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10 जून 2026

151. भंडारा : किल्ला नहीं इसे किला कहते हैं



हमारे देश के ज़्यादातर लोग इतिहास, इतिहास की किताबों में  नहीं पढ़ते बल्कि किस्से कहानियों में पढ़ते हैं । हालाँकि उनका उद्देश्य मनोरंजन होता है, लेकिन इतिहास ज्ञान साइड इफेक्ट की तरह चला आता है । कला का बाज़ार जनता की यह कमज़ोरी जानता है, और किस्से कहानियों और फिल्मों के माध्यम से उसके सामने एक ऐसा इतिहास परोस देता है जिसके सच में झूठ कितना मिला है जानना मुश्किल होता है । अब तक कथा, कहानी, उपन्यास और फिल्मो को इतिहास कहने की कोशिश भी नहीं की गई थी और इनके लिए ‘ऐतिहासिक’ इस विशेषण का प्रयोग ही पर्याप्त  था लेकिन  अब व्यवस्था इस गोरखधंधे में धंधे में शामिल हो गई है और विशुद्ध मनोरंजन के लिए प्रस्तुत इन विधाओं को इतिहास कह कर जनता के अवचेतन से खिलवाड़ करने लगी है । समझदार जनता उसके बहकावे में नहीं आती है और ऐसी रचनाओं के गर्भ में छुपे इतिहास और कथा तत्व में अंतर करना जानती है ।

इतिहास को किस्सों में पढ़ने की इस परम्परा में बचपन में पाठय पुस्तकों में पढ़ा गया एक किस्सा याद आता है, शिवाजी और तानाजी मालसुरे का किस्सा । महाराष्ट्र के बच्चों को सिंहगढ़ के किले की कहानी घूटी में पिलाई जाती है, जिसका की वर्ड होता है ‘गढ़ आला पण सिंह गेला’  यानी किला तो मिल गया लेकिन किले को जीतने वाला हमारा शेर चल गया ।  इसी घटना की स्मृति में बच्चे हर साल दिवाली के अवसर पर अपने आँगन में मिटटी का किला बनाते हैं और उसे सजाते हैं । इससे पहले कि मैं आपको किला बनाने की प्रक्रिया बताऊँ इस घटना का हम संक्षिप्त पुनर्पाठ कर लेते हैं, वैसे संभव है यह विवरण पढ़कर आपको हाल ही में बनी फिल्म ‘तानाजी’ की याद आई होगी जो इसी घटना पर आधारित है ।


पुणे शहर से तीस किलोमीटर दूर सह्याद्री पर्वत श्रंखला की एक पहाड़ी पर बने सिंहगढ़ किले का इतिहास सन तेरह सौ अठ्ठाइस से प्रारंभ होता है जब यह किला मुहम्मद बिन तुगलक द्वारा आदिवासी कबीलों के सरदार नाग नाइक से हस्तगत कर लिया गया था । कौडिन्य ऋषि के बनाये प्राचीन मंदिर के नाम पर इस किले का नाम कोंढाणा किला था । तुगलक वंश से होता हुआ यह किला मराठों के पास आया लेकिन सन सोलह सौ पैंसठ में पुरंदर की संधि के तहत यह किला अन्य तेईस किलों सहित शिवाजी द्वारा औरंगजेब को दे दिया गया ।

किन्तु आगरा में छल द्वारा हत्या का षड़यंत्र रचे जाने पर शिवाजी क्षुब्ध हो गए और उन्होंने संधि भंग कर अपने किले वापस लेने की मुहीम प्रारंभ कर दी । फरवरी सोलह सौ सत्तर में यह अभियान प्रारंभ हुआ और उसके लिए योग्य सेनापति तलाशा जाने लगा । तानाजी मालसुरे ने अपने बेटे रायबा के विवाह की तैयारियों में व्यस्तता के बावजूद यह ज़िम्मेदारी ग्रहण कर ली । उन्होंने कहा “आधी लगीन  कोंढाण्याचे मग रायबा चे” अर्थात पहले लगन किले का बाद में बेटे का  । ‘आधी लगीन  कोंढाण्याचे’ यह उक्ति मुहावरे की भांति महाराष्ट्र में आज भी प्राथमिकता के पर्याय में उपयोग में लाई जाती है ।

फिर सोलह फरवरी का दिन आया । तानाजी ने अपने भाई सूर्याजी और पांच सौ मावले सैनिकों के साथ किले पर अधिकार कर लिया लेकिन किले के अभिभावक उदयभान से लड़ते हुए वे  वीरगति को प्राप्त हुए । जब शिवाजी तक यह ख़बर पहुँची तब उनके मुंह से निकला ‘ अरे गढ़ आ गया लेकिन हमारा शेर चला गया’ तानाजी की स्मृति में इस किले का नाम उन्होंने सिंहगढ़ रखा ।

हमारा राजनीतिक इतिहास ऐसे ही युद्धों का इतिहास है जहाँ सत्ता के लिए राजाओं के बीच युद्ध होते हैं । यहाँ साम्राज्य विस्तार प्रमुख होता है और राज्यधर्म का विस्तार गौण । इतिहास के विश्लेषण में यह सुविधा होती है कि घटना को किसी भी बिंदु पर रोक कर हम उसे अपनी इच्छानुसार रूप दे सकते हैं । इसीलिए किसीको यह नहीं पता चला कि उसके बाद सिंहगढ़ का किला पुनः औरंगजेब द्वारा हस्तगत कर लिया गया जिसे दोबारा तानाजी की तरह बाल कावले ने जीता । कुछ समय बाद फिर उसे मुगलों द्वारा छीन लिया गया जिसे महारानी ताराबाई ने वापस लिया । अंग्रेजों के तोपों की धमक सुनता हुआ अब यह किला भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के पास है । किस्सों में पढ़े गए इतिहास के अंतर्गत हमने तानाजी पर इतिहास को विराम लगा दिया और बाल कावले और ताराबाई अनचीन्हे रह गए  ।

अवचेतन में बिम्ब आरोपित करने की उस उम्र में जब मुझे न इतिहास से कोई सरोकार था न राजनीति से मैंने पहली बार इस किले की कहानी के आलोक में  गुद्दू वानखेड़े को अपने आंगन में मिट्टी का किला बनाते हुए देखा । “क्या बना रहे हो गुद्दू “ पूछने पर उसने कहा “यह दिवाली का किल्ला है ।“ मैंने प्रतिवाद किया “किल्ला नहीं इसे किला कहते हैं ।“  उसकी भाषाई अनभिज्ञता में दृढ़ता थी “ नहीं, यह रायगढ़ का किल्ला है, पिछले साल  मैंने सिंहगढ़ का किल्ला बनाया था । चलो साथ मिलकर बनाते हैं ।“

मैंने उसका साथ देते हुए ध्यान से किला बनाने की पूरी प्रक्रिया देखी और अगले साल दिवाली  पर स्वतन्त्र रूप से  किला बनाने की शुरुआत की । सबसे पहले जगह का चयन ज़रूरी  था । आँगन के  एक कोने में अमरुद के पेड़ के नीचे मुझे उपयुक्त जगह दिखाई दी । सबसे पहला काम था पास के जोगीतालाव मैदान से दो तसले मिटटी खोद कर लाना । मैं जैसे ही तसले लेकर मैदान पहुँचा मोहल्ले के बड़े भैया लोग खुदाई करते दिखे , मेरे दुबले पतले हाथ पांव देखकर उन्हें दया आ गई और उन्होंने दो तसले मिटटी मुझे गिफ्ट कर दी ।

अब इसके बाद आवश्यक सामग्री का जुगाड़ करना था, दो तीन फटे पुराने बोरे, टीन  के पुराने पीपे और ईटें, पानी,रस्सी  इत्यादी  फिर उसे सजाने के लिए छोटे छोटे सैनिक मिट्टी के खिलौने आदि आदि । सजावट का काम तो बाद का था पहले निर्माण जरुरी था । मैंने बीचोबीच टीन का पीपा रखा और आसपास ईटें जमा दी । यह किले का बेस था । फिर बाल्टी में मिटटी घोलकर उसमे बोरा डुबोया और उसे पीपे के आसपास ईट और लकड़ी टिकाकर बिछाते हुए एक पहाड़ी का रूप दिया । फिर पीपे और ईटों पर मिट्टी के लोंदे जमाते हुए दीवारें बनाई लकड़ी का पटिया रखकर छत बनाई और पानी लगाकर उसे चिकनाया ।अब पहाड़ी की बारी थी । जहाँ जहाँ गैप दिखी वहाँ मिट्टी से गुफाएँ बनाई । किले तक पहुँचने के लिए स्लोप बनाया और माचिस की तीलियों से रेलिंग के खम्भे बनाए । फिर धागे को स्याही से रंगकर उसकी रेलिंग बना दी । अगले चरण में  पहाड़ी पर जगह जगह ढेर सारी मिटटी बिछाई और वहाँ राई के दाने बिखेर दिए । 

अब पहाड़ी है तो झील भी जरुरी है ना  इसके लिए मुझे पहाड़ी की तलहटी में उपयुक्त जगह दिखाई दी  । मैंने एक बड़ा सा पॉलिथीन लिया और उसे नीचे बिछाकर आसपास मिट्टी की मेढ़ बना दी ताकि पानी बाहर न बहे , आसपास कुछ चमकीले पत्थर भी रख दिए जो चट्टानों का आभास दे रहे थे ।

अगले दिन जब मिट्टी कुछ सूख गई तो मैंने एक बर्तन में गेरू घोला और दूसरे  में चूना जिससे मैंने गुफाओं के प्रवेश द्वार और किले की दीवारों पर कलाकारी की । घर में थोड़ा सा लकड़ी का बुरादा पड़ा था, होली के बचे हुए हरे रंग से जिसे रंगकर मैंने किले के रास्ते पर घास की तरह बिछा दिया । पिछली बार दशहरे के मेले से मिटटी के सैनिक खरीदकर लाया था उन्हें किले के द्वार पर तैनात कर दिया, मिट्टी के शेर गुफ़ा के पास रख दिए और मोर को जंगल में जगह दे दी ।  अब मेरा किला लगभग तैयार था ।

अगले चार पांच दिनों तक मैं उन जगहों पर हल्का हल्का पानी छिड़कता रहा जहाँ मैंने राई बोई थी।  चौथे पाँचवे दिन जब राई से अंकुर निकलने लगे और मेरी पहाड़ी हरी भरी दिखाई देने लगी । हरियाली देखकर मेरा उत्साह बढ़ गया । अब दीवाली तक उसे सजाने का काम  ही शेष था  और रात में दिए जलाकर रौशनी की व्यवस्था भी करनी थी ।

जब मेरा किला पूर्ण हो गया और प्रदर्शन के लिए तैयार हो गया तो मै जाकर गुद्दू को बुला लाया और कहा “देख मेरा सिंह गढ़ का किला बन गया ।“ गुद्दू मेरा किला देखकर बहुत खुश हुआ  और तालियाँ बजाकर कहने लगा “वा कितना अच्छा किल्ला बनाया है । “ मैंने चीखकर कहा .. “ किल्ला नहीं, यह किला है ।“ 

शरद कोकास 

84 . भंडारा : अंग्रेज़ों के ज़माने के कोई जेलर भी वहाँ नहीं थे


प्राइमरी स्कूल के उन दिनों में स्कूल जाते हुए हम बच्चों की पीठ बिलकुल सीधी हुआ करती थी और आज के बच्चों की तरह पीठ पर ढेर सारी कापियों,किताबों,लंच बॉक्स और पानी की बोतल से भरा बस्ता नहीं होता था ৷ चाय रोटी खाकर सुबह घर से निकलते और प्यास लगने पर सामने वाली बड़ी सी टंकी के नीचे लगे जल से अपनी प्यास बुझाते ৷ एक निगाह टंकी के ऊपरी हिस्से में लगे मधुमक्खियों के छत्ते की और भी रहती थी ৷ पानी की टंकी से ही लगा हुआ  जेल परिसर था, जिसके भीतर अक्सर मेरी निगाह चली जाती थी ৷

सुबह सुबह पुलिस कर्मियों के रिहायशी क्वार्टर्स के सामने सुलगती पत्थर के कोयले की अंगीठी से उठता धुआं, सामने खेलते हुए बच्चे और आंगन सींचती औरतें, मेरी नज़रों के कैनवास में रोज़ यही दृश्य होता 

जहाँ क्वार्टर ख़त्म होते थे वहाँ से शुरू होती थी एक बड़ी सी किलेनुमा दीवार जिसके बीचो बीच एक बुलंद दरवाज़ा था ৷


यह दीवार जेल की दीवार थी जो किसी किले की दीवार जैसी दिखाई देती थी ৷ एक दिन गुरूजी ने बताया कि दरअसल ज़िला जेल बनने से पहले यह एक किला ही था ৷ इसीलिए इसके चारों ओर  एक खाई खुदी हुई है ৷ कहते हैं, जब कोई दुश्मन किले पर आक्रमण करता था तो इस खाई को खौलते हुए पानी से भर दिया जाता था ताकि दुश्मन इसे पार कर किले की दीवार तक नहीं पहुँच सके ৷” मैंने गुरूजी से पूछा “ लेकिन इतना सारा पानी वे लोग खौलाते कैसे थे ?” इस पर उन्होंने ऐसे घूरकर मुझे देखा कि फिर जवाब मांगने की हिम्मत ही नहीं हुई ৷

 जेल की इस इमारत के भीतर का दृश्य कभी मेरी कल्पना में नहीं था । शुरू शुरू में जब भी मैं उस किलेनुमा इमारत के भीतर के दृश्य की कल्पना करता तो सोचता कि भीतर सिंदबाद के किस्सों में आने वाली घाटी की तरह कोई घाटी होगी, जहाँ बेशकीमती हीरे बिखरे होंगे, जिन पर यदि हम मांस का टुकड़ा फेकेंगे तो कोई हीरा भी उसमे चिपक जायेगा और फिर कोई चील उसे लेकर बाहर आ जायेगी ৷ कुछ बड़े होने पर मेरे सामान्य ज्ञान में वृद्धि हुई कि हीरे वाली घाटियाँ केवल कहानी में हुआ करती हैं ৷ इस चारदीवारी के भीतर दरअसल जो जगह है उसे जेल कहते  है और जो लोग चोरी, डकैती, हत्या जैसे अपराध करते हैं उन्हें कोर्ट से सज़ा मिलने पर इस चारदीवारी यानी जेल के भीतर डाल दिया जाता है ৷ फिर यहाँ से बाहर निकलने की कोई गुंजाईश नहीं होती ৷

 एक दिन बाबूजी से मैंने पूछा “ बाबूजी. भीतर जो कैदी रहते हैं उनके लिए वहाँ कोई बाज़ार भी है क्या ?” बाबूजी हँसने लगे  “नहीं, कैदियों को बाज़ार की क्या ज़रूरत, वे भीतर बनी हुई कोठरियों में रहते हैं और उन्हें खाना, कपड़ा सब  जेल के भीतर ही मिल जाता है ৷” मैंने फिर पूछा “ तो क्या उन्हें बिना कोई काम किये खाना मिल जाता है ? “ बाबूजी ने कहा “ बिना काम के खाना कैसे मिलेगा, सरकार उनसे काम करवाती है, तब न उन्हें खाना देती है ৷” मेरा अगला प्रश्न था “ लेकिन वे काम क्या करते होंगे, भीतर न कोई ऑफिस है, न स्कूल ,न कोई कारखाना ?” 

बाबूजी ने पलंग की निवार की ओर  ऊँगली दिखाते हुए कहा “ यह जो निवार है ना, यह कैदियों ने ही बनाई है ৷ इसे जेल ब्रांड निवार कहते हैं ৷


जेल के भीतर कैदी ऐसे ही बढ़ईगिरी,लुहारी जैसे छोटे मोटे काम करते हैं, जेल की ज़मीन पर अनाज और सब्जियाँ भी उगाते हैं ৷ इसके बदले उन्हें खाने कपडे के अलावा अलग से मजदूरी भी मिलती है ৷ हाँ बीड़ी,सिगरेट वगैरह उन्हें नहीं मिलता ৷“

एक दिन स्कूल से लौटते हुए मैं सीधे रास्ते की बजाय जेल के पीछे की ओर से एक  लम्बा चक्कर लगाकर रिंग रोड से घर की ओर लौटा । यह नागपुर से भंडारा रोड स्टेशन की ओर जाने वाला रास्ता था, इसे रिंग रोड कहते थे ৷ उस ओर जेल के पीछे का हिस्सा था जहाँ दीवार के बाहर जेल के ही खेत थे ৷ इन खेतों में कुछ कैदी काम करते हुए दिखाई दे रहे थे । बाबूजी बिलकुल सही कह रहे थे ৷

घर लौटकर मैंने बाबूजी से कहा  “ बाबूजी, आज मैंने देखा, सच्ची में जेल के पीछे वाले रोड पर वहाँ खेत में वो.. सफ़ेद ड्रेस पहने कैदी काम कर रहे थे ৷” इससे पहले कि बाबूजी कोई प्रतिक्रिया दे पाते, एक नया प्रश्न फिर उपस्थित था ৷ “ बाबूजी, जब इन कैदियों को खुले में काम करने का मौका मिला है तो  यह लोग भाग क्यों नहीं जाते ?” बाबूजी ने कहकहा लगाया “ लगता है तुमने उनके सर पर बन्दूक लिए किसी सिपाही को खड़े हुए नहीं देखा ৷ “बाबूजी एक पल के लिए रुके “लेकिन तुम उधर कहाँ चले गए थे  ? सीधे घर क्यों नहीं आये ? बाबूजी की इस भूमिका परिवर्तन के लिए मैं पहले से तैयार था उन्हें नहीं पता था कि टेढ़े मेढ़े रास्तों पर भटकने का साहसी काम तो मैं शुरू से करता आ रहा हूँ ৷ मैंने अपना मुँह खोला और कहा “वो शरद प्रमोद खेलने के लिए बुला रहे हैं “ इससे पहले कि बाबूजी मेरे जवाब का परीक्षण करते  मैं यह जा और वह जा ৷

जेल सम्बन्धी जिज्ञासा से उपजी मेरी प्रश्नावली को विराम तब मिला जब बाबूजी की एक छात्रा के पति वहाँ जेल अधिकारी बनकर आये और उनके सौजन्य से हमें सपरिवार भीतर जाने का अवसर प्राप्त हुआ । उस समय हम लोगों ने पहली बार जेल के भीतर की बैरकें और वहाँ का वातावरण देखा । वह सब कुछ वैसा ही था जैसा बाद में कभी फिल्मों में देखा ৷ हाँ कैदियों के बीच मारपीट वाला शॉट उस समय घटित नहीं हुआ था और अंग्रेज़ों के ज़माने के कोई जेलर भी वहाँ नहीं थे ৷

शरद कोकास