प्रेमचंद की कहानी ‘दो बैलों की कथा’ पढ़ते हुए एक बार मेरे मन में विचार आया, मान लो हीरा हिन्दू होता और मोती मुसलमान तो दोनों बैल आपस में किस तरह संवाद करते ৷ “एकाध को सींगों पर उठाकर फेंक दूंगा” और “मुझे मारेगा तो मैं एक दो को गिरा दूँगा” जैसे संवाद कौन कहता, हीरा या मोती ? फिर मुझे मेरे ही ख्याल पर हँसी आ गई, जानवर भी कभी हिन्दू मुसलमान होते हैं, यह गौरव तो केवल हम इंसानों को हासिल हुआ है ৷ संवाद भले हम .. खैर जाने दीजिये ৷
लेकिन यह सच है कि प्रेमचंद की इस कथा ने मुझे बचपन से ही प्राणियों से प्यार करना सिखाया৷ भंडारा के मोहल्ले शुक्रवारी में किसानों के घर के सामने बंधे बैलों को आते जाते देखता और सोचता इन्हें इनका मालिक ठीक से खाना तो देता होगा ना ৷ बैतूल के हमारे खेत में छप्पर के नीचे बंधे बैलों को मैं अक्सर दुलराता उनकी बड़ी बड़ी आँखें मुझे बहुत अच्छी लगती थीं ৷ वृंदावन लाल वर्मा जी ने अपने प्रसिद्ध ऐतिहासिक उपन्यास ‘मृगनयनी’ में हिरनी जैसी आँखों वाली रानी का वर्णन किया है ৷ उन दिनों मैं सोचता था, अगर मानसिंह तोमर की इस गुर्जरी रानी की आँखें बैल जैसी होती तो क्या वे उसे ‘वृषभ नयनी’ कहते ?
खैर, बैलों को इससे क्या, वे तो सदियों से बस मेहनत करना जानते हैं ৷ कृषि अवस्था में आने के बाद आदिम मानव ने जब बैलों से काम लेना शुरू किया होगा तब यह ख्याल तो उसके मन में अवश्य आया होगा कि बैल हैं, यह भी थक जाते होंगे ৷ फिर उसने एक दिन उनके लिए छुट्टी की व्यवस्था की होगी ৷ अब उस समय के किसानों ने आज की तरह बिज़नेस मैनेजमेंट का कोर्स तो किया नहीं था अन्यथा वे काम भी चलता रहे और घाटा भी न हो यह सोचकर सब बैलों को एक साथ एक ही दिन छुट्टी नहीं देते ৷ वे तो किसान थे, आज के किसानों की तरह ही सीधे सादे, मेहनती, प्राणियों पर दया करने वाले, उन्होंने तय किया कि एक दिन टोटल काम बंद और बैलों को पूरा आराम ৷
फिर जब पंचांग बना , कृषि संस्कृति में आगे चलकर यह तिथि भाद्रपद माह की अमावस्या तय की गई और इस दिन को ‘पोला’ नाम दिया गया ৷ वैसे तो कृषि सम्पूर्ण राष्ट्र में होती है लेकिन ‘पोला’ नामक यह त्यौहार विशेष रूप से महाराष्ट्र,मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, कर्नाटक जैसे राज्यों में अधिक मनाया जाता है ৷ हालाँकि बैलों को आराम देने की प्रथा तो हर राज्य के कृषक समाज में है ৷
महाराष्ट्र के जन जीवन में यह पर्व इतना महत्वपूर्ण है कि स्कूल के पाठ्यक्रम में ‘पोला’ पर निबन्ध लिखना भी शामिल है । अमावस्या के दिन मनाये जाने वाले इस मुख्य पर्व ‘पोला’ के दिन किसान बैलों को नहला धुलाकर उन्हें सजाते हैं, उनकी पूजा करते हैं और उनके लिए विशेष रूप से तैयार की गई पूरन पोली यानी मीठी रोटी उन्हें खिलाते हैं ৷
अगला दिन बच्चों का पोला या ‘ताना पोला’ होता है ৷ इस दिन बच्चे अपने नन्हे नन्हे लकड़ी के या मिट्टी के बैल लेकर निकलते हैं और घर घर जाते है । मैं जब छोटा था तो भंडारा में अपने मोहल्ले में अपने मित्रों के साथ अपना लकड़ी का बैल लेकर निकलता था । सबसे पहले हम लोग मोहल्ले में ही रेहपाडे के घर के पीछे एक जगह एक तोरण के नीचे इकठ्ठे होते थे । फिर उस मोहल्ले की नगरपालिका की पार्षद या सबसे बुज़ुर्ग महिला लकड़ी और मिट्टी के उन बैलों की पूजा करती और हमें ‘बोझारा’ देती थी ।
फिर हम लोग सबसे पहले अपने घर जाते जहाँ माँ उस लकड़ी के बैल की पूजा करती और हम बच्चों को मिठाई खिलाकर ‘बोझारा’ देती थी ৷ ‘बोझारा’ यानी नकद पैसे, इसे चाहें गिफ्ट कहें,बख्शीस कहें या टिप ৷ उसके बाद हम रस्सी से बंधे अपने चक्के वाले बैलों को चलाकर पड़ोसियों के यहाँ जाते थे । थोड़ी बहुत मिठाई और बोझारा वहाँ भी मिल जाता ৷
इस पर्व की एक विशेष बात और थी जिसे मारबत कहते थे ৷ यह एक आदिम परम्परा है ৷ अमावस्या के दिन बच्चे आसपास लगी बेशरम की झाड़ियाँ,कटीले पौधे,या खेतों में उगी खरपतवार उखाड़ कर लाते और उन्हें लोगों के घरों के दरवाज़े पर रख देते ৷ घर के लोग अपने बगीचों में लगी झाड़ियाँ भी उनमे शामिल कर देते৷ फिर अगले दिन सुबह वही बच्चे आते और उन झाड़ियों को उठाकार एक जुलूस के रूप में स्टेशन जानेवाली रोड पर पारस मेटल वर्क्स के आगे एक नाले तक जाते और सारी झाड़ियाँ वहाँ फेंककर आ जाते ৷ रास्ते भर वे नारे लगाते रहते “कचरा काड़ी, रोग राई, ढेकूण, मुंगस, मच्छर,घेउन जा गे मारबत “ इसका अर्थ होता है “ हे मारबत, तू अपने साथ कचरा, गन्दगी,बीमारी,खटमल,मच्छर सब कुछ लेकर चली जा सीधे सीधे कहें तो दफ़ा हो जा ৷
बरसात के बाद होने वाली गन्दगी को साफ़ करने और हायजीन का सन्देश देता हुआ मारबत का यह शगूफा दुनिया में केवल विदर्भ महाराष्ट्र में ही होता है और इसमें कहीं कोई धार्मिक दखल नहीं है यह पूरी तरह से सामाजिक पर्व है ৷ ऐसा संभवतः किसानों द्वारा बुआई आदि के बाद खेतों से खरपतवार साफ़ करने , घरों व खेतों का कचरा दूर ले जाकर जलाने और सब कुछ साफ सुथरा करने के उद्देश्य से प्रारंभ किया गया होगा जिसने आगे चलकर ‘मारबत’ का रूप ले लिया ৷
विदर्भ के विभिन्न स्थानों में निकाले जाने वाले मार्बत के इन जुलूसों में नागपुर की मारबत का जुलूस तो इतनी प्रसिद्ध है जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती ৷ हेल्थ हायजीन को लेकर साफ सफाई की यह परम्परा किसी सरकारी स्वच्छता अभियान से सैकड़ों साल पहले से चली आ रही थी लेकिन भोंसले काल में अर्थात सन अठारह सौ इक्यासी में इसमें एक अध्याय और जुड़ गया ৷ हुआ यह कि भोंसले घराने की एक स्त्री बकाबाई तत्कालीन अंग्रेज शासकों से मिल गई और उसने कुछ रहस्य उन्हें बता दिए ৷ मना जाता है कि इसके फलस्वरूप कालांतर में भोसले घराने का पतन हो गया ৷
अब अंग्रेजों के बढ़ते प्रभाव और साम्राज्यवादी लिप्सा के कारण भले भोंसले शासन का पतन हुआ हो लेकिन इलज़ाम बेचारी बकाबाई पर आ गया ৷ लोगों ने बकाबाई की एक प्रतिमा बनाई और उसे शहर की सीमा से बाहर ले जाकर जला दिया ৷ उसके बाद हर साल पोला त्यौहार के दूसरे दिन मारबत का विसर्जन करते समय उसमे बकाबाई की प्रतिमा जुड़ गई और लोगों ने उसे ‘काली मारबत’ नाम दे दिया ৷ उसीके साथ सन अठारह सौ पच्यासी से ‘पीली मारबत’ निकालने की परम्परा भी शुरू हुई ৷
बस उसके बाद से काली और पीली मारबत की प्रतिमाएँ बनाकर उनका जुलूस निकालने और अंत में उन्हें विसर्जित करने की यह परम्परा जो नागपुर में प्रारंभ हुई वह अब तक चल रही है कुछ साल बाद इसमें बड़ग्या की प्रतिमा भी जुड़ गई ৷
आप सोच रहे होंगे यह ‘बड़ग्या’ क्या है ৷ वैसे तो कहा जाता है की ‘बड़ग्या’ बकाबाई के पति का प्रतीक है ৷लोगों ने सोचा कि भोंसले शासन के पतन का दोष आखिर एक स्त्री को ही क्यों दिया जाए, इस षड्यंत्र में उसका पति भी तो बराबर का हिस्सेदार था ৷ इसलिए उसका पुतला बनाकर भी जुलुस निकलने की यह परंपरा प्रारंभ हुइ और उसे ‘बड़ग्या’ नाम दिया गया ৷ आगे चलकर जब लोगों को इस मारबत पर्व में आनंद आने लगा तो उन्होंने नए नए बडगे निकलने शुरू किये जिसमे भ्रष्टाचार का बडगा, घूसखोरी का बडगा, बेईमानी का बड़गा, दुश्मनी का बड़गा जैसे बडगे के पुतले फेमस हो गए ৷ और अब तो कोरोना वायरस का बड़गा भी इसमें शामिल हो गया है ৷
इस तरह मारबत का यह त्यौहार जो एक सामाजिक त्यौहार है चल निकला ৷ बडगा और काली पीली मारबत बनाने वाले ढेर सारे कलाकार आज नागपुर में उपस्थित हैं, जिनमे अठारह सौ पच्यासी में पीली मारबत के पुतले का निर्माण करने वाले स्व गणपत राव शेंडे के पुत्र भीमाजी,उनके पुत्र गजानन शेंडे और उनके परिवार के लोग शामिल हैं ৷ वहीं सदाशिव वस्ताद तकितकर की कई पीढियां जिनमे जयवंत मणिराम तकितकर और उनके घर के कलाकार आज भी सक्रिय हैं ৷ अब तो पीली मारबत की बेटी तरुण पीली मर्बत का पुतला भी बनाया जाने लगा है ৷
कभी आप सावन की समाप्ति या अगस्त के माह में नागपुर जाएँ तो मार्बत का यह जुलूस देखना न भूलें ৷ और साथ में जोर से चिल्लाएँ घूसखोरी,भ्रष्टाचार करने वालों को,वादाखिलाफ़ी करने वालों को ,झूठ बोलने वालों को,बेईमानी करने वालों को , वैमनस्यता,नफ़रत फ़ैलाने वालों को घेऊन जा गे मारबत ৷ वैसे प्रजातंत्र में आप यह काम अन्य माध्यमों से भी कर सकते हैं ৷

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