| शेर का बॉडी पेंट करते हुए |
ऐसा नहीं है कि बैतूल में केवल मुहर्रम में ही शेर दिखाई देते थे । मुहर्रम के अलावा गणेशोत्सव या दुर्गोत्सव में भी शेरों का जलवा बना रहता था । वैसे भी जिन्हें शेर बनकर नाचने का शौक हो तो उनके लिए शेर बनना केवल मुहर्रम तक क्यों सीमित रहे । वैसे भी हिन्दू परम्परा में शेर का पौराणिक महत्व है । यहाँ दुर्गा देवी का वाहन शेर है वहीं विष्णु के नरसिंह अवतार में भी सिंह या शेर है । इसलिए गुलज़ार चचा के पास गणेशोत्सव और दुर्गा उत्सव में भी काम की कमी नहीं रहती थी । उनके लिए देह पर शेर पेंट करना ही धर्म था फिर वह देह चाहे हिन्दू की हो या मुसलमान की । हाँ इतना अवश्य था कि वे कभी कभी मुसलमान शेर के सर पर उसकी इच्छानुसार हरा कपडा पहना देते थे । हिन्दू शेर या तो नंगे सर रहता था या उस पर भी वे एक भगवा कपड़ा डाल देते थे । वैसे भी शेर बनने के बाद वह उस्मान है या उत्तम कौन जान सकता था ।
अब कुछ बातें गुलज़ार चचा द्वारा किये जाने वाले शेर के बॉडी पेंट की तकनीक पर भी हो जाएँ । पेंटर गुलज़ार सबसे पहले ब्रश से पूरे शरीर पर पीला और सफ़ेद प्राइमर लगाते थे । प्राइमर सूख जाने के बाद धीरे धीरे ब्रश चलाते हुए काले भूरे रंग से शेर के शरीर पर धारियाँ बनाते । पूरा शरीर रंग जाने के बाद चेहरा रंगा जाता । रंग लगाने के बाद वे कभी कभी मुखौटे भी पहनाते थे । वे गत्ते से तरह तरह के मुखौटे बनाते और उस पर पेंट कर उसे शेर के चेहरे का आकार देते थे ।
गुलज़ार भाई के पास शेर की मूँछ बनाने के लिए एक हुनर था । वे आम की गुठली में छेद करते और उसमे मुर्गी के पंख फँसाते जाते । दाढ़ी मूँछ बनाने के लिए भी वे आम की गुठली के रेशों का प्रयोग करते थे । इसके लिए वे गर्मी के दिनों में ही कई बोरे आम की गुठली इकठ्ठा कर लिया करते थे । जूट से शेर के बाल बनाए जाते और रस्सी की पूँछ बन जाती । यह वही पूँछ होती जो रामलीला के समय वानरों की कमर पर पहनाई जाती थी । उसके बाद नकली दांत लगाए जाते जिसमे बाहर की ओर निकली हुई लाल रंग की एक लम्बी जीभ होती । शेर के नाख़ून भी बनाए जाते और उन्हें बघनखा जैसी एक चीज पहनाई जाती । चेहरे का पूरा श्रंगार होता । बाल वाले बिना बाल वाले , डरावने, सौम्य जाने कितने तरह के शेर उनकी पेंटिंग वर्कशॉप में तैयार होते थे ।
इधर शेर बनकर तैयार होता उधर बाजे वाले भी अपने ढोल ड्रम , क्लेरेनेट, सेक्सोफोन , घुंघरू आदि लेकर तैयार हो जाते । शेर के पूर्णरूपेण तैयार होने के पश्चात उसे एक शिष्य की भांति बतौर ट्रायल सबसे पहला नाच गुलज़ार पेंटर के सामने करना होता था उसके बाद उस शेर को बाहर जाने के लिए अनुमति मिल जाती ।
बैतूल शहर में वैसे तो बाजे वाले अलग अलग अवसरों पर किसिम किसिम की धुन बजाते थे लेकिन शेर का बाजा सब बाजों से अलग बजाया जाता था । यहाँ बाजे वाले जो धुन बजाते हैं उसमे लगातार ‘धनक धन का धनक तीती, धनक धन का धनक तीती’ यह धुन सुनाई देती हैं । यह ऐसी धुन है जिसे सुनते हुए पाँव अपने आप थिरकने लगते हैं ।
मोहर्रम, गणेश व दुर्गा उत्सव में गुलज़ार चचा के पास इतना काम रहता था कि संभाले नहीं संभलता था इसलिए कुछ और पेंटर भी उनके शागिर्द बन गए थे जिनमे एक सद्दू मिस्त्री भी थे जो शौकिया पेंट करते थे। सद्दू मिस्त्री वैसे मूल रूप से हमारे घर के फर्नीचर कारखाने में मिस्त्री का काम करते थे । सद्दू मिस्त्री आदिवासी क्षेत्र से आते थे । गणेश दुर्गा के दिनों में वे हमारे घर के पास स्थित बजरंग व्यायामशाला में अपनी पेंटिंग का वर्कशॉप खोल लेते और पूरे नवरात्र में शेर पेंट किया करते ।
दशहरे के दिन जुलुस में उनके बनाये शेर के अलावा वानर, राक्षस और रामायण के विभिन्न पात्र भी दिखाई देते थे ।
मुझे याद है श्यामबिहारी चौरसिया को वे दशरथ बनाते थे । मदन मोहन ताउजी को देवी का रूप देने और दिनकर राव वाघ को राक्षस का रूप देने का कार्य भी उन्होंने किया था । दुर्गा मंदिर और व्यायामशाला मंडल के इन लोगों की एक पूरी टीम थी जिनमे रूपनारायण चौरसिया यानी रुप्पन काका, मुन्नू तिवारी, बाबा वाघ, नागोराव कावले , सद्दू मिस्त्री,शांतिलाल तातेड, विनोद डागा तथा दुर्गा मंदिर निर्माण के ठेकेदार उस्मान भाई जैसे लोग शामिल थे । यह सब लोग अखाड़े से भी जुड़े थे ।
गुलज़ार चचा को अपना और अपने परिवार का पेट भी पालना था इसलिए मुहर्रम , गणेश और दुर्गा उत्सव के बाद बाक़ी दिनों में वे टाकीज के सामने लगाए जाने वाले सिनेमा के बड़े व छोटे बोर्ड भी बनाते थे और अपने ब्रश के कमाल से दिलीपकुमार देवानंद , राजकपूर , आशा पारेख , मीनाकुमारी सबके चेहरे वे हूबहू बना देते थे ।
गुलज़ार चचा सन नब्बे तक जीवित रहे । अंतिम दिनों में वे यद्यपि काम करने में असमर्थ हो गए थे लेकिन उनके बेटे सत्तार ने इस परंपरा को जारी रखा । यद्यपि अब शेर बनाने की ओर उनका रुझान कम हो गया है इसलिए कि अब शेर बनने का यह सिलसिला भी ख़त्म होता जा रहा है । वैसे भी अब जो शेर बनते हैं उन्हें बनाने में न मेहनत है न कला, न किसी तरह की आत्म संतुष्टि । बस शरीर पर छापे रखो और भांति भांति के रंग स्प्रे पेंट गन से स्प्रे कर दो । फिर झबरे बालों वाला विग पहना दो । विग, दाढ़ी, मूँछ सब कुछ बाज़ार में रेडीमेड मिलता है ।
बचपन की मेरी स्मृतियों में पिता के चचेरे भाई यानि हमारे किसन काका का शेर बनना अच्छी तरह याद है । वे मोहरम के समय वे अपने शरीर पर पेंट करवाते थे और बाजे वालों द्वारा बजायी गई ‘ धनक धन का धनक तीती ‘धुन पर घंटों शेर का नाच नाचते थे । बाद में किसन काका का दिमाग पूरी तरह चल गया था । वे बाज़ार के दिन बाज़ार उठ जाने के बाद कचरे में जाने क्या क्या ढूँढा करते थे और सड़े गले फल,संतरे, मिर्ची के डंठल आदि उठा लाया करते थे और उनका रस निकाल कर पी जाते थे ।
एक दिन इसी चक्कर में उन्होंने कोई ज़हरीली वस्तु खा ली जिसके फलस्वरूप उनका निधन हो गया । लेकिन वे अपने शेर नाच के लिए पूरे बैतूल में वे मशहूर थे । बाद में जब उनका दिमाग उनके वश में नहीं रहा, वे कभी कभी माथे पर साइकल का ट्यूब बान्धकर उसमें दो जलती हुई अगरबत्तियाँ खोंसकर बाज़ार में निकल जाते थे और ‘बम्बई दन्न ‘ का नारा लगाते थे । उनका यह नारा पूरे बैतूल में प्रसिद्ध था । लेकिन कभी किसी ने उनका अपमान नहीं किया न मज़ाक उड़ाया या किसी प्रकार की चोट पहुँचाई । छोटे शहर में इंसान को पहले इंसान समझा जाता था ।
बैतूल में ही नहीं बल्कि सभी छोटे शहरों में आपस के सारे भेदभाव भूलकर पूरे शहर के एक संयुक्त परिवार की तरह से रहने के यह दृश्य अब सामजिक पटल से लुप्त हो गए हैं । जीवन यापन हेतु अब बाहर जाकर काम करना विवशता है सो घर के लड़के बाहर निकलते हैं और वहीं बस जाते हैं । संयुक्त परिवार में एक छत के नीचे भी सबके चूल्हे अलग - अलग हो गए हैं । सुख सुविधा की आकांक्षा और समय की मांग ने अब इन जीवंत दृश्यों को ऐसे अतीत में बदल दिया है जिसे सिर्फ किताबों में या मुझ जैसे कुछ संवेदनशील लोगों की स्मृतियों में पढ़ा जा सकता है । अब लोग शेर नहीं बनते लेकिन कुछ लोग अपने ही घर में शेर हैं ।
शरद कोकास



कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
आइये पड़ोस को अपना विश्व बनायें