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10 जून 2026

130. भंडारा : छतों पर उपजा प्रेम ज़मीन तक नहीं पहुँचता


फरवरी की शामें  जाते हुए यह ज़रूर कहती थीं कि  अपना ख्याल रखना, इस माह की उम्र ज़रा कम है ৷ इधर दरख्तों के साये कुछ लम्बे होने लगते और धूप अपने पीलेपन में शर्माते हुए ठंड की विदाई की घोषणा करने लगती ৷ खूंटियों पर टंगे गर्म कपड़े जान जाते कि उनके पैरोल पर रहने का समय समाप्त हो चुका हैऔर वे फिर पेटियों में कैद हो जाने की राह देखने लगते ৷ हवा जिस्म में अपनी भोथरी सुइयाँ चुभोने की कोशिश करती लेकिन चुभन की बजाय उनसे गुदगुदी होती देख खीझ उठती ৷ 

मैं अभी उस उम्र में नहीं पहुँचा था जो उन हवाओं में बसंत की खुशबू महसूस कर पाता ৷ गुफ़ा में रहने वाले नरभक्षी राक्षस को जैसे जंगल में मानुस गंध आती है उसी तरह मुझे इस मौसम में सब तरफ़  से किताबों की गंध आने लगती ৷ मार्च बीतते बीतते गर्मियाँ ‘में आई कम इन सर ’ कहते हुए मेरे फैन विहीन अध्ययन कक्ष के बाहर  खड़ी हो जाती ৷ दिन तो खैर पढने लिखने में बीत जाता लेकिन शाम के बाद जब पसीने की गंध किताबों की गंध पर हावी होने लगती मुझे बाहर निकलना ही पड़ता ৷

गर्मी की छेड़खानी से परेशान होकर एक शाम मैं किताब लेकर छत पर पहुँच गया ৷ शीतल हवाओं के बीच पढाई करने के अनुभव ने मुझे इस तरह प्रेरित किया कि मैंने अगले दिन एक लम्बे वायर के साथ टेबल लैम्प का जुगाड़ किया और फिर देर रात तक मेरी पढ़ाई की महफ़िल वहाँ जमने लगी ৷ पढ़ते पढ़ते जब मैं ऊब जाता तो नीचे उतरकर गली से बाहर निकलता और मुख्य सड़क पर पहुँचकर एक नज़र आसपास की छतों पर भी डाल लेता ৷ इस नज़र में यह जानने की सहज इच्छा शामिल होती कि मेरे अलावा और कौन कौन छत पर बैठकर पढ़ाई कर रहा है  ৷

हालाँकि घर के आसपास छत वाले मकान बहुत कम थे ৷ अधिकांश मकान खपरैल वाले थे जिनमे मजदूर वर्ग के लोग रहते थे और उनके बच्चों का पढ़ाई से कोई विशेष सरोकार नहीं था । फिर भी कुछ बच्चे दिख ही जाते थे ৷ जिन लोगों ने छत पर बैठकर पढ़ाई की हो वे जानते हैं कि इस तरह अपने आसपास उपस्थित छात्र छात्रों को पढ़ते हुए देखने में प्रेरणा और प्रतिस्पर्धा का कितना सुन्दर समन्वय है ৷ 

फिर एक दिन मेरे इस सूने ‘टेरेस स्टडी सेंटर’ में पड़ोस की एक लड़की प्रेरणा बनकर आई ৷ हमारे ही बाड़े में जोशी काका के ऊपर वाले कमरे में पड़ोस वाले काका के एक रिश्तेदार रहते थे, उनकी बेटी लगभग रोज़ ही वहाँ आ जाती और देर रात तक पढ़ाई किया करती । तब वह शायद मुझसे दो या तीन क्लास पीछे रही होगी । उसे पढ़ाई करते हुए देखना मुझे अच्छा लगता था मेरा उत्साह और बढ़ जाता और मैं दुगुने जोश के साथ पढ़ने लगता । 

एक दिन सहज रूप से यह बात मैंने माँ से कही ৷ मुझे याद है माँ यह सुनकर बहुत देर तक मुस्कुराती रहीं थीं । बरसों बाद जब मेरी नौकरी लग गई और मेरे लिये एक अदद लड़की की तलाश शुरू हुई तो बाबूजी ने उस लड़की के पिता से मेरे रिश्ते की बात की लेकिन जाति और समाज का मामला आड़े आ गया और बात वहीं खत्म हो गई । जीवन में अक्सर ऐसा होता है, छतों पर उपजा प्रेम छतों पर ही रह जाता है, ज़मीन तक नहीं पहुँच पाता ৷

अब भी मार्च अप्रेल के मौसम में सड़क पर टहलते हुए मेरी निगाह अक्सर छतों की ओर चली जाती है৷ लेकिन अब छतों पर कोई दिखाई नहीं देता ৷ अब शहरी छात्र बन्द कमरों में पंखे और ए सी की हवा में पढ़ाई करने लगे हैं । हम लोगों के बचपन में पूरे घर में बमुश्किल एक टेबल फैन होता था जिसकी उपयोगिता सामूहिक होती थी । कुछ बरस बाद जब हम लोग गरीबी रेखा से थोड़ा ऊपर उठे बीच वाले कमरे में एक सीलिंग फैन आ गया ৷ मैट्रिक के बाद जब मैं भंडारा से बाहर पढ़ने के लिए चला  गया तब बाबूजी एक छोटा सा कूलर खरीद कर लाये थे जिसे मैं कूलर का बच्चा कहता था । 

आज भी ऐसा ही होता है, एक मध्यवर्गीय नौकरीपेशा जब तक अपना ख़ुद का मकान बनवा कर उसमे सुविधाएँ जुटाता है, बच्चे बाहर पढ़ने चले जाते हैं ৷ फिर बाहर ही उनकी नौकरी लग जाती है, बेटियों की शादी हो जाती है और वे कभी कभार मायके वापस आती हैं ৷ बेटे भी बस दशहरा दिवाली ही घर आते है ৷ शेष समय मकान के सूने पड़े कमरे अपने सूनेपन में बूढ़े माता पिता को ताकते रहते हैं ৷   

आज के बच्चे इस बात की कल्पना नहीं कर सकते कि उन दिनों पंखे और कूलर भी लग्ज़री आइटम थे ৷ ए सी जैसी चीज़ केवल धनाढ्यों के घर में होती थी हालाँकि वे लोग भी गर्मी के दिनों में आँगन में या छत पर खटिया अथवा पलंग बिछाकर सोते थे । घर के मुखिया या युवा होते बच्चों की ड्यूटी में शामिल होता कि खाना खाने से पहले ही छतों पर बिस्तर लगा दिये जाएँ ताकि शयन के समय तक वे ठंडे हो जायें । 

पंखों की उपयोगिता बस दिन में थी, रात के लिए तो चाँद काफी था ৷ लेकिन मुझे याद है एक साल  इतनी गर्मी पड़ी थी कि चाँद ने भी हाथ जोड़ लिए ৷ आँगन में बिछे बिस्तर पर भी जब चैन नहीं आया  तब बाबूजी ने आंगन में टेबल फैन लगा दिया था । लेकिन जब पंखे से भी गर्म हवा आने लगी तो उन्हे एक उपाय सूझा, उन्होंने पीतल की एक बड़ी सी परात में लबालब पानी भरकर पंखे के सामने रख दिया । हवा जब पानी से टकराकर आती थी तो ठंडी महसूस होने लगती । प्रसाद जी से क्षमायाचना सहित कहूँ तो ..‘अरुण यह जुगाड़मय देश हमारा’ ৷ 

छतों पर बिछे बिस्तर की बात पर आपको गुलज़ार साहब का वह गीत ज़रूर याद आया होगा ... 

“या गर्मियों की रात जो पुरवाइयाँ चलें, 

ठंडी सफ़ेद चादरों पे जागे देर तक, 

तारों को देखते रहें छत पर पड़े हुए ..

दिल ढूँढता है फिर वही फुर्सत के रात दिन ৷” 

इस गीत के गहन अर्थों तक वही पहुँच सकता है जो अपने बचपन में इस दृश्य के भीतर से गुजरा हो ৷ 

शरद कोकास 

109.भंडारा : कूँक कूँक करती मुर्गियों से संवाद

अपने बचपन की उन गलियों में भटकते हुए एक दिन मैं जगजीत सिंह की गाई हुई मिर्ज़ा ग़ालिब की ग़ज़लों का कैसेट ख़रीद लाया था और जैसे ही उसे कैसेट प्लेयर पर लगाया गुलज़ार साहब की आवाज़ में उनकी एक मशहूर नज़्म गूंजने लगी ...

बल्ली-मारां के मोहल्ले की वो पेचीदा दलीलों सी गलियाँ

सामने टाल की नुक्कड़ पे बटेरों के कसीदे

गुड़गुड़ाती हुई पान की पीकों में वो दाद वो वाह वा

चंद दरवाज़ों पे लटके हुए बोसीदा से कुछ टाट के पर्दे

एक बकरी के मिम्याने की आवाज़

और धुन्दलाई हुई शाम के बे-नूर अँधेरे साये   

अरे..! मैं चौंक गया.. यह दृश्य तो मेरा देखा हुआ है ৷ भंडारा में अपने ढोला प्राइमरी स्कूल जाते हुए और स्कूल से लौटते हुए हर रोज़ मैं इसी दृश्य के भीतर से होकर ही तो गुज़रता था ৷ बाईं ओर सत्तार दरोगा का मकान, फिर शफ़ी भाई पानवाले और हफीज़ पटेल का घर ৷ उसके बाद की गली में नईम का घर ৷ जैसे ही नईम अपनी गली में मुड़ता, मैं नईम से ‘कल मिलेंगे’ कहकर, नूरी मस्ज़िद के सामने से, कूँक कूँक करती मुर्गियों और  क्वैक क्वैक करती हुई बत्तखों से बतियाता हुआ और मिमियाती बकरियों को हकालता हुआ अपने घर की ओर बढ़ जाता ৷  


वैसे तो अनेक मुस्लिम परिवारों के बच्चे हमारे स्कूल में पढ़ते थे जिनमे कय्यूम था,अशरफ था लेकिन मेरी दोस्ती नईम से ही हुई ৷ नईम के अब्बा जनाब मुनीर खान सरकारी विभाग में ड्राफ्ट्समैन थे ৷ पुराने ढंग का, मिट्टी की मोटी मोटी दीवारों वाला उनका मकान, मस्जिद के पास ही स्थित था । अकसर घर लौटते हुए पानी पीने के लिए मैं नईम के घर रुक जाता ৷ मकान के दरवाज़े पर सबसे पहले नईम की फूफी  से दुआ सलाम  होती थी । वैधव्य के सफ़ेद लिबास में उनके साँवले चेहरे पर दुख साफ़ पढ़ा जा सकता था ৷ वे हमेशा मुझसे मेरे हाल चाल पूछतीं जिसमे मैं उनके ममत्व का अक्स देखता ৷   


नईम की माँ का निधन उन्हीं दिनों हो गया था जब हम लोग स्कूल में पढ़ते थे । वे डायबिटीज़ की मरीज़ थीं जो उन दिनों एक असाध्य सा रोग था ৷ नईम के घर में उससे छोटे दो भाई थे अल्ताफ़ और सैफ़ और एक छोटी बहन शाहीन ৷ नईम की माँ के गुजर जाने के बाद उनकी बुआ ने बच्चों की देखभाल की ৷ कभी कभी मैं नईम और उसके भाई बहनों के लिए सोचता तो मुझे बहुत दुःख होता ৷ मैंने पहली बार जीवन में महसूस किया कि माँ के नहीं रहने पर जीवन कैसा होता है ৷ अक्सर ऐसा सोचते हुए मेरी ऑंखें भर आतीं ৷

नईम की माँ मुझे बिलकुल अपनी माँ जैसी लगती थीं ৷ वे मुझसे मेरी माँ के बारे में पूछतीं, सीमा और बबलू के बारे में पूछतीं, पढाई लिखाई के बारे में पूछतीं ৷ मैं जब भी नईम के घर जाता सीधे उनकी रसोई में चला जाता ৷ मुगलाई शैली में बने मांसाहारी व्यंजनों का सबसे पहला पहला स्वाद मेरी ज़ुबान पर नईम की माँ के हाथों बने खाने का ही है ৷

नईम के घर के सामने का हिस्सा जो रोड की तरफ खुलता था उसमे मुनीर खान चचा ने एक लकड़ी की टाल खोल ली थी ৷ उसके बाद हमें गली से होकर घर जाने की ज़रूरत नहीं रही ৷ हम लोग टाल के बड़े से दरवाज़े से ही आना जाना करने लगे ৷ रमज़ान ईद के शीर खुरमे का स्वाद अभी ज़ुबान से उतर भी नहीं पाता था कि चचा बकरीद के लिए एक बकरा ख़रीद लाते ৷ स्कूल से लौटते हुए हम लोग उस बकरे के लिए हरी पत्तियाँ तोड़कर लाते ৷ फिर नईम घर के भीतर से जर्मन सिल्वर के एक घमेले में मुरमुरे लेकर आता और उसे बकरे के सामने रख देता৷ वह कहता कि इसे खाने से ईद तक बकरा मोटा हो जाएगा ৷ लेकिन बकरीद के अगले रोज़ ही वह बकरा गायब हो जाता৷  छुट्टी के बाद जब मैं नईम के घर पहुँचता और उससे पूछता कि वह बकरा कहाँ गया , तो वह कहता उसकी कुर्बानी दे दी गई ৷ 

मैंने चचा  से पूछा कि कुर्बानी क्यों दी जाती है तो उन्होंने बताया "इस्लामी मान्यता के अनुसार, अल्लाह ने पैगंबर इब्राहिम से उनकी सबसे प्यारी चीज़ की कुर्बानी मांगी थी। जब इब्राहिम अपने बेटे इस्माइल की कुर्बानी देने लगे, तो अल्लाह ने उनके जज़्बे से खुश होकर बेटे की जगह एक मेमने (बकरे) को भेज दिया था। इसी परंपरा के तहत बकरा ईद पर बकरे, भेड़ या अन्य जानवर की कुर्बानी दी जाती है।"

यह वह समय था जब कुर्बानी,शरीयत,रोज़ा,नमाज़,जकात,बुरखा,अल्लाह,मस्जिद,इबादत,सवाब, कुरआन जैसे शब्द, दान,पुण्य,ईश्वर,पर्दा,पूजा,प्रार्थना,व्रत, उपवास,सेवा,मंदिर,प्रणाम, पोथी, पुराण जैसे शब्दों के साथ बचपन के मेरे शब्दकोष में सहअस्तित्व स्थापित कर रहे थे ৷ मज़ेदार बात यह कि इस शब्दकोष में धर्म,मज़हब जैसे शब्द साथ साथ रहते थे और आपस में कभी लड़ाई नहीं करते थे ৷ प्रेम,मोहब्बत और दोस्ती जैसे शब्दों का स्थान इन सभी शब्दों से ऊपर था ৷   

जाने कितनी ईद और दिवालियाँ इस तरह बीत गईं ৷ मैं और नईम साथ साथ पढ़े और बढ़े ৷ मैट्रिक के बाद हम दोनों बी एस सी करने के लिए नागपुर पढने चले गए ৷ नईम तो वापस भंडारा आ गया लेकिन मैं कभी स्थायी रूप से भंडारा नहीं लौट पाया ৷ पढाई लिखाई पूरी हो जाने पर मुझे स्टेट बैंक की दुर्ग शाखा में नौकरी मिली और नईम को भंडारा शाखा में ৷ फिर शादी ब्याह, बच्चे और तमाम लंतरानियाँ ज़िंदगी की चलती रहीं, हम लोग एक दूसरे के परिवार के सुख दुःख में, शादी ब्याह आदि में शामिल होते रहे ৷  बचपन की हमारी यह मित्रता आज भी कायम है, भले ही अब हमारी मुलाकातें कभी कभार होती हैं लेकिन होती ज़रूर हैं ৷ हाँ, फोन पर हम लोग अक्सर बतियाते रहते हैं और इस बात की सत्यता स्थापित करते हैं कि दोस्ती कभी भौतिक उपस्थिति की मोहताज़ नहीं होती है ৷

शरद कोकास 

8 जून 2026

59.बैतूल : धनक धन का धनक ती ती धुन पर नाचते शेर

बैतूल मे हर साल नाचने वाले शेरों का किस्सा पढिए इस एपिसोड मे 
“बेटा,तूने अपने ऊपे के बाल नहीं निकाले ठीक से ,अब मुझे प्राइमर लगाने में दिक्कत हो रई है ना “गुलज़ार पेंटर ने शेर के लिए बॉडी पेंट किये जाने वाले लड़के से कहा ..लड़के ने मुस्कुराते हुए कहा “ तो क्या हुआ चच्चा, शेर के शरीर पर भी तो बाल होते हैं ना । “ गुलज़ार चाचा ने कहा “ तू नहीं समझेगा प्यारेलाल “ फिर वे धीरे धीरे बुदबुदाने लगे .... “ये आजकल के लौंडे भी ना .. इनसे तो बात करना ही बेकार है।” धीमे धीमे बुदबुदाते हुए वे जल्दी जल्दी ब्रश का हाथ चलाने लगे । 

शेर का बॉडी पेंट  करते हुए 

साठ के दशक के किसी साल में मुहर्रम माह की यह एक सुबह थी । बैतूल के आज़ाद वार्ड स्थित गुलज़ार पेंटर के घर में शेर बनने के लिए अपना शरीर रंगवाने वाले युवाओं और बच्चों की भीड़ लगी हुई थी । कुछ बच्चे जांघिया पहने हुए नंगे बदन देह पर पीला सफ़ेद प्राइमर लगाये बैठे थे और आगे की पेंटिंग के लिए इंतज़ार कर रहे  थे । गुलज़ार चचा के असिस्टेंट विभिन्न डिब्बों में पेंट के मिश्रण तैयार कर रहे थे और मिट्टी के तेल से ब्रश धोकर उन्हें पोछ रहे थे ।

गुलज़ार पेंटर शरीर पर शेर का पेंट करने के लिए इतने मशहूर थे कि बैतूल ही नहीं आसपास के जिलों से भी लोग उनके यहाँ पेंट करवाने आते थे,  यहाँ तक कि कई दिनों पहले से उनसे अपॉइंटमेंट लेना पड़ता था। सबसे अधिक भीड़ मुहर्रम के माह में होती थी ।
मोहर्रम की कहानी 

मोहर्रम के दिनों में शेर बनकर नाचने का यह सिलसिला कबसे शुरू हुआ यह तो पता नहीं लेकिन इसके पीछे 61 हिजरी यानी सन 680 मे घटी एक कहानी है । मोहम्मद साहब के निधन के पश्चात सन 656 ईसवी में उनके दामाद हज़रत अली चौथे  खलीफ़ा बने । उसके बाद उनके ज्येष्ठ पुत्र हसन को खलीफ़ा बनना था लेकिन इधर उनकी आँख मुंदी उधर उमय्यद वंश के मुआविया ने अपना दावा पेश कर दिया ।  हसन और मुआविया में यह समझौता हुआ कि ठीक है फ़िलहाल तो मुआविया सीरिया के राजा का पद संभाल ले लेकिन मुआविया की मृत्यु के पश्चात हसन के छोटे भाई हुसैन को खिलाफ़त की गद्दी दी जायेगी । लेकिन मुआविया ने राजा बनते ही षडयंत्र पूर्वक  ज़हर देकर हसन की हत्या करवा दी । 

मुआविया की मृत्यु के बाद उसके पुत्र यजीद ने खिलाफ़त हथिया ली और ख़ुद खलीफ़ा बन गया । हज़रत अली के छोटे बेटे हुसैन ने समझौते की याद दिलाई तो उल्टे यजीद ने हुसैन से अपनी अधीनता स्वीकार करने के लिए कहा । लेकिन हज़रत हुसैन ने स्पष्ट मना कर दिया और पुनः अपने अधिकार की मांग की । मांग पूरी करना तो दूर यजीद की विशाल सेना ने उन्हें धोखे से करबला में घेर लिया, उनकी पेय जल  की आपूर्ती रुकवा दी और उन पर हमला कर दिया ।

दस अक्तूबर छह सौ अस्सी ईस्वी को हुए इस युद्ध या कहें  कि नर संहार में हज़रत इमाम हुसैन  अपने परिवार के छोटे बड़े बहत्तर सदस्यों के साथ शहीद हो गए । 

इस्लामिक कैलेण्डर के अनुसार हज़रत इमाम हुसैन की मृत्यु हिजरी वर्ष इकसठ यानी 680 में मोहरम मास की दसवी तारीख को हुई थी अतः उनकी स्मृति में इस मास में मुहर्रम या मोहरम नामक यह शोक पर्व मनाया जाता है । इस्लाम में विशेषकर हज़रत साहब के परिवार की परम्परा को मानने वाले शिया समुदाय में हज़रत हुसैन को ‘शेरे ख़ुदा’ का दर्जा दिया गया है इसलिए उनकी स्मृति में शेर बनने की परम्परा है । लोग इस अवसर पर मन्नत मानते हैं और मन्नत पूरी होने पर या पूरी होने से पहले अपने परिवार के बच्चों को शेर बनाते हैं । जिसे शेर बनाया जाता है उसे अपने शरीर को शेर जैसा रंग कर लोगों के बीच जाकर नाचना पड़ता है और अपने लिए दुआएँ मांगनी होती हैं ।

ऐसा नहीं है कि बैतूल में केवल मुहर्रम में ही शेर दिखाई देते थे । मुहर्रम के अलावा गणेशोत्सव या दुर्गोत्सव में भी शेरों  का जलवा बना रहता था  । वैसे भी जिन्हें शेर बनकर नाचने का शौक हो तो उनके लिए शेर बनना केवल मुहर्रम तक क्यों सीमित रहे । वैसे भी हिन्दू परम्परा में शेर का पौराणिक महत्व है । यहाँ  दुर्गा देवी का वाहन शेर  है वहीं विष्णु के नरसिंह अवतार में भी सिंह या शेर है । इसलिए गुलज़ार चचा के पास गणेशोत्सव और दुर्गा उत्सव में भी काम की कमी नहीं रहती थी । उनके लिए देह पर शेर पेंट करना ही धर्म था फिर वह देह चाहे हिन्दू की हो या मुसलमान की । हाँ इतना अवश्य था कि वे कभी कभी मुसलमान शेर के सर पर उसकी इच्छानुसार हरा कपडा पहना देते थे । हिन्दू शेर या तो नंगे सर रहता था या उस पर भी वे एक भगवा कपड़ा डाल देते थे । वैसे भी शेर बनने के बाद वह उस्मान है या उत्तम कौन जान सकता था । 

अब कुछ बातें गुलज़ार चचा द्वारा किये जाने वाले शेर के  बॉडी पेंट की तकनीक पर भी हो जाएँ । पेंटर गुलज़ार सबसे पहले ब्रश से पूरे शरीर पर पीला और सफ़ेद प्राइमर लगाते थे । प्राइमर सूख जाने के बाद धीरे धीरे ब्रश चलाते हुए काले भूरे रंग से शेर के शरीर पर धारियाँ बनाते । पूरा शरीर रंग जाने के बाद चेहरा रंगा जाता । रंग लगाने के बाद वे कभी कभी मुखौटे भी पहनाते थे । वे गत्ते से तरह तरह के मुखौटे बनाते और उस पर पेंट कर उसे शेर के चेहरे का आकार देते थे । 

गुलज़ार भाई के पास शेर की मूँछ बनाने के लिए एक हुनर था । वे आम की गुठली में छेद करते और उसमे मुर्गी के पंख फँसाते जाते । दाढ़ी मूँछ  बनाने के लिए भी वे आम की गुठली के रेशों का प्रयोग करते थे । इसके लिए वे गर्मी के दिनों में ही कई बोरे आम की गुठली इकठ्ठा कर लिया करते थे । जूट से शेर के बाल बनाए जाते और रस्सी की पूँछ बन जाती । यह वही पूँछ होती जो रामलीला के समय वानरों की कमर पर पहनाई जाती थी । उसके बाद नकली दांत लगाए जाते जिसमे बाहर की ओर निकली हुई लाल रंग की एक लम्बी जीभ होती । शेर के नाख़ून भी बनाए जाते और उन्हें बघनखा जैसी एक चीज पहनाई जाती । चेहरे का पूरा श्रंगार होता । बाल वाले बिना बाल वाले , डरावने, सौम्य जाने  कितने तरह के शेर उनकी पेंटिंग वर्कशॉप में तैयार होते थे ।


इधर शेर बनकर तैयार होता उधर  बाजे वाले भी अपने ढोल ड्रम , क्लेरेनेट, सेक्सोफोन , घुंघरू आदि लेकर तैयार हो जाते । शेर के पूर्णरूपेण तैयार होने के पश्चात उसे एक शिष्य की भांति बतौर ट्रायल सबसे पहला नाच गुलज़ार पेंटर के सामने करना होता था उसके बाद उस शेर को बाहर जाने के लिए अनुमति मिल जाती ।

बैतूल शहर में वैसे तो बाजे वाले अलग अलग अवसरों पर किसिम किसिम की धुन बजाते थे लेकिन शेर का बाजा सब बाजों से अलग बजाया जाता था । यहाँ बाजे वाले जो धुन बजाते हैं उसमे लगातार ‘धनक धन का धनक तीती, धनक धन का धनक तीती’ यह धुन सुनाई देती हैं । यह ऐसी धुन है जिसे सुनते हुए पाँव अपने आप थिरकने लगते हैं ।

मोहर्रम, गणेश व दुर्गा उत्सव में गुलज़ार चचा के पास इतना काम रहता था कि संभाले नहीं संभलता था इसलिए कुछ और पेंटर भी उनके शागिर्द बन गए थे जिनमे एक सद्दू मिस्त्री भी थे जो शौकिया पेंट करते थे। सद्दू मिस्त्री वैसे मूल रूप से हमारे घर के फर्नीचर कारखाने में मिस्त्री का काम करते थे । सद्दू मिस्त्री  आदिवासी क्षेत्र से आते थे । गणेश दुर्गा के दिनों में वे हमारे घर के पास स्थित बजरंग व्यायामशाला में अपनी पेंटिंग का वर्कशॉप  खोल लेते और पूरे नवरात्र में शेर पेंट किया करते । 

दशहरे के दिन जुलुस में उनके बनाये शेर के अलावा वानर, राक्षस और रामायण के विभिन्न पात्र भी दिखाई देते थे ।


मुझे याद है श्यामबिहारी चौरसिया को वे दशरथ बनाते  थे । मदन मोहन ताउजी को देवी का रूप देने और दिनकर राव वाघ को राक्षस का रूप देने का कार्य भी उन्होंने किया था । दुर्गा मंदिर और व्यायामशाला मंडल के इन लोगों की एक पूरी टीम थी जिनमे रूपनारायण चौरसिया यानी रुप्पन काका, मुन्नू तिवारी, बाबा वाघ, नागोराव कावले , सद्दू मिस्त्री,शांतिलाल तातेड, विनोद डागा तथा  दुर्गा मंदिर निर्माण के ठेकेदार उस्मान भाई जैसे लोग शामिल थे । यह सब लोग अखाड़े से भी जुड़े थे । 

गुलज़ार चचा को अपना और अपने परिवार का पेट भी पालना था इसलिए मुहर्रम , गणेश और दुर्गा उत्सव के बाद बाक़ी दिनों में वे टाकीज के सामने लगाए जाने वाले सिनेमा के बड़े व छोटे बोर्ड भी बनाते थे और अपने ब्रश के कमाल से दिलीपकुमार देवानंद , राजकपूर , आशा पारेख , मीनाकुमारी सबके चेहरे वे हूबहू बना देते थे ।


गुलज़ार चचा सन नब्बे तक जीवित रहे । अंतिम दिनों में वे यद्यपि काम करने में असमर्थ हो गए थे लेकिन उनके बेटे सत्तार ने इस परंपरा को जारी रखा । यद्यपि अब शेर बनाने की ओर उनका  रुझान कम हो गया है इसलिए कि अब शेर बनने का यह सिलसिला भी ख़त्म होता जा रहा है । वैसे भी अब जो शेर बनते हैं उन्हें बनाने में न मेहनत है न कला, न किसी तरह की आत्म संतुष्टि । बस शरीर पर छापे  रखो और भांति भांति के रंग स्प्रे पेंट गन से स्प्रे कर दो । फिर झबरे बालों वाला विग पहना दो । विग, दाढ़ी, मूँछ सब कुछ बाज़ार में रेडीमेड मिलता है । 

बचपन की मेरी स्मृतियों में पिता के चचेरे भाई यानि हमारे किसन काका का शेर बनना अच्छी तरह याद है । वे मोहरम के समय वे अपने शरीर पर पेंट करवाते थे और बाजे वालों द्वारा बजायी गई ‘ धनक धन का धनक तीती ‘धुन पर घंटों शेर का नाच नाचते थे । बाद में किसन काका का दिमाग पूरी तरह चल गया था । वे बाज़ार के दिन बाज़ार उठ जाने के बाद कचरे में जाने क्या क्या ढूँढा करते थे  और सड़े गले फल,संतरे, मिर्ची के डंठल आदि उठा लाया करते थे और उनका रस निकाल कर पी जाते थे । 

एक दिन इसी चक्कर में उन्होंने कोई ज़हरीली वस्तु खा ली जिसके फलस्वरूप उनका निधन हो गया । लेकिन वे अपने शेर नाच के लिए पूरे बैतूल में वे मशहूर थे । बाद में जब उनका दिमाग उनके वश में नहीं रहा, वे कभी कभी माथे पर साइकल का ट्यूब बान्धकर उसमें दो जलती हुई अगरबत्तियाँ खोंसकर बाज़ार में निकल जाते थे और ‘बम्बई दन्न ‘ का नारा लगाते थे । उनका यह नारा पूरे बैतूल में प्रसिद्ध था । लेकिन कभी किसी ने उनका अपमान नहीं किया न मज़ाक उड़ाया या किसी प्रकार की चोट पहुँचाई । छोटे शहर में इंसान को पहले इंसान समझा जाता था । 

बैतूल में ही नहीं बल्कि सभी छोटे शहरों में आपस के सारे भेदभाव भूलकर पूरे शहर के एक संयुक्त परिवार की तरह से रहने के यह दृश्य अब  सामजिक पटल से लुप्त हो गए हैं । जीवन यापन हेतु अब बाहर जाकर काम करना विवशता है सो घर के लड़के बाहर निकलते हैं और वहीं बस जाते हैं । संयुक्त परिवार में एक छत के नीचे  भी सबके चूल्हे अलग - अलग हो गए हैं । सुख सुविधा की आकांक्षा और समय की मांग ने अब इन जीवंत दृश्यों को ऐसे  अतीत में बदल दिया है जिसे सिर्फ किताबों में या मुझ जैसे कुछ संवेदनशील लोगों की स्मृतियों में पढ़ा जा सकता है । अब लोग शेर नहीं बनते लेकिन कुछ लोग अपने ही घर में शेर हैं ।

शरद कोकास 

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