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10 जून 2026

91. भंडारा : उस दिन ठण्ड का रंग गुलाबी था


हाँ उस दिन जब हम सातवीं क्लास  के बच्चे पिकनिक पर गए थे  

ज़िंदगी भर देश विदेश की यात्राएँ करें लेकिन बचपन के दिनों में अपने क्लासमेट्स के साथ पहली पहली यात्रा या पिकनिक हमेशा याद रहती है ৷ वह दिन भी मेरे जीवन का एक ऐसा दिन था जो बरसों मेरी स्मृतियों में बसेरा करने वाला था ৷ उस दिन सुबह आठ बजे हम सभी बच्चे स्कूल के सामने एकत्रित हो गए । 

ठंड का कोई रंग मुझे दिखाई नहीं दे रहा था लेकिन सब उसे गुलाबी ठण्ड कह रहे थे ৷ हम लोग जुलुस की शक्ल में पैदल पैदल ही ढोला स्कूल से निकले, फिर वहाँ से शीतला माता मंदिर पहुँचे और वहाँ से रिंग रोड से आगे बढ़ कर खामतालाव, शुक्रवारी, मनरो स्कूल चौक से होते हुए शहर से बाहर एक ईट भठ्ठे पर पहुँचे । यह ईट भठ्ठा हमारी कक्षा की एक पंजाबी लड़की विनोद मदान के पिता निहालचंद जी मदान का था । 

हमारा कोई तयशुदा पिकनिक स्पॉट नहीं था लेकिन हमें आगे सूर नदी के किनारे तक जाना था ৷ यह जगह हमें इतनी अच्छी लगी कि हमने कुछ देर यहीं रुकने का फैसला किया । अचानक देखा ईट भठ्ठे में काम करने वाली कुछ महिलाएँ अखबार के कागज़ पर गर्मागर्म पोहा लेकर चली आ रही हैं ৷  मदान अंकल ने हम लोगों के लिए नाश्ते में पोहे की व्यवस्था पहले ही कर रखी थी ৷ अनुमान ने आश्चर्य से कहा ‘घड़ोले सर पहले ही मदान साहब से मिलकर सब कुछ तय कर चुके हैं ৷’ 

यहाँ तक पहुंचते पहुंचते भूख तो लग ही गई थी सो जमकर पोहा खाया और उसके बाद मस्ती शुरू ৷ माँ कहती थी ‘ पेट में गया दाना, मुर्गी करे धिंगाना ‘ सही बात थी ৷ हमने देखा आसपास बेर के कई पेड़ थे । पेट भरा था फिर भी हम लोगों ने बेर तोड़ कर खानी शुरू कर दी । इसके बाद अंकल हम बच्चों को ईट भठ्ठे पर ले गए मिट्टी से किस तरह साँचे में ढलकर ईट बन जाती है , उसे किस तरह पकने के लिए भट्ठी में रखा जाता है यह सब हमने पहली बार देखा ৷ ईट भठ्ठे के मजदूरों से भी हमारा परिचय हुआ जो वहीं टिन शेड में घर बनाकर रह रहे थे ৷ 

हमारा अगला पड़ाव था सूर नदी ৷ तीन- चार किलोमीटर पैदल चलने के बाद हम लोग थकावट महसूस कर रहे थे लेकिन नाश्ते ने हमारे लिए एनर्जी बूस्टर का काम किया था । नदी का बहता हुआ पानी देखकर सारी थकावट ग़ायब हो गई ৷ मैं नदी से कुछ दूर ही था लेकिन मुझे लगा नदी मुझे अपने पास बुला रही है ৷ इस निमंत्रण को मैं  कैसे अस्वीकार कर सकता था ৷ मैंने अपने मित्रों के साथ सर से अनुमति ली और नदी में छलांग लगा दी । कुछ सीनियर और अनुभवी छात्रों की सलाह पर हम लोग अंतर्वस्त्र,टावेल आदि साथ लेकर गए थे ৷ हालाँकि नदी में पानी कम और रेत अधिक थी इसलिए डुबकी लगाने के आनंद से हम लोग वंचित रहे ৷ मुझे याद है मेरे मित्र नरेश मदान की सैंडल उस रेत में फँस गई थी जिसे बहुत मुश्किल से हम लोगों ने निकाला । 

नहा धोकर फिर हम लोग आगे बढ़े और एक संतरे के बाग में पहुँचे । उसके निकट ही अमरुद का एक बाग़ भी था ৷ हम लोगों ने ईमानदारी से इन बागों से संतरे और अमरुद खरीदे । यद्यपि खरीदना सिर्फ नाम के लिए था, खरीदकर खाने से ज़्यादा आनंद चुराकर खाने में आया ৷ हालाँकि यह चोरी छुपी नहीं रही, बहरहाल संतरे और जाम इतने मीठे थे कि चौकीदार की  गालियाँ भी हमें मीठी लगीं । 

इस पिकनिक का सबसे ज़ोरदार आइटम था लड़कियों द्वारा सूजी का हलुआ बनाना ৷ हम लोग अपने साथ हलुआ बनाने का सामान भी ले गये थे ।  भोजन की अन्य सामग्री विनोद के पिताजी के सौजन्य से आई थी ৷  सबसे पहले हम लोगों ने एक पेड़  के नीचे ईटों का एक चूल्हा बनाया । फिर लकड़ियाँ इकठ्ठी की और आग जलाई ৷ आगे कढ़ाई चढ़ाने से लेकर  हलुआ बनाने तक का काम लड़कियों के ज़िम्मे था सो लड़के निश्चिन्त होकर खेलते रहे  । 

थोड़ी देर में आवाज़ आई, ‘हलुआ तैयार है’ । पेट तो वैसे ही सबके भरे हुए थे फिर भी सभी ने बहुत चटखारे लेकर हलुआ खाया । हालाँकि उसमे पानी की मात्रा अधिक हो जाने के कारण हलुआ थोड़ा सा पतला हो गया था । कुछ लड़कों ने मज़ाक में कहा कि अगर पतंग बनाने के ताव ( कागज़ ) ले आते तो इससे पतंग भी बना लेते । उसके बाद मनोरंजन कार्यक्रम शुरू हुआ । वैसे भी खाने के बाद गाना होना ही था ৷ किसीने गीत गाया, किसीने चुटकुला सुनाया । 

अर्चना ने अपने तैयार किये हुए दोनों गीत सुनाये । मैं तो शास्त्रीय संगीत वाला गायक था लेकिन मैंने उन दिनों चर्चित एक  गीत सुनाया ..”सुन ले बापू ये पैगाम मेरी चिठ्ठी तेरे नाम , चिठ्ठी में सबसे पहले लिखा तुझको राम राम ৷” इस गीत की यह पंक्तियाँ मुझे अब भी याद हैं .. “तेरी लकड़ी ठगों ने ठग ली तेरी बकरी ले गए चोर, साबरमती सिसकती तेरी तड़प रहा है सेवाग्राम ৷” मुझे क्या पता था कि अगले अनेक वर्षों तक इस परिदृश्य में कोई परिवर्तन नहीं होने वाला है ৷

खैर, नहाना-धोना, घूमना-फिरना, खाना-पीना,गाना - बजाना ख़त्म हुआ ৷ पिकनिक को परिभाषित करने वाले सभी कार्य संपन्न हुए ৷ ठण्ड के दिन थे इसलिए जल्द ही घर लौटना था ৷ जैसे गंजे का माथा कहाँ तक होता है पता नहीं चलता वैसे ही ठण्ड के दिनों में सुबह दोपहर के बीच कहाँ तक चली जाती है समझ में नहीं आता ৷ इधर शाम बिना ओवरटाइम किये जल्द ही घर लौट जाना चाहती है  ৷ हम लोगों को अँधेरा होने से पहले घर पहुंचना था इसलिए दोपहर की साँस टूटने से पहले ही हम लोग ईट भठ्ठे पर लौट आये । विनोद के पिताजी ने हम लोगों के लिये चाय बिस्कुट की व्यवस्था कर रखी थी ৷ अब हमें पैदल नहीं लौटना था, वापसी की यात्रा के लिए उन्होंने एक ट्रक की व्यवस्था भी कर दी थी । ट्रक के डाले में बैठकर हम लोग स्कूल के सामने तक आये और फिर वहाँ से सब बच्चे शाम ढलने से पूर्व ही अपने अपने घरों को लौट गए  ।   



90 . भंडारा : बड़े से दरवाज़े के पीछे छुपा एक तिलिस्म

शेंडे का वाडा

बचपन के वे दिन बहुत खूबसूरत थे ৷ 

चिंताएं मानस की देहरी लांघने का प्रयास ही नहीं करती थीं ৷ मक्खन से नर्म उन दिनों में देवकीनंदन खत्री के उपन्यासों के तिलिस्म थे, परियों की कहानियाँ और राजकुमारी को जादू के जोर से मेंढकी बना देने वाली जादूगरनी के किस्से थे, मृत्युंजय यानि फैंटम के कॉमिक्स थे ৷ रंगीन चित्रों वाली यह किताबें बार बार मुझे बुलाती थीं और मैं कोर्स की नीरस किताबों से बचता हुआ इनसे प्यार करने लगता था ৷ 

उन दिनों रेडियो पर एक गीत आया करता था “ सिकंदर ने पोरस से की थी लड़ाई ,जो की थी लड़ाई , तो मैं क्या करूँ ...?” इतिहास की किताब खोलकर मैं उसे सर पर रख लेता और महेंद्र कपूर की आवाज़ में सुर मिलकर ज़ोर से गाता “जो कौरव ने पांडव से की हाथापाई तो मैं क्या करूँ ৷” 

मुझे इतिहास में रूचि तो थी लेकिन राजाओं महाराजाओं का नहीं बल्कि अपने आसपास के लोगों का इतिहास जानने में ৷ पाठ्य पुस्तकों में पढाये जाने वाले इतिहास, भूगोल व नागरिक शास्त्र यह सभी विषय मुझे बेहद उबाऊ लगते और मैं हमेशा इन सबसे  पीछा छुड़ाने का प्रयास किया करता । 

स्कूल से घर लौटकर मैं लाख सबक  रटने की कोशिश करता लेकिन सबक था कि मुझे याद ही नहीं होता था ৷ उस समय मेरी एक मज़ेदार धारणा थी कि सर पर तेल ठोंकते हुए सबक याद करने से सबक जल्दी याद हो जाता है । मैं अक्सर ऐसा ही किया करता था और आश्चर्य कि सबक मुझे याद हो जाता ৷ फिर मैं अन्य मित्रों को भी यही टोटका आज़माने की सलाह दिया करता था । यह टोटका “ नदी का पानी नदी में जा, मेरी पट्टी सूख जा “ जैसे टोटके की श्रंखला का ही एक टोटका था ৷ 

बड़े होने के बाद मनोविज्ञान पढ़ते हुए मैंने जाना कि इस तरह स्वयं को दिए जाने वाले सुझाव 'सेल्फ सजेशन' कहलाते हैं ৷ होता वही है जो विज्ञान के नियमों के अनुसार होना है लेकिन हम उस टोटके को या  मन्त्र  आदि को इसका श्रेय दे देते हैं ।  

सातवीं कक्षा तक पहुँचते हुए बचपन की आवाज़ मैं पिछली गली में छोड़ आया था और किसी और ही आवाज़ में बोलने लगा था ৷ एक दिन आश्चर्य और भय के भँवर से बाहर निकालते हुए माँ ने मुझे बताया कि इसे ‘कंठ फूटना’ कहते हैं और अब आगे जीवन भर मेरी यही आवाज़ रहेगी ৷ अपनी देह में होने वाले परिवर्तनों को मैं संवेदनशीलता के साथ महसूस कर रहा था,  स्तनाग्रों में होने वाले दर्द के विषय में जब मैंने माँ से कहा तो उन्होंने कहा इस उम्र में लडके लड़कियों दोनों के लिए ऐसा होना स्वाभाविक है इसी बिंदु से बच्चे स्त्री और पुरुष होने की अलग अलग राह पकड़ते हैं ৷ 

मैं बचपन से ही को एजुकेशन में पढ़ रहा था, जननेन्द्रियों के अलावा शारीरिक तौर पर इस उम्र में लडके लड़कियों में कोई और फ़र्क होता है ऐसा मैंने कभी महसूस नहीं किया था ৷ लेकिन अब बढ़ती हुई देह के बदलते अनुपात में मैं यह अंतर महसूस करने लगा था ৷ मेरे मन में लड़कियों के प्रति एक अंजान सा आकर्षण भी जन्म लेने लगा था और मैं सबकी नज़रें बचाकर उनकी ओर देखने भी लगा था ৷ 

कैलेण्डर में अक्तूबर का पन्ना कुलाटी खाकर सितम्बर के पीछे जा चुका था और खुली खिड़की से झाँकते हुए, कानो पर मफलर बांधे अगहन मुस्कुरा रहा था ৷ भंडारा शहर से लगे खेतों में तुअर और मटर की फल्लियाँ, मुली गाज़र जैसी वनस्पतियाँ और चौलाई,मेथी,पालक की ताज़ी हरी सब्जियाँ शीतल बयारों के साथ अठखेलियाँ कर रही थीं ৷ 

स्कूलों में यह शैक्षणिक सहल यानी पिकनिक का मौसम था ৷ एक दिन हमारे क्लास टीचर घड़ोले सर ने क्लास में घोषणा कर दी कि अगले रविवार को  सब लोग पिकनिक पर जायेंगे ৷ इस पिकनिक में विशेष हिदायत यह थी कि कोई टिफिन नहीं ले जायेगा बल्कि  खाना पकाने का सामान यहीं से ले जायेंगे और वहाँ जंगल में सूर नदी के किनारे खाना बनायेंगे । उन्होंने शाम को मुझे घर पर बुलाया और कुछ आवश्यक कामों की सूची बनाकर मुझे दे दी । 

घड़ोले सर मुझे बहुत अच्छे लगते थे ৷ वे बेहद सलीके से कपड़े पहनकर आया करते और काफी स्मार्ट दिखते थे ।  वे हमें इंग्लिश पढ़ाया करते थे । उनका न केवल पढ़ाने का ढंग अच्छा था बल्कि वे खुद भी एक बहुत अच्छे व्यक्ति थे और हम बच्चों को बहुत चाहते थे ৷ 

खाने पीने की व्यवस्था और सामान खरीदने की ज़िम्मेदारी घड़ोले सर की थी ৷ मुझसे उन्होंने कुछ गीत तैयार करने के लिये कहा और मुझे यह दायित्व सौंपा कि अन्य छात्र छात्राओं से भी गीत तैयार करवाऊँ । मैंने जब गाने वाले मित्रों के बारे में सोचना प्रारंभ किया तो मुझे सिवाय अर्चना के और किसी का नाम याद नहीं आया । 

मैंने सर से यह कहा तो उन्होंने आदेश दिया “कल छुट्टी है, कल अर्चना के घर जाओ और उससे कहो कि ‘मेरे रोम रोम में बसने वाले राम ‘ और ‘बच्चे मन के सच्चे “ यह दो गीत तैयार करे । 

अर्चना वहीं महल के निकट एक बाड़े में रहा करती थी । मैं अगले दिन दोपहर में अर्चना के घर पहुँचा । कक्षा की किसी भी लड़की के घर जाने का मेरा यह प्रथम अवसर था सो संकोच के अलावा थोड़ा डर भी लग रहा था । यह शंकर राव शेंडे का बाड़ा था ৷ बाड़े में प्रवेश के लिए एक बड़ा सा दरवाज़ा था जिसके भीतर किराये के अनेक मकान थे ৷ मैं कभी उस दरवाज़े के भीतर गया नहीं था इसलिए मुझे ठीक से पता नहीं था कि अर्चना किस मकान में रहती है ৷ बस यह पता था कि स्कूल से लौटते हुए वह उस बड़े से दरवाज़े के भीतर चली जाती है ৷ 

उस बड़े से दरवाज़े पर पहुँचकर मैं ठिठक गया ৷ मुझे वह एक तिलिस्म की तरह लगा ৷ भीतर एक बहुत बड़ा आँगन था जिसके आगे अनेक मकानों के दरवाज़े थे  ৷ मैं सोच ही रहा था कि किसीसे पता पूछूँ कि देखा दरवाज़े के ऊपर सड़क की ओर एक गैलरी है जिस पर एक महिला खड़ी हुई है ৷ मैंने थोड़ी हिम्मत जुटा कर उनसे पूछा “ वो..अर्चना .. अर्चना यहीं रहती है क्या ? “ 

उस महिला ने मुझसे तो कुछ नहीं कहा लेकिन पीछे पलटकर आवाज़ दी “ अर्चना, तुम्हारे यहाँ कोई आया है । “ अर्चना गैलरी में प्रकट हुई ৷ उसके बालों की  एक लट माथे पर झूल रही थी और दोनो हाथ बरी के पीठे से सने हुए थे ৷ शायद वह अपनी पड़ोस वाली आंटी की बरी डालने में मदद कर रही थी । 

“अरे ! तुम ?” उसे आश्चर्य हुआ ৷ बहरहाल, मैंने उसे आश्चर्य से उबरने का मौका दिए बगैर जल्दी जल्दी घड़ोले सर का सन्देश सुनाया और घर वापस आ गया । 

आप लोगों को फिल्म बॉबी का ऋषि कपूर और डिम्पल कपाड़िया की पहली मुलाकात वाला दृश्य याद आ रहा होगा ना ? माफ़ कीजिये, यहाँ ऐसा कुछ नहीं घटित हुआ ৷ सारे नाटकीय दृश्य फिल्मों में ही घटित होते हैं, ज़िंदगी तो जन्म से लेकर मृत्यु तक एक सपाट दृश्य के अंतर्गत ही घटित होती है ৷ 

यद्यपि इस पहली मुलाकात के बाद अर्चना के परिवार से हम लोगों के पारिवारिक सम्बन्ध स्थापित हुए ৷ हम लोगों का उनके यहाँ आना जाना प्रारंभ हुआ ৷ अर्चना ने हमारी माँ को मौसी कहना शुरू किया और उसकी माँ हम लोगों की मौसी हो गई  । अर्चना से बड़ी इन्ना दीदी, छोटे भाई विनय और अभय मेरे, सीमा और बबलू के भाई बहन हो गए ৷ यह मुलाकात ऐसे रिश्तों की गंगोत्री थी जिनसे निकली गंगा आज तक बह रही है ৷ 


शरद कोकास 

9 जून 2026

63.नागपुर चार : लाल,पीले,नीले,हरे कांचों से आती रौशनी

मैं और बच्चन भैया 

नागपुर का पंचशील टाकीज चौक 

जीवन में ऐसी अनेक बातें होती हैं जो बचपन में निरर्थक लगती हैं लेकिन बड़े होने के बाद उनके बारे में सोचकर देखें तो लगता है उनमे भी कुछ न कुछ अर्थ निहित होता ही होता था । 

मौसी और बुआ इनमे बड़ा कौन होता है ?

नागपुर स्टेशन पर उतरने के बाद बाबूजी कभी हम लोगों को सीधे मौसी के यहाँ इतवारी नहीं ले गए । वे हमेशा हम लोगों को बड़ी बुआ के यहाँ धंतोली ही ले जाते थे । माँ ने कभी इस बात को लेकर न कोई ज़िद की न कोई झगड़ा किया कि उन्हें पहले अपनी बहन के यहाँ जाना है । वैसे वे चाहतीं तो कह सकती थीं कि “पहले मेरी बहन के यहाँ चलो” और बाबूजी को इसमें कोई हर्ज भी न होता  क्योंकि  माँ के बहनोई बाबूजी के चचेरे भाई भी तो थे । 

मामा और चाचा इनमे बड़ा कौन होता है 

हालाँकि मुंबई की यात्राओं में बाबूजी स्टेशन से सीधे दयानंद मामाजी के यहाँ माटुँगा जाते थे जबकि मुंबई में प्रभादेवी में उनके चचेरे भाई वीरेंद्र कोकाश रहते थे । हाँ अगले दिन वे हम सब लोगों को वहाँ अवश्य ले जाते । मुझे लगता था कि नागपुर यात्रा में माँ की अनकही शिकायत वे मुंबई यात्रा में दूर कर देते थे । वैसे यह सिलसिला वीरेंद्र चाचाजी के मुंबई आने के बाद यानि सन पचहत्तर के बाद ही शुरू हुआ । उससे पहले तो मुंबई केवल मेरे मामा का गाँव था ।

बड़े होने के बाद मैंने इस बात पर विचार किया तो मुझे कुछ सूक्ष्म कारण नज़र आये । नागपुर में स्टेशन या बस स्टैंड से सीधे बड़ी बुआ के यहाँ धन्तोली जाने की वज़ह यह थी कि स्टेशन और बस स्टैंड सीताबर्डी क्षेत्र में आता था और धन्तोली उससे काफी करीब था । जबकि इतवारी की दूरी उसके दुगुने से भी अधिक थी । ज़ाहिर है वहाँ सामान सहित जाने में रिक्शा भाड़ा अधिक लगता । पहले के लोगों के मन में भाई बहनों के प्रति प्रेम की कोई कमी नहीं थी लेकिन जेब में पैसे कम हुआ करते थे, इसलिए व्यावहारिकता को प्रसन्न करने के लिए भावुकता और प्रेम की बलि चढ़ानी पड़ती थी ।

आनंद टाकीज नागपुर 

नागपुर स्टेशन से धन्तोली की ओर बढ़ते हुए साइकिल रिक्शे वाला बस कुछ ही पायडल मारता और फिर एक लम्बी साँस खींचकर रिक्शे की सीट पर बैठ जाता ।


सीधी ढलान से ढुलकता हुआ रिक्शा टेकड़ी वाले गणेश मंदिर के सामने से होते हुए लोहा पुल तक पहुंचता ।

फिर शनि मंदिर के बाद दाहिना मोड़ आते ही आनंद टाकीज़ आ जाती थी । बाबूजी आनंद टाकीज के सामने साईकिल की एक दुकान की ओर उंगली उठाकर कहते वहाँ शम्भुदयाल जीजा की दुकान है ।

शम्भुदयाल कोकास शिवनाथ फूफाजी के भाई थे और उन्होंने उस ज़माने में जुगाड़ कर तीन गियर वाली एक साइकिल बनाई थी । अब यहाँ उनकी दूकान तो नहीं है लेकिन लाइन से अनेक साइकिल दुकाने हैं 

उन्ही की दुकान से लगी गली से तेलीपुरा मोहल्ले की शुरुआत होती है ।


इस गली में बड़े होने के बाद भी काफी समय आना जाना हुआ । यहाँ छोटेलाल जी का घर है जिनकी पुत्री उषा से ब्याह रचाने हेतु प्रदीप भैया बारात लेकर गए थे और अपने टेप रिकार्डर के साथ विवाह की लाइव ऑडियो रिकार्डिंग करने के लिए मैं भी उस बारात में शामिल हुआ था  । इसी मोहल्ले में आजकल रीजनल कॉलेज भोपाल की मेरी क्लासमेट अर्चना श्रीवास्तव रहती हैं जो फुटपाथ पर रहने वाले बच्चों के स्वास्थ्य एवं शिक्षा  के लिए एक ‘उपाय’ नमक एक संस्था चलाती हैं । अर्चना के पिता बिहारीलाल जी श्रीवास्तव हिंदी भाषी संघ विद्यालय में शिक्षक थे साथ ही शैक्षणिक पुस्तकों के प्रकाशक भी थे ।

आनंद टाकीज़ अब बंद पड़ी है और किसी विवाद की वज़ह से वह अपने पुराने रूप में सुरक्षित है साथ ही उसी लाइन में श्याम होटल की इमारत है डॉ बाबासाहेब आम्बेडकर जब भी नागपुर आते थे वे इसी होटल में ठहरते थे इसलिए इस इमारत को उनके स्मृतिचिन्ह के रूप में सुरक्षित करने की मांग की जा रही है ।

श्याम होटल बाबासाहेब का अस्थायी निवास 

रिक्शा आगे बढ़ता जाता था और बाबूजी दृष्टि के दायरे में आनेवाली उन जगहों के बारे में बताते जाते थे । तेलीपुरा की इस गली के बाद कुछ तंग सी गलियाँ और थीं जिनके नाम मोदी नंबर एक, मोदी नंबर दो, मोदी नंबर तीन कुछ इस प्रकार के थे । मोदी यह नाम पहली बार मैंने इसी सिलसिले में सुना था । मुझे पता नहीं था बाद में यह नाम सिर्फ गली तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि देश से जुड़ जायेगा और देश के लोगों की दिमाग की गलियाँ  भी इसी नाम की हो जाएँगी । 

आनंद टाकीज के बाद उसी मार्ग पर  श्री टाकीज़ आती थी, आजकल जहाँ बैंक ऑफ़ महाराष्ट्र का चौक है , उसके आगे NEEDOS बार एंड रेस्टारेंट जहाँ मुन्ना  भैया यानी प्रकाश चन्द्र कोकास मैनेजर थे । 

नीडोस 

फिर एक बायाँ मोड़ और नाग नदी का पुल पार करते ही मेहाड़िया चौक ।
MEHADIYA CHAUK  
नाग नदी जिसके नाम पर नागपुर शहर का नाम पड़ा था उस समय भी शहर भर की गन्दगी अपने भीतर समेटे हुए एक नाले की तरह दिखाई देती थी । इस नदी का अस्तित्व उस माँ की तरह है  जो बच्चों का बचा हुआ और फेंका हुआ जूठन खुद खा जाती है और अंततः फूड पायज़निंग का शिकार होकर मर जाती है । 
नाग नदी 

मेहाड़िया चौक से धन्तोली एरिया शुरू हो जाता है । आज यहाँ विश्वविख्यात यशवंत स्टेडियम है जो उन दिनों नहीं था ।

यशवंत स्टेडियम 
मैं यहाँ से रिक्शे से उचक उचक कर देखना शुरू कर देता जैसे बुआ का घर मुझे दिखाई दे जायेगा । रिक्शेवाले के कुछ पायडल मारते ही फिर अगले चौक पर आनन्दाश्रम होटल के निकट
आनंदाश्रम होटल जो आज भी वैसा ही है 

धन्तोली पार्क का पश्चिम की ओर  का गेट दिखाई दे जाता और मैं समझ जाता बस अगले चौक पर पार्क के कोने से दाहिने मुड़ना है । यहीं आगे नानीवड़ेकर  और भाग्योदय मंगल कार्यालय थे यानि मैरिज प्लेस । 


फिर पूर्व की ओर का गेट आयेगा उसके सामने पार्क एवेन्यू स्ट्रीट और उसमे दाहिनी ओर शिवनाथ फूफाजी का मकान  ‘359 पार्क एवेन्यू’ । यह नाम मुझे किसी कहानी उपन्यास या फिल्म के नाम की तरह लगता था । बाद में आई शशिकपूर की फिल्म ’36 चौरंगी लेन ‘ मैंने इसी वज़ह से देखी थी ।
शिवनाथ  फूफाजी  का मकान 
यह घर फिल्मों में दिखाए घर की तरह ही खूबसूरत था, जैसे बचपन के उन दिनों में मेरे सपनों की एक जगह । फूफाजी का दुमंजिला मकान पुराने वास्तुशिल्प के अनुसार से बना था जिनमे दरवाज़ों और मेहराबों पर लकड़ी की नक्काशी  हुआ करती थी । खिड़कियों के पल्लों में छोटे छोटे चौकोर लाल,पीले,नीले और हरे काँच जड़े हुए थे । सामने धनवटे कॉलेज के परिसर में लगे दरख्तों को पारकर सुबह की धूप गैलरी में आती और फिर इन रंगबिरंगे कांचों से छनकर ऊपर के हाल में इंद्रधनुषी वातावरण का निर्माण कर देती थी । 

निचली मंजिल में सामने दालान, फिर एक बड़ा सा हाल उसके पीछे स्पेस । यहाँ से लकड़ी की सीढियाँ शुरू होती थीं जो बीच में एक लैंडिंग से मुड़कर ऊपर हाल तक पहुँचती थीं । इन सीढ़ियों पर कालीन नहीं बिछा था लेकिन इन पर पाँव रखते हुए किसी राजमहल की सीढियाँ चढ़ने का आभास होता था । पुरानी फिल्मों में एक बड़े से हाल से ऊपर की ओर जाती हुई सीढियां आपने देखी होंगी कुछ इसी तरह की थी यह सीढियां जिन पर चलते हुए धम्म धम्म की आवाज़ होती थी, आनेवाला किस मूड में है यह उसके सीढ़ियों पर चढ़ने के अंदाज़ से ही पता चल जाता था ।

स्पेस के बाद पीछे की ओर आँगन से लगा हुआ एक बड़ा सा रसोई घर, उसके बाद आंगन में बंधी हुई गाय, उसके बाद स्नान घर और लगभग पचास मीटर दूर शौचालय । नागपुर जैसे शहर के हृदयस्थल में गाँव की हवेली का आभास देते हुए फूफाजी के इस मकान के बाईं और दो ब्लॉक और थे जिन्हें उन्होंने किराये से दिया हुआ था । उनका पीछे का खाली हिस्सा भी इसी दूरी में शामिल था । अब यह तीनो मकान अपने नए आधुनिक रूप में तीनों भाइयों और उनके परिवार का आशियाना हैं 

पुराने घर की जगह अब नया घर है 
फूफाजी की माताजी गंगा भागीरथी फूलदुलारी देवी अपने अच्छे दिनों में रोज़ रसोईघर गोबर से लीपती थीं । वे शुद्धता का बहुत ध्यान रखती थीं और बहुत से नियमो को मानने वाली थीं । किसीका भी बिना नहाये रसोई में प्रवेश करना उन्हें गवारा न था । वे सफ़ेद वस्त्र धारण करतीं और माथे पर चन्दन का गोल टीका लगातीं । यद्यपि बाद में उन्होंने अपना साम्राज्य अपनी बहू यानि हमारी विद्या बुआ को सौंप दिया था लेकिन उनकी ठसक कम नहीं हुई थी । उनके भोजन करते समय उनके आसपास हम बच्चे तो दूर एक मक्खी तक नहीं मंडरा सकती थी । प्यास के आवेदन पर गलती से कोई रसोईघर  में घुसा और छह फिट दूरी पर भी यदि पानी का कोई छींटा उन्हें दिखाई दे गया तो वे थाली से उठ जाती थीं । फिर बुआजी उन्हें मनाकर दूसरी थाली परोसकर देती थीं । 

विद्या बुआ बाबूजी से भी बड़ी थीं 
जीवन भर रसोईघर में इस सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करने वाली दादी माँ अपने अंतिम समय में पक्षाघात से पीड़ित रहीं । सन इकहत्तर में वे सब दीन धरम, नियम करम छोड़कर विदा हो गईं  । उनके अंतिम समय तक शिवनाथ फूफाजी और विद्या बुआ ने तन मन धन से उनकी सेवा की और उनके मन को किसी प्रकार का आघात नहीं लगने दिया । 

दादी कर्मकांडी थीं लेकिन फूफाजी आस्थावान होते हुए भी काफी प्रगतिशील थे । आवास के परिसर में ही उन्होंने एक छोटा सा शिवमंदिर बनाया हुआ था जहाँ प्रतिदिन वे शिवलिंग पर जल चढ़ाते थे । दादी के निधन के पश्चात फूफाजी ने विधिवत अंतिम संस्कार के सभी कार्यक्रम किये लेकिन तेरहवीं पर ब्राह्मण भोज के लिए मना कर दिया । उनका कहना था कि मृतक की आत्मा की शांति के नाम पर पंडितों को भोजन करवाने की बजाय क्यों न ज़रूरत मंदों को भोजन करवाया जाए । 

तेरहवीं के दिन वे पास ही के अंध विद्यालय गए और वहाँ के छात्रावास से पंद्रह बीस दृष्टि बाधित बच्चों को ले आए । फिर उन्हें भरपेट भोजन करवाया तथा धन, वस्त्र और आवश्यकता की कुछ वस्तुएं देकर विदा किया । ज़ाहिर है कि इन बच्चों में सभी जाति और धर्म के लोग थे । उनके इस अनूठे कार्य का कुछ ऐसा प्रभाव हुआ कि अनेक लोगों ने फिर इसका अनुकरण करना प्रारंभ किया ।

बुआजी फूफाजी का परिवार मेरे लिए आज भी एक आदर्श परिवार की तरह है । उन दिनों बुआजी फूफाजी के इस परिवार में बड़ी बेटी श्यामा थीं जिनका विवाह नागपुर में ही हीरालाल जी से हुआ था और वे वहीं  जरीपटका में रहते थे । उनके बाद रमा, निर्मला, प्रमिला तीन बेटियाँ और सतीश, प्रदीप, दीपक तीन बेटे । फूफाजी के बड़े बेटे जगदीश का सन इकसठ में ही एक सड़क दुर्घटना में निधन हो गया था । 

मेरे ताउजी मनमोहन कोकाश जिनकी ससुराल निकट ही कामठी में है बताते थे कि वे अपने साले साहब के साथ नागपुर अपनी बहन के यहाँ आ रहे थे कि रास्ते में उन्हें भीड़ दिखी, पता चला कि कोई नवयुवक सड़क दुर्घटना में घायल हो गया है । सहज मानवीय स्वभाव में या जल्दबाज़ी में ‘होगा कोई’ यह सोचकर वे वहाँ रुके नहीं । घर लौटने के कुछ समय बाद उन्हें ज्ञात हुआ कि वह तो उन्ही का भांजा जगदीश था ।

फूफाजी के तीन बेटे सतीश प्रदीप दीपक 
फिर यह घटना उनके जीवन भर के लिए सबक बन गई, वैसे भी उन्हें अपना यह भांजा सबसे प्यारा था । बचपन में सुनी इस घटना का असर मुझ पर कुछ ऐसा हुआ कि मैं आज भी कहीं भीड़ देखकर रुक जाता  हूँ और लोगों से घटना के बारे में पूछता हूँ यह सोचकर कि इस दुर्घटना का शिकार कहीं कोई अपना तो नहीं है ।

फूफाजी के दुःख के बारे में क्या कहूँ । सन पचहत्तर में जब ‘शोले’ आई थी । उसमे एक दृश्य था जिसमे गब्बर सिंह रहीम चाचा के बेटे अहमद को मारकर घोड़े की पीठ पर उसे लादकर रामगढ़ भेज देता है । इस दृश्य में रहीम चाचा बने हंगल साहब का एक डॉयलाग था “जानते हो दुनिया का सबसे बड़ा बोझ क्या होता है ...बाप के कन्धों पर बेटे का जनाज़ा, इससे भारी बोझ कोई नहीं है।“ 

यह फिल्म देखने के बाद पहला ख्याल यही मन में आया कि शिवनाथ फूफाजी ने जब अपने युवा बेटे जगदीश की अर्थी अपने कन्धों पर उठाई होगी तब अपने आँसू भीतर ही भीतर जज़्ब करते हुए, बुआ को दिलासा देते हुए, क्या उन्होंने ऐसा ही कुछ नहीं सोचा होगा ? 

स्मृतियों की इस यात्रा में फ़िलहाल नागपुर में मैं उतनी देर ही रुका हूँ जितनी देर दो स्टेशनों के बीच चलने वाली ट्रेन किसी बीच के स्टेशन पर ठहरती है । नागपुर मेरे भीतर किस तरह बसा है और आशा-निराशा, खुशी,रुमान,घुटन,विद्रोह जैसे कितने ही भावों के प्रथम प्रतिबिम्ब के जनक के रूप में मेरे भीतर इस शहर की उपस्थिति है इसका ज़िक्र शायद आगे के पन्नों में आये ।  

जगदीश भैया की यह चिठ्ठी भेजते हुए बच्चन भैया यानी सतीश कोकास ने कहा था 

जगदीश भैया की चिठ्ठी 

शरद आशिर्वाद। कल अचानक कचरे से ऐसी चिट्ठी मिली जिसे धरोहर का दर्जा दिया जा सकता है। ये चिट्ठी बडे भैया जगदीश ने 29-6-1961 को नानाजी (बाबूलाल, बैतूल) को भेजी थी जो उन्हे 1-7-1961 को मिल गयी थी। 2-7-1961 को भैया की एक्सीडेन्ट मे मौत हो गयी। बडे मामा सूचना मिलने पर अन्त्य संसकार मे आते समय ये पत्र लेकर आये व बप्पा को दिये जो अब तक सुरक्षित है। मै लेमिनेट करवा रहा हू।

बुआ के परिवार मे एकविवाह समारोह मे माँ 


नई पीढ़ी