8 जून 2026

59.धनक धन का धनक ती ती धुन पर नाचते शेर

बैतूल मे हर साल नाचने वाले शेरों का किस्सा पढिए इस एपिसोड मे 
“बेटा,तूने अपने ऊपे के बाल नहीं निकाले ठीक से ,अब मुझे प्राइमर लगाने में दिक्कत हो रई है ना “गुलज़ार पेंटर ने शेर के लिए बॉडी पेंट किये जाने वाले लड़के से कहा ..लड़के ने मुस्कुराते हुए कहा “ तो क्या हुआ चच्चा, शेर के शरीर पर भी तो बाल होते हैं ना । “ गुलज़ार चाचा ने कहा “ तू नहीं समझेगा प्यारेलाल “ फिर वे धीरे धीरे बुदबुदाने लगे .... “ये आजकल के लौंडे भी ना .. इनसे तो बात करना ही बेकार है।” धीमे धीमे बुदबुदाते हुए वे जल्दी जल्दी ब्रश का हाथ चलाने लगे । 

शेर का बॉडी पेंट  करते हुए 

साठ के दशक के किसी साल में मुहर्रम माह की यह एक सुबह थी । बैतूल के आज़ाद वार्ड स्थित गुलज़ार पेंटर के घर में शेर बनने के लिए अपना शरीर रंगवाने वाले युवाओं और बच्चों की भीड़ लगी हुई थी । कुछ बच्चे जांघिया पहने हुए नंगे बदन देह पर पीला सफ़ेद प्राइमर लगाये बैठे थे और आगे की पेंटिंग के लिए इंतज़ार कर रहे  थे । गुलज़ार चचा के असिस्टेंट विभिन्न डिब्बों में पेंट के मिश्रण तैयार कर रहे थे और मिट्टी के तेल से ब्रश धोकर उन्हें पोछ रहे थे ।

गुलज़ार पेंटर शरीर पर शेर का पेंट करने के लिए इतने मशहूर थे कि बैतूल ही नहीं आसपास के जिलों से भी लोग उनके यहाँ पेंट करवाने आते थे,  यहाँ तक कि कई दिनों पहले से उनसे अपॉइंटमेंट लेना पड़ता था। सबसे अधिक भीड़ मुहर्रम के माह में होती थी ।
मोहर्रम की कहानी 

मोहर्रम के दिनों में शेर बनकर नाचने का यह सिलसिला कबसे शुरू हुआ यह तो पता नहीं लेकिन इसके पीछे 61 हिजरी यानी सन 680 मे घटी एक कहानी है । मोहम्मद साहब के निधन के पश्चात सन 656 ईसवी में उनके दामाद हज़रत अली चौथे  खलीफ़ा बने । उसके बाद उनके ज्येष्ठ पुत्र हसन को खलीफ़ा बनना था लेकिन इधर उनकी आँख मुंदी उधर उमय्यद वंश के मुआविया ने अपना दावा पेश कर दिया ।  हसन और मुआविया में यह समझौता हुआ कि ठीक है फ़िलहाल तो मुआविया सीरिया के राजा का पद संभाल ले लेकिन मुआविया की मृत्यु के पश्चात हसन के छोटे भाई हुसैन को खिलाफ़त की गद्दी दी जायेगी । लेकिन मुआविया ने राजा बनते ही षडयंत्र पूर्वक  ज़हर देकर हसन की हत्या करवा दी । 

मुआविया की मृत्यु के बाद उसके पुत्र यजीद ने खिलाफ़त हथिया ली और ख़ुद खलीफ़ा बन गया । हज़रत अली के छोटे बेटे हुसैन ने समझौते की याद दिलाई तो उल्टे यजीद ने हुसैन से अपनी अधीनता स्वीकार करने के लिए कहा । लेकिन हज़रत हुसैन ने स्पष्ट मना कर दिया और पुनः अपने अधिकार की मांग की । मांग पूरी करना तो दूर यजीद की विशाल सेना ने उन्हें धोखे से करबला में घेर लिया, उनकी पेय जल  की आपूर्ती रुकवा दी और उन पर हमला कर दिया ।

दस अक्तूबर छह सौ अस्सी ईस्वी को हुए इस युद्ध या कहें  कि नर संहार में हज़रत इमाम हुसैन  अपने परिवार के छोटे बड़े बहत्तर सदस्यों के साथ शहीद हो गए । 

इस्लामिक कैलेण्डर के अनुसार हज़रत इमाम हुसैन की मृत्यु हिजरी वर्ष इकसठ यानी 680 में मोहरम मास की दसवी तारीख को हुई थी अतः उनकी स्मृति में इस मास में मुहर्रम या मोहरम नामक यह शोक पर्व मनाया जाता है । इस्लाम में विशेषकर हज़रत साहब के परिवार की परम्परा को मानने वाले शिया समुदाय में हज़रत हुसैन को ‘शेरे ख़ुदा’ का दर्जा दिया गया है इसलिए उनकी स्मृति में शेर बनने की परम्परा है । लोग इस अवसर पर मन्नत मानते हैं और मन्नत पूरी होने पर या पूरी होने से पहले अपने परिवार के बच्चों को शेर बनाते हैं । जिसे शेर बनाया जाता है उसे अपने शरीर को शेर जैसा रंग कर लोगों के बीच जाकर नाचना पड़ता है और अपने लिए दुआएँ मांगनी होती हैं ।

ऐसा नहीं है कि बैतूल में केवल मुहर्रम में ही शेर दिखाई देते थे । मुहर्रम के अलावा गणेशोत्सव या दुर्गोत्सव में भी शेरों  का जलवा बना रहता था  । वैसे भी जिन्हें शेर बनकर नाचने का शौक हो तो उनके लिए शेर बनना केवल मुहर्रम तक क्यों सीमित रहे । वैसे भी हिन्दू परम्परा में शेर का पौराणिक महत्व है । यहाँ  दुर्गा देवी का वाहन शेर  है वहीं विष्णु के नरसिंह अवतार में भी सिंह या शेर है । इसलिए गुलज़ार चचा के पास गणेशोत्सव और दुर्गा उत्सव में भी काम की कमी नहीं रहती थी । उनके लिए देह पर शेर पेंट करना ही धर्म था फिर वह देह चाहे हिन्दू की हो या मुसलमान की । हाँ इतना अवश्य था कि वे कभी कभी मुसलमान शेर के सर पर उसकी इच्छानुसार हरा कपडा पहना देते थे । हिन्दू शेर या तो नंगे सर रहता था या उस पर भी वे एक भगवा कपड़ा डाल देते थे । वैसे भी शेर बनने के बाद वह उस्मान है या उत्तम कौन जान सकता था । 

अब कुछ बातें गुलज़ार चचा द्वारा किये जाने वाले शेर के  बॉडी पेंट की तकनीक पर भी हो जाएँ । पेंटर गुलज़ार सबसे पहले ब्रश से पूरे शरीर पर पीला और सफ़ेद प्राइमर लगाते थे । प्राइमर सूख जाने के बाद धीरे धीरे ब्रश चलाते हुए काले भूरे रंग से शेर के शरीर पर धारियाँ बनाते । पूरा शरीर रंग जाने के बाद चेहरा रंगा जाता । रंग लगाने के बाद वे कभी कभी मुखौटे भी पहनाते थे । वे गत्ते से तरह तरह के मुखौटे बनाते और उस पर पेंट कर उसे शेर के चेहरे का आकार देते थे । 

गुलज़ार भाई के पास शेर की मूँछ बनाने के लिए एक हुनर था । वे आम की गुठली में छेद करते और उसमे मुर्गी के पंख फँसाते जाते । दाढ़ी मूँछ  बनाने के लिए भी वे आम की गुठली के रेशों का प्रयोग करते थे । इसके लिए वे गर्मी के दिनों में ही कई बोरे आम की गुठली इकठ्ठा कर लिया करते थे । जूट से शेर के बाल बनाए जाते और रस्सी की पूँछ बन जाती । यह वही पूँछ होती जो रामलीला के समय वानरों की कमर पर पहनाई जाती थी । उसके बाद नकली दांत लगाए जाते जिसमे बाहर की ओर निकली हुई लाल रंग की एक लम्बी जीभ होती । शेर के नाख़ून भी बनाए जाते और उन्हें बघनखा जैसी एक चीज पहनाई जाती । चेहरे का पूरा श्रंगार होता । बाल वाले बिना बाल वाले , डरावने, सौम्य जाने  कितने तरह के शेर उनकी पेंटिंग वर्कशॉप में तैयार होते थे ।


इधर शेर बनकर तैयार होता उधर  बाजे वाले भी अपने ढोल ड्रम , क्लेरेनेट, सेक्सोफोन , घुंघरू आदि लेकर तैयार हो जाते । शेर के पूर्णरूपेण तैयार होने के पश्चात उसे एक शिष्य की भांति बतौर ट्रायल सबसे पहला नाच गुलज़ार पेंटर के सामने करना होता था उसके बाद उस शेर को बाहर जाने के लिए अनुमति मिल जाती ।

बैतूल शहर में वैसे तो बाजे वाले अलग अलग अवसरों पर किसिम किसिम की धुन बजाते थे लेकिन शेर का बाजा सब बाजों से अलग बजाया जाता था । यहाँ बाजे वाले जो धुन बजाते हैं उसमे लगातार ‘धनक धन का धनक तीती, धनक धन का धनक तीती’ यह धुन सुनाई देती हैं । यह ऐसी धुन है जिसे सुनते हुए पाँव अपने आप थिरकने लगते हैं ।

मोहर्रम, गणेश व दुर्गा उत्सव में गुलज़ार चचा के पास इतना काम रहता था कि संभाले नहीं संभलता था इसलिए कुछ और पेंटर भी उनके शागिर्द बन गए थे जिनमे एक सद्दू मिस्त्री भी थे जो शौकिया पेंट करते थे। सद्दू मिस्त्री वैसे मूल रूप से हमारे घर के फर्नीचर कारखाने में मिस्त्री का काम करते थे । सद्दू मिस्त्री  आदिवासी क्षेत्र से आते थे । गणेश दुर्गा के दिनों में वे हमारे घर के पास स्थित बजरंग व्यायामशाला में अपनी पेंटिंग का वर्कशॉप  खोल लेते और पूरे नवरात्र में शेर पेंट किया करते । 

दशहरे के दिन जुलुस में उनके बनाये शेर के अलावा वानर, राक्षस और रामायण के विभिन्न पात्र भी दिखाई देते थे ।


मुझे याद है श्यामबिहारी चौरसिया को वे दशरथ बनाते  थे । मदन मोहन ताउजी को देवी का रूप देने और दिनकर राव वाघ को राक्षस का रूप देने का कार्य भी उन्होंने किया था । दुर्गा मंदिर और व्यायामशाला मंडल के इन लोगों की एक पूरी टीम थी जिनमे रूपनारायण चौरसिया यानी रुप्पन काका, मुन्नू तिवारी, बाबा वाघ, नागोराव कावले , सद्दू मिस्त्री,शांतिलाल तातेड, विनोद डागा तथा  दुर्गा मंदिर निर्माण के ठेकेदार उस्मान भाई जैसे लोग शामिल थे । यह सब लोग अखाड़े से भी जुड़े थे । 

गुलज़ार चचा को अपना और अपने परिवार का पेट भी पालना था इसलिए मुहर्रम , गणेश और दुर्गा उत्सव के बाद बाक़ी दिनों में वे टाकीज के सामने लगाए जाने वाले सिनेमा के बड़े व छोटे बोर्ड भी बनाते थे और अपने ब्रश के कमाल से दिलीपकुमार देवानंद , राजकपूर , आशा पारेख , मीनाकुमारी सबके चेहरे वे हूबहू बना देते थे ।


गुलज़ार चचा सन नब्बे तक जीवित रहे । अंतिम दिनों में वे यद्यपि काम करने में असमर्थ हो गए थे लेकिन उनके बेटे सत्तार ने इस परंपरा को जारी रखा । यद्यपि अब शेर बनाने की ओर उनका  रुझान कम हो गया है इसलिए कि अब शेर बनने का यह सिलसिला भी ख़त्म होता जा रहा है । वैसे भी अब जो शेर बनते हैं उन्हें बनाने में न मेहनत है न कला, न किसी तरह की आत्म संतुष्टि । बस शरीर पर छापे  रखो और भांति भांति के रंग स्प्रे पेंट गन से स्प्रे कर दो । फिर झबरे बालों वाला विग पहना दो । विग, दाढ़ी, मूँछ सब कुछ बाज़ार में रेडीमेड मिलता है । 

बचपन की मेरी स्मृतियों में पिता के चचेरे भाई यानि हमारे किसन काका का शेर बनना अच्छी तरह याद है । वे मोहरम के समय वे अपने शरीर पर पेंट करवाते थे और बाजे वालों द्वारा बजायी गई ‘ धनक धन का धनक तीती ‘धुन पर घंटों शेर का नाच नाचते थे । बाद में किसन काका का दिमाग पूरी तरह चल गया था । वे बाज़ार के दिन बाज़ार उठ जाने के बाद कचरे में जाने क्या क्या ढूँढा करते थे  और सड़े गले फल,संतरे, मिर्ची के डंठल आदि उठा लाया करते थे और उनका रस निकाल कर पी जाते थे । 

एक दिन इसी चक्कर में उन्होंने कोई ज़हरीली वस्तु खा ली जिसके फलस्वरूप उनका निधन हो गया । लेकिन वे अपने शेर नाच के लिए पूरे बैतूल में वे मशहूर थे । बाद में जब उनका दिमाग उनके वश में नहीं रहा, वे कभी कभी माथे पर साइकल का ट्यूब बान्धकर उसमें दो जलती हुई अगरबत्तियाँ खोंसकर बाज़ार में निकल जाते थे और ‘बम्बई दन्न ‘ का नारा लगाते थे । उनका यह नारा पूरे बैतूल में प्रसिद्ध था । लेकिन कभी किसी ने उनका अपमान नहीं किया न मज़ाक उड़ाया या किसी प्रकार की चोट पहुँचाई । छोटे शहर में इंसान को पहले इंसान समझा जाता था । 

बैतूल में ही नहीं बल्कि सभी छोटे शहरों में आपस के सारे भेदभाव भूलकर पूरे शहर के एक संयुक्त परिवार की तरह से रहने के यह दृश्य अब  सामजिक पटल से लुप्त हो गए हैं । जीवन यापन हेतु अब बाहर जाकर काम करना विवशता है सो घर के लड़के बाहर निकलते हैं और वहीं बस जाते हैं । संयुक्त परिवार में एक छत के नीचे  भी सबके चूल्हे अलग - अलग हो गए हैं । सुख सुविधा की आकांक्षा और समय की मांग ने अब इन जीवंत दृश्यों को ऐसे  अतीत में बदल दिया है जिसे सिर्फ किताबों में या मुझ जैसे कुछ संवेदनशील लोगों की स्मृतियों में पढ़ा जा सकता है । अब लोग शेर नहीं बनते लेकिन कुछ लोग अपने ही घर में शेर हैं ।

शरद कोकास 

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