8 जून 2026

60.नागपुर एक : दुःख ही जिनके जीवन की कथा रही

अगले पाँच एपिसोड मे पढिए शहर नागपूर के अनकहे किस्से 

नागपूर रेलवे स्टेशन 
ऐसी कोई सड़क जिस पर आप अपने बचपन में चला करते थे, जो आपके स्कूल या किसी दोस्त के घर या बाज़ार जाती थी, बड़े होने के बाद उस पर कभी चलकर देखिएगा । 

बचपन के दिनों में जो सड़कें बहुत बहुत लम्बी लगती थीं वे अचानक छोटी लगने लगेंगी । 

जिन रास्तों को तय करने में पहले अधिक समय लगता था वे जल्दी तय हो जायेंगे । एकबारगी यह सवाल मन में आएगा .. कहीं सड़कें छोटी तो नहीं हो गईं ? लेकिन सड़कें कहाँ छोटी होती हैं,  दरअसल हमारे पाँव ही लम्बे हो जाते हैं । 

फिर ऐसे ही किसी दिन बचपन की उन सड़कों पर चलते हुए, आसपास की चीजों के आद्य रुप को याद  करते हुए अपने बचपन में लौटने की कोशिश कीजियेगा, आपको ऐसे कई लम्हे मिलेंगे जिनसे गले मिले बगैर आप जीवन यात्रा में आगे बढ़ गए थे । कुछ देर उनके साथ रहिएगा और उनके हाल पूछियेगा ..आपको ज़िंदगी में मज़ा आने लगेगा । हाँ इतना ध्यान रहे कि यह सफ़र लम्बे कदमों  के साथ नहीं बल्कि बचपन के अपने उन्ही नन्हे नन्हे पांवों के साथ होना चाहिए । साथ में बचपन के साथी हों तो और भी अच्छा ।

घर से स्कूल तक जाने वाली उस सड़क के अलावा एक और लम्बी सड़क थी मेरे बचपन में जो भंडारा से बैतूल तक जाती थी । कभी वह सड़क रेल की पटरी भी हो जाती थी । घर के पास ही भंडारा रोड स्टेशन से जवाहर नगर आर्डिनेंस फैक्टरी को जोड़ने वाली एक ऐसी रेल पटरी थी जिस पर से कभी कभार  ही कोई रेल गुजरती थी । अक्सर दोस्तों के साथ घूमते हुए मैं उस ओर चला जाता था । हम लोग पटरी  पर कान लगाकर कुछ सुनने की कोशिश करते, दोस्त कहते इससे पता चलता है ट्रेन कितनी दूर है । 

मुझे पटरी से आनेवाली उस आवाज़ में जाने कितने शहरों की आवाजें सुनाई देती थी । दोस्त कहते “ऐसा भी कहीं होता है ?” मैं कहता “ क्यों नहीं, आखिर देश की सारी पटरियां कहीं न कहीं तो एक दूसरे से मिलती ही होंगी तभी तो हम रेल से हर शहर तक जा सकते हैं । “ 

फिर एक दिन मैंने सोचा काश हम मनुष्य भी इन पटरियों की तरह होते तो हम में इतना भेदभाव तो न होता और हम एक दूसरे के दुःख सुन सकते । 

 भंडारा से बैतूल जाने के लिए भंडारा रोड स्टेशन जाने की अनिवार्यता थी । यह स्टेशन शहर से ग्यारह किलोमीटर दूर स्थित है इसलिए इसका नाम ‘भंडारा रोड’ पड़ा । जो स्टेशन शहर से दूर होते हैं उनके नाम के साथ ‘रोड’ जुड़ा होता है । स्टेशन के आसपास की बस्ती वरठी गाँव कहलाती है । भंडारा से बैतूल के लिए कोई सीधी ट्रेन नहीं थी । पहले ट्रेन या बस से नागपुर जाना पड़ता था फिर वहाँ से बैतूल । 

नागपूर रेल्वे  स्टेशन बाहर का दृश्य 

वैसे तो हम लोग ट्रेन से पहले नागपुर जाते फिर ट्रेन बदलकर बैतूल लेकिन जब भी कुछ अतिरिक्त समय होता हम लोग बस से नागपुर जाते और वहाँ एक दो रोज़ ठहरकर बैतूल । नागपुर में बाबूजी की बड़ी बहन विद्यावती और छोटी बहन प्रकाशवती का निवास था । माँ की छोटी बहन बहन लीला भी नागपुर में ही थीं जो बाबूजी के चचेरे भाई रमेश चन्द्र को ब्याही थीं । इस तरह वहाँ दोहरा रिश्ता था । 

विद्या बुआ बाबूजी के सभी भाई बहनों में सबसे बड़ी थीं । हमारे फूफाजी शिवनाथ कोकास अंग्रेज़ी अखबार हितवाद में काम करते थे और अपने परिवार के साथ धन्तोली में रहा करते थे ।



उनकी संतानों में  सबसे बड़ी श्यामा जीजी, उनके बाद रमा जीजी, सतीश  भैया, निर्मला जीजी, प्रदीप भैया, प्रमिला जीजी और सबसे छोटे दीपक । बड़े बेटे  जगदीश का सन साठ में एक सड़क दुर्घटना में निधन हो गया था ।

वहीं मोतीबाग रेलवे कॉलोनी में छोटी बुआ यानि प्रकाश बुआ की ससुराल थी ।


फूफाजी की इंकमटैक्स विभाग में नौकरी के कारण वे लोग कभी जबलपुर कभी नागपुर रहा करते थे । उनके बड़े बेटे राजेंद्र का जन्म हो चुका था । कालांतर में बिटिया रजनी और  छोटे बेटे राकेश का जन्म हुआ । बाद में सन अडसठ के करीब वे लोग गोकुलपेठ  स्थित अपने नए निवास में आ गए । 

इतवारी में रमेश चाचा और लीला मौसी अपने बच्चों के साथ रहा करते थे ।


चाचा जी रेल्वे में टी टी ई थे, उनके बड़े बेटे हैं प्रभात उससे छोटी सन्ध्या, फिर निशा । प्रणय का जन्म बाद में हुआ था ।

सन्ध्या के जीवन की कथा भी बहुत दुखद रही ।

विवाह के प्रारम्भिक वर्षों में ही उसका विवाह विच्छेद हो गया था, बिटिया कोमल को लेकर वह मायके आ गई । इस आघात ने जैसे उसके मन पर असर किया वैसे ही देह पर भी, इसलिए  अल्पायु में ही उसे दुनिया छोड़कर जाना पड़ा । 

मौसी और दोनों मामाओं  ने कोमल को पढ़ाया लिखाया, पाल पोस कर बड़ा किया और उसका विवाह किया । सब कुछ ठीक चल रहा था, लेकिन दुख तो जैसे घात लगाये बैठा था । वर्ष दो हज़ार इक्कीस में आनेवाली कोविड  की दूसरी लहर कोमल को हम सबसे छीन कर ले गई । अभी मात्र चौंतीस साल की ही तो थी वह और चार साल पहले बजी शहनाइयों के स्वर भी नहीं भूल पाई थी ।

निराला ने कभी लिखा था “दुख ही जीवन की कथा रही , क्या कहूँ आज जो नहीं कही ।” कविता में औरों के दुख पढ़ना अलग बात होती है , लेकिन क्या सचमुच में हमें  ज्ञात होता है कि दुख ही जिनके जीवन की कथा होती है उन पर क्या बीतती है ? 

शरद कोकास 


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