फरवरी की शामें जाते हुए यह ज़रूर कहती थीं कि अपना ख्याल रखना, इस माह की उम्र ज़रा कम है ৷ इधर दरख्तों के साये कुछ लम्बे होने लगते और धूप अपने पीलेपन में शर्माते हुए ठंड की विदाई की घोषणा करने लगती ৷ खूंटियों पर टंगे गर्म कपड़े जान जाते कि उनके पैरोल पर रहने का समय समाप्त हो चुका हैऔर वे फिर पेटियों में कैद हो जाने की राह देखने लगते ৷ हवा जिस्म में अपनी भोथरी सुइयाँ चुभोने की कोशिश करती लेकिन चुभन की बजाय उनसे गुदगुदी होती देख खीझ उठती ৷
मैं अभी उस उम्र में नहीं पहुँचा था जो उन हवाओं में बसंत की खुशबू महसूस कर पाता ৷ गुफ़ा में रहने वाले नरभक्षी राक्षस को जैसे जंगल में मानुस गंध आती है उसी तरह मुझे इस मौसम में सब तरफ़ से किताबों की गंध आने लगती ৷ मार्च बीतते बीतते गर्मियाँ ‘में आई कम इन सर ’ कहते हुए मेरे फैन विहीन अध्ययन कक्ष के बाहर खड़ी हो जाती ৷ दिन तो खैर पढने लिखने में बीत जाता लेकिन शाम के बाद जब पसीने की गंध किताबों की गंध पर हावी होने लगती मुझे बाहर निकलना ही पड़ता ৷
गर्मी की छेड़खानी से परेशान होकर एक शाम मैं किताब लेकर छत पर पहुँच गया ৷ शीतल हवाओं के बीच पढाई करने के अनुभव ने मुझे इस तरह प्रेरित किया कि मैंने अगले दिन एक लम्बे वायर के साथ टेबल लैम्प का जुगाड़ किया और फिर देर रात तक मेरी पढ़ाई की महफ़िल वहाँ जमने लगी ৷ पढ़ते पढ़ते जब मैं ऊब जाता तो नीचे उतरकर गली से बाहर निकलता और मुख्य सड़क पर पहुँचकर एक नज़र आसपास की छतों पर भी डाल लेता ৷ इस नज़र में यह जानने की सहज इच्छा शामिल होती कि मेरे अलावा और कौन कौन छत पर बैठकर पढ़ाई कर रहा है ৷
हालाँकि घर के आसपास छत वाले मकान बहुत कम थे ৷ अधिकांश मकान खपरैल वाले थे जिनमे मजदूर वर्ग के लोग रहते थे और उनके बच्चों का पढ़ाई से कोई विशेष सरोकार नहीं था । फिर भी कुछ बच्चे दिख ही जाते थे ৷ जिन लोगों ने छत पर बैठकर पढ़ाई की हो वे जानते हैं कि इस तरह अपने आसपास उपस्थित छात्र छात्रों को पढ़ते हुए देखने में प्रेरणा और प्रतिस्पर्धा का कितना सुन्दर समन्वय है ৷
फिर एक दिन मेरे इस सूने ‘टेरेस स्टडी सेंटर’ में पड़ोस की एक लड़की प्रेरणा बनकर आई ৷ हमारे ही बाड़े में जोशी काका के ऊपर वाले कमरे में पड़ोस वाले मानापुरे काका के एक रिश्तेदार रहते थे, उनकी बेटी लगभग रोज़ ही वहाँ आ जाती और देर रात तक पढ़ाई किया करती । तब वह शायद मुझसे दो या तीन क्लास पीछे रही होगी । उसे पढ़ाई करते हुए देखना मुझे अच्छा लगता था मेरा उत्साह और बढ़ जाता और मैं दुगुने जोश के साथ पढ़ने लगता ।
एक दिन सहज रूप से यह बात मैंने माँ से कही ৷ मुझे याद है माँ यह सुनकर बहुत देर तक मुस्कुराती रहीं थीं । बरसों बाद जब मेरी नौकरी लग गई और मेरे लिये एक अदद लड़की की तलाश शुरू हुई तो बाबूजी ने उस लड़की के पिता से मेरे रिश्ते की बात की लेकिन जाति और समाज का मामला आड़े आ गया और बात वहीं खत्म हो गई । जीवन में अक्सर ऐसा होता है, छतों पर उपजा प्रेम छतों पर ही रह जाता है, ज़मीन तक नहीं पहुँच पाता ৷
अब भी मार्च अप्रेल के मौसम में सड़क पर टहलते हुए मेरी निगाह अक्सर छतों की ओर चली जाती है৷ लेकिन अब छतों पर कोई दिखाई नहीं देता ৷ अब शहरी छात्र बन्द कमरों में पंखे और ए सी की हवा में पढ़ाई करने लगे हैं । हम लोगों के बचपन में पूरे घर में बमुश्किल एक टेबल फैन होता था जिसकी उपयोगिता सामूहिक होती थी । कुछ बरस बाद जब हम लोग गरीबी रेखा से थोड़ा ऊपर उठे बीच वाले कमरे में एक सीलिंग फैन आ गया ৷ मैट्रिक के बाद जब मैं भंडारा से बाहर पढ़ने के लिए चला गया तब बाबूजी एक छोटा सा कूलर खरीद कर लाये थे जिसे मैं कूलर का बच्चा कहता था ।
आज भी ऐसा ही होता है, एक मध्यवर्गीय नौकरीपेशा जब तक अपना ख़ुद का मकान बनवा कर उसमे सुविधाएँ जुटाता है, बच्चे बाहर पढ़ने चले जाते हैं ৷ फिर बाहर ही उनकी नौकरी लग जाती है, बेटियों की शादी हो जाती है और वे कभी कभार मायके वापस आती हैं ৷ बेटे भी बस दशहरा दिवाली ही घर आते है ৷ शेष समय मकान के सूने पड़े कमरे अपने सूनेपन में बूढ़े माता पिता को ताकते रहते हैं ৷
आज के बच्चे इस बात की कल्पना नहीं कर सकते कि उन दिनों पंखे और कूलर भी लग्ज़री आइटम थे ৷ ए सी जैसी चीज़ केवल धनाढ्यों के घर में होती थी हालाँकि वे लोग भी गर्मी के दिनों में आँगन में या छत पर खटिया अथवा पलंग बिछाकर सोते थे । घर के मुखिया या युवा होते बच्चों की ड्यूटी में शामिल होता कि खाना खाने से पहले ही छतों पर बिस्तर लगा दिये जाएँ ताकि शयन के समय तक वे ठंडे हो जायें ।
पंखों की उपयोगिता बस दिन में थी, रात के लिए तो चाँद काफी था ৷ लेकिन मुझे याद है एक साल इतनी गर्मी पड़ी थी कि चाँद ने भी हाथ जोड़ लिए ৷ आँगन में बिछे बिस्तर पर भी जब चैन नहीं आया तब बाबूजी ने आंगन में टेबल फैन लगा दिया था । लेकिन जब पंखे से भी गर्म हवा आने लगी तो उन्हे एक उपाय सूझा, उन्होंने पीतल की एक बड़ी सी परात में लबालब पानी भरकर पंखे के सामने रख दिया । हवा जब पानी से टकराकर आती थी तो ठंडी महसूस होने लगती । प्रसाद जी से क्षमायाचना सहित कहूँ तो ..‘अरुण यह जुगाड़मय देश हमारा’ ৷
छतों पर बिछे बिस्तर की बात पर आपको गुलज़ार साहब का वह गीत ज़रूर याद आया होगा ... “या गर्मियों की रात जो पुरवाइयाँ चलें, ठंडी सफ़ेद चादरों पे जागे देर तक, तारों को देखते रहें छत पर पड़े हुए ..दिल ढूँढता है फिर वही फुर्सत के रात दिन ৷” इस गीत के गहन अर्थों तक वही पहुँच सकता है जो अपने बचपन में इस दृश्य के भीतर से गुजरा हो ৷
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
आइये पड़ोस को अपना विश्व बनायें