10 जून 2026

146 भूखे भजन न होय गोपाला



व्रत,उपवास,फास्ट, रोजा सब कुछ मेरे लिए अपने बचपन में नित्य प्रति के भोजन में सुखद परिवर्तन हेतु घटित होने वाले एक उपक्रम से अधिक कुछ नहीं था । अपनी मासूमियत में एक दिन मैंने बाबूजी से सवाल किया था “क्या उपवास रखने से भगवान प्रसन्न हो जाते हैं ?” मेरे हर अगले सवाल को भांप लेने की क्षमता रखने वाले बाबूजी ने अपने डिफेंस में मुस्कुराते हुए कहा था “भगवान प्रसन्न होते हैं या नहीं यह तो पता नहीं लेकिन आमाशय अवश्य प्रसन्न हो जाता है इसलिए कि उसे एक दिन का विश्राम मिल जाता है ।“


इस सवालीराम के तरकश में भी सवालों के तीर कम नहीं थे “कैसे प्रसन्न हो जाता होगा ? उसे तो हम सिंघाड़े के आटे का मीठा हलवा, साबूदाने की खिचड़ी और बड़े, दूध और शकरकंद की खीर, भुनी मूंगफल्ली और गुड़ की पपड़ी जैसी सुस्वादु किन्तु गरिष्ठ चीज़ों से भर देते हैं, थोडा ज्यादा खा लेने से उस पर अतिरिक्त दबाव नहीं पड़ता होगा ?” बाबूजी मुस्कुराते और कहते “ बिलकुल ठीक, उपवास खाने-पीने के लिए थोड़े ही होता है, ठीक है खाना चाहिए लेकिन कम मात्रा में खाना चाहिए ।“ बाबूजी जानते थे कि उनके जवाब से मेरी संतुष्टि नहीं हुई थी ।


उपवास के दिन बनने वाली इन विविध वस्तुओं के ‘जैभिक मोह’ में मैंने बचपन में  ही सीधे सीधे यह तय कर लिया था कि व्रत तो रखेंगे लेकिन किसी भक्ति भावना से नहीं बल्कि विविध सुस्वादु भोजन के आस्वादन के लिए । नवरात्र का व्रत रखने की कोई परंपरा हमारे यहाँ नहीं थी लेकिन माँ बाबूजी, सावन के छह सोमवार, महाशिवरात्रि, रामनवमी और जन्माष्टमी के व्रत अनिवार्य रूप से रखते थे ।


इन त्योहारों के आने से कुछ दिन पूर्व ही मुझे इस लज्ज़तदार फलाहार के स्वप्न आने लगते । सपने में मुझे दूध की नदियाँ और साबूदाने के पहाड़ दिखाई देते । दूध में मसलकर मिलाये गए मीठे मीठे शकरकंद मुझे बुलाने लगते । मेवे के लड्डुओं के साथ मैं फ़ुटबाल खेलता और पेड़ पर लगी छेने की मिठाईयां, रसगुल्ले और चमचम तोड़ तोड़कर खाता । त्यौहार के दिन मैं सुबह से ही सजग हो जाता और इन पकवानों को बनाने में माँ की मदद भी करता जैसे सिंघाड़े के आटे से बनी बर्फी को छोटे छोटे टुकड़ों में काटना, भुनी मूंगफल्ली को खलबत्ते में कूटना आदि आदि । 


महाराष्ट्र में फलाहार को ‘फराळ’ या ‘फरार’ कहते हैं जो फलाहार का ही अपभ्रंश है बाजारों में इस अवसर पर विशेष रूप से बना ‘फराळी चिवडा’ मिलता है । अब यह शब्द व्रत में खाए जाने वाले हर तरह के भोजन के लिए लागू होता है । इस ‘फराळ’ में क्या क्या होना चाहिए इस पर विभिन्न व्रत विशेषज्ञों के अलग अलग मत है । उपवास में अनाज निषिद्ध है लेकिन कुट्टू या बकव्हीट चलता है । धान वाला चावल बिलकुल मना है लेकिन सामो चावल या पसई के चावल चलते हैं । कहीं हरी मिर्च अलाउड है तो कहीं उसकी जगह काली मिर्च चलती है । दूध और दूध से बनी चीज़ें सर्वमान्य हैं लेकिन हरछठ के व्रत में भैंस के दूध के प्रयोग की अनुमति नहीं है । 


मेरा कन्फ्यूज़न तब दूर हुआ जब मैंने अमृता प्रीतम की एक किताब मे पढ़ा कि गुरूद्वारे में बनने वाला हलुआ यूँ तो साधारण हलुआ ही होता है लेकिन जब उस पर कृपाण या तलवार घुमाई जाती है तो वह कढ़ाह प्रसाद बन जाता है । व्रत में खाई जाने वाली वस्तुओं,प्रसाद आदि को भी हम इसी तरह स्थान और परम्परा के अनुसार तय करते हैं । वैसे भी स्थान विशेष के अनुसार ढेर वृत कथाएँ हैं । कहानियों में तो आस्था विष को भी प्रभावहीन कर देती है । 


हमारे घर में किसी भी  त्योहार पर बहुत ज़्यादा धूमधाम नहीं होती थी । महाशिवरात्रि पर माँ बाबूजी उपवास रखते थे और हम लोगों को साबूदाने की खिचड़ी, उबले हुए शकरकन्द और दूध, सिंघाड़े के आटे का हलुवा और बर्फी,मखाने की खीर, नारियल की बर्फ़ी तथा आलू के या केले के चिप्स खाने को मिलते थे । उस दिन नित्य प्रति वाला भोजन नहीं बनता था । हम लोगों को उन  त्योहारों की प्रतीक्षा रहती थी जिनमे उपवास किया जाता था । 


सावन के महीने में भी माँ और बाबूजी दोनों उपवास रखते  थे । महाराष्ट्र के पंचांग के अनुसार सावन का महीना , हिन्दी पंचांग के सावन के महीने के पन्द्रह दिन बाद प्रारम्भ होता था । माँ हिन्दी पंचांग के अनुसार अपने व्रत रखना प्रारम्भ कर देती थी और मराठी पंचांग तक करती थी इसलिये वे डेढ़ माह तक सावन मनाती थीं और छह सावन सोमवार व्रत करती थीं । हम लोग जब उन्हे ऐसा करने के लिये मना करते तो वे कहती ..हँ... ठीक है इसी बहाने ज़्यादा पुण्य मिल जायेगा । “सावन सोमवार का व्रत एक समय का ही होता था इसलिये उस दिन शाम का भोजन नियत समय से पूर्व ही तैयार हो जाता था । दिन में विविध व्यंजनों की कोई गुंजाईश नहीं होती थी । सावन सोमवार को वे खामतलाव स्थित बहिरंगेश्वर शिव मन्दिर अवश्य जाती थीं । उस दिन वहाँ बहुत भीड़ रहती थी । उपवास के बावजूद माँ सबके लिए खाना बनाती और सबको खाना खिलाकर अंत में आराम करती थी ।



व्रत और सुस्वादु पकवानों के अंतर्संबंध को लेकर एक बार जब मैंने अपने मित्र ख़ालिद से बात की तो उसने बताया कि हम लोग दिन भर जो रोज़ा रखते हैं उसमे पानी तो क्या अपना थूक तक नहीं गुटकते । इस बात से मैं बहुत प्रभावित हुआ । नईम को तो मैं बचपन से देखता आ रहा था वह भी इसी तरह का रोजा रखता था । मुझे यह देखकर बहुत आश्चर्य होता था । लेकिन शाम को जब वे रोजा खोलते थे तो तरह तरह के सुस्वादु भोजन उनकी प्रतीक्षा करते रहते थे । नईम के घर कई बार इफ्तारी की इस दावत में शरीक होने का अवसर मुझे मिला उसके बाद से रोजा भी मुझे उपवास की तरह लगने लगा ।  यद्यपि बीच बीच में कुछ न खाकर एकबार में ही खा लेने का तरीका मुझे ज़्यादा अच्छा लगा । खैर धर्म कोई भी हो इस तरह की परम्पराएँ भोजन और व्रत के मेरे समीकरण में कोई विशेष परिवर्तन नहीं कर पाई । 


आज ग्लूकोज़ टालरेंसी अर्थात शरीर में मीठा जज़्ब करने की क्षमता देखते हुए डॉक्टर ने लम्बे समय तक भूखे रहने या व्रत रखने के लिए मना कर दिया है लेकिन व्रत में इस्तेमाल होने वाली सुस्वादु वस्तुएँ खाने के लिए मना नहीं किया है ।  


आप लोगों के लिए पुनः ऐसी ही कुछ सुस्वादु व्यंजनों के नाम लिख रहा हूँ आप चाहें  खाने के लिए व्रत रखें या भूखे रहने के लिए आप इनके नाम तो  पढ़ ही सकते हैं यथा सिंघाड़े के आटे का मीठा हलवा, सिंघाड़े के आटे की या नारियल की बर्फी, साबूदाने की खिचड़ी और साबूदाने के बड़े , साबूदाने का पुलाव सिंघाड़े के पकौड़े , कुट्टू की रोटी, पराठे या चीला या बड़े ,कच्चे केले या आलू की डीप फ्राय टिकिया, अरबी के फलाहारी कबाब,साबूदाना ककड़ी की थालीपीठ,खीरे आलू और मूंगफल्ली का सलाद, फलों का सलाद, फ्रूट कस्टर्ड,श्रीखंड, फलाहारी भेल, फलाहारी चटनी, भुने हुए आलू की कालीमिर्च और सेंधा नमक वाली भेलचाट ,लौकी या कद्दू का मीठा हलवा, लौकी का मसालेदार शरबत, दूध के विभिन्न आइटम , बादाम वाला दूध, मिल्क शेक, केसरिया लस्सी , सामो चावल की मीठी खीर, मीठा दही , खोये की बर्फी, कलाकंद, शकरकंद की खीर , बादाम शेक, मेवे के लड्डू , गुलाब और बादाम की खीर, गुलकंद की आइसक्रीम आदि आदि ।


इनके अलावा भी आपको यदि कुछ नाम याद आते हैं तो अवश्य बताएँ  सोच रहा हूँ इस बार व्रत रख ही लूं ।    



कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

आइये पड़ोस को अपना विश्व बनायें