23 अप्रैल 2026

21. ठाकरे किराना में चंदामामा घराना


शहर की गलियों से गुज़रते हुए मुझे अक्सर दुष्यंत का वह शेर याद आता है जिसमे वे कहते हैं ..”शहर की भीड़ भाड़ से बचकर, तू गली से निकल रही होगी ৷ “ भंडारा शहर इतना बड़ा शहर नहीं था कि उसकी सड़कों पर भीड़ भाड़ रहे फिर गलियों में तो आवाजाही बहुत ही कम थी ৷ जिस गली में हमारा मकान था वह गली दो मुख्य सड़कों को जोड़ती थी, एक शहर के भीतर की सड़क और एक रिंग रोड । यह भीतर की सड़क भी आगे जाकर रिंग रोड में मिल जाती थी । इस तरह हमारा मोहल्ला एक त्रिकोण के भीतर आ जाता था । एक भुजा हमारी गली और दोनों सड़कें दो भुजाएँ ।

हमारी गली में अधिकांश निम्नमध्यवर्गीय लोग ही रहा करते थे । उनमें कुछ घर लोधी जाति के लोगों के थे जिनके उपनाम ठाकरे, माहुले और सव्वालाखे थे और उनकी भाषा छत्तीसगढ़ी से बहुत कुछ मिलती जुलती थी । घर के सामने एक बाड़ी थी जहाँ आगे चलकर मकान के दाहिनी ओर रहने वाले पाण्डुरंग ठाकरे के काका भोजराम ठाकरे ने मकान बनाया । जैसा कि गांवों के मकानों में होता है मकान बनने से पूर्व वहाँ एक बाड़ी थी जिसमे मचान बनाकर कद्दू की बेल लगाईं गई थी । उसके बगल में एक टीला था जिस पर पांडुरंग ठाकरे की गाय बन्धती थी । पांडुरंग ठाकरे की अपने ही घर में एक छोटे सी कम पूंजी में लगाई गई किराने की दुकान थी ৷ और

बचपन के उन दिनों में राजाओं महाराजाओं और परियों की कहानियाँ पढ़ने का शौक तो होता था लेकिन पत्रिकाएँ खरीदने के लिए जेब में पैसे नहीं होते थे ৷ पांडुरंग ठाकरे की दुकान में आई रद्दी में मैं पत्रिकाएँ खोजता था और मुझे अचानक बच्चों की मशहूर पत्रिका चंदामामा दिख जाती थी ৷ उनके बरामदे में लकड़ी का एक झूला लगा था जिस पर बैठकर मैं ‘ चंदामामा ‘ पत्रिका की कहानियाँ पढ़ा करता था । उस समय बच्चों की पत्रिका चंदामामा बड़ी मशहूर थी ৷ इसमें राजाओं की कहानियाँ होती थीं, कुछ नीति परक, कुछ बोध कथाएँ यह पत्रिका दक्षिण से निकलती थी और उस समय तमिल के अलावा कई अन्य भाषाओं में आती थी ৷ इस पत्रिका में कलाकारों द्वारा कहानियों पर बनाये चित्र होते थे ৷ मज़े की बात यह कि कहानी भले ही उत्तर भारत के किसी नगर के बारे में हो वहाँ का राजा दक्षिण के राजाओं की तरह वेशभूषा और आभूषण धारण किये होता था ৷ आखिर चित्रकार तो दक्षिण के ही होते थे ।

चंदामामा के अलावा बाल पत्रिकाओं के घराने में पराग, नंदन, चम्पक जैसी पत्रिकाएँ भी प्रारंभ हो चुकी थीं कहीं कहीं लोटपोट पत्रिका भी मिल जाती थी ৷ यह पत्रिकाएँ नियमित पढ़ने को तो मिलती नहीं थी कभी कभार बैतूल आते जाते स्टेशन पर बाबूजी ख़रीद कर दे देते थे वर्ना ठाकरे किराना में आई रद्दी में तो मिल ही जाती थीं ৷

पांडुरंग ठाकरे थोड़ा ऊँचा सुनते थे और उनकी माँ उन्हें ‘बहरा‘ कहकर बुलाती थी सो उनकी किराने की दुकान भी ‘ किराना स्टोर्स ‘ की बजाय ‘‘बहरे की दुकान “ के नाम से प्रसिद्ध थी । पांडुरंग ठाकरे जितने ग़रीब थे उतने ही ग़रीब उनके ग्राहक भी थे, इसलिए उनकी दुकान बमुश्किल चल पाती थी । जब घर में दुकान नहीं चली तो एक दिन उन्होंने नुक्कड़ के खाली पड़े एक मकान में ,जिसे हम लोग बोम्बल्या भागवत का मकान कहते थे, की छपरी में अपनी दुकान लगा ली जिसके एक पटिये पर मैंने पिपरमेंट की मीठी गोली का मेहनताना लेकर चाक से लिख दिया था ‘ ठाकरे किराना स्टोर्स ‘ । लेकिन वहाँ भी उनकी दुकान नहीं चली तो वे अपनी दुकान समेट कर वापस घर आ गये ।

उनकी दुकान के बन्द होने का सबसे बड़ा कारण पास ही एक बड़ी दुकान का होना था जिसे ‘भाटया की दुकान’ कहते थे ৷ पांडुरंग ठाकरे के पास इतनी पूंजी नहीं थी कि वे अपनी दुकान में अधिक सामान रख सकते ৷ जिसे उनके यहाँ वांछित सामान नहीं मिलता वह भाटया की दुकान चला जाता और फिर सारा सामान वहीं से खरीदने लगता ৷ धीरे धीरे इनके सभी ग्राहक वहाँ चले गए ৷ पूंजी का खेल किस तरह होता है यह बात मुझे उन्ही दिनों समझ में आ गई थी ৷ आज देश में मल्टी नेशनल कम्पनियाँ और माल्स किस तरह छोटे छोटे व्यवसायियों का धंधा चौपट कर रहे हैं और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश किस तरह इन छोटे व्यापारियों को उजाड़ रहा है इस बात को इस उदाहरण से भलीभांति समझा जा सकता है ৷

पांडुरंग ठाकरे के चार बच्चे थे अशोक, अरुण, मनोहर और मंगला । बाद में उनकी एक और बेटी हुई जो बहुत गोरी थी और जिसके बाल भूरे थे इस वज़ह से सभी उसे भूरी कहकर बुलाते थे । उनके घर में रहनेवाली एक वृद्धा के बारे में दबी जुबान में कहा जाता था कि वह जादू-टोना करती थी , हालाँकि प्रकट में ऐसा कहने का साहस किसी में नहीं था ৷ हम लोग ऐसे किसी भी अन्धविश्वास को नहीं मानते थे बल्कि ऐसा कहने वालों का विरोध भी करते थे । लेकिन गाँवों में यह अन्धविश्वास बहुत अधिक था ৷ छत्तीसगढ़ आने के बाद मैंने देखा कि यहाँ के गांवों में इतना अंधविश्वास है कि गाँव में कोई बीमारी फ़ैलने या किसी बच्चे की मृत्यु होने पर ऐसी ही किसी स्त्री को ‘टोनही’ करार दे दिया जाता है और उसे प्रताड़ित किया जाता है ৷ मैंने बाद में स्त्री की इस पीड़ा पर ‘डायन’ कविता लिखी थी ৷ उसमे रात्रि के अंतिम पहर में नग्नावस्था में नदी का जल लेने गई स्त्री का चित्रण करते हुए मेरे अवचेतन में बचपन का यही चित्र था ৷

बचपन में हम दोस्तों को उनके वर्ग या उनकी हैसियत से नहीं बल्कि उनके अपने जैसे बच्चे होने की वज़ह से चुनते हैं ৷ पांडुरंग़ ठाकरे का तीसरे नम्बर का बेटा मनोहर लगभग मेरे बराबर का था । उससे बड़ा अरुण थोड़ा मेन्टली रिटार्डेड था और हमेशा उसकी लार बहा करती थी, उसके बुद्धू होने के कारण सब उसे ‘ बुद्ध्या ‘ कह कर बुलाते थे । मेरी गली में मकान मालकिन पार्वती बाई चव्हाण की नातिन अन्नू, सामने वाली बाड़ी की बाईं ओर रहने वाले उरकुडा माहुले के बच्चे थे रामकिशन, राधाकिशन और प्रमिला यही सब मेरे बचपन के साथी थे । रामकिशन की एक निराश्रित मौसी भी थी जिसे सब मिलखी मौसी कहते थे । वह किसी स्किन डिसऑर्डर के कारण अंग्रेज़ों की तरह गोरी दिखाई देने लगी थी ৷ इतनी गोरी कि बड़ा होने के बाद मैं उसे ‘मिल्की मौसी ’ कहकर बुलाने लगा था ।

शरद कोकास 



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