10 जून 2026

127 मन का रेडियो बजने दो ज़रा




‘मन का रेडियो बजने दो ज़रा’ यह गीत सुनते हुए शायद इस पीढ़ी की मोबाइल मेमोरी में कोई फर्क न पड़ता हो लेकिन हम पुरानी पीढ़ी वालों की यादों की पुरानी गाड़ी में एक धक्का अवश्य लग जाता है और हम लोग उसे रिवर्स गियर में चलाते हुए दशक सत्तर अस्सी के उन दिनों में पहुँच जाते हैं जब खुशियों के विभिन्न उपादानों में रेडियो प्रमुखता से शामिल था ৷  


मोबाइल की भांति आसान नहीं था उन दिनों रेडियो चलाना ৷ बटन ऑन करते ही पहले यह तय करना होता था कि आपको कौनसा रेडियो स्टेशन सुनना है ৷ यदि स्थानीय आकाशवाणी सुनना हो तो वह मीडियम वेव पर मिल जाता था और विविध भारती या रेडियो सीलोन सुनना हो तो वह शॉर्ट वेव पर मिलता था ৷ इसके लिए रेडिओ में पीछे की ओर एक गुटका जैसा नॉब लगा होता था जिसे ऊपर नीचे कर शॉर्ट वेव या  मीडियम वेव का चयन करना होता था ৷ इसके बाद ही शुरू होती थी अगली एक्सरसाइज ৷ 


 तर्जनी व अँगूठे के बीच रेडियो का काँटा घुमाने वाला नॉब, आँखें मीटर बैंड वाली पट्टी पर खिसकते हुए काँटे की ओर, कान स्पीकर के साथ पैंतालीस डिग्री का कोण बनाते हुए, काँटा जैसे ही शॉर्ट वेव पर पच्चीस या इकत्तीस मीटर बैंड पर पहुँचता खर्र खर्र की इरिटेटिंग आवाज़ अचानक रुक जाती और स्पीकर से आवाज़ आने लगती..”जाता कहाँ है दीवाने सब कुछ यहाँ है सनम, बाकी के सारे फ़साने झूठे हैं तेरी कसम ...” लग गया, लग गया, कहते हुए  हमारी उंगलियाँ वहीं थम जातीं ৷ उसके बाद जब तक मन करे रेडियो के दीवाने वहीं बने रहते थे ৷


मुझे शुरू शुरू में यह शॉर्ट वेव और मीडियम वेव का चक्कर समझ में नहीं आता था ৷ फिर एक दिन बाबूजी ने बताया रेडियो स्टेशन के प्रसारण केंद्र से एक टावर के द्वारा ध्वनि तरंगे आकाश में फेंकी जाती हैं, हवा में उपस्थित अणु जो आकाशीय विद्युत से चार्ज रहते हैं उन तरंगों को पृथ्वी की ओर परावर्तित करते हैं ৷ वे हमारे रेडियो  सेट तक पहुँचती हैं , फिर हम हमारे रेडियो सेट पर जैसे ही काँटा वांछित स्थान पर ले जाते हैं हमारा रेडियो सेट तत्काल उन तरंगों को कैच कर लेता है  और मनचाहा स्टेशन सुनाई देने लगता है ৷ सेकण्ड वर्ल्ड वार में सन्देश भेजने के लिए रेडियो की इसी  तकनीक का सर्वाधिक प्रयोग किया गया था ৷


बाबूजी ने यह भी बताया कि इन तरंगों या वेव्स के तीन प्रकार होते हैं, जो तरंगे अधिक दूरी पर कैच की जा सकती है उन्हें शॉर्ट वेव कहते हैं और जो कम दूरी पर उन्हें लॉन्ग वेव कहते हैं ৷ इनके बीच में मीडियम वेव होता है ৷ यह सुनकर मैं अपना सर खुजाता फिर भी समझ में नहीं आता था कि अठारह सौ अस्सी  में मार्कोनी महोदय द्वारा रेडियो का आविष्कार करने के बाद जब योरोप में पहली बार रेडियो आया तो किस सयाने ने दूर तक जाने वाली तरंगों का नाम शॉर्ट वेव और पास तक जाने वाली तरंगों का नाम लॉन्ग वेव रखा? ठीक है भाई, उनके मर्ज़ी उल्टा सीधा जैसा रखें, कोई भी माता पिता अपने दुबले पतले मरियल बच्चे का नाम बजरंगी या काले कलूटे बच्चे का नाम गोरेलाल रख सकता है ৷ 


उन दिनों घर में एक रेडियो का होना सृमद्धि का प्रतीक माना जाता था । घर की किसी दीवार पर लगी ब्रेकेट में,किसी कैबिनेट में , किसी दीवार वाली आलमारी में या टेबल पर रखा यह रेडियो क्रोशिये से बने टेबल क्लॉथ से ढंका रहता था ৷ रेडियो चलाने का प्रथम अधिकार मुख्यतः घर के मुखिया का होता था और उनके समाचार आदि सुन लेने के बाद घर के बच्चों को फ़िल्मी गाने या अन्य कार्यक्रम सुनने की परमीशन मिलती थी ৷ घर की महिलाओं को यह सुविधा दिन में पुरुषों के काम पर और बच्चों के स्कूल चले जाने के बाद दोपहर के समय प्राप्त होती थी ৷ उनके लिए कार्यक्रम भी दोपहर में ही आते थे ৷


रेडियो सेट बनाने वाली कम्पनियाँ भी गिनी चुनी थीं, जिनमे फिलिप्स, मर्फी आदि उस समय की सुप्रसिद्ध कम्पनियाँ थी । हमारे घर में भी मर्फी का एक रेडियो हुआ करता था । बाबूजी बैतूल से फर्नीचर की दुकान से उस रेडियो के लिये एक केस बनाकर ले आये थे  जिसमें सामने काँच का एक स्लाइडिंग डोर था, जिसे ऊपर उठाकर सरकाओ तो वह पीछे की ओर चला जाता था । 


बाबूजी महीने में एक बार रेडियो सेट पीछे के ओर से खोलते , ब्रश से उसके वाल्व और अन्य पार्ट साफ करते, साथ ही गाना सुनने के शौक में भीतर पहुँचे काक्रोच, मच्छर और कीड़े मकोड़ों के भी अंतिम संस्कार करते ৷ जिन लोगों ने रेडियो की यह सर्जरी नहीं देखी थी वे लोग इस बात पर विश्वास नहीं कर पाते थे कि बिना किसी के भीतर बैठे गाने की आवाज़ बाहर कैसे आ सकती है ৷ इस आशय का एक चुटकुला भी चलता था उन दिनों ৷ 


जैसे आजकल टी वी देखने के लिए डिस्क एंटीना लगाना पड़ता है ऐसे ही उन दिनों रेडियो सुनने के लिए घर में एक इनडोर एरियल लगाया जाता था यह एरियल ताम्बे के एक लम्बी जालीदार पट्टी होती थी जिसे एक खिड़की या दरवाज़े के पास लगा दिया जाता फिर उससे एक कॉपर वायर लेकर रेडियों तक पहुँचाया जाता था जिससे रेडियो से विशेषकर शॉर्ट वेव के स्टेशन साफ़ सुनाई देते थे ৷


जिनके पास रेडियो होता था वे लोग संपन्न माने जाते थे फिर भला सरकार उनसे टैक्स वसूलना कैसे छोड़ देती सो सरकार ने रेडियो रखने वालों के लिए उसका लायसेंस बनाना अनिवार्य कर दिया था ৷ यह लायसेंस फीस पंद्रह रुपये वार्षिक थी और इसे स्थानीय पोस्ट ऑफिस में जाकर पटाना पड़ता था ৷ इसके लिए एक छोटी सी पासबुक मिलती थी ৷ साल में एक बार पंद्रह रुपये का विशेष टिकट खरीदकर उसे पासबुक पर चिपकाना होता था ৷ पोस्ट ऑफिस की सील उस पर लगने के बाद माना जाता था कि रेडियो टैक्स पट गया৷  


वैसे तो रेडियो बचपन से ही सुनते आ रहे थे लेकिन जैसे ही ‘बच्चों की फुलवारी’ से ध्यान हटकर ‘युववाणी’ पर गया बाबूजी समझ गए कि लड़का बड़ा हो रहा है ৷ हाइस्कूल तक पहुँचते हुए रेडियो पर गाने सुनने का चस्का ऐसा लगा कि इधर बाबूजी घर से बाहर निकले नहीं कि अपनी उंगली सीधे नॉब पर ৷ लेकिन बाबूजी की यह साफ हिदायत थी कि पढ़ाई के वक़्त और परीक्षा के वक़्त रेडियो कम से कम सुना जाये । हाँ शनिवार और रविवार को इसकी छूट होती थी । इसलिये मैंने रविवार का नाम ही ‘रेडियो डे’ रख दिया था ।  


मेरे प्रिय रेडियो स्टेशनों में आकाशवाणी का नागपुर केंद्र था ৷ भंडारा से निकट होने के कारण मीडियम वेव पर इसकी आवाज़ साफ़ सुनाई आती थी ৷ भारत में तीन अक्तूबर उन्नीस सौ सत्तावन को विविधभारती सेवा प्रारंभ होने के पश्चात जब आकाशवाणी नागपुर से विविधभारती की विज्ञापन सेवा प्रारंभ हुई तब तो वह हम लोगों का प्रिय स्टेशन बन गया ৷ उन दिनों रेडियो का एडिक्शन कुछ इस तरह था कि बहुत से छात्र बिना रेडियो सुने पढ़ाई भी नहीं कर सकते थे और बहुत सी महिलाएँ बिना रेडियो सुने खाना भी नहीं पका सकती थीं ৷ क्रिकेट प्रेमियों का रेडियो सेट से चिपके रहना तो आम बात थी ৷

 

विविध भारती की विज्ञापन सेवा के अंतर्गत काफी आकर्षक विज्ञापन आते थे । जैसे एक विज्ञापन आता था “मैंने कहा, मुन्ना दौड़ में फिर फर्स्ट आया है ..आखिर पोता किसका है ..“फिर प्रोडक्ट का नाम और डिंग डांग की आवाज़ के बाद एक नया विज्ञापन ৷ मैंने और कंचन भैया ने बहुत सारे विज्ञापन रट लिये थे और हम अंत्याक्षरी की तरह विज्ञापन सुनाने का खेल खेला करते थे । रविवार के दिन जाने कितने कार्यक्रम आते थे, सेरिडोन के साथी, इन्स्पेक्टर ईगल और सन्डे को दिन में ग्यारह बजे किसी एक फिल्म का पूरा साउंड ट्रैक जिसमे पूरी फिल्म सुन सकते थे ৷ हर दिन के भी जाने कितने कार्यक्रम, फ़ौजी भाइयों के लिए जय माला के अलावा रोज रात सवा नौ  बजे ‘हवामहल‘ आता था जिसमें एक रेडियो नाटक प्रस्तुत किया जाता था । रविवार की दोपहर दो बजे ‘अपना घर’ ৷ घर में हम सभी लोग इन कार्यक्रमों को सुना करते थे ।   


विविध भारती के अलावा हम लोगों का एक प्रिय स्टेशन और था रेडियो सीलोन ৷ रेडियो  सीलोन शुरुआत उन्नीस सौ तेईस में हुई थी ৷ हम सबके लिए बुधवार की रात बहुत ख़ास होती थी ৷ कोई कहीं भी हो आठ बजने के पहले अमीन सयानी द्वारा प्रस्तुत ‘ बिनाका गीत माला ‘ सुनने के लिए वह  घर पहुँच जाता ৷ घर में रेडियो न हो तो  पड़ोसी के यहाँ ৷ होटल में और बाज़ार में जो जिस दुकान पर होता वहीं ठहर जाता ৷ आज किस पायदान पर कौनसा गीत होगा से लेकर आज का सरताज गीत कौनसा होगा इस पर शर्तें भी लग जातीं ৷ 

 

रेडियो सीलोन से एक कार्यक्रम और आता था जिसका नाम था ‘कोहीनूर गीत गुंजार‘ था । जब मैं कुछ बड़ा हुआ मैंने पोस्टकार्ड पर इस कार्यक्रम में एक गीत की भूमिका लिखकर भेजी थी, वह गीत था ‘ दिल ढूंढता है फिर वही फुर्सत के रात दिन “ इस गीत को मेरी लिखी भूमिका और मेरे नाम के साथ प्रसारित किया गया था । इसके अलावा ‘हफ़्ते के श्रोता’ कार्यक्रम का किस्सा तो मैं बता ही चुका  हूँ ৷ प्रतिदिन आने वाले कार्यक्रमों में रेडियो सीलोन पर सुबह साढ़े सात बजे पुरानी फिल्मों के गीत आया करते थे जिसके अंतिम गीत के रूप में कुन्दनलाल सहगल का गीत बजा करता था । 


आवाज़ की इस दुनिया में जाने क्या क्या होता रहा , रेडियो के बाद ट्रांजिस्टर आये फिर टी वी फिर मोबाइल ৷ बाद में सरकार द्वारा किन्ही कारणों वश शॉर्ट वेव बंद कर दिया गया लेकिन इसके साथ ही एफ एम रेडिओ शुरू हुआ जो आज हर मोबाइल में है ৷ फिर इन्टरनेट रेडियो शुरू हुआ, सेटेलाइट रेडियो शुरू हुआ ৷ अब तो आप अपने डेस्कटॉप लैपटॉप और मोबाइल में भी यह रेडियो  सुन सकते हैं ৷ यह परम्परा अभी भी जारी है ৷ हालाँकि खर्र खर्र की आवाज़ के बीच धीरे धीरे काँटा घुमाते हुए रेडियो स्टेशन ढूँढने और लगते ही चिल्लाना कि “पकड़ लिया रे या लग गया रे”  में  जो आनंद था वह इन सब में नहीं है ৷ 



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