरू में मुझे लगता था कि बाबूजी कंजूसी की वज़ह से ऐसा करते हैं लेकिन बाद में पता चला कि वे ऐसा मंजन की गुणवत्ता बढ़ाने के लिये करते थे । यद्यपि यह सब टोटके मिलकर भी उनके दांतों का क्षरण नहीं रोक पाए और साठ साल की उम्र तक सारे दांत उन्हें बाय बाय कहकर चले गए ।  


शरद कोकास 

5 जून 2026

46. बैतूल : मीठी मीठी जामुन खानेवाले हम बंदरों का कलेजा


बैतूल का हमारा वह खपरैल वाला मकान ठीक आचार्य रामचंद्र शुक्ल की इस कविता में बताये गए मकान की तरह ही नगर के अंतिम छोर पर था । आठ दस मकानों के बाद से ही रिंग रोड के उस पार से खेत शुरू हो जाते थे । 

नगर से दूर कुछ गाँव की-सी बस्ती एक 

हरे भरे खेतों के समीप अति अभिराम 

जहाँ पत्राजाल अंतराल से झलकते हैं 

लाल खपरैल श्वेत छज्जों के सँवारे धाम 

मुझे आश्चर्य होता था कि खपरैल वाले उस छोटे से मकान में इतने सारे लोग कैसे रह लेते थे । मुझे यह मकान जादूगर के उस छोटे से डिब्बे मैजिक बॉक्स की तरह मालूम होता था जिसमे से जादूगर जाने क्या क्या चीज़ें निकाल लेता है । हालाँकि यह मकान इतना छोटा भी नहीं था यह दुमजिला था और काफी बड़े क्षेत्र में फैला हुआ था ।  

विश्वेश्वर प्रसाद जी तो काफी पहले गुजर गए थे लेकिन उनके बड़े बेटे  बाबूलाल जी अपने छोटे भाइयों बृजलाल,कुन्दनलाल, सुन्दरलाल, चन्दनलाल और उनके बाल बच्चों के साथ सुखमय जीवन व्यतीत कर रहे थे ।

सबसे छोटे चन्दन लाल का निधन अल्पायु में सन पचास से पूर्व ही हो चुका था । उनकी पत्नी रामदुलारी यानि छोटी काकी अपनी एक बेटी उषा तथा बेटे किशन के साथ वहाँ रहती थीं । बड़ी बेटी आशा का विवाह बाबूजी के विवाह के कुछ समय पश्चात ही नागपुर में रतनलाल शर्मा जी के साथ हो चुका था । उनकी सुभाष, मालती, रेखा,रजनी व रानी नामक पांच संतानें थीं । छोटी बेटी उषा का विवाह कुछ समय बाद  मुंबई में विजय कुमार शर्मा जी के साथ हुआ । उनके अखिलेश,निखिलेश,विमलेश व अमित चार बेटे हुए ।

सुन्दरलाल दादा जी नि:संतान थे और उस पुराने कच्चे मकान के दक्षिणी भाग में फर्नीचर कारखाने के पीछे की ओर रहा करते थे । बैतूल में वे काफी रुतबे वाले व्यक्ति थे । वे समाज सेवी थे तथा एक समय नगर परिषद बैतूल में पार्षद भी रह चुके थे । उनकी पत्नी यानि हमारी दादी रतनबाई धार्मिक कर्मकांडों के अलावा छुआ-छूत भी बहुत मानती थीं। उनके वाले हिस्से के पीछे के आंगन में एक बड़ा सा कुआँ था जिसके कारण उन्हें सब ‘कुएँ वाली काकी’ कहते थे । 

इस गोल घेरे के भीतर था कुआँ 

दादी  तड़के ही स्नान कर लेतीं और पूजा - पाठ के बाद गीले वस्त्रों में रसोई बनाती थीं । उन्होंने पहले से ही अपनी रसोई अलग कर रखी थी । हम बच्चों को उनके यहाँ जाने में बहुत डर लगता था। जून के माह में जब उनके पिछवाड़े के आंगन में जामुन के पेड़ पर मीठी मीठी जामुन लगती थीं, हम बच्चे उन्हें तोड़ने पहुँच जाते थे और दोपहर के सुनसान में पत्थर की आवाज़ से दादी की नींद में ख़लल डालने के आरोप में उनकी डांट खाते थे । शाम को दादी हम बच्चों को खुद ही बुलाती थीं और मीठे मीठे जामुन खाने के लिए दिया करतीं थीं । दादा दादी तो नहीं रहे लेकिन यह जामुन का पेड़ आज भी उसी जगह है ।

आज भी है जामुन का पेड़ 

बृजलाल दादा उन दिनों हम बच्चों को एक कहानी सुनाया करते थे जिसमे नदी किनारे जामुन के पेड़ पर रहने वाले बन्दर की एक मगरमच्छ से दोस्ती हो जाती है। एक दिन मगरमच्छ उस बन्दर को अपनी पीठ पर बिठाकर अपने घर ले जाता है और रास्ते में बताता है कि उसकी पत्नी ने कहा है जो बन्दर रोज मीठी जामुन खाता है उसका कलेजा कितना मीठा होगा । बन्दर बुद्धि से काम लेता है और कहता है कि “मित्र कलेजा तो मैं पेड़ पर ही भूल गया हूँ, एक बार वापस ले चलो ताकि भाभी की इच्छा पूरी कर सकूँ ।“ बस फिर क्या था बन्दर पेड़ पर गया सो गया । यह कहानी सुनकर हम बच्चे उन दिनों यही सोचते थे कि जामुन खाने से हमारा कलेजा भी खूब मीठा हो गया होगा, अब कोई हमसे कलेजा मांगेगा तब भी नहीं देंगे ।

सुन्दरलाल दादा से बड़े कुन्दनलाल दादा थे । वे रेलवे की नौकरी से अवकाश लेकर बैतूल आ गए थे । दादीजी का नाम चंपा देवी था और उन्हें किताबें पढ़ने का बहुत शौक था । कहानी,उपन्यास और पत्रिकाएँ पढ़ें बगैर उन्हें नींद नहीं आती थी । जासूसी उपन्यास वे बहुत चाव से पढ़ती थीं । कुंदनलाल जी के बेटों में सबसे बड़े मनोहर बैंगलोर में एच एम टी घड़ी कंपनी कार्य करने के बाद भिलाई इस्पात संयंत्र  में नौकरी के लिए  आ गए थे । बचपन में ही अपने नाना के पास जबलपुर चले गए थे । सुशीला चाची मेरी माँ शीला की हमनाम हैं  । 

मनोहर चाचा सुशीला चाची गोपाल ममता 

उनके बच्चों के नाम हैं सरिता, गोपाल, मंजू, ममता और संजय । यह सारे बच्चे बैतूल की हमारी ग्रीष्मकालीन आयुवर्गानुसार बनाई धमाचौकड़ी टीम में शामिल हुआ करते थे । बाद में सरिता जीजी का विवाह भिलाई में सुरेश चन्द्र शर्मा से, मंजू का बिलासपुर में सुन्दर लाल विश्वकर्मा से और ममता का नागपुर में शैलेश माहुले से हुआ । 

 उस समय मनोहर चाचा से छोटे वीरेंद्र चाचा कॉलेज में पढ़ रहे थे । वीरेंद्र चाचा लकड़ी के फर्नीचर का काम बहुत अच्छी तरह जानते थे लेकिन वे बहुत महत्वाकांक्षी थे । वे बाबूजी से बहुत प्रेरित रहे इसलिए बैतूल में रहते हुए ही उन्होंने नौकरी के लिए आवेदन किया और मात्र उन्नीस वर्ष की आयु में वे रेलवे में फायरमैन की नौकरी करने के लिए भावनगर गुजरात चले गए । फिर वे वेस्टर्न रेलवे में पदोन्नत होकर सन पचहत्तर में मुंबई आ गए और फिर वहीं  प्रभादेवी में सेटल हो गए ।

वीरेंद्र चाचा देवकी चाची मनीष आशीष निधीश अनिषा 

उनका विवाह मुंबई में ही मुन्नीलाल जी की बेटी देवकी से हुआ था । उनके बच्चों के नाम हैं, मनीष, अनिषा, आशीष और निधीश । अनिषा का विवाह शशांक जी केनी से हुआ है और वह वर्तमान में अमेरिका में सेटल है । बाक़ी सभी भाई अपने परिवार सहित मुंबई में हैं । 

 कुंदनलाल दादा के अन्य दो पुत्र उपेन्द्र और सुरेन्द्र है । सुरेन्द्र उर्फ़ मुन्ना कक्कू लगभग मेरी उम्र के ही हैं । उपेन्द्र काका भी छात्र जीवन में मेधावी रहे, उन्होंने बाद में  चिकित्सा विभाग में नौकरी ज्वाइन कर ली लेकिन अपने भाइयों व भाभियों के लाख समझाने के बावजूद उन्होंने विवाह नहीं किया । विवाह न करने हेतु उनके अपने तर्क हुआ करते थे । फिर मुन्ना कक्कू ने भी न विवाह न कहीं नौकरी की, लेकिन खेतीबाड़ी करते रहे । यह दोनों चाचा अभी भी अविवाहित ही हैं और उनका अपना जीवन दर्शन अटल है । 

कुंदनलाल जी की बेटियों में उस समय सिर्फ सरोज वहाँ थीं । बेटियों में कुसुम का विवाह वर्धा में सुग्रीवन से और ध्यान का विवाह जबलपुर में शम्भु रतन से हो चुका था । सरोज का विवाह बाद में बिलासपुर के कन्हैया लाल जी विश्वकर्मा से हुआ जिनसे उनकी संतानें हुई रीतेश, एकता और राहुल । ध्यान बुआ के बच्चों में राजू मेरा हमउम्र था और योगेश व स्वर्णा छोटे थे । कुसुम बुआ के सभी बच्चे आशीष,सुदीप,अनूप,संदीप,रेखा,जयवंती और रमा मुझसे बहुत छोटे थे । कुंदनलाल दादा जी की सबसे बड़ी बेटी ज्ञानवती का निधन बचपन में ही हो गया था । 

इन दिनों यह बात बहुत आश्चर्य जनक लगती है लेकिन हम लोगों को बताया गया था कि कुंदनलाल दादाजी की कुल मिलाकर उनकी चौदह संताने हुई थीं जिनमे से सात का उनकी शैशवावस्था में ही उनका निधन हो गया था इसलिए वे परिवार की क्रोनोलॉजी में शामिल ही नहीं हो पाई । 

शरद कोकास 

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