10 जून 2026

128 गुज़रते मौसम के संग गुज़रते साल , मच्छरदानी के डंडे



एक दिन एक मित्र ने पूछा “ तुम्हें बचपन की घटनाएँ इतने विस्तार से कैसे याद हैं ?” मैंने कहा “ मैं ठण्ड के दिनों में, ठण्ड के दिनों को इतनी अच्छी तरह याद कर लेता हूँ कि वे गर्मी के दिनों तक याद रहते हैं ৷” मैंने यह बात कुछ लाक्षणिक ढंग से अपने मस्तिष्क की मेमोरी प्रोसेस के बारे में कही थी ৷ इस बात को उसने इसके स्थूल अर्थों में ग्रहण किया और पूछा “तुम्हारे इधर ठण्ड कैसी पड़ती है ?” जो लोग कहते हैं न कि उन्हें कविता समझ में नहीं आती दरअसल वे इसी तरह के पाठक होते हैं ৷  


बात जब ठण्ड पर चल निकली तो अपने बचपन के ठण्ड के दिन याद आ गए ৷ हम विदर्भ के लोग ठण्ड को सबसे पहले उत्तर भारत से आने वाले मौसम के समाचारों में महसूस करते थे और प्रतीक्षा करते थे कि अब कुछ ही दिनों में ठण्ड आने वाली है ৷ जैसे किसी दुश्मन के आने की आशंका से हम आत्मरक्षा हेतु अपने हथियार निकाल लेते हैं उसी तरह माँ संदूकों से गर्म कपड़े,शाल स्वेटर आदि निकाल लेती और उन्हें धूप दिखा देती ৷ 


शीत ऋतु  के तमाम सकारात्मक प्रभावों को स्वीकार करने के बावजूद मुझे ठंड केवल इसलिए पसंद नहीं थी कि ठंड के दिनों में भी सुबह सात साढे सात से पहले बिस्तर छोड़ना बहुत आवश्यक होता था । बाबूजी की डाँट  की इतनी आदत हो गई थी कि उसके आगे घड़ी को अपने अलार्म पर व्यर्थता बोध होने लगा था बाबूजी बाहर छपरी में सोते थे । वे सुबह जल्दी जाग जाते और भीतर के कमरे में सोये हम चारों को जगा देते ৷ 


सुबह जागने के बाद हम लोग रोबोट की तरह अपने काम में जुट जाते ৷ बिस्तर समेटकर भीतर वाले कमरे में बिछे निवार वाले पलंग पर रखना फिर खाट को बाहर करना और मच्छर दानी के डंडे निकाल कर एक कोने में जमा देना ৷ रोज़ रात को सोने से पूर्व डंडों और कीलों के सहारे मच्छरदानियाँ लगाना हमारे कर्तव्य में शामिल था ৷ ज़रुरत के अनुसार एक या दो डंडे पलंग के पाये पर लगे लोहे के सॉकेट में लगा दिये जाते जिनके उपरी सिरे पर लगी कील में हुक  अटका दिये जाते ৷


हम लोग खुली नालियों वाली बस्ती में रहते थे और मच्छरों से हमारा परिचय जन्म के साथ ही हो जाता था ৷ सप्ताह में एक दो बार मलेरिया उन्मूलन विभाग से पीठ पर कीटनाशक का फुहारे वाला एक सिलेंडर लादे एक व्यक्ति आता और नालियों में डी डी टी का छिडकाव करता लेकिन मच्छर कम नहीं होते थे ৷ उन्हें दीवार पर लगे उन पोस्टरों को पढ़ना नहीं आता था जिन पर लिखा होता था ‘हम दो हमारे दो’ ৷ मुझे मच्छरों से बहुत डर लगता था ৷ मैं बाबूजी से कहता “ प्रधानमंत्री जी देश की इतनी समस्याएँ हल करते हैं मच्छरों की समस्या हल क्यों नहीं करते ?”


बाबूजी मुस्कुराकर जवाब देते “ इनकी छोडो, भविष्य में भी कभी कोई प्रधानमंत्री इस समस्या का समाधान नहीं कर पायेगा ৷ आज भी मच्छरों के काटने पर अपनी संवेदनशील त्वचा पर पड़े हुए ‘हाइव्स’ यानी ददोरों को खुजाते हुए मैं बाबूजी की बात याद करता हूँ और प्रधानमंत्रीजी  की तमाम नाकामियों के साथ इस नाकामी को भी जोड़ देता हूँ ৷  


वैसे तो घर में सभी को अपनी मच्छरदानी खुद लगानी होती थी लेकिन बाद में बबलू ने बाबूजी के पलंग पर  मच्छरदानी के इन डंडों को लगाने की ज़िम्मेदारी संभाल ली ৷ बबलू ने जब पहली बार डंडे लगाए तो उसे बाबूजी का यह गणित समझ में नहीं आया कि कितने हुक दीवार पर लगी कीलों पर टांगने हैं और कितने डंडों पर ৷ उसने सहज रूप से पूछा “ बाबूजी आपको कितने डंडे लगाऊँ ? “बाबूजी यह सुनकर पहले तो चौंके फिर हँसने लगे । बबलू अपने प्रश्न का लाक्षणिक अर्थ समझ नहीं पाया, उसने फिर पूछा ..” बताइये ना, आपको कितने डंडे लगाऊँ ? “ बाबूजी ने कहा “ मुझे डंडे लगाएगा?” फिर हम लोगों को हँसता हुआ देखकर वह झेंप गया और अपनी बात का अर्थ जान कर हम लोगों के साथ हँसी में शामिल हो गया । उन दिनों घर ऐसी ही छोटी छोटी खुशियों से आबाद हुआ करते थे ৷ 


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