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7 जून 2026

57. बैतूल : गू - गोबर छोड़कर सब खाना है

शीर्षक पढ़कर नाक -भौं  न सिकोड़ें , पढिए आगे आपको बहुत मज़ा आएगा । 

बाबूलाल जी और राजरानी देवी 
बैतूल के हमारे पुराने घर जितने ही बुज़ुर्ग थे दादाजी यानी बाबूलाल जी वैद्य । वे जब दूध में मिस कर रोटी खाते थे तो दूध उनकी मूंछों की सफ़ेदी में इस तरह मिल जाता था कि पता ही नहीं चलता था दूध की वज़ह से मूंछे सफ़ेद हुई हैं या मूंछों की वज़ह से दूध इतना सफ़ेद दिखाई दे रहा है । 

दादाजी उस ज़माने के मल्टीटेलेंटेड व्यक्ति थे । खेती किसानी और फर्नीचर का काम करते हुए उन्होंने आयुर्वेद चिकित्सा का डिप्लोमा भी ले लिया था और गोंड आदिवासियों का निशुल्क उपचार करना प्रारंभ करना शुरू कर दिया था । प्राकृतिक चिकित्सा और जड़ी बूटियों में उनकी काफी दिलचस्पी थी । अक्सर वे जंगलों की ओर निकल जाते और आदिवासियों के बीच प्रचलित जड़ी बूटियाँ ढूंढकर ले आते ।

खेतीबाड़ी और दुकान का काम उनके भाईयों और बेटों ने संभाल ही लिया था इसलिए वे निश्चिन्त होकर  पूरी तरह चिकित्सा सेवा के कार्य में लग गए । उनकी इच्छा हुई कि लोगों की चिकित्सा के लिए एक दवाखाना खोला जाए । पुराने घर के सामने ही सड़क के उस पार उन्होंने ज़मीन ली और एक नए भवन का निर्माण प्रारम्भ किया ।

‘कोकास भवन’ को अंतिम रूप देते हुए उन्नीस सौ सत्तावन की गर्मियों में राज मिस्त्री एच के आकार में दिखाई देने वाली इस इमारत की एक दीवार पर एक चक्र के भीतर उकेर  रहे थे “मुनि बाबूलालजी वैद्य औषधालय’ । दादाजी उस समय ‘मुनि समाज’ के अध्यक्ष भी थे सो अपने नाम के साथ मुनि लिखते थे ।

दवाखाने के सामने खड़ा नीम का पेड़ जो अब तक केवल राहगीरों को छाँव देता था दूर गांवों से आनेवाले मरीजों की बैलगाड़ियों और उनके बैलों को भी छाँव देने लगा ।  मरीज़ों के लिए पीछे की ओर बनाये गए कमरों से उनकी कराहों के साथ साथ उनके घरवालों की प्रार्थनाओं के स्वर भी सुनाई देने लगे । 

नीम के पेड़ और नीम के धोखे में लगाये गए बकायन के पेड के नीचे ईट पत्थरों से बने टेम्पररी चूल्हे दिखाई देने लगे जिन पर रखे तवों पर मरीज के रिश्तेदार मक्के और ज्वार की रोटियाँ थाप कर पकाते हुए नज़र आने लगे ।

गर्मियों की दोपहर में हवाएँ खामोश हो जाती थीं । उस खामोशी में गूंजती थी लोहे के खलबत्ते में जड़ी बूटियाँ कूटने की धम्म धम्म की आवाज़ । वह घर के पुरुष की तरह बिना आवाज़ किये कोई काम कर ही नहीं सकता था वहीं उसके बरअक्स संगमरमर की खरल घर की सुघड़ स्त्री की तरह धीमे धीमे शांत स्वरों में जड़ी बूटियों को पीसती और औषधि हेतु उपयुक्त उनका चूर्ण बना देती ।

दादाजी ने दान-पुण्य और समाज सेवा किस्से कहानियों और पुराणों से नहीं सीखी थी, वे एक मनुष्य के रूप में वे अपना कर्तव्य जानते थे । उस ज़माने के अपने इस नर्सिंग होम में  दादाजी निर्धन मरीज़ों की न केवल निशुल्क सेवा किया करते अपितु उनके रहने खाने का प्रबंध भी कर देते थे । बाक़ी आय उनकी यही थी कि जो स्वेच्छा से जो कुछ भी दे दे वह ठीक ।

मुनि बाबूलाल जी वैद्य का यह दवाखाना अपने आप में एक अनुसंधान केंद्र भी था । वे प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति और आयुर्वेदिक पद्धति से मरीज़ों की चिकित्सा करते थे और नित नये नुस्खों की खोज कर अपने अनुसंधानों को एक रजिस्टर में लिखते रहते थे । उनके निधन के बरसों बाद एक दिन मैंने वह रजिस्टर देखा था, उसमे कैंसर तक का इलाज़ लिखा हुआ था । 

दादाजी की ओपीडी दालान में और उसके बाईं और स्थित कमरे में थी। एक बड़ी सी टेबल के पीछे कुर्सी पर उनका आसन था । दीवार पर उनका आयुर्वेदाचार्य का प्रमाणपत्र और धन्वन्तरी की एक तस्वीर । टेबल पर औषधि की कुछ डिब्बियां, स्टेथोस्कोप,रजिस्टर कलम, दवात और बिजली की मशीन ।

बाबूलाल जी वैद्य 
बिजली की यह मशीन भी गज़ब की चीज़ थी । यह लकड़ी के एक छोटे से बॉक्स में स्थित थी जो दो बैटरियों से चलती थी । उसमें धातु की दो छड़ थीं जिनकी मूठ लकड़ी की बनी थी, एक का रंग हरा था और दूसरी का लाल । इनमे से एक छड़ वे घुटना दर्द , गठिया या वात के मरीज़ के हाथ में पकड़ा देते थे और दूसरा हिस्सा मूठ की ओर से स्वयं पकड़े रहते, फिर प्रभावित स्थान पर गीला कपड़ा रखते और सेल लगाकर बटन ऑन करते । किर्र किर्र की आवाज़ के साथ वह मशीन चालू हो जाती । 

किर्र की यह आवाज़ जैसे ही बच्चों के कानों तक पहुँचती वे दवाखाने की ओर दौड़ लगा देते थे क्योंकि इसके बाद का दृश्य देखने लायक होता था । जैसे ही दादाजी अपने हाथ की छड़ का लोहे वाला हिस्सा उस गीले कपड़े पर रखते मरीज़ को बिजली का हल्का सा झटका लगता और वह ज़ोर से उछलता । अपने हाथ में पकड़ी लोहे की छड़ वह छोड़ने की कोशिश करता लेकिन छोड़ नहीं पाता । दादाजी रॉड से हल्का हल्का स्पर्श दर्द वाली जगह पर करते और हँसते हुए कहते “ कोई बात नहीं, यह मामूली दर्द  सह लो फिर तुम्हारा गठिया का दर्द हमेशा के लिए गायब हो जायेगा ।“

ऐसा दृश्य रोज़ नहीं घटित होता था लेकिन जब भी होता कोई न कोई हम बच्चों तक यह खबर पहुँचा ही देता था कि ‘बिजली की पेटी’ निकाली जा रही है । हम लोग दौड़कर वहाँ पहुँच जाते । मरीज़ों को चिल्लाते हुए ,उछल कूद करते हुए और दादाजी को उन्हें डाँटते देखकर हम बच्चों को बड़ा मज़ा आता था । हमें हँसता देख कभी कभी मरीज़ भी अपना दर्द भूलकर हँसने लगता । 

यह मशीन दरअसल TENS (Transcutaneous Electrical Nerve Stimulation) या Muscle Stimulator (इलेक्ट्रोथेरेपी मशीन) है। गठिया और मांसपेशियों के दर्द से राहत के लिए इन मशीनों के जरिए नसों को हल्का करंट (इलेक्ट्रिकल स्टिमुलेशन) दिया जाता है। 
ये मशीनें दो तरह से काम करती हैं:
  • पेन इलेक्ट्रोड (Pen Electrode): आप जिन दो हैंडल्स (या पेन जैसी रॉड) की बात कर रहे हैं, उनका उपयोग चिकित्सक एक्यूप्रेशर या एक्यूपंक्चर पॉइंट्स पर सीधा दबाव और करंट देने के लिए करते थे। 
  • इलेक्ट्रोड पैड्स (Electrode Pads): आधुनिक TENS मशीनों में हैंडल्स की जगह त्वचा पर चिपकाने वाले पैड (इलेक्ट्रोड) होते हैं, जिनसे सुन्न करने वाली हल्की झनझनाहट पैदा होती है। यह तंत्रिका संकेतों को अवरुद्ध करके दर्द को रोकता है। 

बाबूलालजी को लोग सम्मान से बापू कहते थे । उनके के बारे में यह बात मशहूर थी कि जिस मरीज़ को जिला अस्पताल वाले वापस कर देते थे उसे भी बापू अपनी चिकित्सा से ठीक कर देते थे । यह बैतूल के विकास का प्रारम्भिक समय था और जिस तरह सम्पूर्ण देश में चिकित्सकीय सुविधाओं का अभाव था उसी तरह बैतूल में भी यह सुविधायें अपर्याप्त थी फिर भी इस तरह के वैद्य और हकीम आदि अपने ज्ञान और अध्ययन के आधार पर जनता की सेवा करने में लगे थे ।

अब पढिए बाबूलाल जी  के मित्र डॉ जौहरी का किस्सा  

अब बापू के दवाखाने के साथ यदि डॉ. वी एम जौहरी के दवाखाने का उल्लेख न आये तो बात अधूरी रह जाएगी । घर के निकट  ही देवी मन्दिर के पीछे मेन रोड पर डॉ. जौहरी  का दवाखाना था ।

इसी कॉर्नर पर था डॉ जौहरी का दवाखाना 

वे भी आयुर्वेदिक पद्धति से इलाज़ करते थे लेकिन आवश्यक एलोपेथी औषधियाँ भी उनके पास रहती थीं । उन्हीके सामने कांतिलाल एण्ड ब्रदर्स की मशहूर दवा की दूकान भी थी ।  

कांतिलाल एंड ब्रदर्स की दवा  की दुकान 
उन्नीस सौ पैंसठ में बापू के निधन के बाद उनका दवाखाना श्याममोहन  चाचाजी ने संभाल लिया था लेकिन उन्नीस सौ सतत्तर में उनकी असामयिक मृत्यु के पश्चात यह दवाखाना भी बंद हो गया । उनके बाद किसी के पास न योग्यता थी न किसी को इस  काम में रूचि थी, अतः  हमारे घर से चिकित्सा सेवा का यह कार्य हमेशा के लिए बंद हो गया । 

बैतूल शहर में चिकित्सकीय व्यवसाय मगर पनपता रहा । नए नए चिकित्सक आते गए साथ ही डॉ. जौहरी का दवाखाना भी बाकायदा चलता रहा। डॉक्टर जौहरी अपने चिकित्सकीय ज्ञान के अलावा अपनी स्पष्टवादिता और तीखी ज़ुबान के लिए भी मशहूर थे । वैसे तो उनके कई किस्से मशहूर थे लेकिन एक किस्सा मुझे याद आ रहा है । 

डॉ.जौहरी अपने मरीज़ों की दवा के साथ साथ उनके पथ्य परहेज़ पर भी ज़ोर देते थे । एक दिन दवा के साथ पथ्य परहेज़ संबंधी हिदायतें प्राप्त कर जैसे ही एक मरीज़ चलने के लिए तत्पर हुआ उसने पूछा

 “डॉक्टर साहब, वो..क्या क्या नहीं खाना है ?” डॉ. साहब ने उसे बता दिया । 

गेट पर खड़े होकर उसने फिर पूछा “डॉक्टर साहब, भूल गया एक बार और बता दीजिये क्या क्या नहीं खाना है ?”

 डॉ. जौहरी तब तक अगले मरीज़ में व्यस्त हो चुके थे फिर भी उन्होंने सहजता से बता दिया । 

चप्पल पहन कर वह मरीज़ जैसे ही सड़क पर उतरा वह ठिठक गया और पलटकर उसने फिर पूछा ..” डॉक्टर साहब क्या क्या नहीं खाना ....” 

उसका वाक्य पूरा भी नहीं हुआ कि डॉक्टर साहब को गुस्सा आ गया और वे उसे डाँटते हुए बोले .. “गू गोबर छोड़कर सब खाना है.. चल भाग यहाँ से । 

बात मज़ाक में कही गई थी लेकिन चिकित्सा हेतु गोबर का उपयोग उस समय भी मना था । इसे विगत दिनों कोरोना काल में कतिपय लोगों के गोबर से स्नान द्वारा इलाज के सन्दर्भ में देखा जाए, साथ ही सर्प दंश से मृत्यु, बिजली गिरने से मृत्यु आदि में मरीज को गोबर में गले तक गाड़ दिए जाने जैसे समाचारों पर गौर किया जाए तो लगता है अगर लोगों ने बाबूलाल जी वैद्य और डॉक्टर जौहरी जैसे सुयोग्य चिकित्सकों की सलाह मानी होती तो उन्हें इस तरह के अंधविश्वासों का शिकार होकर अपनी जान तो न गंवाना पड़ता ।

शरद कोकास 

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22 अप्रैल 2026

20.भंडारा : भूख के पक्ष में आदिम बहस



देशबंधु वार्ड का यह कच्चा मकान ग.भा.पार्वतीबाई के साम्राज्य का एक हिस्सा था उनका खेत और एक मकान भंडारा से बीस किलोमीटर दूर नेशनल हाइवे के निकट बसे गड़ेगाँव में था बड़े बेटे ठाकुर जगमोहन सिंह नागपुर में रहा करते थे उनके एक बेटा और दो बेटियाँ थीं जिनमें एक का नाम शीला था माँ का यही नाम होने के कारण वह नाम मुझे याद है । पार्वतीबाई अर्थात नानी के छोटे बेटे विजयमोहन सिंह गोंदिया में बिजली विभाग में नौकरी किया करते थे । । विजय काका की पोस्टिंग गोंदिया में थी लेकिन भंडारा ज़िला उनका मुख्यालय था इसलिए वे कभी कभी ऑफिस के काम से भंडारा आ जाते थे बाबूजी को वे अपने बड़े भाई की तरह ही मानते थे, वैसे भी उनके सगे बड़े भाई का नाम जगमोहन था

 विजय काका बिजली विभाग में मीटर रीडर थे उन दिनों बिजली के मीटर के भीतर एक गोल चक्का हुआ करता था जो बिजली का उपयोग करने की स्थिति में तेज़ी से घूमता था अन्यथा स्थिर रहता था एक दिन उन्होंने बाबूजी को मीटर खोलकर घूमने वाले चक्के को रोककर बिजली चोरी करने का तरीका बताया कि आप बिजली का उपयोग भी करते रहें और चक्का भी न घूमे इसमें एक छोटी सी ट्रिक थी जिसमे चक्के को घुमाने वाली लोहे की एक छोटी सी पट्टी को पेंचकस से खोलकर नीचे गिराना होता था जैसे ही पट्टी का संपर्क  चक्के से टूटता चक्का घूमना बंद हो जाता और बिजली का प्रवाह भी निरंतर जारी रहता ज़ाहिर है इससे बिल बहुत कम आता

 वे कहते थे आप इसे महीने भर गिरा कर रखो और जैसे ही विभाग के लोग मीटर रीडिंग करने आयें उसे जोड़ दो ताकि काम भी हो जाये और चोरी पकड़ी भी न जाए यह उनके लिए बहुत सामान्य बात थी लेकिन बाबूजी बिजली चोरी जैसी इस बात के बहुत खिलाफ़ थे उन्होंने कहा “ अधिक बिल देना मुझे मंज़ूर है लेकिन मैं गलत काम नहीं करूँगा मकान मालिक के खुद बिजली विभाग में होने की सुविधा के बावजूद एकाध बार के अलावा उन्होंने इस काम के लिए उन्हें कभी इज़ाज़त नहीं दी । 

 विजय काका जब भी भंडारा आते भोजन हमारे घर में ही करते थे । वैसे तो उनकी माँ पार्वतीबाई वहीं रहती थी लेकिन कभी कभी वे अपने खेतों की देखभाल के लिये या फसल की बुआई और कटाई के समय काफी दिनों के लिये गड़ेगाँव चली जाया करती थीं । उनकी अनुपस्थिति में विजय काका हमारे मेहमान होते । वे लोग शुद्ध शाकाहारी थे । पार्वती बाई ने मकान इसी शर्त पर किराये से दिया था कि वहाँ मांसाहार नहीं होगा । वैसे वे स्वयं बहुत छुआ छूत मानती थीं और बिना नहाये उनकी रसोई की ओर जाने की भी सख्त मनाही थी ।

 

वे जब भंडारा में नहीं होती थीं तब  कभी किसी रविवार को हमारे यहाँ मटन बनता था । माँ शुद्ध शाकाहारी थी और उन्हें मांस की गंध भी पसंद नहीं थी लेकिन बाबूजी बचपन से ही माँसाहारी थे हम बच्चे अपने आदिम पुरखों की भांति पितृ धर्म का निर्वाह कर रहे थे

 

रविवार के इस विशेष दिन हमारे घर में हिन्दुस्तान पकिस्तान की तरह का नज़ारा होता था माँ ने हम लोगों का चूल्हा यानि स्टोव,पकाने और खाने के बर्तन अलग कर दिए थे यही नहीं माँ तेल, मसाले, आलू , हरा धनिया सब कुछ पहले ही निकालकर अलग रख देती थीं मटन खाने के लिए हमारे घर में तामचीनी की पीले रंग की बहुत सुन्दर प्लेटें थीं जिनपर नीले रंग से फूलों की डिज़ाइन बनी थी पकाने से लेकर बर्तन धोने तक का काम बाबूजी के ही ज़िम्मे था

 हालाँकि यह सब करते हुए  हमें समाज से बहिष्कृत किये जाने वाली अनुभूति होती थी लेकिन जीभ के स्वाद के लिए हमें इस टाइप का सारा अपमान सहनीय था माँ अपना खाना पका कर, खुद भोजन कर हम लोगों के लिए पर्याप्त रोटियां थापकर और चावल पकाकर पड़ोसनो से गपशप करने निकल जाती थी उनके गमन के पश्चात तामसिक भोजन पकाने और उसे भक्षण करने का हम लोगों का यह पैशाचिक कृत्य प्रारंभ होता था

 

एक रविवार को गज़ब हो गया मटन पककर तैयार हो चुका था हम भाई बहन अपनी अपनी तामचीनी की प्लेट लिए रोटियों के साथ बोटियां परोसे जाने की प्रतीक्षा कर रहे थे कि टीन का वह दरवाज़ा खड़का और बाहर आँगन से आवाज़ आई “ भाभी, खाना खाऊंगा, भूख लगी है ।“  यह विजय काका की आवाज़ थी । बाबूजी पहले तो घबरा गये फिर जैसे ही विजय काका ऊपर अपना आवास देखने गये उन्होंने एक कपड़े से पके पकाये मटन का गर्म बर्तन पकड़ा और पिछले दरवाज़े से निकलकर पड़ोस के भेदरे काका के यहाँ रख आये ।

 फिर माँ को तुरंत पड़ोस से बुलाया गया और इस आपात स्थिति के बारे में उन्हें बताया गया उन्होंने  पंद्रह बीस मिनट में ही आलू की सब्जी बनाकर रख दी फिर हम सब लोगों ने विजय काका के साथ बैठकर रोटी चावल और आलू की सब्ज़ी खाई । विजय काका बार बार आलू की सब्ज़ी सूंघते रहे उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि आलू की सब्ज़ी से मटन की गंध कैसे आ सकती है । शाम को उनके जाने के उपरांत ही हम लोगों को  उस मटन का स्वाद चखने का अवसर प्राप्त हुआ । हालाँकि इस बार हम लोग तृप्त नहीं हो पाए इसलिए कि बाबूजी भेदरे काका को बर्तन अपने घर रखने और उनकी इज्ज़त बचने के एवज में आधा मटन  दे आये थे । मटन वैसे भी महंगा होने के कारण हमारे घर में बहुत कम आता था विजय काका को यह बात उनके जीवन काल में कभी पता नहीं चली

 

उस दिन माँ ने शाकाहार मांसाहार हो लेकर चली आ रही शाश्वत बहस में कोई भागीदारी नहीं की न ही बाबूजी ने आदिम समय से चली आ रही मनुष्य की अलग अलग फूड हैबिट्स पर कोई व्याख्यान दिया संसार की विभिन्न सभ्यताओं में उनके देवी देवताओं द्वारा मांस भक्षण किये जाने तथा जिव्हा के स्वाद की पूर्ति हेतु पशुओं की बलि दिए जाने की प्रथा पर भी कोई बात नहीं हुई न शाकाहारी वस्तुओं की गुणवत्ता और विभिन्न प्रकार के मांसों में शामिल खनिज और विटामिनों की उपस्थिति पर कोई भाषण झाड़ा गया