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10 जून 2026

147. भंडारा : पिज्जा बर्गर खाने वाली अगले जन्म में क्या बनेगी

सायास किये जाने वाले उपवास में भूख मनुष्य को आध्यात्मिक बना देती है । वह आत्मा परमात्मा के गहन चिंतन में डूब जाता है । उसकी वैज्ञानिक सोच की लाश पर पाप - पुण्य, मोक्ष,लोक-परलोक आदि की अवधारणाएं चीलों की तरह मंडराने लगती हैं ।

माँ आर्यसमाजी परिवार से आई थीं, न कभी कोई व्रत उन्होंने किया था न कभी वे मंदिर गई थीं । विवाह से पूर्व ईश्वर की किसी साकार प्रतिमा की भी वे उपासक नहीं थी, लेकिन उन्हें ज्ञात था कि भारतीय स्त्री के समाज में विवाह अपने आप में एक धर्म परिवर्तन होता है और अनिच्छापूर्वक ही सही ससुराल का धर्म उसे स्वीकारना पड़ता है । फिर संयुक्त परिवार में पति परमेश्वर के अलावा श्वसुर परमेश्वर, जेठ परमेश्वर, देवर परमेश्वर के साथ साथ छोटे मोटे फूफा ससुर, मामा ससुर जैसे आधे-पूरे ईश्वर भी होते हैं अतः वे जो कहें वही उसका धर्मं, वही उनका ईश्वर।

बाबूजी शिव पार्वती के उपासक थे सो माँ को उपहार में यही देवता मिले, साथ में उनके मंदिर, उनके सावन सोमवार के व्रत और हरतालिका जैसे पर्व भी मिले । हरतालिका अर्थात तीज का पर्व,बैलों के त्यौहार पोले के तीसरे दिन आता था । एक दिन बाबूजी से पूछा मैंने कि “बैल तो शिवजी का वाहन है फिर बैलों का त्यौहार पहले और शिवजी का बाद में ऐसा क्यों ?” तो उन्होंने कहा  “ शिवजी को बाहर जाना है तो अपना वाहन तैयार करना होगा ना हम कैसे बाहर जाने से पहले अपनी साइकिल की साफ सफाई करते हैं ।“

हरतालिका के दिन बाबूजी छपरी के एक कोने में एक टेबल पर शिव पार्वती की प्रतिमा रखते और उस पर एक लाइट लगाते थे । वह लाइट भी कुछ स्पेशल थी । टिन के एक गोल डिब्बे में ढक्कन की जगह एक लाल रंग का काँच लगा था । यह वह काँच था जिसे रेल्वे में सिग्नल के लिए इस्तेमाल किया जाता था  यह उन्हे कहीं कबाड़ में मिल गया था । ड़िब्बे की तली में एक छेद कर उसमें होल्डर व बल्ब लगाने की व्यवस्था थी । उस लैम्प से गाढ़े रंग की लाल रोशनी निकलती थी और मूर्ति से होती हुई पूरे कमरे में फैल जाती थी । 

विभिन्न प्रकार के पौधों की पत्तियों और फूलों से सजावट के अलावा नीचे वाली टेबल पर गेहूँ के जवारे रखे जाते थे जिन्हे माँ भुजलिया कहा करती थी । पूजा के लिये हम बच्चे बेल पत्ती, दुर्वा, और फूल बटोरकर लाते थे । माँ दिन और रात का निर्जला उपवास करती थी । दो तीन घंटे के अंतराल पर पूजा करती थी । पूजा के लिये आसपास की महिलायें भी आती थीं और सजावट की प्रशंसा करती थीं । रात के समय पंडित लक्षमण प्रसाद शुक्ला आते थे और कथा कहते थे ।  

यह कथा सुनना हम लोगों के लिये किसी मनोरंजन कार्यक्रम से कम नहीं होता था । इस कथा के द्वारा ही मैने जाना कि ब्राह्मणों द्वारा किस तरह पाप-पुण्य आदि का भय दिखाकर सामान्य जनता पर अपना वर्चस्व कायम किया गया। पंडित जी बताते थे कि जो स्त्री इस व्रत को ठीक ढंग से नहीं करेगी वह अगले जन्म में पशु योनि में पैदा होगी उदाहरणार्थ जो स्त्री व्रत के दौरान जल ग्रहण करेगी वह अगले जन्म में मछली या मगरमच्छ बनेगी, फल खाने वाली स्त्री बंदरिया बनेगी, मीठा खाने वाली चींटी या मक्खी बनेगी या माँस भक्षण करने वाली स्त्री लोमड़ी या लकड़बग्घा बनेगी आदि आदि । इसके अलावा रात में सो जाने वाली और पति से संसर्ग करने वाली स्त्रियों के लिये भी बहुत सी भयावह बातें वे बताते थे ।

बाबूजी पुनर्जन्म जैसी अवधारणाओं में विश्वास नहीं रखते थे लेकिन इन सब बातों का बहुत आनंद लिया करते थे । जब मुझे अक्ल आई तो एक दिन मैंने भी पंडित जी से सवाल किया कि “यह तो कहीं नहीं लिखा है कि समोसा, कचोड़ी, जलेबी आदि खाने वाली स्त्री क्या बनेगी, तो यह सब उपवास में खाया जा सकता है क्या ?” पहले तो वे हंसकर टाल देते फिर उसी तरह डाँटकर चुप करा देते थे जिस तरह पूर्व में ईश्वर और धर्म का भय दिखाकर सामान्य मनुष्य को चुप करा दिया जाता था । 

बाबूजी, माँ के निर्जला उपवास पर चिन्ता प्रकट करते और कहते “तुम चाय पी लिया करो इसलिये कि कथा में इस बात का कहीं उल्लेख नहीं है कि चाय पीने वाली स्त्री क्या बनेगी ।“ माँ इस बात का प्रतिवाद करती कि चाय मे चीनी होती है सो चींटी तो बनना पड़ेगा । तब बाबूजी कहते  “तो बिना शक्कर की पिया करो ।“ तब वे कहतीं  “चाय में दूध तो फिर भी रहेगा और मुझे भैंस या गाय बनना पसन्द नहीं ।“ फिर बात पानी पर आ जाती और माँ को मछली बनना भी गवारा नहीं होता । वैसे बाद में माँ ने चाय पीनी शुरू कर दी थी और अंत में मधुमेह हो जाने के बाद डॉक्टर की सलाह मानकर व्रत रखना भी बन्द कर दिया । उन्हें उसी दिन समझ में आ गया कि डॉक्टर पंडित से बड़ा होता है । पूजा वे फिर भी करती थीं और घर में शिव की स्थापना का कार्यक्रम बन्द हो जाने के बाद पड़ोस में जाकर पूजा कर लिया करती थीं ।

पूजा पाठ, व्रत उपवास की निरर्थकता को भलीभांति समझ जाने के बावजूद भी बचपन के उन दृश्यों की स्मृतियाँ मुझे बहुत आकर्षित करती  हैं । जेहन में अब भी तैरते हैं, हरतालिका के अगले दिन सर पर सुनहली भुजलियों से भरी टोकरी रखे खाम तलाव स्थित बहिरंगेश्वर मंदिर की ओर जाती स्त्रियों के झुण्ड , तालाब के जल की सतह  पर तैरते हुए अनगिनत दीपक, और वैनगंगा की रेत पर गीली रेत से बने शिवलिंग । मेरे मन को बहुत सुकून देते हैं यह दृश्य । 

दृश्य बदलते जाते हैं, मेरे जैसे बच्चे बड़े हो जाते हैं लेकिन मेरी ही तरह के अनेक बच्चे अभी भी परिदृश्य में उपस्थित हैं जो पूछते हैं “पंडित जी, तो फिर पिज्जा बर्गर खाने वाली स्त्री अगले जन्म में क्या बनेगी ?” पंडितों के पास आज भी उनके सवालों का जवाब नहीं है वे अब उन्हें धर्म और ईश्वर  का ही नहीं राजनीति का भय दिखाकर भी चुप करा देते हैं । 

अफ़सोस यही है कि दुनिया में ऐसे पंडितों की जमात बढ़ती जा रही है और उनका क्षेत्र धर्म के अलावा राजनीति भी हो गया है, उनकी उँगलियों से लटके धागों में बंधे जाने कितने बच्चे कितने युवा आज भी बिना कोई सवाल पूछे उनके इशारों पर नफ़रत फैला रहे हैं, विध्वंस कर रहे हैं, हत्याएँ कर रहे हैं । फिर भी मुझे बच्चों की आनेवाली पीढी पर भरोसा है कि वे अपनी वैज्ञानिक सोच मजबूत करेंगे और इनसे धर्म के ही नहीं राजनीति के अंकुश भी छीन कर उन्हें नष्ट कर देंगे ।







146 भूखे भजन न होय गोपाला


व्रत,उपवास,फास्ट, रोजा सब कुछ मेरे लिए अपने बचपन में नित्य प्रति के भोजन में सुखद परिवर्तन हेतु घटित होने वाले एक उपक्रम से अधिक कुछ नहीं था । अपनी मासूमियत में एक दिन मैंने बाबूजी से सवाल किया था “क्या उपवास रखने से भगवान प्रसन्न हो जाते हैं ?” मेरे हर अगले सवाल को भांप लेने की क्षमता रखने वाले बाबूजी ने अपने डिफेंस में मुस्कुराते हुए कहा था “भगवान प्रसन्न होते हैं या नहीं यह तो पता नहीं लेकिन आमाशय अवश्य प्रसन्न हो जाता है इसलिए कि उसे एक दिन का विश्राम मिल जाता है ।“

इस सवालीराम के तरकश में भी सवालों के तीर कम नहीं थे “कैसे प्रसन्न हो जाता होगा ? उसे तो हम सिंघाड़े के आटे का मीठा हलवा, साबूदाने की खिचड़ी और बड़े, दूध और शकरकंद की खीर, भुनी मूंगफल्ली और गुड़ की पपड़ी जैसी सुस्वादु किन्तु गरिष्ठ चीज़ों से भर देते हैं, थोडा ज्यादा खा लेने से उस पर अतिरिक्त दबाव नहीं पड़ता होगा ?” बाबूजी मुस्कुराते और कहते “ बिलकुल ठीक, उपवास खाने-पीने के लिए थोड़े ही होता है, ठीक है खाना चाहिए लेकिन कम मात्रा में खाना चाहिए ।“ बाबूजी जानते थे कि उनके जवाब से मेरी संतुष्टि नहीं हुई थी ।

उपवास के दिन बनने वाली इन विविध वस्तुओं के ‘जैभिक मोह’ में मैंने बचपन में  ही सीधे सीधे यह तय कर लिया था कि व्रत तो रखेंगे लेकिन किसी भक्ति भावना से नहीं बल्कि विविध सुस्वादु भोजन के आस्वादन के लिए । नवरात्र का व्रत रखने की कोई परंपरा हमारे यहाँ नहीं थी लेकिन माँ बाबूजी, सावन के छह सोमवार, महाशिवरात्रि, रामनवमी और जन्माष्टमी के व्रत अनिवार्य रूप से रखते थे ।

इन त्योहारों के आने से कुछ दिन पूर्व ही मुझे इस लज्ज़तदार फलाहार के स्वप्न आने लगते । सपने में मुझे दूध की नदियाँ और साबूदाने के पहाड़ दिखाई देते । दूध में मसलकर मिलाये गए मीठे मीठे शकरकंद मुझे बुलाने लगते । मेवे के लड्डुओं के साथ मैं फ़ुटबाल खेलता और पेड़ पर लगी छेने की मिठाईयां, रसगुल्ले और चमचम तोड़ तोड़कर खाता । त्यौहार के दिन मैं सुबह से ही सजग हो जाता और इन पकवानों को बनाने में माँ की मदद भी करता जैसे सिंघाड़े के आटे से बनी बर्फी को छोटे छोटे टुकड़ों में काटना, भुनी मूंगफल्ली को खलबत्ते में कूटना आदि आदि । 

महाराष्ट्र में फलाहार को ‘फराळ’ या ‘फरार’ कहते हैं जो फलाहार का ही अपभ्रंश है बाजारों में इस अवसर पर विशेष रूप से बना ‘फराळी चिवडा’ मिलता है । अब यह शब्द व्रत में खाए जाने वाले हर तरह के भोजन के लिए लागू होता है । इस ‘फराळ’ में क्या क्या होना चाहिए इस पर विभिन्न व्रत विशेषज्ञों के अलग अलग मत है । उपवास में अनाज निषिद्ध है लेकिन कुट्टू या बकव्हीट चलता है । धान वाला चावल बिलकुल मना है लेकिन सामो चावल या पसई के चावल चलते हैं । कहीं हरी मिर्च अलाउड है तो कहीं उसकी जगह काली मिर्च चलती है । दूध और दूध से बनी चीज़ें सर्वमान्य हैं लेकिन हरछठ के व्रत में भैंस के दूध के प्रयोग की अनुमति नहीं है । 

मेरा कन्फ्यूज़न तब दूर हुआ जब मैंने अमृता प्रीतम की एक किताब मे पढ़ा कि गुरूद्वारे में बनने वाला हलुआ यूँ तो साधारण हलुआ ही होता है लेकिन जब उस पर कृपाण या तलवार घुमाई जाती है तो वह कढ़ाह प्रसाद बन जाता है । व्रत में खाई जाने वाली वस्तुओं,प्रसाद आदि को भी हम इसी तरह स्थान और परम्परा के अनुसार तय करते हैं । वैसे भी स्थान विशेष के अनुसार ढेर वृत कथाएँ हैं । कहानियों में तो आस्था विष को भी प्रभावहीन कर देती है । 

हमारे घर में किसी भी  त्योहार पर बहुत ज़्यादा धूमधाम नहीं होती थी । महाशिवरात्रि पर माँ बाबूजी उपवास रखते थे और हम लोगों को साबूदाने की खिचड़ी, उबले हुए शकरकन्द और दूध, सिंघाड़े के आटे का हलुवा और बर्फी,मखाने की खीर, नारियल की बर्फ़ी तथा आलू के या केले के चिप्स खाने को मिलते थे । उस दिन नित्य प्रति वाला भोजन नहीं बनता था । हम लोगों को उन  त्योहारों की प्रतीक्षा रहती थी जिनमे उपवास किया जाता था । 

सावन के महीने में भी माँ और बाबूजी दोनों उपवास रखते  थे । महाराष्ट्र के पंचांग के अनुसार सावन का महीना , हिन्दी पंचांग के सावन के महीने के पन्द्रह दिन बाद प्रारम्भ होता था । माँ हिन्दी पंचांग के अनुसार अपने व्रत रखना प्रारम्भ कर देती थी और मराठी पंचांग तक करती थी इसलिये वे डेढ़ माह तक सावन मनाती थीं और छह सावन सोमवार व्रत करती थीं । हम लोग जब उन्हे ऐसा करने के लिये मना करते तो वे कहती ..हँ... ठीक है इसी बहाने ज़्यादा पुण्य मिल जायेगा । “सावन सोमवार का व्रत एक समय का ही होता था इसलिये उस दिन शाम का भोजन नियत समय से पूर्व ही तैयार हो जाता था । दिन में विविध व्यंजनों की कोई गुंजाईश नहीं होती थी । सावन सोमवार को वे खामतलाव स्थित बहिरंगेश्वर शिव मन्दिर अवश्य जाती थीं । उस दिन वहाँ बहुत भीड़ रहती थी । उपवास के बावजूद माँ सबके लिए खाना बनाती और सबको खाना खिलाकर अंत में आराम करती थी 

व्रत और सुस्वादु पकवानों के अंतर्संबंध को लेकर एक बार जब मैंने अपने मित्र ख़ालिद से बात की तो उसने बताया कि हम लोग दिन भर जो रोज़ा रखते हैं उसमे पानी तो क्या अपना थूक तक नहीं गुटकते । इस बात से मैं बहुत प्रभावित हुआ । नईम को तो मैं बचपन से देखता आ रहा था वह भी इसी तरह का रोजा रखता था । मुझे यह देखकर बहुत आश्चर्य होता था । लेकिन शाम को जब वे रोजा खोलते थे तो तरह तरह के सुस्वादु भोजन उनकी प्रतीक्षा करते रहते थे । नईम के घर कई बार इफ्तारी की इस दावत में शरीक होने का अवसर मुझे मिला उसके बाद से रोजा भी मुझे उपवास की तरह लगने लगा ।  यद्यपि बीच बीच में कुछ न खाकर एकबार में ही खा लेने का तरीका मुझे ज़्यादा अच्छा लगा । खैर धर्म कोई भी हो इस तरह की परम्पराएँ भोजन और व्रत के मेरे समीकरण में कोई विशेष परिवर्तन नहीं कर पाई । 

आज ग्लूकोज़ टालरेंसी अर्थात शरीर में मीठा जज़्ब करने की क्षमता देखते हुए डॉक्टर ने लम्बे समय तक भूखे रहने या व्रत रखने के लिए मना कर दिया है लेकिन व्रत में इस्तेमाल होने वाली सुस्वादु वस्तुएँ खाने के लिए मना नहीं किया है ।  

आप लोगों के लिए पुनः ऐसी ही कुछ सुस्वादु व्यंजनों के नाम लिख रहा हूँ आप चाहें  खाने के लिए व्रत रखें या भूखे रहने के लिए आप इनके नाम तो  पढ़ ही सकते हैं यथा सिंघाड़े के आटे का मीठा हलवा, सिंघाड़े के आटे की या नारियल की बर्फी, साबूदाने की खिचड़ी और साबूदाने के बड़े , साबूदाने का पुलाव सिंघाड़े के पकौड़े , कुट्टू की रोटी, पराठे या चीला या बड़े ,कच्चे केले या आलू की डीप फ्राय टिकिया, अरबी के फलाहारी कबाब,साबूदाना ककड़ी की थालीपीठ,खीरे आलू और मूंगफल्ली का सलाद, फलों का सलाद, फ्रूट कस्टर्ड,श्रीखंड, फलाहारी भेल, फलाहारी चटनी, भुने हुए आलू की कालीमिर्च और सेंधा नमक वाली भेलचाट ,लौकी या कद्दू का मीठा हलवा, लौकी का मसालेदार शरबत, दूध के विभिन्न आइटम , बादाम वाला दूध, मिल्क शेक, केसरिया लस्सी , सामो चावल की मीठी खीर, मीठा दही , खोये की बर्फी, कलाकंद, शकरकंद की खीर , बादाम शेक, मेवे के लड्डू , गुलाब और बादाम की खीर, गुलकंद की आइसक्रीम आदि आदि ।

इनके अलावा भी आपको यदि कुछ नाम याद आते हैं तो अवश्य बताएँ  सोच रहा हूँ इस बार व्रत रख ही लूं ।    


शरद कोकास