जैसे हर पुरुष के भीतर एक स्त्री होती है वैसे ही हर शहर के भीतर अपने आदिम सौन्दर्य के साथ उपस्थित एक गाँव होता है ৷ राज्यसत्ता ,अर्थसत्ता और धर्मसत्ता की राजधानियां बनने की होड़ में विगत सदियों में अनेक गाँवों का कायांतरण शहरों में हुआ ৷ लेकिन समग्र कायांतरण के बाद भी वे पूरी तरह शहर नहीं बन पाए ৷ शहर के जिस्म में कहीं न कहीं वही पुराना गाँव साँस लेता रहा ৷ मुंबई जैसा शहर जिसे हम उसके जन्म से शहर की भांति ही देख रहे हैं वह भी अनेक गाँवों से मिलकर बना है और बरसों बाद तक वहाँ दादर जैसे क्षेत्र के पास कोलीवाड़ा जैसे मछुआरोंके गाँव बचे रहे थे जो ग्राम पंचायत के अंतर्गत आते थे ৷
साठ सत्तर के दशक में भंडारा में भी ऐसे अनेक मोहल्ले थे जिनका स्वरूप ठेठ गाँव जैसा था ৷ इनमे शुक्रवारी एक ऐसा ही मोहल्ला था जो हम लोगों के देशबन्धु वार्ड और सहकार नगर से लगा हुआ था ৷ यद्यपि यह क्षेत्र नगरपालिका के अंतर्गत आ चुका था, यहाँ अनेक पक्के मकान भी बन चुके थे फिर भी कुछ गलियों में से गुजरते हुए गाँव की झलक दिखाई देती थी ৷
उस दौर के हिंदी सिनेमा शहरी लोगों के सम्मुख गाँव का एक रूमानी चित्र प्रस्तुत करते थे ৷ इस चित्र में गाँव की एक गोरी होती थी जो पनघट से घाघर भरकर लाते हुए इठलाकर चलती थी, अपने घर के पीपल के आसपास चक्कर लगाते हुए ‘पीपल झूमे मोरे अंगना’ जैसा गाना गाती थी और गाँव के छोरों से अँखियाँ लड़ाती थी ৷ लेकिन भारत के गाँव, हिन्दी सिनेमा के गाँव नहीं थे, वे प्रेमचंद की कहानियों और उपन्यासों में दिखाई देने वाले किसानों और मेहनतकशों के पसीने से महकते गाँव थे ৷
शुक्रवारी के अधिकांश घर मिट्टी के बने थे ৷ रिसती हुई दीवारों के पहलू में बैलगाड़ियाँ खड़ी रहती थीं ৷ हीरा मोती जैसे बैल, हल के जुए से तात्कालिक मुक्ति पाकर चारा खाने और घर की मालकिन द्वारा नांद में छोड़े गए भोजन में मुँह मारने में व्यस्त रहते थे ৷ छुट्टी के दिन वे निठल्लों की तरह जुगाली करते हुए दिन भर अपनी पूँछ से अपनी देह पर बैठने वाली मख्खियाँ भगाया करते ৷ शुक्रवारी की गलियां उनकी पेशाब के गंध से महकती रहती थीं ৷
शुक्रवारी के घरों से हर सुबह से लोहे और पीतल का काम करने वालों के घन की आवाज़ आनी शुरू हो जाती ৷ यह अनेक लोहार थे जो बैलगाड़ी के चक्कों पर लोहे की रिम चढ़ाने का काम करते थे । पहले वे भट्टी में लोहे की रिम को गरम करते फिर उसे घन से ठोक कर चक्के पर चढ़ाते । मैं अक्सर शुक्रवारी मोहल्ले की ओर घूमने चला जाया करता था और चक्के पर रिम चढ़ाने और पीतल के बर्तनों को ठोंकने का कार्य बहुत रुचि से देखता रहता था । लोहे को तपकर लाल होते देखना मुझे बहुत अच्छा लगता था ৷
इधर बरसात के बाद जब गलियों का कीचड़ सूखने लगता शुक्रवारी की गलियों में त्योहारों की आवाजाही प्रारंभ हो जाती ৷ दुर्गोत्सव के दौरान यहाँ तीन स्थानों पर देवी बिठाई जाती थी ৷ यद्यपि यहाँ मनोरंजन के कार्यक्रम कम ही होते थे लेकिन ग्रामीण परिवेश होने के कारण पूजास्थल का वातावरण बहुत अच्छा लगता था । स्त्रियाँ नऊवारी साड़ी पहनकर और पुरुष धोती कमीज़ व टोपी पहनकर पूजा करने आते थे৷ दुर्गा पंडालों में रात भर जसगीत गाये जाते । कभी कभी यहाँ महाराष्ट्र का लोकनाट्य खड़ा तमाशा व गोन्धड़ भी हुआ करता था ।
शुक्रवारी का विशेष आकर्षण था बैलगाड़ी की दौड़ ৷ पहले के ज़माने में राजा महाराजाओं के समय रथ दौड़ हुआ करती थी ৷ प्राचीन ग्रीक में ओलम्पिक के समय से लेकर मातृसत्ता युग में पवित्र राजा के चयन के लिए भी रथ दौड़ हुआ करती थी ৷ आज़ादी के बाद न राजा बचे न रथ ৷ उनके कुछ वंशजों ने अपनी जायदाद को बचाए रखने के लिए अपने पुरखों के जीर्ण शीर्ण रथ अवश्य ज़रूर उनके खँडहर होते महलों के सामने खड़े कर रखे थे ৷
लेकिन शंकर पट यह राजाओं का नहीं किसानों का त्यौहार था ৷ इस बैलगाड़ी दौड़ में भाग लेने के लिए जिस तरह की बैलगाड़ी का उपयोग किया जाता था उसे ‘छकड़ा’ या ‘गाड़ा’ कहते थे ৷ कहीं कहीं इसे ‘खटारा’ भी कहा जाता ৷ यह प्रचलित बैलगाड़ी ही होती थी लेकिन इसमें गाड़ी का हिस्सा इतना छोटा और हल्का होता है कि उसमे चालक के अलावा अन्य किसी व्यक्ति के बैठने की गुंजाइश नहीं होती थी ৷ इसके चक्के भी वज़न में कम और आकार में छोटे होते थे ৷ दरअसल यह रेसर कार की तरह बैलगाड़ी का रेसर वर्शन होता था ৷
पूस माह के बाद मकर संक्रांति के आसपास शंकरपट आयोजित किया जाता था ৷ शंकरपट की यह प्रतियोगिता पूल आधार पर होती थी ৷ इसमें सबसे पहले दो दो छकड़े दौड़ने के लिए चुने जाते थे , उनमे से जो जीतता था उसे आगे अगले प्रतियोगी से साथ दौड़ में भाग लेने का मौका मिलता, उसके बाद खेल का क्वार्टर फाइनल होता फिर सेमी फाइनल और अंत में फाइनल होता था ৷
दौड़ वाले वाले दिन लगभग एक किलो मीटर का एक मैदान या ट्रैक दौड़ के लिए चुना जाता ৷ इस मैदान के एक सिरे पर लाइन से छकड़े खड़े कर दिए जाते ৷ बेशुमार भीड़ के अलावा तुरही और नगाड़ों का म्यूजिकल उनके बैंड उत्साहवर्धन के लिए वहाँ खड़ा रहता था ৷ दौड़ प्रारंभ होने की लाइन पर छकड़ों के आते ही गाँव के पाटील या प्रतिष्ठित लोगों द्वारा हरी झंडी दिखाई जाती , दोनों छकड़ों के मालिक अपने अपने छकड़े दौडाना दौडाना शुरू कर देते ৷ बैलों को और तेज़ दौड़ाने के लिए वे ‘तुतारी’ से कोंचते ৷ बैल कुछ इस तरह दौड़ते जैसे उन्हें मालूम हो कि उनके मालिकों की प्रतिष्ठा दांव पर लगी हुई हो ৷
मैदान के दोनों और खड़े दर्शक तालियों से और चिल्ला चिल्ला कर उनका उत्साह वर्धन करते ৷ मुश्किल से पांच मिनट के भीतर दोनों बैल गाड़ियाँ निर्धारित दूरी तय कर अंतिम बिंदु तक पहुँच जाती ৷ वहां दोनों ट्रैक के बीचों बीच बेरियर की तरह एक ध्वज लगा रहता था ৷ जो भी छकड़ा दौड़ में जीतता ध्वज उसी ओर झुका दिया जाता ताकि काफी दूर से देखने वाले को भी समझ में आ जाए कि कौनसा छकड़ा जीता है৷
दिन भर के यह पूल मैच संपन्न होने के पश्चात किसान घर लौट जाते ৷ रात भर बैलों की मालिश की जाती,उन्हें रोज की अपेक्षा अधिक पौष्टिक भोजन कराया जाता, उनके पैरों की सिंकाई की जाती और उन्हें आराम करने दिया जाता ৷ अगले दिन की दौड़ की शुरुआत इन्हीं पहले दिन जीते हुए हुए छकड़ों की दौड़ से होती ৷ अंत में जो छकडा जीतता उसके बैलों और मालिक का पटका आदि पहनाकर सार्वजनिक सम्मान किया जाता उन्हें इनाम वगैरह दिए जाते ৷
प्राणियों की दौड़ अथवा उनके द्वारा मनुष्य का मनोरंजन मनुष्यों और प्राणियों के सहअस्तित्व वाले इस संसार में कोई नई बात नहीं है ৷ यह दुनिया का सबसे प्राचीन खेल है जो दुनिया में अलग अलग तरीके से संपन्न होता रहा है ৷ कहीं प्राणियों को विभिन्न करतब सिखाए जाते हैं , कहीं उन्हें उन्हें गाड़ी में जोतकर उनकी दौड़ आयोजित की जाती है ৷ इनमे बैल, कुत्ता, बन्दर, ऊँट,गधा, घोडा, सुअर, बकरा, रीछ, याक, मुर्गे से लेकर हाथी,शेर,बाघ जैसे प्राणी शामिल होते रहे ৷
सर्कस में प्राणियों द्वारा किये जा रहे विभिन्न मनोरंजक खेल तो आपने देखे ही होंगे ৷ तमिलनाडू में जल्ली कट्टु का खेल तो विगत वर्षों में काफी प्रसिद्ध रहा ৷ तमिल में ‘जल्ली’ का अर्थ ‘पैसों की थैली’ और ‘कट्टु’ का अर्थ ‘बैल का सींग’ होता है ৷ इस खेल में पैसों की एक थैली बैल के सींग से बांध दी जाती है और उसे खुला छोड़ दिया जाता है ৷ मदमाते सांड के सींग पर बंधी पैसों की थैली प्राप्त करने के लिए पुरुष दौड़ते हैं इस प्रतिस्पर्धा में जो जीतता है उसे पैसों की थैली के अलावा अन्य इनाम भी दिए जाते हैं ৷
पश्चिम महाराष्ट्र में अरात-परात, कोंकण में छकड़ी और विदर्भ में ‘शंकरपट’ के नाम से चलने वाला यह खेल उन्नीस सौ अन्ठ्यानबे तक निर्बाध गति से जारी रहा ৷ उसके बाद प्राणी संरक्षण विभाग की इस पर नज़र पड़ी और दो हज़ार ग्यारह के क़रीब प्राणियों का उपयोग इसमें सर्वथा वर्जित कर दिया गया ৷ लेकिन बैलगाड़ी दौड़ तो किसानों का आदिम खेल था और इसमें बैलों को कोई नुकसान भी नहीं पहुंचाया जाता था इसलिए किसानों ने इस अध्यादेश के विरुद्ध कोर्ट में अपील की ৷ काफी लड़ाई लड़ने के बाद हाई कोर्ट से उन्हें इज़ाज़त भी मिल गई लेकिन कुछ समय बाद फिर सुप्रीम कोर्ट ने इस पर बैन अलग लगा दिया ৷ इधर दो हज़ार छः में जल्ली कट्टु पर भी पाबंदी लग गई और पंजाब में किसानों द्वारा की जाने वाली बैलगाड़ी प्रतियोगिता पर भी ৷
फिर एक लम्बा सिलसिला शुरू हुआ किसानों और सरकार के बीच मुकाबले का ৷ तमिलनाडु,महाराष्ट्र और पंजाब के किसानों द्वारा एक संयुक्त मोर्चा बनाया गया ৷ मद्रास हाईकोर्ट, औरंगाबाद की खंड पीठ से लेकर दिल्ली के सुप्रीम कोर्ट तक किसान अपने बैलों की भांति ही दौड़ लगाते रहे ৷ इस खेल के बहाने राजनीति के जाने कितने खेल हुए ৷ अंत में कुछ शर्तों के साथ पाबंदियां हटा ली गईं और यह खेल पुनः प्रारंभ हो गया ৷
मोटर कार रेस में रूचि रखने वाली और बाइक पर स्टंट दिखने वाली इस युवा पीढ़ी की इस खेल में रूचि नहीं है ৷ लम्बी पाबंदी के इस दौर में भी इस खेल को चाहने वालों की संख्या में कमी आई है ৷ लेकिन आज भी बैलों की दौड़ का यह मनोरंजक खेल ग्रामीण क्षेत्रों में बहुत लोकप्रिय है ৷ हमारे जीव जगत के समस्त प्राणी मनुष्यों के साथ साथ देवताओं से भी जुड़े हैं, जैसे माइथोलॉजी में नंदी शंकर जी का वाहन है और वास्तविक दुनिया में किसान का सच्चा साथी ৷ अगर प्रेमचंद की कहानी ‘दो बैलों की कथा’ आपने पढ़ रखी हो तो मुझे फिर और कुछ कहने की क्या ज़रूरत है ৷

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