10 जून 2026

152 अठरा ते अठरा टिम्बा ची रांगोली




बरसात की अंतिम बूँदें जब बाय बाय कह कर चली जातीं पंछी निश्चिन्त हो जाते कि अब उनके घोसलों की छत नहीं टपकेगी । इधर आँगन अपनी बदसूरती पर हाय तौबा मचाने लगता कि ‘भैया मेरा तो सारा मेकअप ही धुल गया है, कुछ करो ।‘ आंगन की गुहार पर माँ आदेश देती “जा कहीं से गोबर ढूंढकर ला, आंगन में छड़ा डालना है ।“ हम एक छोटी टुटही बाल्टी लेकर गायों के शौचालय की तलाश में निकल पड़ते और जोगीतालाव के मैदान से पवित्र गोबर ढूंढ लाते । उसके बाद शुरू होता आंगन लीपने का काम । 


छड़ा या सड़ा डालने के लिए एक बाल्टी पानी में गोबर का संपृक्त घोल बनाया जाता और उसे धीरे धीरे पूरे आंगन में छिडक दिया जाता। तत्पश्चात  ताड़ के पत्ते वाली झाड़ू से उसे समतल कर दिया जाता । दो तीन दिनों में आँगन का रूप इतना बदल जाता कि वह आईना मांगने लगता । शुरू शुरू में तो यह काम माँ ही करती थी लेकिन बाद में यह काम मुझे इतना अच्छा लगने लगा कि मैंने यह चार्ज माँ से ले लिया । 


इसके बाद प्रारंभ होता रंगोली  की डिज़ाइन ढूँढने का अभियान । इस अभियान की शुरुआत हम बच्चों की टीम लीडर लीला ताई के घर से होती । पूरे मोहल्ले में  लीला ताई  की रंगोली  की कॉपी सबसे ज़्यादा अपडेट रहती थी और उसमें नित नई रांगोलियों की डिज़ाइनों  का समावेश होता रहता था । हालाँकि नई डिज़ाइन  पर वह अपना कॉपीराइट समझती थी और हमें उतारने नहीं देती थी । 


मैं उसे एक नई डिज़ाइन लाकर देने  का प्रलोभन देता और एक घंटे के लिए कॉपी मांग लाता फिर  फुर्ती से उसकी सारी डिज़ाइनें  पेन से अपनी कॉपी में उतार लेता  । इनमे होतीं छह बिंदु आड़े और छह बिंदु खड़े वाली वर्गाकार रंगोली  यानी सहा ते सहा, ऐसे ही ऊपर की लाइन में पंद्रह बिंदु फिर उससे नीचे घटते क्रम में चौदह ,तेरह, बारह होते हुए एक तक पहुँचने वाली तिकोनी रंगोली  यानी पंदरा ते एक वाली डिज़ाइन। इसके अलावा उस कॉपी में होती कुछ बेल बूटे, मोर और चिड़िया की आकृतियाँ, साथ ही तिकोनी,चौकोनी शटकोणी  आकार की छोटी बड़ी अनेक डिज़ाइनें  । 


कॉपी में लगभग पचास डिज़ाइनें हो जाने के बाद अगला कदम होता बाज़ार से सफ़ेद और रंगीन रंगोली  पाउडर लाना । सफ़ेद रंगोली  पायली के भाव से मिलती थी और सस्ती भी होती थी जबकि रंगीन रंगोली  अपेक्षाकृत महंगी । हम सफ़ेद रंग की रंगोली  एक थाली में लेते और होली के बचे हुए रंग ,कुछ  नीली और लाल स्याही के साथ उसे मिलाकर उसे ज़िंदगी की तरह रंगीन बना देते । शेष रंग बाज़ार से ले आते ।


दशहरे के आठ दस दिन पहले हमारा यह रंगोली  बनाओ अभियान प्रारंभ होता । मैं माँ के साथ ही सुबह जल्दी जाग जाता और जोगी तलाव से काऊफ्रेश गोबर ढूंढ लाता । टीन के डिब्बे में गोबर का घोल भरकर उसके मुँह पर चारों उंगलियां लगाकर छड़ा डालने या छिड़काव करने की टेक्नीक में मैं कुछ ही दिनों में सिद्धहस्त हो गया था । इस बीच बाबूजी चाय बनाकर आवाज़ देते । चाय के उपरांत अपनी रंगोली  किट लेकर मैं आँगन में पहुँच जाता और अपना मोर्चा संभाल लेता ।


रंगोली  की किताब के पन्ने पलटकर सबसे पहले यह तय किया जाता कि आज कितने से कितने बिंदु वाली रंगोली  डालनी है । फिर बिंदु डाले जाते और सफ़ेद रंगोली  से आड़ी तिरछी खड़ी रेखाएँ खींच कर उसका क्राफ्ट तैयार कर लिया जाता । अब समस्या यह कि कौनसा रंग भरना है । मध्यवर्गीय अवचेतन में यह बात बराबर बनी रहती कि अपने पास जो रंग मात्रा में कम है अथवा महंगा है उसका इस्तेमाल कम करना है और जो बहुतायत में है उसका उपयोग ज़्यादा । यह भी ध्यान रखना पड़ता कि कोई रंग आधे में ही न समाप्त हो जाए वर्ना पड़ोस की लड़कियों द्वारा मज़ाक उडाये जाने की पूरी सम्भावना होती । अतः इस योजना के क्रियान्वयन हेतु माँ की मदद लेनी पड़ती ।


पूरी रंगोली  बन जाने के बाद विभिन्न कोणों से उसका परीक्षण किया जाता, कहीं कोई लाइन छोटी बड़ी तो नहीं हो गई, रंग कहीं गहरा या हल्का तो नहीं हो गया । माँ उत्तर प्रदेश की थीं उन्हें रंगोली  डालने की प्रैक्टिस नहीं थी लेकिन रंगों के बारे में उनका ज्ञान अद्भुत था । माँ द्वारा अपनी बनाई हुई रंगोली  पास किये जाने और इनाम में एक चुम्मी मिलने के बाद अपना भ्रमण कार्यक्रम प्रारंभ होता । 


सामने वाली ठाकरे की बेबी, बाजू के घर की मंगला, बेदरे काका की लता, कलकोटवार की माधुरी, हलमारे के यहाँ की रंजू और अंत में हमारी लीला ताई सबके घर की विज़िट होने के बाद शुरू होता आत्मालोचना का दौर । सबकी बनाई रंगोलियों के साथ अपनी रंगोली की तुलना करते हुए मन ही मन अपनी गलतियाँ काऊंट कर ली जातीं जिन्हें अगली सुबह ठीक करने का वादा भी अपने आप से कर लिया जाता ।


माँ को मेरी बनाई हुई रंगोली  बहुत अच्छी लगती थी । एक दिन मैंने माँ से कहा “माँ तुम भी रंगोली  बनाना सीख लो न । तुम्हारे यहाँ झाँसी में रंगोली  नहीं बनाते थे क्या ?”  माँ ने मुस्कुराते हुए कहा “ बनाते थे ना, हम आटे से रंगोली  बनाते थे । वहाँ इसे चौक पूरना कहते हैं ।“ मुझे जानकर आश्चर्य हुआ “ मतलब महाराष्ट्र अभी सबसे एडवांस है ?”  


बाबूजी अपने बेटे का गुरुर बढ़ता हुआ देख रहे थे ।उन्होंने हमारे माँ बेटे के वार्तालाप में हस्तक्षेप करते हुए कहा “ ऐसा बिलकुल भी नहीं है कि महाराष्ट्र सबसे आगे है, रंगोली  सभी प्रान्तों में बनाई जाती है लेकिन उन्हें अलग अलग नामों से जाना जाता है, महाराष्ट्र में जो रंगोली  है वह यू पी में चौक है । राजस्थान में इसे मांडना कहते हैं तो बिहार में अरिपन । वहीं कर्णाटक में यह रंगवल्ली कहलाती है, तमिलनाडु में कोल्लम, आंध्र में मुग्गालू, हिमाचल में अदूपन । केरल में ओणम के अवसर पर फूलों की रंगोली बनाते हैं, तो कहीं चावल के आटे से । बंगाल में पिसे चावल के  घोल से अल्पना बनाते हैं । कहीं कहीं हल्दी से और गेरू से भी बनाते हैं। 


अपना एटिकेट फिर भी बरक़रार था “फिर भी इसकी शुरुआत तो महाराष्ट्र से ही हुई होगी न?” बाबूजी ने सोचा लड़के का घमंड जरा चूर किया जाये,  बोले “ऐसा बिलकुल नहीं है । इसकी शुरुआत तो आदिम काल से हुई है जब मनुष्य ने गुफाओं में चित्र बनाना सीखा । फिर हड़प्पा में भी इसके संकेत मिलते हैं । हमारी पुराण कथाओं में भी इसका उल्लेख है कि ब्रह्मा ने सबसे पहले उर्वशी का चित्र बनाया था फिर उसमे जान डाल दी ।


मैंने सोचा काश ऐसे ही ब्रह्मा जी मेरी रंगोली  के साथ भी करते तो कितना अच्छा होता, मेरे बनाये बेल बूटे जीवंत हो जाते, पौधे लहलहाने लगते, कुओं में पानी भर जाता, नदियाँ अपने आप बहने लगतीं, एक चाँद मेरे आंगन में भी जगमगाने लगता । बाबूजी की बातों से मेरा दर्प चकनाचूर हो चुका था लेकिन मेरा रंगोली  बनाना बंद नहीं हुआ । बहन सीमा के कुछ बड़े हो जाने के बाद उसने भी मेरा हाथ बंटाना शुरू कर दिया ।


बचपन में शुरू हुआ रंगोली  बनाने का यह सिलसिला आज भी जारी है । अब तो बिटिया कोपल भी मेरा साथ देने लगी है । आसपास देखता हूँ तो पता चलता है रंगोली  की यह कला अब प्रोफेशनल रूप ले चुकी है। कला के इस क्षेत्र में बड़े बड़े कलाकार आ गए हैं, कोई बीस फीट की रंगोली  बनाता है तो कोई चालीस फीट की, कोई ज़मीन पर बनाता है तो कोई पानी पर चारकोल बुरादा या तेल छिड़ककर । नए नए रिकॉर्ड ।


हमारे समय की तरह सफ़ेद रंगोली में स्याही मिलाकर  नया रंग बनाने की अब जरूरत नहीं, अब तो बाजार में कई रंग मौजूद हैं । अलावा इसके कोई फूलो की रंगोली बना रहा है तो कोई बुरादे से या चारकोल से । अब आंगन लीपकर सतह बनाने की भी जरुरत नहीं, इसके लिए सुन्दर ड्राइंग बोर्ड और ग्लास व प्लास्टिक शीट्स आ गई हैं  । इसके अलावा जाने कितने तरह के सांचे और पॉट,रेडीमेड स्टीकर्स  । रंगोली  अब कपड़ों पर भी बनाई जाने लगी है ।


बचपन की मेरी रंगोली की किताब समय के साथ गुम हो गई और हाथ से कॉपी में उतारने का चलन भी ख़त्म हो गया , लेकिन नन्ही नन्ही बच्चियों को दिवाली के आसपास प्रिंटेड किताबों का सहारा लेकर रंगोली  बनाते देखता हूँ तो मन प्रसन्न हो जाता है । किसी घर के सामने से गुजरते हुए, रंगोली  बनाते हुए बच्चों को देखकर पल भर ठहरता हूँ और सोचता हूँ यह कितने से कितने बिंदु वाली रंगोली होगी । 


रंगोली जैसे मेरा जीवन दर्शन है और बार बार मिटाने और बनाने की मेरी रचना प्रक्रिया का उत्स । यह जानते हुए भी कि कल इसे धोकर, झाड़ू लगाकर फिर नई रंगोली  बनानी  होगी हर बच्चा हर दिन उसी तन्मयता के साथ  रंगोली  बनाता है । मुझे कभी कभी रंगोली  जीवन  की तरह लगती है, यह जानते हुए भी कि जीवन एक दिन ख़त्म हो जाना है हम जीना नहीं छोड़ते बल्कि हर दिन नए उत्साह और कभी न ख़त्म होने वाली जिजीविषा के साथ जीते हैं ।


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