देशबंधु वार्ड का यह कच्चा
मकान ग.भा.पार्वतीबाई के साम्राज्य का एक हिस्सा था
৷ उनका खेत और एक मकान भंडारा से
बीस किलोमीटर दूर नेशनल हाइवे के निकट बसे गड़ेगाँव में था ৷ बड़े बेटे ठाकुर जगमोहन सिंह
नागपुर में रहा करते थे ৷
उनके एक बेटा और दो बेटियाँ थीं जिनमें एक का नाम शीला था ৷ माँ का यही नाम होने के कारण वह
नाम मुझे याद है । पार्वतीबाई अर्थात नानी के छोटे बेटे विजयमोहन सिंह गोंदिया में
बिजली विभाग में नौकरी किया करते थे । । विजय काका की पोस्टिंग गोंदिया में थी
लेकिन भंडारा ज़िला उनका मुख्यालय था इसलिए वे कभी कभी ऑफिस के काम से भंडारा आ
जाते थे ।
बाबूजी को वे अपने बड़े भाई की तरह ही मानते थे, वैसे भी उनके सगे बड़े भाई का नाम
जगमोहन था ।
विजय काका बिजली विभाग में
मीटर रीडर थे ।
उन दिनों बिजली के मीटर के भीतर एक गोल चक्का हुआ करता था जो बिजली का उपयोग करने
की स्थिति में तेज़ी से घूमता था अन्यथा स्थिर रहता था । एक दिन उन्होंने बाबूजी को मीटर खोलकर घूमने वाले चक्के को
रोककर बिजली चोरी करने का तरीका बताया कि आप बिजली का उपयोग भी करते रहें और चक्का
भी न घूमे ।
इसमें एक छोटी सी ट्रिक थी जिसमे चक्के को घुमाने वाली लोहे की एक छोटी सी पट्टी
को पेंचकस से खोलकर नीचे गिराना होता था । जैसे ही पट्टी का संपर्क चक्के से टूटता चक्का घूमना बंद हो जाता और बिजली
का प्रवाह भी निरंतर जारी रहता । ज़ाहिर है इससे बिल बहुत कम आता ।
वे कहते थे आप इसे महीने भर
गिरा कर रखो और जैसे ही विभाग के लोग मीटर रीडिंग करने आयें उसे जोड़ दो ताकि काम
भी हो जाये और चोरी पकड़ी भी न जाए । यह उनके लिए बहुत सामान्य बात थी । लेकिन बाबूजी बिजली चोरी जैसी इस
बात के बहुत खिलाफ़ थे ।
उन्होंने कहा “ अधिक बिल देना मुझे मंज़ूर है लेकिन मैं गलत काम नहीं करूँगा । मकान
मालिक के खुद बिजली विभाग में होने की सुविधा के बावजूद एकाध बार के अलावा
उन्होंने इस काम के लिए उन्हें कभी इज़ाज़त नहीं दी ।
विजय काका जब भी भंडारा आते
भोजन हमारे घर में ही करते थे । वैसे तो उनकी माँ पार्वतीबाई वहीं रहती थी लेकिन
कभी कभी वे अपने खेतों की देखभाल के लिये या फसल की बुआई और कटाई के समय काफी
दिनों के लिये गड़ेगाँव चली जाया करती थीं । उनकी अनुपस्थिति में विजय काका हमारे
मेहमान होते । वे लोग शुद्ध शाकाहारी थे । पार्वती बाई ने मकान इसी शर्त पर किराये
से दिया था कि वहाँ मांसाहार नहीं होगा । वैसे वे स्वयं बहुत छुआ छूत मानती थीं और
बिना नहाये उनकी रसोई की ओर जाने की भी सख्त मनाही थी ।
वे जब भंडारा में नहीं होती
थीं तब कभी किसी रविवार को हमारे यहाँ मटन
बनता था । माँ शुद्ध शाकाहारी थी और उन्हें मांस की गंध भी पसंद नहीं थी लेकिन
बाबूजी बचपन से ही माँसाहारी थे
৷ हम बच्चे अपने आदिम पुरखों की भांति पितृ धर्म का निर्वाह
कर रहे थे ৷
रविवार के इस विशेष दिन
हमारे घर में हिन्दुस्तान पकिस्तान की तरह का नज़ारा होता था ৷ माँ ने हम लोगों का चूल्हा यानि
स्टोव,पकाने और खाने के बर्तन अलग कर दिए थे । यही नहीं माँ तेल, मसाले, आलू ,
हरा धनिया सब कुछ पहले ही निकालकर अलग रख देती थीं । मटन खाने के लिए हमारे घर में
तामचीनी की पीले रंग की बहुत सुन्दर प्लेटें थीं जिनपर नीले रंग से फूलों की
डिज़ाइन बनी थी ৷ पकाने से
लेकर बर्तन धोने तक का काम बाबूजी के ही ज़िम्मे था ৷
हालाँकि यह सब करते
हुए हमें समाज से बहिष्कृत किये जाने वाली
अनुभूति होती थी लेकिन जीभ के स्वाद के लिए हमें इस टाइप का सारा अपमान सहनीय था । माँ अपना
खाना पका कर, खुद भोजन कर हम लोगों के लिए पर्याप्त रोटियां थापकर और चावल पकाकर
पड़ोसनो से गपशप करने निकल जाती थी । उनके गमन के पश्चात तामसिक भोजन पकाने और उसे भक्षण करने
का हम लोगों का यह पैशाचिक कृत्य प्रारंभ होता था ৷
एक रविवार को गज़ब हो गया
। मटन पककर
तैयार हो चुका था ।
हम भाई बहन अपनी अपनी तामचीनी की प्लेट लिए रोटियों के साथ बोटियां परोसे जाने की
प्रतीक्षा कर रहे थे कि टीन का वह दरवाज़ा खड़का और बाहर आँगन से आवाज़ आई “ भाभी,
खाना खाऊंगा, भूख लगी है ।“ यह विजय काका की
आवाज़ थी । बाबूजी पहले तो घबरा गये फिर जैसे ही विजय काका ऊपर अपना आवास देखने गये
उन्होंने एक कपड़े से पके पकाये मटन का गर्म बर्तन पकड़ा और पिछले दरवाज़े से निकलकर
पड़ोस के भेदरे काका के यहाँ रख आये ।
फिर माँ को तुरंत पड़ोस से
बुलाया गया और इस आपात स्थिति के बारे में उन्हें बताया गया । उन्होंने पंद्रह बीस मिनट में ही आलू की सब्जी बनाकर रख
दी ৷ फिर हम
सब लोगों ने विजय काका के साथ बैठकर रोटी चावल और आलू की सब्ज़ी खाई । विजय काका
बार बार आलू की सब्ज़ी सूंघते रहे ৷ उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि आलू की सब्ज़ी से मटन
की गंध कैसे आ सकती है । शाम को उनके जाने के उपरांत ही हम लोगों को उस मटन का स्वाद चखने का अवसर प्राप्त हुआ ।
हालाँकि इस बार हम लोग तृप्त नहीं हो पाए इसलिए कि बाबूजी भेदरे काका को बर्तन
अपने घर रखने और उनकी इज्ज़त बचने के एवज में आधा मटन दे आये थे । मटन वैसे भी महंगा होने के कारण
हमारे घर में बहुत कम आता था ৷ विजय काका को यह बात उनके जीवन
काल में कभी पता नहीं चली ৷
उस दिन माँ ने शाकाहार मांसाहार हो लेकर चली आ रही शाश्वत
बहस में कोई भागीदारी नहीं की
৷ न ही बाबूजी ने आदिम समय से चली आ
रही मनुष्य की अलग अलग फूड हैबिट्स पर कोई व्याख्यान दिया ৷ संसार की विभिन्न सभ्यताओं में उनके देवी देवताओं द्वारा मांस भक्षण किये
जाने तथा जिव्हा के स्वाद की पूर्ति हेतु पशुओं की बलि दिए जाने की प्रथा पर भी
कोई बात नहीं हुई न शाकाहारी वस्तुओं की गुणवत्ता और विभिन्न प्रकार के मांसों में
शामिल खनिज और विटामिनों की उपस्थिति पर कोई भाषण झाड़ा गया ৷
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