खामतलाव लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
खामतलाव लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

10 जून 2026

100 . भंडारा : खामतालाब के पानी में बहिरंगेश्वर मंदिर की परछाईं


खामतलाव का बहिरंगेश्वर मंदिर
बचपन की पगडंडी मैं पीछे छोड़ आया था और किशोरावस्था की अपेक्षाकृत चौड़ी सड़क पर पांव रख रहा था ৷ देह की घाटी में कुछ चट्टानें ठोस रूप ले रही थीं ৷ भीतर ही भीतर नसों में कोई नदी बहने लगी थी ৷ सपनों में परियाँ अब भी दिखाई देती थीं लेकिन अब मैं उन्हें जागते हुए में भी देखना चाहता था ৷ किशोरवय की चौड़ी सड़क पर आगे बढ़ते हुए मैं  पीछे मुड़कर बचपन की पगडंडी पर छूटे हुए अपने पदचिन्हों को देखना चाहता  तो वहाँ नन्हे नन्हे पांवों के पदचिन्ह दिखाई देते ৷ 

आगे एक ऐसा रास्ता था जिस पर लगे मील के पत्थरों की गिनती उस मक़ाम पर असम्भव थी ৷ मंज़िल शब्द का अर्थ मेरे लिए किसी मकान की मंजिल से अधिक नहीं था ৷ लेकिन इस बात की कल्पना थी कि अपने पिता की तरह भविष्य में मुझे भी जीने के लिए संघर्ष करना होगा ৷ जंगल में भटके हुए मुसाफिर की तरह कभी कभी मैं भी घबरा भी जाता, फिर दोस्तों के साथ तरह तरह के खेल खेलते हुए, सिनेमा देखते हुए , लायब्रेरी में किताबों के बीच समय बिताते हुए मन को व्यस्त करने की कोशिश करता लेकिन भविष्य का ख़याल किसी बदमाश बच्चे की तरह मुझे अकेला पाकर घेरने लगता ৷ 

  जब मेरा मन भीड़-भाड़ से उचट जाता मैं किसी एकांत स्थल की तलाश में निकल जाता । मेरे पांव मुझे घर के पास स्थित  खामतलाव ले जाते । यह एक खूबसूरत तालाब था जिसके बीचोबीच एक खम्भा गड़ा हुआ था, इसीकी वज़ह से इसका नाम खामतलाव पड़ा था । इस तालाब में गर्मी के दिनों में भी पर्याप्त जल हुआ करता था । आज यह तालाब सूख चला है यद्यपि इसके किनारे शिवजी का एक मन्दिर अभी भी विद्यमान है जिसे बहिरंगेश्वर का मन्दिर कहते हैं । मंदिर के गर्भगृह में एक शिवलिंग स्थापित है ৷ उन दिनों इस मन्दिर के फर्श पर बहुत सुन्दर टाइल्स लगीं थीं ৷ उन ठंडी ठंडी टाइल्स पर बैठना बहुत मुझे अच्छा लगता था । मन्दिर के किनारे सीढ़ियाँ थीं जो तालाब के घाट तक जाती थीं । 

रात के समय का दृश्य 

मैं अक्सर सीढ़ियों पर बैठकर या तालाब के किनारे लगी रेलिंग पर कुहनियाँ टिकाकर तालाब के जल की ओर एकटक देखा करता । यह रेलिंग लोहे के पोले पाइप की बनी हुई थी जिसके एक सिरे पर कोई आवाज़ निकालने पर वह दूसरे सिरे पर सुनाई देती थी । कभी कभी मैं वहाँ उपस्थित अन्य बच्चों के साथ टेलीफोन वाला यह खेल भी खेलने लग जाता था । उस वक़्त मैं और बच्चों की तरह एक बच्चा हो जाता था ৷ 

सौन्दर्यीकरण के नाम पर अब यहाँ बहुत कुछ बदल चुका है ৷ अब यहाँ न रेलिंग है न घाट की सीढियां अब तालाब और मंदिर के बीच यहाँ एक दीवार है ৷ बहिरंगेश्वर मंदिर झांककर तालाब के पानी में अब अपना अक्स भी नहीं देख सकता ৷ बच्चे भी अब यहाँ नहीं दिखाई देते ৷ 

खामतालाव के इस परिसर में घाट पर ही बहिरंगेश्वर मंदिर के नीचे की ओर हनुमान जी का एक मन्दिर था जिसमें हनुमान जी की एक बड़ी सी पत्थर की प्रतिमा थी जिस पर सिन्दूर पुता हुआ था । प्रतिमा के पार्श्व में पत्थर में बना हुआ एक गड्ढा था जिसमें हाथ डालकर लोग पानी निकालते थे और उसे चरणामृत की तरह ग्रहण करते थे । नारियल से निकला पानी भी इसीमे डाला जाता था ৷ अब वह अनगढ़ स्थापत्य यहाँ नहीं है ৷

तालाब जहाँ अब सीमेंट की दीवार के भीतर कैद है वहाँ पहले मिट्टी की प्राकृतिक मेढ़ हुआ करती थी जिस पर चलते हुए मैरीन ड्राइव का आनंद मिलता था ৷ ৷ इसी मेढ़  पर शिवमन्दिर से विपरीत दिशा में एक देवी का मन्दिर भी था जिसे शीतला माता का मन्दिर कहते थे । कभी कभी मैं मेढ़ पर चलकर सामने वाले शीतला मन्दिर तक चला जाता था । यहाँ अपेक्षाकृत भीड़ कम होती थी ৷ कभी कभी शांत वातावरण में  इस मन्दिर की घंटियों की आवाज़ हमारे घर तक सुनाई देती थी । 

एक बार जब मुझे माता निकली थी तब माँ इस मन्दिर में दही चावल चढ़ाने आई थी । हालाँकि माँ यह सब नहीं मानती थी । बाबूजी भी ऐसा कुछ नहीं मानते थे और बीमारी में दवा पर ही विश्वास करते थे लेकिन माँ ने मोहल्ले की स्त्रियों के कहने पर ऐसा किया था । दुनिया की हर माँ अपने बच्चों की सेहत के लिए कुछ भी करने को तैयार रहती है ৷ 

बरसों बाद में जब मैं एम. ए. कर रहा था एक बार छुट्टियों में मैं इस मन्दिर में गया तो मैंने देखा कि वहाँ टूटी फूटी मूर्तियों के साथ जैन धर्म के तीर्थंकरों की मूर्तियाँ भी रखी हैं जिन्हे वहाँ के लोग देवी की बहने कहते हैं । मैंने लौटकर माँ से कहा ..” माँ वहाँ देवी की बहनों की नहीं बल्कि भाइयों की मूर्ति है वह भी दूसरे धर्म की । “माँ हँसने लगी थी । माँ एक आर्य समाजी घराने से आई थी और उनके मायके में मूर्तिपूजा नहीं होती थी । लेकिन बाबूजी सनातन धर्म को मानते थे इसलिए देवी देवताओं और मूर्तिपूजा में उनका विश्वास था ৷ माँ बताती थीं कि शादी के बाद पहली बार वे मन्दिर गईं थी और उन्होंने मूर्तिपूजा की थी । उस ज़माने की स्त्री पति की अनुगामिनी हुआ करती थी और उसके विश्वास पति के विश्वासों का ही एक रूप होते थे ৷

घर के आसपास के लोग जादू-टोने में विश्वास करते थे लेकिन माँ को यह सब बातें पता ही नहीं थीं ৷ एक बार हमारे घर के पिछवाड़े किसी ने नीबू में सिन्दूर लगाकर फेंक दिया था । माँ ने उसे देखा तो उन्हें कुछ समझ में नहीं आया, उन्होंने उस नीबू से ताम्बे का लोटा मांजकर उसे चमका दिया । बाद में पड़ोस की महिलाओं से वार्तालाप के अंतर्गत जब उन्होंने यह घटना उन्हें बताई तो पड़ोसनों ने कहा कि किसी ने जादू टोना करने के लिए वह नीबू घर में फेंका था ৷ 

माँ उस समय पड़ोसनों की यह बात हँस कर उसे टाल गई ৷ फिर उन्होंने  बाबूजी को यह बात बताई  तो उन्होंने कहा “अच्छा है ना, ऐसे ही लोग नीबू फेंका करें तो इस बहाने घर के ताम्बे के बर्तन साफ़ हो जायेंगे ৷” पड़ोस की महिलाओं के ऐसे टोन टोटके में विश्वास करने के बावजूद  माँ ने कभी किसी अन्धविश्वास को मन में जगह नहीं दी फलस्वरूप बचपन में न कभी हमें  काला टीका लगाया गया, न कोई काला धागा या ताबीज़ बान्धा गया और न ही कभी हम लोगों की नज़र उतारी गई । 

शरद कोकास 

86. भंडारा : कविता में अर्थ तक पहुँचने के लिए कोई शॉर्टकट नहीं होता

कला मंदिर थियेटर भिलाई में 

“ज़िंदगी की राहों में रंजो ग़म के मेले हैं, भीड़ है क़यामत की और हम अकेले हैं ৷” 

कव्वाली की उस रात को ‘हैरा’ साहब की आवाज़ में सुना ग़ज़ल का यह मिसरा आज भी मेरे जेहन में गूंजता रहता है ৷  हम लाख इंकार करें लेकिन हम जैसे लोग भीड़ में भी कभी कभी अपने आप को अकेला महसूस करते हैं  ৷ 

घर से स्कूल जाने वाले पर रास्ते पर आप लोगों को अपने साथ ले चलते हुए मैं उस अतीत के भविष्य में ज़िंदगी की राह पर भी आगे बढ़ गया था और गुर्जर चौक से दायें बाएँ जाने वाले दो रास्तों और उनके किनारे के मकानों का ज़िक्र रह ही गया था ৷ दरअसल इन दो रास्तों पर मेरा जाना बहुत कम हुआ इसलिए कि यह दोनों रास्ते जहाँ पहुंचाते हैं वहाँ तक पहुँचने के लिए मेरे घर से अपेक्षाकृत कम दूरी के रास्ते भी हैं ৷ 

ऐसा ज़िंदगी में हमेशा होता है कि जब हमारे पास मंजिल तक पहुँचने के शार्टकट  रास्ते उपलब्ध हों तो हम लम्बे रास्तों से जाना पसंद नहीं करते ৷ हालाँकि कभी कभी शॉर्टकट रास्तों से जाने में नुकसान भी बहुत होता है ৷ कई बार कविता के अर्थ तक पहुँचने के लिए भी हम इसी तरह शॉर्टकट रास्तों से आगे बढ़ते हैं लेकिन पहुँच नहीं पाते ৷

 किसीने पूछा था कभी कि आप लम्बी कविताएँ क्यों लिखते हैं ? मैंने जवाब दिया था कि मैं कविता के जिस संसार में आप लोगों को ले जाना चाहता हूँ वहाँ अपेक्षाकृत कम लम्बी कविता के माध्यम से नहीं पहुँचा जा सकता ৷  

गुर्जर चौक से एक रास्ता खाम तलाव की ओर जाता है और एक बाज़ार की ओर ৷ खामतालाव जाने वाले रास्ते पर दाहिनी ओर गुप्ते का बाड़ा है ।

गुप्ते बाड़ा जाने का रास्ता 

बाड़ा यानी एक चारदीवारी के भीतर अनेक मकानों का समूह ৷ इस बाड़े में बाबूजी के बेला कॉलेज के सहकर्मी घटवई रहा करते थे और नीचे की ओर मनरो स्कूल के प्रिंसिपल बापट । बापट सर का बेटा शिरीष बालकमन्दिर में  मेरा बालसखा था । हम लोग एक बार घटवई काका के यहाँ गये थे और काकू ने हमें  बेसन से बना एक व्यंजन खिलाया था । उसके आकार की वज़ह से घर आकर हम लोगों ने उसका बहुत मज़ा लिया था ।  बाड़े के सामने की और बैस का मकान था , किशोर बैस वहाँ रहता था  ।


आगे यह रास्ता रिंग रोड से मिल जाता है जिसके आगे झाँसी की रानी की प्रतिमा  और शिवमंदिर है ৷

गुर्जर चौक से बाज़ार जाने वाले रास्ते पर व्यवहारे का दवाखाना है


और उससे पहले खड़तकर का मकान । डॉक्टर व्यवहारे के दवाखाने के बाद एक गली आती है ৷ उसके बाद  वझलवार सर का मकान है जिनका बेटा मुकुन्द बालकमन्दिर में मेरे साथ था ।  इसी रोड पर आगे ‘शिंगणापुरकर की माड़ी’ है और ढगे सर का मकान भी । ‘शिंगणापुरकर की माड़ी’ यह वही मकान हैं जहाँ भंडारा आने के बाद बाबूजी को सबसे पहले ठिकाना मिला था ৷ मेरे जन्म के बाद मेरी पहली पहचान इसी मकान की दीवारों से हुई थी ৷  

     शरद कोकास