प्राइमरी स्कूल के उन दिनों में स्कूल जाते हुए हम बच्चों की पीठ बिलकुल सीधी हुआ करती थी और आज के बच्चों की तरह पीठ पर ढेर सारी कापियों,किताबों,लंच बॉक्स और पानी की बोतल से भरा बस्ता नहीं होता था ৷ चाय रोटी खाकर सुबह घर से निकलते और प्यास लगने पर सामने वाली बड़ी सी टंकी के नीचे लगे जल से अपनी प्यास बुझाते ৷ एक निगाह टंकी के ऊपरी हिस्से में लगे मधुमक्खियों के छत्ते की और भी रहती थी ৷ पानी की टंकी से ही लगा हुआ जेल परिसर था, जिसके भीतर अक्सर मेरी निगाह चली जाती थी ৷ सुबह सुबह पुलिस कर्मियों के रिहायशी क्वार्टर्स के सामने सुलगती पत्थर के कोयले की अंगीठी से उठता धुआं, सामने खेलते हुए बच्चे और आंगन सींचती औरतें, मेरी नज़रों के कैनवास में रोज़ यही दृश्य होता
जहाँ क्वार्टर ख़त्म होते थे वहाँ से शुरू होती थी एक बड़ी सी किलेनुमा दीवार जिसके बीचो बीच एक बुलंद दरवाज़ा था ৷ यह दीवार जेल की दीवार थी जो किसी किले की दीवार जैसी दिखाई देती थी ৷ एक दिन गुरूजी ने बताया कि दरअसल ज़िला जेल बनने से पहले यह एक किला ही था ৷ इसीलिए इसके चारों ओर एक खाई खुदी हुई है ৷ कहते हैं, जब कोई दुश्मन किले पर आक्रमण करता था तो इस खाई को खौलते हुए पानी से भर दिया जाता था ताकि दुश्मन इसे पार कर किले की दीवार तक नहीं पहुँच सके ৷” मैंने गुरूजी से पूछा “ लेकिन इतना सारा पानी वे लोग खौलाते कैसे थे ?” इस पर उन्होंने ऐसे घूरकर मुझे देखा कि फिर जवाब मांगने की हिम्मत ही नहीं हुई ৷
जेल की इस इमारत के भीतर का दृश्य कभी मेरी कल्पना में नहीं था । शुरू शुरू में जब भी मैं उस किलेनुमा इमारत के भीतर के दृश्य की कल्पना करता तो सोचता कि भीतर सिंदबाद के किस्सों में आने वाली घाटी की तरह कोई घाटी होगी, जहाँ बेशकीमती हीरे बिखरे होंगे, जिन पर यदि हम मांस का टुकड़ा फेकेंगे तो कोई हीरा भी उसमे चिपक जायेगा और फिर कोई चील उसे लेकर बाहर आ जायेगी ৷ कुछ बड़े होने पर मेरे सामान्य ज्ञान में वृद्धि हुई कि हीरे वाली घाटियाँ केवल कहानी में हुआ करती हैं ৷ इस चारदीवारी के भीतर दरअसल जो जगह है उसे जेल कहते है और जो लोग चोरी, डकैती, हत्या जैसे अपराध करते हैं उन्हें कोर्ट से सज़ा मिलने पर इस चारदीवारी यानी जेल के भीतर डाल दिया जाता है ৷ फिर यहाँ से बाहर निकलने की कोई गुंजाईश नहीं होती ৷
एक दिन बाबूजी से मैंने पूछा “ बाबूजी. भीतर जो कैदी रहते हैं उनके लिए वहाँ कोई बाज़ार भी है क्या ?” बाबूजी हँसने लगे “नहीं, कैदियों को बाज़ार की क्या ज़रूरत, वे भीतर बनी हुई कोठरियों में रहते हैं और उन्हें खाना, कपड़ा सब जेल के भीतर ही मिल जाता है ৷” मैंने फिर पूछा “ तो क्या उन्हें बिना कोई काम किये खाना मिल जाता है ? “ बाबूजी ने कहा “ बिना काम के खाना कैसे मिलेगा, सरकार उनसे काम करवाती है, तब न उन्हें खाना देती है ৷” मेरा अगला प्रश्न था “ लेकिन वे काम क्या करते होंगे, भीतर न कोई ऑफिस है, न स्कूल ,न कोई कारखाना ?”
बाबूजी ने पलंग की निवार की ओर ऊँगली दिखाते हुए कहा “ यह जो निवार है ना, यह कैदियों ने ही बनाई है ৷ इसे जेल ब्रांड निवार कहते हैं ৷ जेल के भीतर कैदी ऐसे ही बढ़ईगिरी,लुहारी जैसे छोटे मोटे काम करते हैं, जेल की ज़मीन पर अनाज और सब्जियाँ भी उगाते हैं ৷ इसके बदले उन्हें खाने कपडे के अलावा अलग से मजदूरी भी मिलती है ৷ हाँ बीड़ी,सिगरेट वगैरह उन्हें नहीं मिलता ৷“
एक दिन स्कूल से लौटते हुए मैं सीधे रास्ते की बजाय जेल के पीछे की ओर से एक लम्बा चक्कर लगाकर रिंग रोड से घर की ओर लौटा । यह नागपुर से भंडारा रोड स्टेशन की ओर जाने वाला रास्ता था, इसे रिंग रोड कहते थे ৷ उस ओर जेल के पीछे का हिस्सा था जहाँ दीवार के बाहर जेल के ही खेत थे ৷ इन खेतों में कुछ कैदी काम करते हुए दिखाई दे रहे थे । बाबूजी बिलकुल सही कह रहे थे ৷
घर लौटकर मैंने बाबूजी से कहा “ बाबूजी, आज मैंने देखा, सच्ची में जेल के पीछे वाले रोड पर वहाँ खेत में वो.. सफ़ेद ड्रेस पहने कैदी काम कर रहे थे ৷” इससे पहले कि बाबूजी कोई प्रतिक्रिया दे पाते, एक नया प्रश्न फिर उपस्थित था ৷ “ बाबूजी, जब इन कैदियों को खुले में काम करने का मौका मिला है तो यह लोग भाग क्यों नहीं जाते ?” बाबूजी ने कहकहा लगाया “ लगता है तुमने उनके सर पर बन्दूक लिए किसी सिपाही को खड़े हुए नहीं देखा ৷ “बाबूजी एक पल के लिए रुके “लेकिन तुम उधर कहाँ चले गए थे ? सीधे घर क्यों नहीं आये ? बाबूजी की इस भूमिका परिवर्तन के लिए मैं पहले से तैयार था उन्हें नहीं पता था कि टेढ़े मेढ़े रास्तों पर भटकने का साहसी काम तो मैं शुरू से करता आ रहा हूँ ৷ मैंने अपना मुँह खोला और कहा “वो शरद प्रमोद खेलने के लिए बुला रहे हैं “ इससे पहले कि बाबूजी मेरे जवाब का परीक्षण करते मैं यह जा और वह जा ৷
जेल सम्बन्धी जिज्ञासा से उपजी मेरी प्रश्नावली को विराम तब मिला जब बाबूजी की एक छात्रा के पति वहाँ जेल अधिकारी बनकर आये और उनके सौजन्य से हमें सपरिवार भीतर जाने का अवसर प्राप्त हुआ । उस समय हम लोगों ने पहली बार जेल के भीतर की बैरकें और वहाँ का वातावरण देखा । वह सब कुछ वैसा ही था जैसा बाद में कभी फिल्मों में देखा ৷ हाँ कैदियों के बीच मारपीट वाला शॉट उस समय घटित नहीं हुआ था और अंग्रेज़ों के ज़माने के कोई जेलर भी वहाँ नहीं थे ৷
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