10 जून 2026

90 .बड़े से दरवाज़े के पीछे छुपा एक तिलिस्म





बचपन के वे दिन बहुत खूबसूरत थे ৷ चिंताएं मानस की देहरी लांघने का प्रयास ही नहीं करती थीं ৷ मक्खन से नर्म उन दिनों में देवकीनंदन खत्री के उपन्यासों के तिलिस्म थे, परियों की कहानियाँ और राजकुमारी को जादू के जोर से मेंढकी बना देने वाली जादूगरनी के किस्से थे, मृत्युंजय यानि फैंटम के कॉमिक्स थे ৷ रंगीन चित्रों वाली यह किताबें बार बार मुझे बुलाती थीं और मैं कोर्स की नीरस किताबों से बचता हुआ इनसे प्यार करने लगता था ৷ 


उन दिनों रेडियो पर एक गीत आया करता था “ सिकंदर ने पोरस से की थी लड़ाई ,जो की थी लड़ाई , तो मैं क्या करूँ ...?” इतिहास की किताब खोलकर मैं उसे सर पर रख लेता और महेंद्र कपूर की आवाज़ में सुर मिलकर ज़ोर से गाता “जो कौरव ने पांडव से की हाथापाई तो मैं क्या करूँ ৷” मुझे इतिहास में रूचि तो थी लेकिन राजाओं महाराजाओं का नहीं बल्कि अपने आसपास के लोगों का इतिहास जानने में ৷ पाठ्य पुस्तकों में पढाये जाने वाले इतिहास, भूगोल व नागरिक शास्त्र यह सभी विषय मुझे बेहद उबाऊ लगते और मैं हमेशा इन सबसे  पीछा छुड़ाने का प्रयास किया करता । 


स्कूल से घर लौटकर मैं लाख सबक  रटने की कोशिश करता लेकिन सबक था कि मुझे याद ही नहीं होता था ৷ उस समय मेरी एक मज़ेदार धारणा थी कि सर पर तेल ठोंकते हुए सबक याद करने से सबक जल्दी याद हो जाता है । मैं अक्सर ऐसा ही किया करता था और आश्चर्य कि सबक मुझे याद हो जाता ৷ फिर मैं अन्य मित्रों को भी यही टोटका आज़माने की सलाह दिया करता था । यह टोटका “ नदी का पानी नदी में जा, मेरी पट्टी सूख जा “ जैसे टोटके की श्रंखला का ही एक टोटका था ৷ बड़े होने के बाद मनोविज्ञान पढ़ते हुए मैंने जाना कि इस तरह स्वयं को दिए जाने वाले सुझाव सेल्फ सजेशन कहलाते हैं ৷


सातवीं कक्षा तक पहुँचते हुए बचपन की आवाज़ मैं पिछली गली में छोड़ आया था और किसी और ही आवाज़ में बोलने लगा था ৷ एक दिन आश्चर्य और भय के भँवर से बाहर निकालते हुए माँ ने मुझे बताया कि इसे ‘कंठ फूटना’ कहते हैं और अब आगे जीवन भर मेरी यही आवाज़ रहेगी ৷ अपनी देह में होने वाले परिवर्तनों को मैं संवेदनशीलता के साथ महसूस कर रहा था,  स्तनाग्रों में होने वाले दर्द के विषय में जब मैंने माँ से कहा तो उन्होंने कहा इस उम्र में लडके लड़कियों दोनों के लिए ऐसा होना स्वाभाविक है इसी बिंदु से बच्चे स्त्री और पुरुष होने की अलग अलग राह पकड़ते हैं ৷ 


मैं बचपन से ही को एजुकेशन में पढ़ रहा था, जननेन्द्रियों के अलावा शारीरिक तौर पर इस उम्र में लडके लड़कियों में कोई और फ़र्क होता है ऐसा मैंने कभी महसूस नहीं किया था ৷ लेकिन अब बढ़ती हुई देह के बदलते अनुपात में मैं यह अंतर महसूस करने लगा था ৷ मेरे मन में लड़कियों के प्रति एक अंजान सा आकर्षण भी जन्म लेने लगा था और मैं सबकी नज़रें बचाकर उनकी ओर देखने भी लगा था ৷ 


कैलेण्डर में अक्तूबर का पन्ना कुलाटी खाकर सितम्बर के पीछे जा चुका था और खुली खिड़की से झाँकते हुए, कानो पर मफलर बांधे अगहन मुस्कुरा रहा था ৷ भंडारा शहर से लगे खेतों में तुअर और मटर की फल्लियाँ, मुली गाज़र जैसी वनस्पतियाँ और चौलाई,मेथी,पालक की ताज़ी हरी सब्जियाँ शीतल बयारों के साथ अठखेलियाँ कर रही थीं ৷ 


स्कूलों में यह शैक्षणिक सहल यानी पिकनिक का मौसम था ৷ एक दिन हमारे क्लास टीचर घड़ोले सर ने क्लास में घोषणा कर दी कि अगले रविवार को  सब लोग पिकनिक पर जायेंगे ৷ इस पिकनिक में विशेष हिदायत यह थी कि कोई टिफिन नहीं ले जायेगा बल्कि  खाना पकाने का सामान यहीं से ले जायेंगे और वहाँ जंगल में सूर नदी के किनारे खाना बनायेंगे । उन्होंने शाम को मुझे घर पर बुलाया और कुछ आवश्यक कामों की सूची बनाकर मुझे दे दी । 


घड़ोले सर मुझे बहुत अच्छे लगते थे ৷ वे बेहद सलीके से कपड़े पहनकर आया करते और काफी स्मार्ट दिखते थे ।  वे हमें इंग्लिश पढ़ाया करते थे । उनका न केवल पढ़ाने का ढंग अच्छा था बल्कि वे खुद भी एक बहुत अच्छे व्यक्ति थे और हम बच्चों को बहुत चाहते थे ৷ 


खाने पीने की व्यवस्था और सामान खरीदने की ज़िम्मेदारी घड़ोले सर की थी ৷ मुझसे उन्होंने कुछ गीत तैयार करने के लिये कहा और मुझे यह दायित्व सौंपा कि अन्य छात्र छात्राओं से भी गीत तैयार करवाऊँ । मैंने जब गाने वाले मित्रों के बारे में सोचना प्रारंभ किया तो मुझे सिवाय अर्चना के और किसी का नाम याद नहीं आया । मैंने सर से यह कहा तो उन्होंने आदेश दिया “कल छुट्टी है, कल अर्चना के घर जाओ और उससे कहो कि ‘मेरे रोम रोम में बसने वाले राम ‘ और ‘बच्चे मन के सच्चे “ यह दो गीत तैयार करे । 


अर्चना वहीं महल के निकट एक बाड़े में रहा करती थी । मैं अगले दिन दोपहर में अर्चना के घर पहुँचा । कक्षा की किसी भी लड़की के घर जाने का मेरा यह प्रथम अवसर था सो संकोच के अलावा थोड़ा डर भी लग रहा था । यह शंकर राव शेंडे का बाड़ा था ৷ बाड़े में प्रवेश के लिए एक बड़ा सा दरवाज़ा था जिसके भीतर किराये के अनेक मकान थे ৷ मैं कभी उस दरवाज़े के भीतर गया नहीं था इसलिए मुझे ठीक से पता नहीं था कि अर्चना किस मकान में रहती है ৷ बस यह पता था कि स्कूल से लौटते हुए वह उस बड़े से दरवाज़े के भीतर चली जाती है ৷ 


उस बड़े से दरवाज़े पर पहुँचकर मैं ठिठक गया ৷ मुझे वह एक तिलिस्म की तरह लगा ৷ भीतर एक बहुत बड़ा आँगन था जिसके आगे अनेक मकानों के दरवाज़े थे  ৷ मैं सोच ही रहा था कि किसीसे पता पूछूँ कि देखा दरवाज़े के ऊपर सड़क की ओर एक गैलरी है जिस पर एक महिला खड़ी हुई है ৷ मैंने थोड़ी हिम्मत जुटा कर उनसे पूछा “ वो..अर्चना .. अर्चना यहीं रहती है क्या ? “ 


उस महिला ने मुझसे तो कुछ नहीं कहा लेकिन पीछे पलटकर आवाज़ दी “ अर्चना, तुम्हारे यहाँ कोई आया है । “ अर्चना गैलरी में प्रकट हुई ৷ उसके बालों की  एक लट माथे पर झूल रही थी और दोनो हाथ बरी के पीठे से सने हुए थे ৷ शायद वह अपनी पड़ोस वाली आंटी की बरी डालने में मदद कर रही थी । “अरे ! तुम ?” उसे आश्चर्य हुआ ৷ बहरहाल, मैंने उसे आश्चर्य से उबरने का मौका दिए बगैर जल्दी जल्दी घड़ोले सर का सन्देश सुनाया और घर वापस आ गया । 


आप लोगों को फिल्म बॉबी का ऋषि कपूर और डिम्पल कपाड़िया की पहली मुलाकात वाला दृश्य याद आ रहा होगा ना ? माफ़ कीजिये, यहाँ ऐसा कुछ नहीं घटित हुआ ৷ सारे नाटकीय दृश्य फिल्मों में ही घटित होते हैं, ज़िंदगी तो जन्म से लेकर मृत्यु तक एक सपाट दृश्य के अंतर्गत ही घटित होती है ৷ 


यद्यपि इस पहली मुलाकात के बाद अर्चना के परिवार से हम लोगों के पारिवारिक सम्बन्ध स्थापित हुए ৷ हम लोगों का उनके यहाँ आना जाना प्रारंभ हुआ ৷ अर्चना ने हमारी माँ को मौसी कहना शुरू किया और उसकी माँ हम लोगों की मौसी हो गई  । अर्चना से बड़ी इन्ना दीदी, छोटे भाई विनय और अभय मेरे, सीमा और बबलू के भाई बहन हो गए ৷ यह मुलाकात ऐसे रिश्तों की गंगोत्री थी जिनसे निकली गंगा आज तक बह रही है ৷ 


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