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| पूर्व का नौतलाव आज का दशेरा मैदान और कब्रस्तान |
पटेल मियाँ के घर के पास एक मस्जिद भी थी जहाँ आम के पेड़ों पर कूकती हुई कोयल अज़ान के सुर में सुर मिलाकर आगंतुकों का स्वागत करती थी ।
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| पटेल जी का मकान |
| अब यहाँ रावण जलाया जाता है |
यह वाक्य अब केवल भंडारा रोड स्टेशन पर सुमधुर स्वर में किये जा रहे अनाउंसमेंट में सुनाई देता है । कभी अपने जल के साथ अठखेलियाँ करने वाली नर्म ज़मीन प्लाटों में बंटकर बड़े बड़े मकानों की नींव के नीचे दफ्न होती जा रही है । ईदगाह आज भी वहीं पर है ।
आपको पता है आपके शहर से कितने तालाब गायब हो गए और उन्हें पाट कर वहाँ इमारतें खड़ी कर दी गईं ?
२१ अप्रेल १९५४ के दिन ऐसा क्या हुआ था ?
वह बुधवार का दिन था । तारीख इक्कीस माह अप्रेल सन उन्नीस सौ चौवन । नउतलाव मैदान भीड़ से खचाखच भरा हुआ था । भंडारा के इतिहास में वह एक अभूतपूर्व दिन था उस दिन यहाँ बाबासाहेब आम्बेडकर की जंगी चुनावी सभा होने वाली थी । भंडारा शहर के आसपास के सैकड़ों गांवों से जाने कितने लोग पैदल पैदल, साइकिलों से या बैलगाड़ियों से आये थे । इन्ही में एक थे ग्राम माडगी में रहने वाले कृषक और बीड़ी कामगार प्रह्लाद गोस्वामी जो बाईस किलोमीटर दूर से अपनी पत्नी प्रमिला के साथ पैदल चलकर बाबासाहेब की बात सुनने आये थे । (गोस्वामी जी के पुत्र श्री एस पी गोस्वामी अभी फेसबुक पर हैं और मेरे मित्र हैं )
बाबासाहेब आंबेडकर इस चुनाव में शिड्यूल कास्ट फेडरेशन की और से प्रत्याशी थे । फेडरेशन के कार्यकर्ताओं ने तम्बुओं में और घरों में सभी के ठहरने और भोजन की व्यवस्था की थी । वहाँ का नज़ारा किसी मेले से कम नहीं था हालाँकि वह महज मेला नहीं था ।
बाबासाहेब के अलावा अन्य प्रत्याशियों का चुनाव प्रचार भी ज़ोरों से चल रहा था । भंडारा निर्वाचन क्षेत्र से भी दो सांसद चुने जाने थे एक सामान्य वर्ग से एक आरक्षित वर्ग से । प्रत्येक मतदाता को दो वोट देने का अधिकार था इसलिए उनकी ज़िम्मेदारी और भी बढ़ गई थी । बाबासाहेब आंबेडकर भंडारा की आरक्षित सीट से उपचुनाव लड़ रहे हैं यह बात पूरे देश में फ़ैल चुकी थी । देश के सभी बड़े बड़े नेताओं की निगाह इस चुनाव पर थी ।
अब देखिये इस चुनाव में मुकाबला कैसा था
आरक्षित सीट
२१ अप्रेल १९५४ के दिन ऐसा क्या हुआ था ?
वह बुधवार का दिन था । तारीख इक्कीस माह अप्रेल सन उन्नीस सौ चौवन । नउतलाव मैदान भीड़ से खचाखच भरा हुआ था । भंडारा के इतिहास में वह एक अभूतपूर्व दिन था उस दिन यहाँ बाबासाहेब आम्बेडकर की जंगी चुनावी सभा होने वाली थी । भंडारा शहर के आसपास के सैकड़ों गांवों से जाने कितने लोग पैदल पैदल, साइकिलों से या बैलगाड़ियों से आये थे । इन्ही में एक थे ग्राम माडगी में रहने वाले कृषक और बीड़ी कामगार प्रह्लाद गोस्वामी जो बाईस किलोमीटर दूर से अपनी पत्नी प्रमिला के साथ पैदल चलकर बाबासाहेब की बात सुनने आये थे । (गोस्वामी जी के पुत्र श्री एस पी गोस्वामी अभी फेसबुक पर हैं और मेरे मित्र हैं )
बाबासाहेब आंबेडकर इस चुनाव में शिड्यूल कास्ट फेडरेशन की और से प्रत्याशी थे । फेडरेशन के कार्यकर्ताओं ने तम्बुओं में और घरों में सभी के ठहरने और भोजन की व्यवस्था की थी । वहाँ का नज़ारा किसी मेले से कम नहीं था हालाँकि वह महज मेला नहीं था ।
बाबासाहेब के अलावा अन्य प्रत्याशियों का चुनाव प्रचार भी ज़ोरों से चल रहा था । भंडारा निर्वाचन क्षेत्र से भी दो सांसद चुने जाने थे एक सामान्य वर्ग से एक आरक्षित वर्ग से । प्रत्येक मतदाता को दो वोट देने का अधिकार था इसलिए उनकी ज़िम्मेदारी और भी बढ़ गई थी । बाबासाहेब आंबेडकर भंडारा की आरक्षित सीट से उपचुनाव लड़ रहे हैं यह बात पूरे देश में फ़ैल चुकी थी । देश के सभी बड़े बड़े नेताओं की निगाह इस चुनाव पर थी ।
अब देखिये इस चुनाव में मुकाबला कैसा था
आरक्षित सीट
शिड्यूल कास्ट फेडरेशन से डॉ.भीमराव आंबेडकर
विरुद्ध
कांग्रेस पार्टी से अम्बाडी गाँव के भाउराव बोरकर
सामान्य सीट
प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के अशोक मेहता
विरुद्ध
कांग्रेस पार्टी के पूनमचंद राका
देखिये पॉलिटिक्स कैसी होती है
भंडारा आने से पूर्व बाबासाहेब को प्रजा सोशलिस्ट पार्टी की वरिष्ठ सदस्य सुचेता कृपलानी का पत्र मिला था जिसमे उन्होंने मुंबई के चुनावों में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी द्वारा उन्हें पूर्ण सहयोग दिए जाने के बावजूद उनकी विजय न होने पर खेद व्यक्त किया था । पत्र का आशय यह था कि मुंबई में जो हुआ सो हुआ लेकिन भंडारा में अशोक मेहता जैसे विद्वान, अर्थशास्त्री और समाजसेवी व्यक्ति उनकी पार्टी से खड़े हैं । उनके विरुद्ध पूनमचंद राका नामक उम्मीदवार हैं जिनकी छवि जनता के बीच किसी समाजसेवक या राजनैतिक कार्यकर्त्ता के रूप में मेहता जी से कम है । यदि बाबासाहेब के सहयोग से एक सीट अशोक मेहता जीत जाते हैं तो भंडारा के लिए वे एक अच्छे सांसद साबित होंगे तथा अपनी विद्वता,ज्ञान और समझ से वे भंडारा की स्थिति को लेकर संसद में उचित प्रश्न भी रख सकेंगे ।
बाबासाहेब इस सत्य से अवगत हो चुके थे कि मुंबई के प्रथम लोकसभा चुनावों (1951-52) में उनकी पार्टी शेड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन ने प्रजा सोशलिस्ट पार्टी को बहुत सहयोग दिया था किन्तु प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के वोटर्स की ओर से उन्हें यथेष्ट सहयोग नहीं मिला था । उनकी हार के पीछे यह एक बहुत बड़ा कारण था । वहीं कहीं सुचेता कृपलानी की अपील भी उनके मन में उमड़ घुमड़ रही थी
लेकिन जनता के मन में क्या था देखिये
भंडारा की जनता की राजनीतिक समझ कहीं बेहतर थी । जनता इस सत्य से भलीभांति वाकिफ़ थी कि उन्नीस सौ बावन के चुनावों में बाबासाहेब को मुंबई में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के वोटर्स के वोट नहीं मिले थे । इस वज़ह से उनके मन में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के प्रति गुस्सा भी था ।
भीतर ही भीतर संक्रमण की तरह यह बात भी फ़ैल चुकी थी कि हम आरक्षित सीट से बाबासाहेब को तो वोट देंगे लेकिन सामान्य सीट वाला दूसरा वोट किसी को नहीं देंगे, भले ही वह व्यर्थ चला जाए ।
इसके बाद क्या हुआ ,सभा में बाबासाहेब ने क्या कहा और चुनाव में क्या हुआ यह अगली किश्तों में पढ़िए
आपका
शरद कोकास
इसके बाद क्या हुआ ,सभा में बाबासाहेब ने क्या कहा और चुनाव में क्या हुआ यह अगली किश्तों में पढ़िए
आपका
शरद कोकास


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