10 जून 2026

129 मेरी नई फिल्म का नाम होगा ‘बेसन भात’



किसी सीधे सपाट रास्ते पर दूर तक चलते चले जाइये और फिर कहीं ठहरकर पीछे मुड़कर उस रास्ते को देखिये जिसे आप पीछे छोड़ आये थे ৷ याद कीजिये जब आपने उस रास्ते पर पहला कदम रखा था ৷ कितना नया नया था सब कुछ उस प्रारंभ में ৷ एक उत्सुकता  थी सब कुछ जानने की कि आगे रास्ता कैसा है ?  कैसे हमने आगे बढ़ते जाने की इच्छा में शामिल किंचित भय के साथ शुरुआत की थी ৷ कभी सोचियेगा ज़िंदगी के रास्ते पर चलने की शुरुआत भी हमने ऐसे ही की थी और हमारे पास कोई गूगल मैप भी नहीं था ৷


 वे बचपन के दिन थे ৷ ठण्ड के उन दिनों में सुबह सुबह हमारी गली से सर पर टोकरा रखे हुए सब्जीवालियाँ गुजरतीं, आवाज़ देते हुए मेथी लो,पालक लो,लाल भाजी, चौलाई ले लो ... ৷ माँ हाथ लगाकर उनका टोकरा नीचे उतारती मानो सब्ज़ी की पूरी बाड़ी ही आँगन में उतार देती ৷  जाने कितना कुछ होता था उनकी टोकरियों में ৷ हर थोड़ी थोड़ी देर में एक खेत हमारे आंगन में उतरता किसी में अम्बाड़ी की भाजी और पोपट की फल्लियाँ होतीं किसी में मूली, प्याज़ भाजी और मुनगे की फल्ली ৷ खेतों के साथ कभी कोई तालाब भी आ जाता टोकरियों में कच्चे हरे या उबले सिंघाड़े लिए हुए ৷ कभी मटकी में दूध की नदी आँगन में आ जाती, कभी ताक यानी छाछ का झरना, और कभी दही की झील  ৷


जिस दिन माँ हरा कांदा यानी हरा प्याज़ खरीदती, तय होता कि उस दिन हमारे यहाँ हरे प्याज़ का बेसन बनेगा ৷ जैसे ही माँ बेसन भूंजने के लिए चूल्हे पर कढ़ाई चढ़ाती मैं भौरे की तरह उसके आसपास मंडराने लगता ৷ भुने हुए बेसन की गंध मुझे दूर से खींच लाती ৷ माँ पहले बेसन भूनती फिर उसे अलग रख उसी कढाई में तेल डालकर कटी हुई हरी प्याज़ भाजी को जीरा,राई,हींग,हरी मिर्च आदि से छौंक देती ৷ फिर टमाटर, आदि डालकर उसमे  बेसन मिला देती और पानी डालकर उसका पेस्ट बना देती ৷ 


सोंधे सोंधे इस बेसन को अंत में फिर एक बार चम्मच गर्म तेल से तड़का लगाया जाता, नीबू के रस की बूंदों और गुड़ के टुकड़े से हल्का खट्टा मीठा फ्लेवर दिया जाता और हरे धनिये से गार्निशिंग की जीती  ৷ इस बेसन को पराठे और गीले भात के साथ खाने का आनन्द ही कुछ और था । 


हम भाई बहन चूल्हे के पास बैठ जाते थे और ध्यान से बेसन बनाने की यह  प्रोसेस देखा करते । मैं माँ से कहता था “माँ बड़ा होकर अगर मैं फिल्म डायरेक्टर बना तो एक फिल्म बनाउंगा जिसका नाम होगा ‘बेसन-भात ‘। सीमा पूछती थी “लेकिन भैया, उसमें स्टोरी क्या होगी ?” मैं कहता “कुछ नहीं, वह एक विशुद्ध कला फिल्म होगी और उसमें शुरू से अंत तक सिर्फ बेसन बनाने की प्रोसेस ही होगी और क्या ।“ माँ मेरी बात सुनकर खूब हँसती । 


आज भी ठंड के दिनों में सब्जीवालियाँ घर आकर भाजियाँ दे जाती हैं ৷ मैं माँ की तरह ही हरे प्याज़ का बेसन बनाता हूँ और माँ को याद करता हूँ ৷ माँ ने मुझे सब्ज़ी,दाल चावल बनाना तो सिखाया ही साथ ही यह भी  सिखाया कि रोटी बेलते हुए किस तरह बेलन चलाया जाए कि रोटी गोल भी हो और कहीं अधिक मोटी या अधिक पतली भी न हो ৷  मैं आज भी बच्चों से कहता हूँ कि माँ से पढ़ना लिखना सीखने के अलावा बचपन में ही अपनी माँ से खाना बनाना भी सीख लो, माँ जीवन भर तुम्हारी उँगलियों में बसकर तुम्हारे साथ रोटी बेलेगी और कढाई में करछुल चलायेगी ৷ माँ से ही ज़िंदगी का स्वाद है वह हमें छोड़कर कहाँ जायेगी৷ 


उन दिनों सब्ज़ियों का स्वाद सिर्फ कविता में नहीं दिखाई देता था वह स्वाद एक यथार्थ था ৷ शायद इसलिए कि आज की तरह हर सब्ज़ी बेशर्मी से हर मौसम में नहीं चली आती थी ৷ फूल गोभी सर्दियों की सरताज़ होती तो कटहल गर्मियों का राजा ৷ टमाटर बस ठण्ड में लाल रहता और भिंडी भी अपने हरेपन में सिर्फ़ गर्मियों में इठलाती ৷ गोभी में तो स्वाद और गंध इस क़दर  कि मोहल्ले में प्रवेश करते ही पता चल जाता गोभी किसके  घर में पक रही है । 


हरे प्याज़ के बेसन अलावा भी माँ कुछ विशिष्ट व्यंजन बनाती थी ৷ एक सब्ज़ी वह थी जिसमे घुइयाँ या अरबी के बड़े बड़े पत्तों पर बेसन लपेटकर उन्हें तलकर उनकी भजिया बनाई जाती और फिर उसकी सब्ज़ी ।  माँ इसे सेहड़े कहती थी ৷ उनके हाथों की खीर के बगैर किसीका जन्मदिन नहीं होता था ৷ सिलबट्टे पर पीसी हरी मिर्च,धनिया ,टमाटर आदि की चटनियों की तो बात ही मत पूछिये ৷ उनके हाथों गर्म अंगारों पर भुने बैंगन के भरते का स्वाद तो जीवन भर ज़बान पर रहेगा ৷ 


गैस आने से पहले तक हमारे घर में पूरा खाना मिट्टी के चूल्हे पर ही पकता था । ठंड के दिनों में हर शाम हम लोग चूल्हे के पास सिमट आते और चूल्हे की आँच सेंकते हुए साथ बैठकर भोजन करते ৷ माँ मिट्टी का यह चूल्हा खुद ही बनाती थी और यदा कदा उसे गोबर से लीपती थी । इस चूल्हे में स्कूटर की साइड कार की तरह साइड में एक सिगड़ी थी जिस तक लकड़ियों की आँच पहुँचती ৷ माँ कांसे की एक बटलोई में उस पर दाल चढ़ा देती धीमी आँच में खदबद खदबद पकती रहती ৷ उसके  ढक्कन के आसपास फेन जमा हो जाता जिसे माँ बीच बीच में हटाती रहती ৷ 


ईंधन का इंतज़ाम बाबूजी के जिम्मे था ৷ बाबूजी लकड़ी टाल से साईकल के कैरियर पर लकड़ी लादकर  लाते  और नहानी के पास वाले छप्पर के नीचे उन्हें जमा देते  । कभी कभी  मोहल्ले के चार - पाँच लोग  मिलकर एक ट्रक लकड़ी खरीद लेते  । उन दिनों बाबूजी रोज़ सुबह उठते और छेनी घन लेकर लकड़ी के डूंड फाड़ना शुरू कर देते, और संग्रहण कर्ता आदिम मनुष्य की परम्परा में इस तरह लम्बे समय के लिये लकड़ियाँ इकठ्ठा कर लेते । 


सुबह और दोपहर की चाय बनाने की ज़िम्मेदारी भी बाबूजी की ही थी । उन दिनों घर में पीतल का एक स्टोव हुआ करता था जो केरोसिन से चलता था । बाबूजी सुबह जागते और मुँह धोने के पहले स्टोव जलाकर धीमी आँच में चाय का पानी चढ़ा देते और उसमें तुलसी की पत्ती व अदरक भी डाल देते । उसके कुछ देर बाद चाय पत्ती व शक्कर । जब तक वे चाय  छानते दूध गर्म हो जाता । काली चाय को कपों में छानकर वे उसमें गर्म दूध डालते । इस तरह चाय बहुत स्वादिष्ट बनती थी । बाबूजी बताते कि अंग्रेज़ इसी तरह चाय बनाते थे ৷


इन अच्छी स्मृतियों के बीच एक दुर्घटना की दुखद स्मृतियाँ भी हैं  । छोटा भाई बबलू उन दिनों बहुत छोटा था । एक दिन रोज़ की तरह बाबूजी चाय का पानी स्टोव पर चढ़ाकर मंजन करने चले गये और उधर बबलू रेंगता हुआ स्टोव तक पहुँच गया । वह रोज़ बाबूजी को स्टोव में पम्प मारते हुए देखता था, उसने भी उसी तरह पम्प मारने का नॉब अपनी ओर खींचा ৷ बाबूजी दाहिने हाथ से नॉब खींचते थे और बाएँ हाथ से स्टोव को दबाकर रखते थे, अब उस नन्हे बच्चे के पास इतनी अक्ल कहाँ ৷ बस, स्टोव खौलते हुए पानी के साथ उसकी ओर लुढ़क गया और वह जांघों के बीच बुरी तरह जल गया । फिर उसका दो माह तक इलाज चलता रहा लेकिन अंत में सब कुछ ठीक हो गया ৷ ज़िंदगी ऐसे ही चलती है , अंत में सब ठीक हो जाता है ৷



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