6 मई 2026

30.बाबासाहेब के हाथी ,बैल जोड़ी और झोपडी में टक्कर

सुमन बाई यशोदा बाई (AI)
“अगो बाई, बाबासाहेबा सारखा येवढ़ा मोठा मानूस आमच्या भंडारा हून यीलेक्शन लढून राह्यला आहे ?“ बाबासाहेब आम्बेडकर के भंडारा से चुनाव लड़ने की बात पर आश्चर्य व्यक्त करते हुए यशोदा बाई ने अपनी पड़ोसन सुमन से पूछा । “काऊन ? “ सुमन बाई ने जवाब दिया “ आमचा भंडारयात काई कमी आहे का ?“ सुमन बाई का कहना सही था, भंडारा में ऐसी कोई कमी नहीं थी जिसकी वज़ह से उपचुनाव में रिक्त हुई इस सीट पर बाबासाहेब चुनाव न लड़ते ।
 
बाबासाहेब 1951-52 मुंबई चुनाव हार चुके थे 

भंडारा की गलियों में उन दिनों एक ही शोर था .. आमचे बाबासाहेब .. हमारे बाबासाहेब भंडारा से चुनाव लड़ रहे हैं ৷ जिलाधीश कार्यालय में चुनाव के लिए प्रत्याशियों द्वारा नामांकन भरे जा चुके थे ৷ देश के प्रथम चुनावों में मुंबई की उत्तर मध्य सीट से चुनाव में बाबासाहेब द्वारा सफलता न प्राप्त करने को भंडारा की जनता ने बहुत गंभीरता से लिया था और वे ठान कर बैठे थे कि कुछ भी हो बाबासाहेब को भंडारा से जिताना ही है ৷ भंडारा के सुर्ख़ियों में आने का और मुंबई से भी आगे निकल जाने का यह स्वर्णिम अवसर था ৷ 1954 मे  यह अवसर उपचुनाव के रूप में अनायास ही उनके सामने आ गया । 

उन दिनों सामान्य व आरक्षित दो सीटें होती थीं      

उन्नीस सौ इक्यावन-बावन के प्रथम लोकसभा चुनाव में मध्य प्रांत की भंडारा निर्वाचन क्षेत्र से सामान्य सीट के लिए से कांग्रेस के चतुर्भुज जसानी ने ज्वालाप्रसाद दुबे को हराकर संसद का चुनाव जीता था वहीं आरक्षित सीट से कांग्रेस के तुलाराम साखरे निर्वाचित हुए थे । 

चुनाव परिणाम आते ही विपक्षियों ने जसानी के निर्वाचन पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करते हुए उन पर मुक़दमा कर दिया । ऐसा क्यों हुआ इसका कारण बताता हूँ । उन दिनों भंडारा में मूलजी भाई बीड़ी कारखाना बहुत प्रसिद्ध था । इस कारखाने से शासकीय अनुबंध के अनुसार मिलिट्री में बीड़ी सप्लाई होती थी । चतुर्भुज जसानी इस कंपनी में भागीदार थे । चूँकी यह एक लाभ का पद था इसलिए इस पर रहते हुए उन्हें चुनाव लड़ने की पात्रता ही नहीं थी । अतः इस आधार पर कोर्ट ने विपक्षियों की याचिका पर कार्यवाही करते हुए उनका निर्वाचन अवैध घोषित कर दिया ।

1951-52 प्रथम लोकसभा चुनाव में आरक्षित सीट के प्रत्याशी  

यहाँ से सांसद पद के लिये शिड्यूल कास्ट फेडरेशन के प्रत्याशी के रूप में नागपुर के सखाराम मेश्राम ने नामांकन भरा था । 

कांग्रेस कैंडिडेट के रूप में तुलाराम साखरे के अलावा गंगाराम ठवरे ने भी फॉर्म भरा था, 

वहीं गोंदिया के हेमराज खांडेकर ने स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में फॉर्म भरा था यद्यपि वो कांग्रेस के पक्ष में ही थे । 

कांग्रेस ठवरे को अपना प्रत्याशी घोषित करने वाली थी लेकिन ठवरे का नामांकन रद्द हो गया इसलिए कांगेस ने तुलाराम साखरे को अपना प्रत्याशी घोषित किया । 

ठवरे भंडारा के ही थे और साखरे नागपुर से आये थे लेकिन अंततः आरक्षित सीट से कांग्रेस के तुलाराम साखरे ने एस सी फेडरेशन के सखाराम मेश्राम को हराकर यह चुनाव जीता ।

ठवरे का नामांकन क्यों रद्द हुआ पता है ?

ठवरे के नामांकन रद्द होने के पीछे यह कारण था कि उन्होंने स्वयं को श्यिडूल्ड कास्ट घोषित कर फॉर्म भरा था जबकि वे महानुभाव पंथ से आते थे । यह पंथ जात-पात नहीं मानता था । चुनाव के बाद ठवरे ने इस बात को लेकर चैलेंज किया कि पंथ भले जात-पात न माने लेकिन जाति तो उनकी एस सी है । कोर्ट ने विभिन्न पक्षों पर विचार करने के पश्चात उनके पक्ष में निर्णय दिया और उन्हें चुनाव लड़ने का अधिकारी माना लेकिन तब तक चुनाव सम्पन्न हो चुका था, और ठवरे चुनाव नहीं लड़ पाए थे अतः इस सीट का भी चुनाव रद्द करने की बाध्यता उत्पन्न हो गई । 

इस तरह उन्नीस सौ चौवन में भंडारा से उपचुनाव होना तय हुआ । मतदान हेतु दो मई और सात मई की तारीखें तय की गईं ।

अब इस उपचुनाव में तुरत फुरत में बाबासाहेब के लिए चुनाव कार्यालय की तलाश हुई ৷ भंडारा के ही एक समृद्ध निवासी श्री कोलते जी ने वरठी जाने वाली रोड पर बना अपना बंगला बाबासाहेब को चुनाव कार्यालय हेतु प्रदान कर दिया ৷ चुनाव प्रचार का प्रभार शिड्यूल कास्ट फेडरेशन के जिला अध्यक्ष और बाबासाहेब के अनुयायी दिनकर राव रहाटे को सौंपा गया ৷ उस समय तक दिनकर राव अपनी शिक्षक की नौकरी से त्यागपत्र दे चुके थे और अपना पूरा समय और जीवन पार्टी को समर्पित करने का प्रण कर चुके थे ৷ वे पार्टी के इतने निष्ठावान सदस्य थे कि आन्दोलन करने के आरोप में सन अड़तालीस में डेढ़ वर्ष जेल में भी बिताकर भी आ चुके थे ৷

वरठी जाने वाली मेन रोड पर ठक्कर अम्बालाल की बड़े से बुलंद दरवाज़े वाली खँडहर नुमा हवेली के निकट दिनकर राव का मकान था ৷ उनके घर के आसपास की पूरी बस्ती निम्न वर्गीय मजदूरों कामगारों की बस्ती थी। इस बस्ती के पीछे टेकडी की ढलान के बाद जोगी तलाव और उसका मैदान शुरू होता था । अप्रेल का महीना था ৷ गर्मियों का आगमन हो रहा था दिनकर राव के घर के सामने सड़क पर एक पंडाल लगा दिया गया और उनकी पत्नी भागीरथा बाई तमाम कार्यकर्ताओं के लिए चाय नाश्ते और भोजन का प्रबंध करने में लग गई ৷ घर की कोई आमदनी तो थी नहीं, कोई गेहूँ पहुँचा देता कोई चावल ৷ दाल, सब्जी, तेल मसाले, दूध आदि का भी प्रबंध भी जन सहयोग से हो ही जाता था ৷

बाबासाहेब जब नामांकन जमा करने और चुनाव प्रचार के लिए भंडारा पहुँचे तो उनके और सहयोगियों के रहने की व्यवस्था कोलते के बंगले में ही गई ৷ वही उनका चुनाव कार्यालय भी था ৷ बाबासाहेब को दोनों समय चाय, नाश्ता और भोजन का ‘डबा’ पहुँचाने की ज़िम्मेदारी समिति की ही एक युवा कार्यकर्त्ता मालती बाई मेंढे ने स्वीकार की ৷

मुंबई के समान द्विकोणी मुकाबला यहाँ भी था ৷ सामान्य व आरक्षित सीट दोनों पर कुल मिलाकर चार उम्मीदवार खड़े थे । सामान्य सीट पर प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के अशोक मेहता और कांग्रेस के पूनमचंद राका के बीच चुनाव होना था वहीं आरक्षित सीट पर बाबासाहेब के प्रमुख प्रतिद्वंद्वी थे भाउराव बोरकर जिन्हें कांग्रेस की ओर से मैदान में उतारा गया था ৷ बोरकर भंडारा से लगे वैनगंगा के किनारे स्थित अम्बाड़ी गाँव के रहने वाले थे और मराठी साहित्य से स्नातकोत्तर थे ৷ आश्चर्य की बात यह कि मुंबई के काजरोलकर की भांति बोरकर भी बाबासाहेब के अनुयायी थे लेकिन सम्प्रति चुनाव में उनके विरुद्ध थे ৷ यह कथन बिलकुल सही है कि अपने स्वार्थ के लिए राजनीति में सब कुछ जायज़ है।

शिड्यूल कास्ट फेडरेशन के प्रत्याशी बाबासाहेब को चुनाव चिन्ह मिला ‘हाथी’ जो दलित ,पीड़ित, शोषित जनता की आतंरिक शक्ति का प्रतीक बना । कांग्रेस का चुनाव चिन्ह था ‘दो बैलोंकी जोड़ी’ वहीं प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के प्रत्याशी अशोक मेहता ने चुनाव चिन्ह ‘झोपडी’ पर चुनाव लड़ना तय किया । देश की बहुसंख्य निरक्षर जनता जो प्रत्याशियों के नाम पढ़ने में असमर्थ थी इन चुनाव चिन्हों को बेहतर समझ सकती थी । पढ़े लिखे लोग भी नाम से अधिक प्रतीकों को महत्त्व देते थे इसीलिए आज तक चुनावों में यह प्रथा चली आ रही है यह अवश्य है कि अब यह केवल महत्त्व देना नहीं रहा बल्कि प्रतीक पूजा और व्यक्ति पूजा में बदल चुका है ।

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