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10 जून 2026

152. भंडारा : अठरा ते अठरा टिम्बा ची रांगोली

बरसात की अंतिम बूँदें जब बाय बाय कह कर चली जातीं पंछी निश्चिन्त हो जाते कि अब उनके घोसलों की छत नहीं टपकेगी । इधर आँगन अपनी बदसूरती पर हाय तौबा मचाने लगता कि ‘भैया मेरा तो सारा मेकअप ही धुल गया है, कुछ करो ।‘ आंगन की गुहार पर माँ आदेश देती “जा कहीं से गोबर ढूंढकर ला, आंगन में छड़ा डालना है ।“ हम एक छोटी टुटही बाल्टी लेकर गायों के शौचालय की तलाश में निकल पड़ते और जोगीतालाव के मैदान से पवित्र गोबर ढूंढ लाते । उसके बाद शुरू होता आंगन लीपने का काम । 

छड़ा या सड़ा डालने के लिए एक बाल्टी पानी में गोबर का संपृक्त घोल बनाया जाता और उसे धीरे धीरे पूरे आंगन में छिडक दिया जाता। तत्पश्चात  ताड़ के पत्ते वाली झाड़ू से उसे समतल कर दिया जाता । दो तीन दिनों में आँगन का रूप इतना बदल जाता कि वह आईना मांगने लगता । शुरू शुरू में तो यह काम माँ ही करती थी लेकिन बाद में यह काम मुझे इतना अच्छा लगने लगा कि मैंने यह चार्ज माँ से ले लिया । 

इसके बाद प्रारंभ होता रंगोली  की डिज़ाइन ढूँढने का अभियान । इस अभियान की शुरुआत हम बच्चों की टीम लीडर लीला ताई के घर से होती । पूरे मोहल्ले में  लीला ताई  की रंगोली  की कॉपी सबसे ज़्यादा अपडेट रहती थी और उसमें नित नई रांगोलियों की डिज़ाइनों  का समावेश होता रहता था । हालाँकि नई डिज़ाइन  पर वह अपना कॉपीराइट समझती थी और हमें उतारने नहीं देती थी । 

मैं उसे एक नई डिज़ाइन लाकर देने  का प्रलोभन देता और एक घंटे के लिए कॉपी मांग लाता फिर  फुर्ती से उसकी सारी डिज़ाइनें  पेन से अपनी कॉपी में उतार लेता  । इनमे होतीं छह बिंदु आड़े और छह बिंदु खड़े वाली वर्गाकार रंगोली  यानी सहा ते सहा, ऐसे ही ऊपर की लाइन में पंद्रह बिंदु फिर उससे नीचे घटते क्रम में चौदह ,तेरह, बारह होते हुए एक तक पहुँचने वाली तिकोनी रंगोली  यानी पंदरा ते एक वाली डिज़ाइन। इसके अलावा उस कॉपी में होती कुछ बेल बूटे, मोर और चिड़िया की आकृतियाँ, साथ ही तिकोनी,चौकोनी शटकोणी  आकार की छोटी बड़ी अनेक डिज़ाइनें  । 

कॉपी में लगभग पचास डिज़ाइनें हो जाने के बाद अगला कदम होता बाज़ार से सफ़ेद और रंगीन रंगोली  पाउडर लाना । सफ़ेद रंगोली  पायली के भाव से मिलती थी और सस्ती भी होती थी जबकि रंगीन रंगोली  अपेक्षाकृत महंगी । हम सफ़ेद रंग की रंगोली  एक थाली में लेते और होली के बचे हुए रंग ,कुछ  नीली और लाल स्याही के साथ उसे मिलाकर उसे ज़िंदगी की तरह रंगीन बना देते । शेष रंग बाज़ार से ले आते ।

दशहरे के आठ दस दिन पहले हमारा यह रंगोली  बनाओ अभियान प्रारंभ होता । मैं माँ के साथ ही सुबह जल्दी जाग जाता और जोगी तलाव से काऊफ्रेश गोबर ढूंढ लाता । टीन के डिब्बे में गोबर का घोल भरकर उसके मुँह पर चारों उंगलियां लगाकर छड़ा डालने या छिड़काव करने की टेक्नीक में मैं कुछ ही दिनों में सिद्धहस्त हो गया था । इस बीच बाबूजी चाय बनाकर आवाज़ देते । चाय के उपरांत अपनी रंगोली  किट लेकर मैं आँगन में पहुँच जाता और अपना मोर्चा संभाल लेता ।

रंगोली  की किताब के पन्ने पलटकर सबसे पहले यह तय किया जाता कि आज कितने से कितने बिंदु वाली रंगोली  डालनी है । फिर बिंदु डाले जाते और सफ़ेद रंगोली  से आड़ी तिरछी खड़ी रेखाएँ खींच कर उसका क्राफ्ट तैयार कर लिया जाता । अब समस्या यह कि कौनसा रंग भरना है । मध्यवर्गीय अवचेतन में यह बात बराबर बनी रहती कि अपने पास जो रंग मात्रा में कम है अथवा महंगा है उसका इस्तेमाल कम करना है और जो बहुतायत में है उसका उपयोग ज़्यादा । यह भी ध्यान रखना पड़ता कि कोई रंग आधे में ही न समाप्त हो जाए वर्ना पड़ोस की लड़कियों द्वारा मज़ाक उडाये जाने की पूरी सम्भावना होती । अतः इस योजना के क्रियान्वयन हेतु माँ की मदद लेनी पड़ती ।

पूरी रंगोली  बन जाने के बाद विभिन्न कोणों से उसका परीक्षण किया जाता, कहीं कोई लाइन छोटी बड़ी तो नहीं हो गई, रंग कहीं गहरा या हल्का तो नहीं हो गया । माँ उत्तर प्रदेश की थीं उन्हें रंगोली  डालने की प्रैक्टिस नहीं थी लेकिन रंगों के बारे में उनका ज्ञान अद्भुत था । माँ द्वारा अपनी बनाई हुई रंगोली  पास किये जाने और इनाम में एक चुम्मी मिलने के बाद अपना भ्रमण कार्यक्रम प्रारंभ होता । 

सामने वाली ठाकरे की बेबी, बाजू के घर की मंगला, बेदरे काका की लता, कलकोटवार की माधुरी, हलमारे के यहाँ की रंजू और अंत में हमारी लीला ताई सबके घर की विज़िट होने के बाद शुरू होता आत्मालोचना का दौर । सबकी बनाई रंगोलियों के साथ अपनी रंगोली की तुलना करते हुए मन ही मन अपनी गलतियाँ काऊंट कर ली जातीं जिन्हें अगली सुबह ठीक करने का वादा भी अपने आप से कर लिया जाता ।

माँ को मेरी बनाई हुई रंगोली  बहुत अच्छी लगती थी । एक दिन मैंने माँ से कहा “माँ तुम भी रंगोली  बनाना सीख लो न । तुम्हारे यहाँ झाँसी में रंगोली  नहीं बनाते थे क्या ?”  माँ ने मुस्कुराते हुए कहा “ बनाते थे ना, हम आटे से रंगोली  बनाते थे । वहाँ इसे चौक पूरना कहते हैं ।“ मुझे जानकर आश्चर्य हुआ “ मतलब महाराष्ट्र अभी सबसे एडवांस है ?”  

बाबूजी अपने बेटे का गुरुर बढ़ता हुआ देख रहे थे ।उन्होंने हमारे माँ बेटे के वार्तालाप में हस्तक्षेप करते हुए कहा “ ऐसा बिलकुल भी नहीं है कि महाराष्ट्र सबसे आगे है, रंगोली  सभी प्रान्तों में बनाई जाती है लेकिन उन्हें अलग अलग नामों से जाना जाता है, महाराष्ट्र में जो रंगोली  है वह यू पी में चौक है । राजस्थान में इसे मांडना कहते हैं तो बिहार में अरिपन । वहीं कर्णाटक में यह रंगवल्ली कहलाती है, तमिलनाडु में कोल्लम, आंध्र में मुग्गालू, हिमाचल में अदूपन । केरल में ओणम के अवसर पर फूलों की रंगोली बनाते हैं, तो कहीं चावल के आटे से । बंगाल में पिसे चावल के  घोल से अल्पना बनाते हैं । कहीं कहीं हल्दी से और गेरू से भी बनाते हैं। 

अपना एटिकेट फिर भी बरक़रार था “फिर भी इसकी शुरुआत तो महाराष्ट्र से ही हुई होगी न?” बाबूजी ने सोचा लड़के का घमंड जरा चूर किया जाये,  बोले “ऐसा बिलकुल नहीं है । इसकी शुरुआत तो आदिम काल से हुई है जब मनुष्य ने गुफाओं में चित्र बनाना सीखा । फिर हड़प्पा में भी इसके संकेत मिलते हैं । हमारी पुराण कथाओं में भी इसका उल्लेख है कि ब्रह्मा ने सबसे पहले उर्वशी का चित्र बनाया था फिर उसमे जान डाल दी ।

मैंने सोचा काश ऐसे ही ब्रह्मा जी मेरी रंगोली  के साथ भी करते तो कितना अच्छा होता, मेरे बनाये बेल बूटे जीवंत हो जाते, पौधे लहलहाने लगते, कुओं में पानी भर जाता, नदियाँ अपने आप बहने लगतीं, एक चाँद मेरे आंगन में भी जगमगाने लगता । बाबूजी की बातों से मेरा दर्प चकनाचूर हो चुका था लेकिन मेरा रंगोली  बनाना बंद नहीं हुआ । बहन सीमा के कुछ बड़े हो जाने के बाद उसने भी मेरा हाथ बंटाना शुरू कर दिया ।

बचपन में शुरू हुआ रंगोली  बनाने का यह सिलसिला आज भी जारी है । अब तो बिटिया कोपल भी मेरा साथ देने लगी है । आसपास देखता हूँ तो पता चलता है रंगोली  की यह कला अब प्रोफेशनल रूप ले चुकी है। कला के इस क्षेत्र में बड़े बड़े कलाकार आ गए हैं, कोई बीस फीट की रंगोली  बनाता है तो कोई चालीस फीट की, कोई ज़मीन पर बनाता है तो कोई पानी पर चारकोल बुरादा या तेल छिड़ककर । नए नए रिकॉर्ड ।

हमारे समय की तरह सफ़ेद रंगोली में स्याही मिलाकर  नया रंग बनाने की अब जरूरत नहीं, अब तो बाजार में कई रंग मौजूद हैं । अलावा इसके कोई फूलो की रंगोली बना रहा है तो कोई बुरादे से या चारकोल से । अब आंगन लीपकर सतह बनाने की भी जरुरत नहीं, इसके लिए सुन्दर ड्राइंग बोर्ड और ग्लास व प्लास्टिक शीट्स आ गई हैं  । इसके अलावा जाने कितने तरह के सांचे और पॉट,रेडीमेड स्टीकर्स  । रंगोली  अब कपड़ों पर भी बनाई जाने लगी है ।

बचपन की मेरी रंगोली की किताब समय के साथ गुम हो गई और हाथ से कॉपी में उतारने का चलन भी ख़त्म हो गया , लेकिन नन्ही नन्ही बच्चियों को दिवाली के आसपास प्रिंटेड किताबों का सहारा लेकर रंगोली  बनाते देखता हूँ तो मन प्रसन्न हो जाता है । किसी घर के सामने से गुजरते हुए, रंगोली  बनाते हुए बच्चों को देखकर पल भर ठहरता हूँ और सोचता हूँ यह कितने से कितने बिंदु वाली रंगोली होगी । 

रंगोली जैसे मेरा जीवन दर्शन है और बार बार मिटाने और बनाने की मेरी रचना प्रक्रिया का उत्स । यह जानते हुए भी कि कल इसे धोकर, झाड़ू लगाकर फिर नई रंगोली  बनानी  होगी हर बच्चा हर दिन उसी तन्मयता के साथ  रंगोली  बनाता है । मुझे कभी कभी रंगोली  जीवन  की तरह लगती है, यह जानते हुए भी कि जीवन एक दिन ख़त्म हो जाना है हम जीना नहीं छोड़ते बल्कि हर दिन नए उत्साह और कभी न ख़त्म होने वाली जिजीविषा के साथ जीते हैं ।

शरद कोकास 

7 जून 2026

57. बैतूल : गू - गोबर छोड़कर सब खाना है

शीर्षक पढ़कर नाक -भौं  न सिकोड़ें , पढिए आगे आपको बहुत मज़ा आएगा । 

बाबूलाल जी और राजरानी देवी 
बैतूल के हमारे पुराने घर जितने ही बुज़ुर्ग थे दादाजी यानी बाबूलाल जी वैद्य । वे जब दूध में मिस कर रोटी खाते थे तो दूध उनकी मूंछों की सफ़ेदी में इस तरह मिल जाता था कि पता ही नहीं चलता था दूध की वज़ह से मूंछे सफ़ेद हुई हैं या मूंछों की वज़ह से दूध इतना सफ़ेद दिखाई दे रहा है । 

दादाजी उस ज़माने के मल्टीटेलेंटेड व्यक्ति थे । खेती किसानी और फर्नीचर का काम करते हुए उन्होंने आयुर्वेद चिकित्सा का डिप्लोमा भी ले लिया था और गोंड आदिवासियों का निशुल्क उपचार करना प्रारंभ करना शुरू कर दिया था । प्राकृतिक चिकित्सा और जड़ी बूटियों में उनकी काफी दिलचस्पी थी । अक्सर वे जंगलों की ओर निकल जाते और आदिवासियों के बीच प्रचलित जड़ी बूटियाँ ढूंढकर ले आते ।

खेतीबाड़ी और दुकान का काम उनके भाईयों और बेटों ने संभाल ही लिया था इसलिए वे निश्चिन्त होकर  पूरी तरह चिकित्सा सेवा के कार्य में लग गए । उनकी इच्छा हुई कि लोगों की चिकित्सा के लिए एक दवाखाना खोला जाए । पुराने घर के सामने ही सड़क के उस पार उन्होंने ज़मीन ली और एक नए भवन का निर्माण प्रारम्भ किया ।

‘कोकास भवन’ को अंतिम रूप देते हुए उन्नीस सौ सत्तावन की गर्मियों में राज मिस्त्री एच के आकार में दिखाई देने वाली इस इमारत की एक दीवार पर एक चक्र के भीतर उकेर  रहे थे “मुनि बाबूलालजी वैद्य औषधालय’ । दादाजी उस समय ‘मुनि समाज’ के अध्यक्ष भी थे सो अपने नाम के साथ मुनि लिखते थे ।

दवाखाने के सामने खड़ा नीम का पेड़ जो अब तक केवल राहगीरों को छाँव देता था दूर गांवों से आनेवाले मरीजों की बैलगाड़ियों और उनके बैलों को भी छाँव देने लगा ।  मरीज़ों के लिए पीछे की ओर बनाये गए कमरों से उनकी कराहों के साथ साथ उनके घरवालों की प्रार्थनाओं के स्वर भी सुनाई देने लगे । 

नीम के पेड़ और नीम के धोखे में लगाये गए बकायन के पेड के नीचे ईट पत्थरों से बने टेम्पररी चूल्हे दिखाई देने लगे जिन पर रखे तवों पर मरीज के रिश्तेदार मक्के और ज्वार की रोटियाँ थाप कर पकाते हुए नज़र आने लगे ।

गर्मियों की दोपहर में हवाएँ खामोश हो जाती थीं । उस खामोशी में गूंजती थी लोहे के खलबत्ते में जड़ी बूटियाँ कूटने की धम्म धम्म की आवाज़ । वह घर के पुरुष की तरह बिना आवाज़ किये कोई काम कर ही नहीं सकता था वहीं उसके बरअक्स संगमरमर की खरल घर की सुघड़ स्त्री की तरह धीमे धीमे शांत स्वरों में जड़ी बूटियों को पीसती और औषधि हेतु उपयुक्त उनका चूर्ण बना देती ।

दादाजी ने दान-पुण्य और समाज सेवा किस्से कहानियों और पुराणों से नहीं सीखी थी, वे एक मनुष्य के रूप में वे अपना कर्तव्य जानते थे । उस ज़माने के अपने इस नर्सिंग होम में  दादाजी निर्धन मरीज़ों की न केवल निशुल्क सेवा किया करते अपितु उनके रहने खाने का प्रबंध भी कर देते थे । बाक़ी आय उनकी यही थी कि जो स्वेच्छा से जो कुछ भी दे दे वह ठीक ।

मुनि बाबूलाल जी वैद्य का यह दवाखाना अपने आप में एक अनुसंधान केंद्र भी था । वे प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति और आयुर्वेदिक पद्धति से मरीज़ों की चिकित्सा करते थे और नित नये नुस्खों की खोज कर अपने अनुसंधानों को एक रजिस्टर में लिखते रहते थे । उनके निधन के बरसों बाद एक दिन मैंने वह रजिस्टर देखा था, उसमे कैंसर तक का इलाज़ लिखा हुआ था । 

दादाजी की ओपीडी दालान में और उसके बाईं और स्थित कमरे में थी। एक बड़ी सी टेबल के पीछे कुर्सी पर उनका आसन था । दीवार पर उनका आयुर्वेदाचार्य का प्रमाणपत्र और धन्वन्तरी की एक तस्वीर । टेबल पर औषधि की कुछ डिब्बियां, स्टेथोस्कोप,रजिस्टर कलम, दवात और बिजली की मशीन ।

बाबूलाल जी वैद्य 
बिजली की यह मशीन भी गज़ब की चीज़ थी । यह लकड़ी के एक छोटे से बॉक्स में स्थित थी जो दो बैटरियों से चलती थी । उसमें धातु की दो छड़ थीं जिनकी मूठ लकड़ी की बनी थी, एक का रंग हरा था और दूसरी का लाल । इनमे से एक छड़ वे घुटना दर्द , गठिया या वात के मरीज़ के हाथ में पकड़ा देते थे और दूसरा हिस्सा मूठ की ओर से स्वयं पकड़े रहते, फिर प्रभावित स्थान पर गीला कपड़ा रखते और सेल लगाकर बटन ऑन करते । किर्र किर्र की आवाज़ के साथ वह मशीन चालू हो जाती । 

किर्र की यह आवाज़ जैसे ही बच्चों के कानों तक पहुँचती वे दवाखाने की ओर दौड़ लगा देते थे क्योंकि इसके बाद का दृश्य देखने लायक होता था । जैसे ही दादाजी अपने हाथ की छड़ का लोहे वाला हिस्सा उस गीले कपड़े पर रखते मरीज़ को बिजली का हल्का सा झटका लगता और वह ज़ोर से उछलता । अपने हाथ में पकड़ी लोहे की छड़ वह छोड़ने की कोशिश करता लेकिन छोड़ नहीं पाता । दादाजी रॉड से हल्का हल्का स्पर्श दर्द वाली जगह पर करते और हँसते हुए कहते “ कोई बात नहीं, यह मामूली दर्द  सह लो फिर तुम्हारा गठिया का दर्द हमेशा के लिए गायब हो जायेगा ।“

ऐसा दृश्य रोज़ नहीं घटित होता था लेकिन जब भी होता कोई न कोई हम बच्चों तक यह खबर पहुँचा ही देता था कि ‘बिजली की पेटी’ निकाली जा रही है । हम लोग दौड़कर वहाँ पहुँच जाते । मरीज़ों को चिल्लाते हुए ,उछल कूद करते हुए और दादाजी को उन्हें डाँटते देखकर हम बच्चों को बड़ा मज़ा आता था । हमें हँसता देख कभी कभी मरीज़ भी अपना दर्द भूलकर हँसने लगता । 

यह मशीन दरअसल TENS (Transcutaneous Electrical Nerve Stimulation) या Muscle Stimulator (इलेक्ट्रोथेरेपी मशीन) है। गठिया और मांसपेशियों के दर्द से राहत के लिए इन मशीनों के जरिए नसों को हल्का करंट (इलेक्ट्रिकल स्टिमुलेशन) दिया जाता है। 
ये मशीनें दो तरह से काम करती हैं:
  • पेन इलेक्ट्रोड (Pen Electrode): आप जिन दो हैंडल्स (या पेन जैसी रॉड) की बात कर रहे हैं, उनका उपयोग चिकित्सक एक्यूप्रेशर या एक्यूपंक्चर पॉइंट्स पर सीधा दबाव और करंट देने के लिए करते थे। 
  • इलेक्ट्रोड पैड्स (Electrode Pads): आधुनिक TENS मशीनों में हैंडल्स की जगह त्वचा पर चिपकाने वाले पैड (इलेक्ट्रोड) होते हैं, जिनसे सुन्न करने वाली हल्की झनझनाहट पैदा होती है। यह तंत्रिका संकेतों को अवरुद्ध करके दर्द को रोकता है। 

बाबूलालजी को लोग सम्मान से बापू कहते थे । उनके के बारे में यह बात मशहूर थी कि जिस मरीज़ को जिला अस्पताल वाले वापस कर देते थे उसे भी बापू अपनी चिकित्सा से ठीक कर देते थे । यह बैतूल के विकास का प्रारम्भिक समय था और जिस तरह सम्पूर्ण देश में चिकित्सकीय सुविधाओं का अभाव था उसी तरह बैतूल में भी यह सुविधायें अपर्याप्त थी फिर भी इस तरह के वैद्य और हकीम आदि अपने ज्ञान और अध्ययन के आधार पर जनता की सेवा करने में लगे थे ।

अब पढिए बाबूलाल जी  के मित्र डॉ जौहरी का किस्सा  

अब बापू के दवाखाने के साथ यदि डॉ. वी एम जौहरी के दवाखाने का उल्लेख न आये तो बात अधूरी रह जाएगी । घर के निकट  ही देवी मन्दिर के पीछे मेन रोड पर डॉ. जौहरी  का दवाखाना था ।

इसी कॉर्नर पर था डॉ जौहरी का दवाखाना 

वे भी आयुर्वेदिक पद्धति से इलाज़ करते थे लेकिन आवश्यक एलोपेथी औषधियाँ भी उनके पास रहती थीं । उन्हीके सामने कांतिलाल एण्ड ब्रदर्स की मशहूर दवा की दूकान भी थी ।  

कांतिलाल एंड ब्रदर्स की दवा  की दुकान 
उन्नीस सौ पैंसठ में बापू के निधन के बाद उनका दवाखाना श्याममोहन  चाचाजी ने संभाल लिया था लेकिन उन्नीस सौ सतत्तर में उनकी असामयिक मृत्यु के पश्चात यह दवाखाना भी बंद हो गया । उनके बाद किसी के पास न योग्यता थी न किसी को इस  काम में रूचि थी, अतः  हमारे घर से चिकित्सा सेवा का यह कार्य हमेशा के लिए बंद हो गया । 

बैतूल शहर में चिकित्सकीय व्यवसाय मगर पनपता रहा । नए नए चिकित्सक आते गए साथ ही डॉ. जौहरी का दवाखाना भी बाकायदा चलता रहा। डॉक्टर जौहरी अपने चिकित्सकीय ज्ञान के अलावा अपनी स्पष्टवादिता और तीखी ज़ुबान के लिए भी मशहूर थे । वैसे तो उनके कई किस्से मशहूर थे लेकिन एक किस्सा मुझे याद आ रहा है । 

डॉ.जौहरी अपने मरीज़ों की दवा के साथ साथ उनके पथ्य परहेज़ पर भी ज़ोर देते थे । एक दिन दवा के साथ पथ्य परहेज़ संबंधी हिदायतें प्राप्त कर जैसे ही एक मरीज़ चलने के लिए तत्पर हुआ उसने पूछा

 “डॉक्टर साहब, वो..क्या क्या नहीं खाना है ?” डॉ. साहब ने उसे बता दिया । 

गेट पर खड़े होकर उसने फिर पूछा “डॉक्टर साहब, भूल गया एक बार और बता दीजिये क्या क्या नहीं खाना है ?”

 डॉ. जौहरी तब तक अगले मरीज़ में व्यस्त हो चुके थे फिर भी उन्होंने सहजता से बता दिया । 

चप्पल पहन कर वह मरीज़ जैसे ही सड़क पर उतरा वह ठिठक गया और पलटकर उसने फिर पूछा ..” डॉक्टर साहब क्या क्या नहीं खाना ....” 

उसका वाक्य पूरा भी नहीं हुआ कि डॉक्टर साहब को गुस्सा आ गया और वे उसे डाँटते हुए बोले .. “गू गोबर छोड़कर सब खाना है.. चल भाग यहाँ से । 

बात मज़ाक में कही गई थी लेकिन चिकित्सा हेतु गोबर का उपयोग उस समय भी मना था । इसे विगत दिनों कोरोना काल में कतिपय लोगों के गोबर से स्नान द्वारा इलाज के सन्दर्भ में देखा जाए, साथ ही सर्प दंश से मृत्यु, बिजली गिरने से मृत्यु आदि में मरीज को गोबर में गले तक गाड़ दिए जाने जैसे समाचारों पर गौर किया जाए तो लगता है अगर लोगों ने बाबूलाल जी वैद्य और डॉक्टर जौहरी जैसे सुयोग्य चिकित्सकों की सलाह मानी होती तो उन्हें इस तरह के अंधविश्वासों का शिकार होकर अपनी जान तो न गंवाना पड़ता ।

शरद कोकास 

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