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8 जून 2026

58.बैतूल : भाग भाग राक्षस तलवार लेकर देवी आई


“भैया, आपने तो समझो मेरा वध ही कर दिया था उस दिन ।“ सद्दू नाई  ने चाय की चुस्की लेते हुए मदन मोहन ताऊजी से कहा । 

ताऊजी हँसने लगे, “भाई, अब देवी माता है तो वह राक्षस का वध करेगी ही, यह समझ लो कि तुम्हारी किस्मत अच्छी थी इसलिए बच गए तुम उस दिन । “ 

“बच तो आप भी गए भैया ।” सद्दू ने  हँसते हुए कहा “वर्ना देवीजी पर राक्षस का मर्डर करने के आरोप में धारा 302 लगना तो पक्का था ।“  

ताऊजी ने एक ठहाका लगाया और सरौते से कतरी हुई सुपारी सद्दू  की ओर बढ़ाते हुए कहा “और क्या, सरकार के रिकार्ड में देवी और राक्षस थोड़े ही होते हम लोग ।“ 

ताऊजी और सद्दू  उन दिनों को याद कर रहे थे जब नवरात्र के बाद दुर्गा मंदिर के प्रतिमा विसर्जन के जुलूस में वे देवी बनते थे और बाबा वाघ राक्षस । 

बैतूल में इसी तरह कुछ कुछ नया घटित होता रहता था । यद्यपि यह शहर विकास की दौड़ में खरगोश कभी नहीं रहा, उसे अपनी कछुए की मंथर गति ही पसंद थी । अब एक छोटे से कस्बे में जीवन की इससे तेज़ गति हो भी क्या सकती थी । लोग अपनी छोटी छोटी खुशियों में मस्त थे । 

मनोरंजन के नाम पर दो सिनेमाघर रघुबीर और ज्योति टाकीज़, कभी कभार रामलीला और अन्य धार्मिक कार्यक्रम । फिर रामजन्मोत्सव, जन्माष्टमी, गणेशोत्सव और दुर्गोत्सव तो धूम धाम से मनाये जाते थे, ईद और क्रिसमस पर भी काफी चहल पहल रहती थी । बैतूल के लोग सांप्रदायिक सौहार्द्र जैसे शब्द को शब्दकोश या सरकारी विज्ञप्ति की वज़ह से नहीं जानते थे वह उनकी जीवन चर्या में गेहूं में ग्लूकोज़ की तरह शामिल था ।  

कृष्ण मंदिर और दुर्गा मंदिर में प्रतिदिन होने वाली शाम की आरती में हम बच्चों के शामिल होने का उद्देश्य भक्ति भाव से अधिक प्रसाद के लिए होता था । तीज त्योहारों का सिलसिला बरसात के दिनों से ही प्रारंभ हो जाता था लेकिन दशहरे और दुर्गा पूजा का यहाँ ख़ास महत्त्व था । यह समय शहर के वातावरण में अलग आनंद घोल देता था । घंटों की आवाज़ और सुबह शाम की आरती से मोहल्ला गूंजता रहता । अंतिम दिन यानि विसर्जन के दिन सुबह से ही तैयारी शुरू हो जाती । 

मदन मोहन ताऊजी दोपहर तक देवी काली की भूमिका में सज जाते थे, देह पर कालिख,पीली धोती, माथे पर मुकुट , सर पर लम्बे बालों का विग, स्त्रियोचित श्रृंगार, गले में नारियल के खाली कोटरों से बनी मुंड माला और एक लम्बी सी लाल रंग की नकली जीभ । उनके एक हाथ में लाल रंग से रंगा खप्पर होता और दूसरे हाथ में लोहे की भारी तलवार । 

वहीं सद्दू  राक्षस के मेकअप में आ जाते थे । रंग तो वैसे ही उनका गहरा था इसलिए काला रंग लगाने की उतनी ज़रूरत नहीं होती थी फिर भी राक्षस जैसा दिखने के लिए वे कालिख पोत लेते । कभी कभार वे राक्षस का मुखौटा भी लगा लेते थे और कमर में अधोवस्त्र के नाम पर एक काला कपडा लपेट लेते थे । कमर में बंधे उनके पटके में एक कटार भी खुसी होती थी और मुँह में बाहर की ओर निकले राक्षस जैसे नकली दांत वाला सेट ।

पुराण कथाओं में वर्णित पात्रों को जीवित रूप में देखने की लालसा हर श्रद्धालु व्यक्ति के मन में होती है इसलिए हमें पौराणिक फिल्मे, नाटक और धारावाहिक अच्छे लगते हैं । बैतूल के इस दशहरे के जुलूस के विशेष आकर्षण होते थे देवी और राक्षस । लगभग शाम के समय जुलूस प्रारंभ होता था । 

जुलुस में सबसे आगे बैंड बाजे वाले होते थे, उसके बाद एक ठेला होता था जिस पर बैटरी से चलने वाला एम्प्लीफायर और लाउड स्पीकर रखा होता था । एम्प्लीफायर से निकले तार के अंतिम सिरे पर होता एक माइक जिसे थामे होता झूम झूम कर जस गीत गाने वाली मंडली का मुख्य गायक ।  उसके बाद ढोल और नगाड़े वाले आते थे । फिर उसके बाद देवी बने ताऊजी और उनके आगे पीछे घूमते हुए  राक्षस बने सददु नाई । ताउजी हवा में अपनी तलवार लहराते और उसे आड़ा तिरछा घुमाते हुए राक्षस के आगे नृत्य की मुद्रा में गोल गोल घूमने लगते । राक्षस भी कुछ इस तरह अभिनय करता जैसे वह तलवार के वार से बचने की कोशिश कर रहा हो । जनता के आकर्षण का यह दृश्य पूरे जुलूस में विद्यमान रहता । अंततः प्रतिमा विसर्जन स्थल पर पहुंचकर जुलूस की समाप्ति हो जाती ।

जुलूस का दृश्य 
अपने जीवन में सबसे पहला जुलूस मैंने यही प्रतिमा विसर्जन का देखा था । उसके बाद देखी संघ की प्रभातफेरी, गणतंत्र दिवस का जुलूस,इंदिरा गांधी का जुलूस और आन्दोलनकारियों का जुलूस । फिर मुक्तिबोध की लम्बी कविता ‘अँधेरे में’ पढ़ने के बाद समझ में आया कि एक ऐसा भी जुलूस होता है जिसमे आलोचक,विचारक,कवि मंत्री उद्योगपति के साथ कुख्यात हत्यारा डोमाजी उस्ताद भी शामिल है, साथ ही काले घोड़ों पर सवार खाकी पोशाक में वे सैनिक हैं जिनके चेहरे का आधा भाग सिंदूरी और आधा गेरुआ है। 

“यहाँ ये दीखते हैं भूत-पिशाच काय /भीतर का राक्षसी स्वार्थ अब / साफ़ उभर आया है/ “

मैं जब भी आधे सिंदूरी, आधे गेरुए में रंगे सैनिक का ख्याल करता उसमे मंत्री के साथ हत्यारे डोमाजी का चेहरा भी मिल जाता और अंत में वह चेहरा देवी बने ताऊजी और राक्षस बने बाबा वाघ के चेहरे में बदल जाता । अवचेतन के यह सब खेल खेलने में मुझे बहुत आनंद आता है । स्वप्नों में हम रोज़ यही खेल तो खेलते हैं कहीं का व्यक्ति कहीं , किसी का चेहरा किसी का धड़ , अनजान अनचीन्ही जगहें, अनजान लोग । हालाँकि जो भी हम देखते हैं उसके बारे में या उससे मिलते जुलते दृश्य,व्यक्ति या स्थान के बारे में हमने पढ़ा हुआ या सुना हुआ होता है ।

उस साल ऐसा क्या हुआ कि फिर यह जुलूस कभी नहीं निकला 

बैतूल की सडकों पर दशहरे का वह जुलूस हर साल की तरह ही निकला था लेकिन उस साल जुलूस के इस मूल दृश्य में अचानक एक परिवर्तन उपस्थित हो गया ।उस दिन ढोल वाले कुछ अतिरिक्त उत्साह से ढोल बजा रहे थे । देवी बने ताऊजी कुछ देर तक तो राक्षस के साथ आमोद-प्रमोद की मुद्रा में तलवार लहराकर युद्ध का अभिनय करते हुए जुलुस के साथ चलते रहे, फिर अचानक एक स्थान पर खड़े हो गए । उन्होंने सर झटककर अपने लम्बे बाल आगे किये और आँखे बंद कर झूमना प्रारंभ कर दिया । जुलूस में शामिल लोगों के लिए यह कोई असामान्य बात नहीं थी । ढोल की ढम्म ढम्म की आवाज़ उनके अवचेतन में दाखिल हो रही थी और संगीत का प्रभाव जैसा कि आम लोगों पर होता है उन पर भी हो रहा था ।

अचानक भीड़ में से एक आवाज़ आई ...”भागो रे.. देवी आ गई , देवी आ गई ..”अवचेतन के शून्य हो जाने की स्थिति में यह सजेशन उनके लिए काफी था । यह आवाज़ सुनकर वे सीधे ट्रांस की स्थिति में पहुँच गए और हेल्युसिनेशन में अपने आप को सचमुच की देवी समझने लगे । ढोल नगाड़े वालों को भी यह देखकर आनंद आ गया कि उनका बजाना सार्थक हो गया है । वे उत्साह में और ज़ोर से बाजा बजाने लगे । ताउजी काफी देर तक आँखें बंद किये झूमते रहे फिर अचानक उन्होंने एक झटके से आँखे खोली ।

राक्षस बने सद्दू  अब तक तो उनकी इस स्थिति का आनंद ले रहे थे क्योंकि प्रति वर्ष की भांति यह दृश्य भी उनके लिए यह सामान्य बात  थी । लेकिन इस बार जैसे ही उन्होंने देवी बने ताऊजी की ऊपर की ओर चढी हुई लाल लाल ऑंखें देखीं  वे सहम गए । एक क्षण में वे जान गए कि ताउजी देवी  का अभिनय नहीं कर रहे हैं । इससे पहले कि  वे कुछ सोच पाते ताउजी ने हवा में अपनी तलवार लहराई और राक्षस बने बाबा वाघ की ओर दौड़ गए  । सद्दू ने तुरंत निर्णय लिया और सड़क पर दौड़ लगा दी । 

यह दृश्य जुलूस  में शामिल सभी लोगों के लिए अप्रत्याशित था, आगे आगे राक्षस और पीछे पीछे  देवी । एक जगह तो वे सामने ही आ गए । देवी ने तलवार लहराई और राक्षस पर वार किया राक्षस ने टेढ़े होकर तलवार का वार बचाया और  दौड़ लगा दी और एक गली में घुस गया । इस बीच लोगों को भी स्थिति की गंभीरता समझ में आ गई थी, लोग दौड़े और उन्होंने देवी बने मदन मोहन ताऊजी को पकड़ लिया । यद्यपि उन्हें संभाल पाना चार पांच लोगों के लिए भी मुश्किल था । जैस तैसे लोग उन्हें पकड़कर घर ले आये और कुर्सी पर बिठाकर उन पर बाल्टियों से पानी डालना शुरू किया .. इतने में किसी ने कहा “होश में आओ मदन.. तुम मदन हो देवी मैया नहीं हो । “ बस इतना सुनते ही वे सामान्य स्थिति में आ गए । फिर उन्होंने कपडे बदले और भीतर जाकर चुपचाप सो गए । 

वह उनके देवी बनने का अंतिम साल था । अगले साल उन्होंने साफ़ मना कर दिया । सददु  भी फिर राक्षस नहीं बने । मदन भैया पर देवी कैसे आई इसका विश्लेषण श्रद्धालु लोग भले अपनी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार करें लेकिन वास्तविकता यह थी कि अवचेतन द्वारा सूचना स्वीकार करने की स्थिति में आते ही वे ट्रांस की स्थिति में आ गए थे ।

इस घटना का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण 

मनोविज्ञान में हिप्नोटिज्म या सम्मोहन एक शाखा है जिसमे इस तरह के केसेस का विश्लेषण किया जाता है । अक्सर ढोल नगाड़े की आवाज़ सुनते हुए हमारा अवचेतन उस आवाज़ पर केन्द्रित हो जाता है । टीवी पर ध्यान से सीरियल या फिल्म देखते समय, नाटक देखते समय, एकाग्र होकर संगीत सुनते समय, किसी का व्याख्यान सुनते समय या कविता पाठ सुनते हुए भी अक्सर ऐसा  होता है । ऐसे समय यदि कोई सजेशन आप को दे तो वह कानों  से होता हुआ सीधे अवचेतन में दाखिल हो जाता है । ऐसे समय हमारा मस्तिष्क तर्क नहीं करता । आपने भूत उतारने वाले केन्द्रों में यह देखा होगा कि वहाँ तेज़ आवाज़ में ढोल बजाये जाते हैं । फिर जिस व्यक्ति को भूत बाधा से ग्रसित माना जा रहा है उसे यदि कोई मान्त्रिक या बैगा सजेशन दे कि “तुम्हारे शरीर में फला फला भूत है तो वह उसे बिना तर्क के स्वीकार लेता है ।  शरीर में देवी देवता भी इसी तरह सजेशन से आते हैं ।

ताऊजी के साथ भी यही हुआ था । ढोल नगाड़ों की आवाज़  के साथ जैसे ही उनका अवचेतन तरल अवस्था में पहुंचा, लोगों ने चिल्लाना शुरू किया ‘देवी आ गई  देवी आ गई ‘ और वे यह सूचना ग्रहण कर अपने आपको देवी का अवतार समझने लगे । आज न मदन मोहन ताउजी हैं न सद्दू  लेकिन मेरे अवचेतन में आज भी उनके देवी और राक्षस वाले बिम्ब विद्यमान हैं  ।

शरद कोकास 

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7 जून 2026

56 .बैतूल : बूढ़े बुज़ुर्गों की तरह होते हैं पुराने मकान

मिट्टी के पुराने मकान बूढ़े बुज़ुर्गों की तरह होते हैं । छप्पर की कमर झुक जाती है, दीवारों के पलस्तर में बेशुमार झुर्रियाँ दिखाई देने लगती हैं, बरसातों में  नज़ले ज़ुकाम की तरह टूटे खपरैल से होता हुआ पानी भीतर टपकने लगता है, उनकी त्वचा पर पड़े सीलन के धब्बे किसी चर्म रोग की तरह दिखाई देने लगते हैं , वे बमुश्किल साँस ले पाते हैं और देर रात तक खाँसते हैं । 

गर्मियों में अक्सर उनकी नींद सुबह जल्दी उचट जाती है और वे अपने आसपास बने युवा मकानों को एसी और कूलर की लोरी में गहरी नींद में सोता हुआ देखते हैं ।


सर्दियों में वे कानों में मफ़लर लपेटने के बावजूद कभी भी ढह जाने का अंदेशा लिए काँपते हैं । बेमौसम बारिश में अपने आँगन में पानी से भरे डबरे में अपना अक्स देखते हुए वे सोचते हैं कि वे भी कभी जवान थे ।

मेरा बचपन बैतूल के इस पुराने मकान की जवानी का गवाह है ।


हम बच्चे  खेलकर आते थे और दालान से होते हुए बीच का कमरा और आंगन पार कर सीधे रसोईघर में प्रवेश करते थे । दालान के बाद  बीच में एक बड़ा कमरा था । इसकी छत बांस और मिटटी से बनी थी जो ऊपर वाले कमरे का मिट्टी का फर्श थी ।
दालान के बाद बीच के कमरे में सीमा 

बीच के कमरे के बाद छपरी से बाहर 
यहाँ से लकड़ी के पटियों से बनी दस पायदान वाली सीढ़ियाँ ऊपर की ओर जाती थीं । बिनाका गीतमाला में जब अमीन सयानी साहब ‘पायदान’ शब्द कहते थे तो हमारे जेहन में इन्ही सीढ़ियों का अक्स उभरता था ।
लकड़ी की सीढ़ियों पर सुभाष बाबू 
हम लोग सीढ़ियों से चढकर ऊपर जाते लेकिन उतरते वक़्त छत से बाहर निकले बाँस के दो टुकड़ों से किसी जिमनास्ट की भांति लटककर नीचे आ जाते  । सीढ़ियों से ऊपर पहुँचते ही दाहिनी ओर मदन मोहन ताउजी का एक कमरा था जहाँ हम बच्चे इनडोर गेम्स खेल खेला करते थे ।
मदन मोहन ताउजी का कमरा 
बीच में एक बड़ा हाल नुमा कमरा जिसमें बाहर झाँकती छोटी छोटी दो खिड़कियाँ थीं, फिर मनमोहन ताउजी यानि दादाभैया का कमरा । 
मनमोहन ताउजी का कमरा 
दिवाली के दिन यह कमरा लक्ष्मी जी को आवंटित हो जाता था । लक्ष्मी पूजन हेतु सारे लोग इस कमरे में जुटते । दादाभैया लक्ष्मीजी की प्रतिमा की स्थापना करते और स्थल सजावट करते । हम सब श्रमजीवी थे इसलिए प्रतिमा के साथ कुदाल, फावड़े, आरी,बसूला, हथौड़ी,खुरपी आदि औजार रखे जाते । पूजन का प्रोटोकाल बिलकुल तय था, सबसे पहले दादाजी और उनके भाई, फिर दोनों ताउजी, फिर बाबूजी, फिर सभी  चाचा लोग  और उसके बाद तीसरी पीढी में हम बच्चों का नंबर आता था । तब तक हम लोग इतने ऊब जाते कि नीचे जाकर पटाखे जलाने में व्यस्त हो जाते । उसके बाद तो लक्ष्मी जी खुद कह देती थीं ..जाओ बच्चों , खेलो कूदो, मेरी इबादत बड़े होने के बाद कर लेना ।

पुराने मकान की एक मिनट की सैर के लिए यहाँ पर क्लिक करें  

नीचे बीच वाले कमरे के बाद एक छपरी थी जिसमे जाली लगी थी,


उसके बाद जच्चाघर जैसा एक कमरा जिसे हम ‘माँ की कोठरी’ कहते थे । मेरे बड़े भाइयों और मेरे अलावा अनेक बच्चों ने आँखे खोलते ही सबसे पहले इसी कोठरी की दीवारें देखी थीं और खिड़की से आती सुबह की धूप की पहली उष्मा महसूस की थी । माँ की यह कोठरी बिना अवकाश लिए नवजात शिशुओं के आगमन से सदा प्रफुल्लित रहती थी । वैसे यह एरिया छोटी दादी के अंडर में आता था ।
इस खिड़की से पहली बार मैंने दुनिया देखी थी 
इस छपरी को पार करने के बाद बीच में एक बड़ा सा आंगन था जो हमारा डायनिंग लॉन था ।

आंगन पार करते ही उस पार  रसोई घर व भंडार घर के कमरे, स्नानगृह आदि । रसोई में दादियाँ,दोनों बड़ी माताएँ  , व चाची खाना बनाया करती थीं । माँ का आगमन चूँकी छुट्टियों में मेहमानों की तरह होता था इसलिये उन्हें  सुबह शाम चूल्हा जलाकर चाय का अदहन चढ़ाकर सबको चाय पिलाने की ज़िम्मेदारी सौंप दी जाती थी । हालाँकि यह कार्य भी आसान नहीं था, पच्चीस तीस सदस्यों को जिनका जागने का समय अलग अलग था, चाय पिलाते पिलाते दो घंटे का समय तो उन्हें लग ही जाता था, यही क्रम शाम को भी जारी रहता । 

बाबा नागार्जुन की कविता में आंगन से ऊपर उठता धुआं भले कई दिनों के बाद दिखाई देता हो लेकिन हमारे घर में प्रतिदिन शाम को धुआं उठने का यह दृश्य अनिवार्य था । इस धुएँ में शामिल छौंकी हुई दाल की गंध,फूलगोभी की सब्ज़ी की महक, कच्ची कैरी की चटनी में शामिल पुदीने की ख़ुशबू जैसे ही हम लोगों के नासापुटों तक पहुँचती हम लोग थाली लिए बड़ी माँ के सामने खड़े हो जाते । थाली में दाल,रोटी, सब्ज़ी, चटनी प्याज़, आदि लेकर हम लोग आंगन में आ जाते और पसरकर बैठ जाते । 

उन दिनों एक थाली में अकेले बैठकर खाने जितने हम लोग सभ्य नहीं हुए थे । अक्सर यह होता था कि दो बच्चे एक बड़ी सी थाली में खाना शुरू करते और फिर एक एक कर बच्चे उनके साथ शामिल हो जाते । ओपनिंग बैट्समैन के आउट होने के बाद भी लास्ट विकेट तक भोजन का यह सिलसिला उसी पिच पर जारी रहता, साथ ही रसोईघर से मांग और पूर्ति के नियमानुसार रोटियों और सब्जियों की आपूर्ति जारी रहती।

  इस भोजन सत्र में सबसे अधिक आकर्षण मदन मोहन ताउजी के बेटे यानि हमारे मुल्लू भैया और होशंगाबाद वाली पुष्पा बुआ के बेटे संतोष भैया का एक साथ भोजन करना था । वे उम्र में बड़े थे सो उनकी पार्टी अलग थी । उनके साथ थाली में भोजन का दुस्साहस करने वाले बच्चे जल्दी ही आउट हो जाते लेकिन मुल्लू भैया और संतोष भैया पिच पर लगभग डेढ़-दो घंटे डटे रहते।  दोनों ही अखाड़े में वर्जिश करते थे इसलिए उनकी खुराक काफी तगड़ी थी । 

दोनों भाइयों में कभी कभी मिर्ची खाने की प्रतियोगिता भी होती थी जिसका समापन तीखेपन को न सह पाने के कारण हिचकी, आँखों से पानी आने जैसी क्रियाओं पर ही होता था । पुरस्कार स्वरूप उन्हें एक गगरी पानी और मुठ्ठी भर गुड़ प्रदान किया जाता था । वैसे भोजन में ज़्यादातर रोटी, सब्ज़ी ,प्याज़ और चटनी हुआ करती थी, दाल का कोटा ज़रा कम था । गेहू तो खेत में ही होता था सो बहुतायत में उपलब्ध था लेकिन चावल एक विलासिता की वस्तु थी इसलिए कभी कभार ही पकता था । 

हम लोगों के भोजन सत्र इतने मनोरंजक होते थे कि भोजन संपन्न होने के पश्चात भी किसी के उठने का मन नहीं करता था । इन सत्रों में विगत में संपन्न शादी ब्याह और बारातों के किस्से, फूफाओं और जीजाओं के साथ की गई शरारतों के किस्से बहुत चाव से सुने सुनाये जाते । बड़े भाइयों और चाचाओं द्वारा सुनाये गए उन किस्सों में हम बच्चों को कहानी सुनने का मज़ा आता था । 

मिट्टी के पुराने मकान बूढ़े बुज़ुर्गों की तरह होते हैं । वे भले ही किसी काम के न हों लेकिन उनके हमारे आसपास बने रहने से रौनक बनी रहती हैं उनकी उपस्थिति हमें न केवल अपने बल्कि मनुष्य जाति के बचपन की याद दिलाती हैं ।


शरद कोकास 



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