बाबासाहेब आम्बेडकर छह दिसंबर उन्नीस सौ छप्पन को ही संसार से विदा लेकर जा चुके थे । उनके लाखों अनुयायी नई उर्जा से लैस होकर महाराष्ट्र में शिक्षा के विकास पर अपना ध्यान केन्द्रित कर रहे थे ।
बजबजाती नालियों की बदबू से भरी गलियाँ जस की तस थीं । इन गलियों में रहने वाले कभी अपने कदमों के निशान मिटाने के लिए अपनी कमर में झाड़ू बांधकर चला करते थे ताकि किसी सवर्ण का पैर उन पर न पड़े और इस अपराध का जवाब उन्हें अपनी पीठ पर कोड़े खाकर न देना पड़े । सड़क पर थूकने की भी जिन्हें इज़ाज़त नहीं थी जो थूक इकठ्ठा करने के लिए गले में मटकी बांधे हुए चलते थे, उन्होंने अब अपनी मटकियाँ फोड़ दी थीं । इन बस्तियों में अब बाबासाहेब का नारा गूँज रहा था “शिक्षित हो,संगठित हो, संघर्ष करो ।“ अपने जीवनकाल के प्रारंभिक वर्षों में ही वे जान गए थे कि इस देश के निवासियों की पहली ज़रूरत है शिक्षा । असहयोग के आवरण में लिपटे विरोध के बावजूद इसका सूत्रपात हो चुका था ।लेकिन यह पहला शंखनाद नहीं था । उनसे भी पहले सन अठारह सौ अड़तालीस में ज्योतिबा फुले और सावित्री बाई फुले ने महाराष्ट्र में स्त्री शिक्षा की शुरुआत कर दी थी l पुणे जैसे शहर में स्त्रियों को शिक्षा देने के लिए एक स्कूल खोलना अपने आप में एक विद्रोह था । उस समय स्त्री शिक्षा का अधिकार जैसी कोई बात किसी की कल्पना में भी नहीं थी । पुरुष प्रधान समाज में स्त्रियों को शिक्षा ग्रहण करने के लिए उकसाना भी एक तरह का सामाजिक अपराध था ।
सावित्री बाई जब अपने घर से निकलकर लड़कियों को पढ़ाने के लिए स्कूल जाती थीं तो स्त्री शिक्षा के विरोधी सड़क के दोनों ओर खड़े हो जाते थे । वे केवल शब्दों में लिपटी हुई गन्दगी ही नहीं बल्कि गोबर, कीचड़ और मैला जैसी गन्दगी भी उन पर फेंकते थे । सावित्रीबाई उन्हें कोई जवाब नहीं देतीं । वे अपने साथ एक थैली में धुली हुई एक अतिरिक्त साड़ी लेकर जाती थीं । स्कूल पहुंचकर पहले वे अपनी साड़ी बदलतीं और कक्षा में जाकर पितृसत्ता द्वारा शोषित उन स्त्रियों के मस्तिष्क में शिक्षा के बीज बोतीं । उन्हें ज्ञात था कि उनका लगाया हुआ यह पौधा एक दिन महाविशाल वृक्ष बनेगा । इस बात में कोई दो राय नहीं कि महाराष्ट्र के इस समाज ने स्त्री शिक्षा के लिए संघर्ष किया है इसीलिए आज स्त्री शिक्षा के मामले में महाराष्ट्र अग्रणी है ।
महाराष्ट्र का निर्माण यद्यपि एक मई उन्नीस सौ साठ को हुआ लेकिन उससे पूर्व ही गांवों में शिक्षा संस्थानों का खुलना प्रारंभ हो चुका था । ब्रिटिश काल से चली आ रही शिक्षा प्रणाली में देशकालानुसार परिवर्तन कर उसे लागू करने का ज़िम्मा राजनीतिक इच्छा शक्ति पर निर्भर करता था । मराठा साम्राज्यों के समय प्रारंभ की गई मराठी शालाएँ भी चल रही थीं । शिक्षा के स्तर तथा मानकों की कोई बात ही नहीं थी , औसत दर्जे की शिक्षा मिल जाए इतना ही काफी था । निजी स्कूल न के बराबर थे और शिक्षा को मूलभूत अधिकारों में शामिल करने की संवैधानिक व्यवस्था पर अनेक मत मतांतर थे । फिर भी महाराष्ट्र अपनी प्रगतिशील सोच के कारण शिक्षा के क्षेत्र में बहुत तरक्की कर रहा था ।
स्त्री शिक्षा की स्थिति में भी परिवर्तन आ चुका था लेकिन पितृसत्तात्मक विचारों में कोई परिवर्तन नहीं आया था । धर्म परिवर्तन का अर्थ सब कुछ त्याग देना नहीं था, पत्थर,मिट्टी और पीतल के बने देवी देवता पूजाघरों में विद्यमान थे बस उनके साथ आंबेडकर और बुद्ध की प्रतिमाएँ और जुड़ गई थीं । मस्तिष्क में वैचारिक परिवर्तन नहीं हुआ था इसलिए अवैज्ञानिक विचार अभी जीवन से चिपके हुए थे ।
साड़ी में सजी धजी लडकियाँ अपनी लाल पीले रिबन से बंधी अपनी चोटियाँ लहराते हुए स्कूल जाने लगी थीं और विद्यार्थिनी कहलाने लगी थीं । लेकिन स्कूल से आने के बाद वे फिर छात्रा से बेटी और बहन बन जाती थीं और पिताओं,भाईयों और धर्मगुरुओं के बनाये समाज के नियमों से संचालित होने लगती थीं । समय अपनी क्रूर हँसी हँस रहा था ..वह जानता था कि समाज उससे अधिक तेज़ गति से चलकर उससे आगे नहीं हो सकता ।
भंडारा में अभी इतनी बरसात नहीं हुई थी शहर की दीवारों पर चुनाव के दौरान नील से लिखी गई प्रत्याशियों को वोट देने की अपीलें और चुनाव चिन्ह के रेखांकन धुल जाएँ । आज़ादी के समय ख़रीदी गई लोगों की छतरियों में अनगिनत छेद हो चुके थे, अभावों का आसमान अपनी बुलंदी में उन छेदों से झाँक रहा था और उनकी ग़रीबी का मज़ाक उड़ा रहा था । कपसीले बादलों में दिल्ली के लाल किले से की गई घोषणाओं और विकास के वादों का अस्पष्ट सा अक्स था ।
जिससे तारीख का एक पन्ना रोज़ फाड़ दिया जाता है ऐसे टीन पर छपे लक्ष्मी गणेश की फोटो वाले वाल कैलेण्डर से सन छप्पन का इकतीस दिसंबर वाला आख़िरी पन्ना फाड़ा जा चुका था । गाँवों में बरगद के नीचे चौपाल पर रेडिओ बज रहे थे । समाचारों में बताया जा रहा था कि आल इंडिया रेडिओ अब आकाशवाणी है । प्रथम पंचवर्षीय योजना का लक्ष्य आत्मनिर्भरता, कृषि का विकास, मुद्रास्फीति पर नियंत्रण तथा शरणार्थियों की व्यवस्था आदि अब पूर्ण हो चुका है ।
दूसरी पंचवर्षीय योजना प्रारंभ हो चुकी थी और नेहरू जी के कोट में लगे लाल गुलाब की खुशबू औद्योगिक विकास, घरेलु उत्पादन जैसे शब्दों के साथ घर घर तक पहुँच रही थी । भिलाई, दुर्गापुर और राउरकेला जैसे इस्पात संयंत्रों की ताज़ा ताज़ा बनी पहली ब्लास्ट फर्नेस काला धुआं उगलने लगी थी ।
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12 मई 2026
8 मई 2026
31. भंडारा : नौतलाव में बाबासाहेब का भाषण
प्रस्तुतकर्ता :
शरद कोकास
आपने नहीं सुना होगा नौतलाव मैदान का नाम चलिए आज आपको बताते हैं भंडारा के उस मैदान के बारे में जहाँ डॉ आंबेडकर ने अपना चुनावी भाषण दिया था
भंडारा शहर के अंतिम छोर पर जहाँ लार्ड मनरो के नाम पर बना मनरो स्कूल था वहीं कब्रस्तान भी था । उससे आगे मुश्ताक़ पटेल की ज़मीन थी जहाँ ढेर सारी अमराइयों के बीच ईदगाह थी जो ईद के रोज़ गुलज़ार दिखाई देती थी ।
उस ज़माने में यहाँ नौ तालाब हुआ करते थे । इनसे लगा ग्राउंड नौतालाब या नउतलाव मैदान कहलाता था । इस मैदान को हम लोगों ने बाद में मनरो स्कूल ग्राउंड, फिर शास्त्री स्कूल के ग्राउंड के रूप में जाना । आज की पीढी इसे दशहरा मैदान के रूप में जानती है इसलिए कि यहाँ दशहरे के दिन रावण जलाया जाता है । अमराइयाँ अब ख़त्म हो चली हैं, नौ तालाब भी अब एक तालाब में सिमट गए हैं ।
यह वाक्य अब केवल भंडारा रोड स्टेशन पर सुमधुर स्वर में किये जा रहे अनाउंसमेंट में सुनाई देता है । कभी अपने जल के साथ अठखेलियाँ करने वाली नर्म ज़मीन प्लाटों में बंटकर बड़े बड़े मकानों की नींव के नीचे दफ्न होती जा रही है । ईदगाह आज भी वहीं पर है ।
शिड्यूल कास्ट फेडरेशन से डॉ.भीमराव आंबेडकर
विरुद्ध
कांग्रेस पार्टी से अम्बाडी गाँव के भाउराव बोरकर
सामान्य सीट
प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के अशोक मेहता
विरुद्ध
कांग्रेस पार्टी के पूनमचंद राका
देखिये पॉलिटिक्स कैसी होती है
भंडारा आने से पूर्व बाबासाहेब को प्रजा सोशलिस्ट पार्टी की वरिष्ठ सदस्य सुचेता कृपलानी का पत्र मिला था जिसमे उन्होंने मुंबई के चुनावों में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी द्वारा उन्हें पूर्ण सहयोग दिए जाने के बावजूद उनकी विजय न होने पर खेद व्यक्त किया था । पत्र का आशय यह था कि मुंबई में जो हुआ सो हुआ लेकिन भंडारा में अशोक मेहता जैसे विद्वान, अर्थशास्त्री और समाजसेवी व्यक्ति उनकी पार्टी से खड़े हैं । उनके विरुद्ध पूनमचंद राका नामक उम्मीदवार हैं जिनकी छवि जनता के बीच किसी समाजसेवक या राजनैतिक कार्यकर्त्ता के रूप में मेहता जी से कम है । यदि बाबासाहेब के सहयोग से एक सीट अशोक मेहता जीत जाते हैं तो भंडारा के लिए वे एक अच्छे सांसद साबित होंगे तथा अपनी विद्वता,ज्ञान और समझ से वे भंडारा की स्थिति को लेकर संसद में उचित प्रश्न भी रख सकेंगे ।
बाबासाहेब इस सत्य से अवगत हो चुके थे कि मुंबई के प्रथम लोकसभा चुनावों (1951-52) में उनकी पार्टी शेड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन ने प्रजा सोशलिस्ट पार्टी को बहुत सहयोग दिया था किन्तु प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के वोटर्स की ओर से उन्हें यथेष्ट सहयोग नहीं मिला था । उनकी हार के पीछे यह एक बहुत बड़ा कारण था । वहीं कहीं सुचेता कृपलानी की अपील भी उनके मन में उमड़ घुमड़ रही थी
लेकिन जनता के मन में क्या था देखिये
भंडारा की जनता की राजनीतिक समझ कहीं बेहतर थी । जनता इस सत्य से भलीभांति वाकिफ़ थी कि उन्नीस सौ बावन के चुनावों में बाबासाहेब को मुंबई में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के वोटर्स के वोट नहीं मिले थे । इस वज़ह से उनके मन में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के प्रति गुस्सा भी था ।
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| पूर्व का नौतलाव आज का दशेरा मैदान और कब्रस्तान |
पटेल मियाँ के घर के पास एक मस्जिद भी थी जहाँ आम के पेड़ों पर कूकती हुई कोयल अज़ान के सुर में सुर मिलाकर आगंतुकों का स्वागत करती थी ।
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| पटेल जी का मकान |
| अब यहाँ रावण जलाया जाता है |
यह वाक्य अब केवल भंडारा रोड स्टेशन पर सुमधुर स्वर में किये जा रहे अनाउंसमेंट में सुनाई देता है । कभी अपने जल के साथ अठखेलियाँ करने वाली नर्म ज़मीन प्लाटों में बंटकर बड़े बड़े मकानों की नींव के नीचे दफ्न होती जा रही है । ईदगाह आज भी वहीं पर है ।
आपको पता है आपके शहर से कितने तालाब गायब हो गए और उन्हें पाट कर वहाँ इमारतें खड़ी कर दी गईं ?
२१ अप्रेल १९५४ के दिन ऐसा क्या हुआ था ?
वह बुधवार का दिन था । तारीख इक्कीस माह अप्रेल सन उन्नीस सौ चौवन । नउतलाव मैदान भीड़ से खचाखच भरा हुआ था । भंडारा के इतिहास में वह एक अभूतपूर्व दिन था उस दिन यहाँ बाबासाहेब आम्बेडकर की जंगी चुनावी सभा होने वाली थी । भंडारा शहर के आसपास के सैकड़ों गांवों से जाने कितने लोग पैदल पैदल, साइकिलों से या बैलगाड़ियों से आये थे । इन्ही में एक थे ग्राम माडगी में रहने वाले कृषक और बीड़ी कामगार प्रह्लाद गोस्वामी जो बाईस किलोमीटर दूर से अपनी पत्नी प्रमिला के साथ पैदल चलकर बाबासाहेब की बात सुनने आये थे । (गोस्वामी जी के पुत्र श्री एस पी गोस्वामी अभी फेसबुक पर हैं और मेरे मित्र हैं )
बाबासाहेब आंबेडकर इस चुनाव में शिड्यूल कास्ट फेडरेशन की और से प्रत्याशी थे । फेडरेशन के कार्यकर्ताओं ने तम्बुओं में और घरों में सभी के ठहरने और भोजन की व्यवस्था की थी । वहाँ का नज़ारा किसी मेले से कम नहीं था हालाँकि वह महज मेला नहीं था ।
बाबासाहेब के अलावा अन्य प्रत्याशियों का चुनाव प्रचार भी ज़ोरों से चल रहा था । भंडारा निर्वाचन क्षेत्र से भी दो सांसद चुने जाने थे एक सामान्य वर्ग से एक आरक्षित वर्ग से । प्रत्येक मतदाता को दो वोट देने का अधिकार था इसलिए उनकी ज़िम्मेदारी और भी बढ़ गई थी । बाबासाहेब आंबेडकर भंडारा की आरक्षित सीट से उपचुनाव लड़ रहे हैं यह बात पूरे देश में फ़ैल चुकी थी । देश के सभी बड़े बड़े नेताओं की निगाह इस चुनाव पर थी ।
अब देखिये इस चुनाव में मुकाबला कैसा था
आरक्षित सीट
२१ अप्रेल १९५४ के दिन ऐसा क्या हुआ था ?
वह बुधवार का दिन था । तारीख इक्कीस माह अप्रेल सन उन्नीस सौ चौवन । नउतलाव मैदान भीड़ से खचाखच भरा हुआ था । भंडारा के इतिहास में वह एक अभूतपूर्व दिन था उस दिन यहाँ बाबासाहेब आम्बेडकर की जंगी चुनावी सभा होने वाली थी । भंडारा शहर के आसपास के सैकड़ों गांवों से जाने कितने लोग पैदल पैदल, साइकिलों से या बैलगाड़ियों से आये थे । इन्ही में एक थे ग्राम माडगी में रहने वाले कृषक और बीड़ी कामगार प्रह्लाद गोस्वामी जो बाईस किलोमीटर दूर से अपनी पत्नी प्रमिला के साथ पैदल चलकर बाबासाहेब की बात सुनने आये थे । (गोस्वामी जी के पुत्र श्री एस पी गोस्वामी अभी फेसबुक पर हैं और मेरे मित्र हैं )
बाबासाहेब आंबेडकर इस चुनाव में शिड्यूल कास्ट फेडरेशन की और से प्रत्याशी थे । फेडरेशन के कार्यकर्ताओं ने तम्बुओं में और घरों में सभी के ठहरने और भोजन की व्यवस्था की थी । वहाँ का नज़ारा किसी मेले से कम नहीं था हालाँकि वह महज मेला नहीं था ।
बाबासाहेब के अलावा अन्य प्रत्याशियों का चुनाव प्रचार भी ज़ोरों से चल रहा था । भंडारा निर्वाचन क्षेत्र से भी दो सांसद चुने जाने थे एक सामान्य वर्ग से एक आरक्षित वर्ग से । प्रत्येक मतदाता को दो वोट देने का अधिकार था इसलिए उनकी ज़िम्मेदारी और भी बढ़ गई थी । बाबासाहेब आंबेडकर भंडारा की आरक्षित सीट से उपचुनाव लड़ रहे हैं यह बात पूरे देश में फ़ैल चुकी थी । देश के सभी बड़े बड़े नेताओं की निगाह इस चुनाव पर थी ।
अब देखिये इस चुनाव में मुकाबला कैसा था
आरक्षित सीट
शिड्यूल कास्ट फेडरेशन से डॉ.भीमराव आंबेडकर
विरुद्ध
कांग्रेस पार्टी से अम्बाडी गाँव के भाउराव बोरकर
सामान्य सीट
प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के अशोक मेहता
विरुद्ध
कांग्रेस पार्टी के पूनमचंद राका
देखिये पॉलिटिक्स कैसी होती है
भंडारा आने से पूर्व बाबासाहेब को प्रजा सोशलिस्ट पार्टी की वरिष्ठ सदस्य सुचेता कृपलानी का पत्र मिला था जिसमे उन्होंने मुंबई के चुनावों में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी द्वारा उन्हें पूर्ण सहयोग दिए जाने के बावजूद उनकी विजय न होने पर खेद व्यक्त किया था । पत्र का आशय यह था कि मुंबई में जो हुआ सो हुआ लेकिन भंडारा में अशोक मेहता जैसे विद्वान, अर्थशास्त्री और समाजसेवी व्यक्ति उनकी पार्टी से खड़े हैं । उनके विरुद्ध पूनमचंद राका नामक उम्मीदवार हैं जिनकी छवि जनता के बीच किसी समाजसेवक या राजनैतिक कार्यकर्त्ता के रूप में मेहता जी से कम है । यदि बाबासाहेब के सहयोग से एक सीट अशोक मेहता जीत जाते हैं तो भंडारा के लिए वे एक अच्छे सांसद साबित होंगे तथा अपनी विद्वता,ज्ञान और समझ से वे भंडारा की स्थिति को लेकर संसद में उचित प्रश्न भी रख सकेंगे ।
बाबासाहेब इस सत्य से अवगत हो चुके थे कि मुंबई के प्रथम लोकसभा चुनावों (1951-52) में उनकी पार्टी शेड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन ने प्रजा सोशलिस्ट पार्टी को बहुत सहयोग दिया था किन्तु प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के वोटर्स की ओर से उन्हें यथेष्ट सहयोग नहीं मिला था । उनकी हार के पीछे यह एक बहुत बड़ा कारण था । वहीं कहीं सुचेता कृपलानी की अपील भी उनके मन में उमड़ घुमड़ रही थी
लेकिन जनता के मन में क्या था देखिये
भंडारा की जनता की राजनीतिक समझ कहीं बेहतर थी । जनता इस सत्य से भलीभांति वाकिफ़ थी कि उन्नीस सौ बावन के चुनावों में बाबासाहेब को मुंबई में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के वोटर्स के वोट नहीं मिले थे । इस वज़ह से उनके मन में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के प्रति गुस्सा भी था ।
भीतर ही भीतर संक्रमण की तरह यह बात भी फ़ैल चुकी थी कि हम आरक्षित सीट से बाबासाहेब को तो वोट देंगे लेकिन सामान्य सीट वाला दूसरा वोट किसी को नहीं देंगे, भले ही वह व्यर्थ चला जाए ।
इसके बाद क्या हुआ ,सभा में बाबासाहेब ने क्या कहा और चुनाव में क्या हुआ यह अगली किश्तों में पढ़िए
आपका
शरद कोकास
इसके बाद क्या हुआ ,सभा में बाबासाहेब ने क्या कहा और चुनाव में क्या हुआ यह अगली किश्तों में पढ़िए
आपका
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