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8 जून 2026

61.नागपुर दो : कबीर के वंशजों का मोहल्ला

कौन हैं कबीर के वंशज इस पोस्ट मे पढिए 

ऐसे लोग बहुत कम होते हैं बचपन में ही जिनका साक्षात्कार दुख से हो जाता है, अन्यथा  ‘दुख’ यह शब्द हम सबसे पहले किताबों में ही पढ़ते हैं । 

मैंने सबसे पहले दुख यह शब्द कबीर के दोहे “दुःख में सुमिरन सब करे” में ही पढ़ा । बचपन के उन दिनों में मैं कबीर और तुलसीदास के चित्र में मैं अधिक भेद नहीं कर पाता था ।

कबीर 

तुलसीदास 

फिर एक दिन मैंने कबीर का एक ऐसा चित्र देखा था जिसमे वे करघे पर कपड़ा बन रहे थे । बाबूजी ने बताया कि कबीर कविता अवश्य लिखते थे लेकिन उनकी रोजी रोटी कपडा बुनने से ही चलती थी । तुलसीदास क्या करते थे मुझे पता नहीं । आपको पता हो तो अवश्य बताएं । 
कपड़ा बुनते हुए कबीर 

फिर एक दिन मैंने इतवारी नागपुर में रमेश चाचाजी के घर के पास वह करघा देखा जिस पर चित्र में कबीर कपड़ा बुन रहे थे । इतवारी रेल्वे स्टेशन के पास शांतिनगर के रास्ते पर बस्तरवारी मोहल्ले में पाँच देवल मंदिर के निकट  यह जुलाहों की एक बस्ती थी ।


चाचाजी और मौसी जी उन दिनों यहाँ पांडुरंग समर्थ के यहाँ किराये के एक छोटे से मकान में रहा करते थे ।
पांडुरंग समर्थ का मकान 

उन्हीके मकान की दाहिनी ओर मोहाड़ीकर का वह खपरैल वाला मकान था जिसके अहाते में वह करघा लगा था । यह कबीर के वंशजों का मोहल्ला था । जुलाहे वहाँ ‘कोष्टी’ कहलाते थे । अगर उनके घर में  जगह नहीं होती थी तो वे उन संकरी संकरी गलियों में ही अपने करघे लगा लेते थे और उसमे रंगबिरंगे धागों का ताना-बाना डालते थे । नागपुरी हैण्डलूम  नौवारी  साड़ी को वहाँ सड़कों पर बनते हुए मैंने पहली बार देखा था । 

बुनकर दिन रात पसीना बहाकर साड़ियाँ और कपडे तैयार करते थे । बाज़ार तक सीधे उनकी पहुँच नहीं थी । उनके द्वारा तैयार किया हुआ सारा माल किसी बिचौलिए के माध्यम से दुकान तक पहुंचता था । दुकानदार उस माल को बेचकर तगड़ा मुनाफ़ा कमाता था लेकिन ग़रीब बुनकर के हाथ में अधिक कुछ नहीं आता था । फिर जब धीरे धीरे कपड़ा मिलें खुलती गईं तो पॉवरलूम का चलन बढ़ गया और हैंडलूम की मांग कम होती गई । उस समय बुनकरों की स्थिति देखकर बहुत दुख होता था । 

चाचाजी के मकानमालिक पांडुरंग समर्थ जी के तीन बेटे हैं किशोर, प्रमोद, मनोहर और एक बेटी मीना । सामने की ओर लांजेवार परिवार रहता था जिनकी बेटियाँ थीं कुसुम मनु और कमला । मौसी के घर मैं कई कई दिनों तक रहा करता था इसलिए मोहल्ले के सब बच्चों से मेरी पहचान हो गयी थी । मोहाड़ीकर के बड़े बेटे थे पुरुषोत्तम जिन्हें पुरश्या कहते थे । मराठी में इसी तरह नाम को प्यार से बिगाड़कर नाम के साथ ‘या’ लगाने का चलन है जैसे प्रकाश को ‘पक्या’, मनोहर व मनोज को ‘मन्या’ , रघुनाथ को ‘रघ्या’ जगदीश को ‘जग्या’ कहते हैं  

मेरे मौसेरे भाई प्रणय के साथ प्रमोद समर्थ 
नागपुर की गर्मियाँ असहनीय होती थीं, स्वाभाविक था कि सुबह नींद जल्दी खुल जाती थी । मौसी गोबर युक्त पानी से आँगन सींचने के लिए तैयार हो जाती थीं । मराठी में गोबर घुले पाने से आंगन सींचने के लिए ‘सड़ा टाकणे’ यह शब्द हैं । कुछ लोग क्रिया में हिन्दी का इस्तेमाल करते हुए इसे ‘सड़ा डालना’ कहते हैं आप खुद ही सोचिये ‘आंगन में सड़ा डालो’ इस वाक्य का क्या अर्थ निकलेगा ।

मौसी के घर के सामने की ओर लांजेवार के घर के पीछे यादव जी रहते थे जिनके यहाँ बहुत हृष्ट पुष्ट भैंसे थी ।


मौसी पीतल की एक बाल्टी मुझे देती, आंगन सींचने व लीपने के लिए जिसमे मैं पांच पैसे का बाल्टी भर गोबर ले आता । जिस तरह मुंबई में पांच पैसे गिलास पानी बिकता हुआ देखकर मैं आश्चर्य चकित हुआ था उसी तरह का आश्चर्य मुझे यहाँ गोबर बिकता हुआ देखकर हुआ । 

अब तो लोग शान से अमाजान से मिनरल वाटर और काउ डंग केक के नाम पर पानी व गोबर खरीदते हैं । हालाँकि उस समय भी ताती गारू जैसे लोग थे जो मोहल्ले के बच्चों को पिपरमेंट की गोली व बिस्किट मुफ़्त बाँटा  करते थे । ताती गारी तेलगु भाषी थे जो मौसी के घर के सामने की ओर रहा करते थे । उनके  बच्चों  कृष्णा, नानी और सेसू से भी मेरी पहचान थी । 

इतवारी की उस सघन बस्ती में मौसी की सुबह भूसे की सिगड़ी जलाने के साथ होती थी । लकड़ी के बुरादे को लोहे की सिगड़ी में जमाने की प्रक्रिया मुझे बहुत रोमांचक लगती थी । इसके लिये सिगड़ी के बीचोबीच लोहे का एक छोटा सा सिलेंडर रखा जाता और उसके आसपास ठूँस ठूँस कर हल्का गीला बुरादा भरा जाता ताकि बीच में जगह खाली रहे । फिर नीचे से कागज़ आदि जलाकर उसमें आग लगाई जाती । कुछ देर तक धुआं उठता फिर लकड़ी का वह भूसा गर्म लोहे की तरह लाल हो जाता । फिर उस पर खाना पकता । शाम के वक्त यह प्रक्रिया पुनः दोहराई जाती ।

बचपन के उन दिनों में हम लोग जब भी नागपुर जाते कुछ समय धन्तोली में बड़ी बुआ के यहाँ ठहरते और कुछ समय इतवारी में मौसी के यहाँ । मेरी कोशिश होती कि रविवार को मैं मौसी के यहाँ रहूँ । चाचाजी रविवार को अक्सर घर पर ही रहते थे । वे सुबह सुबह तैयार होते और मुझे लेकर रेल्वे स्टेशन के सामने पुल के नीचे की ओर स्थित दही बाज़ार में मटन की एक दुकान पर ले जाते ।

इतवारी रेल्वे  स्टेशन 

दही की दुकानों की अधिकता के नाम पर इस बाज़ार का नाम ‘दही बाज़ार’ पड़ा था लेकिन यहाँ सब्ज़ी से लेकर दैनिक उपयोग की सारी आवश्यक चीज़ें उपलब्ध थीं । चाचाजी मटन बहुत बढ़िया पकाया करते थे और रविवार का दिन इसके लिए तय था ।
दही बाज़ार नागपूर - चित्र हर्ष नंदनवार 



60.नागपुर एक : दुःख ही जिनके जीवन की कथा रही

अगले पाँच एपिसोड मे पढिए शहर नागपूर के अनकहे किस्से 

नागपूर रेलवे स्टेशन 
ऐसी कोई सड़क जिस पर आप अपने बचपन में चला करते थे, जो आपके स्कूल या किसी दोस्त के घर या बाज़ार जाती थी, बड़े होने के बाद उस पर कभी चलकर देखिएगा । 

बचपन के दिनों में जो सड़कें बहुत बहुत लम्बी लगती थीं वे अचानक छोटी लगने लगेंगी । 

जिन रास्तों को तय करने में पहले अधिक समय लगता था वे जल्दी तय हो जायेंगे । एकबारगी यह सवाल मन में आएगा .. कहीं सड़कें छोटी तो नहीं हो गईं ? लेकिन सड़कें कहाँ छोटी होती हैं,  दरअसल हमारे पाँव ही लम्बे हो जाते हैं । 

फिर ऐसे ही किसी दिन बचपन की उन सड़कों पर चलते हुए, आसपास की चीजों के आद्य रुप को याद  करते हुए अपने बचपन में लौटने की कोशिश कीजियेगा, आपको ऐसे कई लम्हे मिलेंगे जिनसे गले मिले बगैर आप जीवन यात्रा में आगे बढ़ गए थे । कुछ देर उनके साथ रहिएगा और उनके हाल पूछियेगा ..आपको ज़िंदगी में मज़ा आने लगेगा । हाँ इतना ध्यान रहे कि यह सफ़र लम्बे कदमों  के साथ नहीं बल्कि बचपन के अपने उन्ही नन्हे नन्हे पांवों के साथ होना चाहिए । साथ में बचपन के साथी हों तो और भी अच्छा ।

घर से स्कूल तक जाने वाली उस सड़क के अलावा एक और लम्बी सड़क थी मेरे बचपन में जो भंडारा से बैतूल तक जाती थी । कभी वह सड़क रेल की पटरी भी हो जाती थी । घर के पास ही भंडारा रोड स्टेशन से जवाहर नगर आर्डिनेंस फैक्टरी को जोड़ने वाली एक ऐसी रेल पटरी थी जिस पर से कभी कभार  ही कोई रेल गुजरती थी । अक्सर दोस्तों के साथ घूमते हुए मैं उस ओर चला जाता था । हम लोग पटरी  पर कान लगाकर कुछ सुनने की कोशिश करते, दोस्त कहते इससे पता चलता है ट्रेन कितनी दूर है । 

मुझे पटरी से आनेवाली उस आवाज़ में जाने कितने शहरों की आवाजें सुनाई देती थी । दोस्त कहते “ऐसा भी कहीं होता है ?” मैं कहता “ क्यों नहीं, आखिर देश की सारी पटरियां कहीं न कहीं तो एक दूसरे से मिलती ही होंगी तभी तो हम रेल से हर शहर तक जा सकते हैं । “ 

फिर एक दिन मैंने सोचा काश हम मनुष्य भी इन पटरियों की तरह होते तो हम में इतना भेदभाव तो न होता और हम एक दूसरे के दुःख सुन सकते । 

 भंडारा से बैतूल जाने के लिए भंडारा रोड स्टेशन जाने की अनिवार्यता थी । यह स्टेशन शहर से ग्यारह किलोमीटर दूर स्थित है इसलिए इसका नाम ‘भंडारा रोड’ पड़ा । जो स्टेशन शहर से दूर होते हैं उनके नाम के साथ ‘रोड’ जुड़ा होता है । स्टेशन के आसपास की बस्ती वरठी गाँव कहलाती है । भंडारा से बैतूल के लिए कोई सीधी ट्रेन नहीं थी । पहले ट्रेन या बस से नागपुर जाना पड़ता था फिर वहाँ से बैतूल । 

नागपूर रेल्वे  स्टेशन बाहर का दृश्य 

वैसे तो हम लोग ट्रेन से पहले नागपुर जाते फिर ट्रेन बदलकर बैतूल लेकिन जब भी कुछ अतिरिक्त समय होता हम लोग बस से नागपुर जाते और वहाँ एक दो रोज़ ठहरकर बैतूल । नागपुर में बाबूजी की बड़ी बहन विद्यावती और छोटी बहन प्रकाशवती का निवास था । माँ की छोटी बहन बहन लीला भी नागपुर में ही थीं जो बाबूजी के चचेरे भाई रमेश चन्द्र को ब्याही थीं । इस तरह वहाँ दोहरा रिश्ता था । 

विद्या बुआ बाबूजी के सभी भाई बहनों में सबसे बड़ी थीं । हमारे फूफाजी शिवनाथ कोकास अंग्रेज़ी अखबार हितवाद में काम करते थे और अपने परिवार के साथ धन्तोली में रहा करते थे ।



उनकी संतानों में  सबसे बड़ी श्यामा जीजी, उनके बाद रमा जीजी, सतीश  भैया, निर्मला जीजी, प्रदीप भैया, प्रमिला जीजी और सबसे छोटे दीपक । बड़े बेटे  जगदीश का सन साठ में एक सड़क दुर्घटना में निधन हो गया था ।

वहीं मोतीबाग रेलवे कॉलोनी में छोटी बुआ यानि प्रकाश बुआ की ससुराल थी ।


फूफाजी की इंकमटैक्स विभाग में नौकरी के कारण वे लोग कभी जबलपुर कभी नागपुर रहा करते थे । उनके बड़े बेटे राजेंद्र का जन्म हो चुका था । कालांतर में बिटिया रजनी और  छोटे बेटे राकेश का जन्म हुआ । बाद में सन अडसठ के करीब वे लोग गोकुलपेठ  स्थित अपने नए निवास में आ गए । 

इतवारी में रमेश चाचा और लीला मौसी अपने बच्चों के साथ रहा करते थे ।


चाचा जी रेल्वे में टी टी ई थे, उनके बड़े बेटे हैं प्रभात उससे छोटी सन्ध्या, फिर निशा । प्रणय का जन्म बाद में हुआ था ।

सन्ध्या के जीवन की कथा भी बहुत दुखद रही ।

विवाह के प्रारम्भिक वर्षों में ही उसका विवाह विच्छेद हो गया था, बिटिया कोमल को लेकर वह मायके आ गई । इस आघात ने जैसे उसके मन पर असर किया वैसे ही देह पर भी, इसलिए  अल्पायु में ही उसे दुनिया छोड़कर जाना पड़ा । 

मौसी और दोनों मामाओं  ने कोमल को पढ़ाया लिखाया, पाल पोस कर बड़ा किया और उसका विवाह किया । सब कुछ ठीक चल रहा था, लेकिन दुख तो जैसे घात लगाये बैठा था । वर्ष दो हज़ार इक्कीस में आनेवाली कोविड  की दूसरी लहर कोमल को हम सबसे छीन कर ले गई । अभी मात्र चौंतीस साल की ही तो थी वह और चार साल पहले बजी शहनाइयों के स्वर भी नहीं भूल पाई थी ।

निराला ने कभी लिखा था “दुख ही जीवन की कथा रही , क्या कहूँ आज जो नहीं कही ।” कविता में औरों के दुख पढ़ना अलग बात होती है , लेकिन क्या सचमुच में हमें  ज्ञात होता है कि दुख ही जिनके जीवन की कथा होती है उन पर क्या बीतती है ? 

शरद कोकास 

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