आज के भंडारा शहर को देखकर मुझे कवि नासिर अहमद सिकंदर की एक कविता याद आती है “छोटे शहर का दुख / क्या हो सकता है / सबसे बड़ा दुःख यही होगा- / कुछ वर्ष पहले/ वह गाँव था /अब शहर है “ यह कविता केवल भंडारा शहर के लिए नहीं हैं बल्कि दुनिया के उन तमाम शहरों के लिए हैं जो अपने शिल्प में कभी खूबसूरत गाँव हुआ करते थे ৷ हम सबका शहर इसमे शामिल है ৷
उन दिनों भंडारा एक गाँव के वस्त्र धीरे धीरे उतार रहा था और एक एक कर शहर के कपड़े पहन रहा था । घर के पास रेल पटरी से लगे विशाल भूखण्ड पर सहकार नगर नामक कॉलोनी जन्म लेने लगी थी । वैसे तो इस कॉलोनी का कार्य उन्नीस सौ सड़सठ से ही प्रारम्भ हो गया था । ट्रकों से वहाँ लाइ गई रेत में हमारे नन्हे हाथों से बने घरौन्दे इस बात के गवाह थे । इस कॉलोनी की अंतिम सीमा पर एक रेल्वे लाइन थी जो भंडारा रोड रेल्वे स्टेशन से जवाहर नगर ऑर्डिनेंस फैक्टरी तक जाती थी । इस फैक्टरी में बनने वाला बारूद रेलगाड़ियों से मुख्य स्टेशन तक पहुँचाया जाता फिर वहाँ से देश की विभिन्न आयुध निर्माणियों तक भेजा जाता था, जहाँ वह बुलेट्स और हथगोलों में समाकर चीन और पाकिस्तान जैसे दुश्मनों के जिस्म में समाकर उन्हें नेस्तनाबूद करता था ৷
बासठ और पैंसठ का वह समय भारत के चीन और पाकिस्तान से युद्धों का समय था ৷ भंडारा के तमाम लोग युद्ध की शब्दावली से परिचित हो चुके थे ৷ रेडियो पर लता जी का गाया गीत बजता था “ जब देश में थी दिवाली वो खेल रहे थे होली, जब हम बैठे थे घरों मे वो झेल रहे थे गोली “ उस वक़्त हमें पता नहीं था कि गोलियों में बारूद होता है और वह बारूद हमारे शहर की आयुध निर्माणी में ही बनता है ৷
युद्ध के उन दिनों में रिक्शों पर शहर में अनाउंसमेंट होता ..”आज शहर में ब्लैक आउट रहेगा ৷ आम जनता से निवेदन है कि शाम के बाद अपने घर में कोई लाइट नहीं जलाएगा, सड़क के खम्भों की लाइट भी नहीं जलेगी ৷ बाज़ारों में दुकानों के लाइट भी हमें बंद रखना है ৷” हमें समझ में नहीं आता था कि घर में लाइट नहीं जलाने का युद्ध से क्या सम्बन्ध है ৷ बाबूजी ने हमारी शंका का समाधान किया “हमारे शहर में बारूद फैक्टरी है, अगर ग़लती से दुश्मन का कोई हवाई जहाज़ इधर आ गया और उसे रौशनी दिख गई तो वह यहाँ बम फेंक देगा ৷”
हम बच्चों की तरह सवाल करते लेकिन हमारा शहर तो पकिस्तान से इतनी दूर है यहाँ तक हवाई जहाज आएगा कैसे ? बाबूजी कहते “हाँ, यह सही है, हमारे फ़ौजी अफसर इतने सजग हैं कि उसे यहाँ तक आने ही नहीं देंगे लेकिन, मान लो ..फिर भी, किसी की ग़लती से आ गया तो ?” हम मानते ही नहीं थे कि ऐसा हो सकता है ৷ लेकिन अब बरसों बाद जब पुलवामा जैसी घटनाएँ घटित होते हुए देखते हैं तो लगता है बाबूजी ठीक कहते थे ৷ वैसे अब शहरों में ब्लैक आउट नहीं होता, हाँ लोगों के दिमागों में अब अवश्य ब्लैक आउट होने लगा है ৷
जवाहर नगर फैक्टरी के कामगारों के लिए उन्ही पहाड़ियों के हरियाली के बीच बसी एक रिहायशी कॉलोनी थी जिसमे मेरा क्लासमेट देशवंत राव चव्हाण रहा करता था । उसे स्कूल तक पहुँचाने के लिये फैक्टरी की स्कूल बस आया करती थी । उन दिनों स्कूल बस से आना जाना अभिजात्य जीवन शैली में शामिल था ৷ गली कूचों में नंगे पाँव घूमने वाले हम बच्चे उन बसों से उतरने वाले बच्चों को हसरत भरी निगाह से देखते और सोचते क्या कभी ऐसी बस में बैठने का मौका हमें मिलेगा ?
एक बार यशवंत ने मुझसे और नईम से कहा मेरा घर देखने चलोगे ? स्कूल बस में बैठने की कल्पना से हम लोग खुश थे लेकिन बस तो शाम को वापस जाती थी इसलिए भंडारा के बस स्टैंड से नियमित रूप से भंडारा से जवाहर नगर की और जानेवाली स्टेट ट्रांसपोर्ट की बस से एक रविवार को हमारा जाने का कार्यक्रम बना ৷ व्यवस्थित रूप से बसी इस तरह की कॉलोनी देखने का हमारा यह प्रथम अवसर था । सहकार नगर में भी बहुत सुव्यवस्थित ढंग से क्वार्टर्स बन रहे थे लेकिन रेत ,ईट,सीमेंट और लोहे की छड़ें देखकर हमें कुछ समझ में नहीं आ रहा था, जवाहर नगर कॉलोनी देखने के बाद उसके रूप की कल्पना हम लोग करने लगे ৷
टेढ़ी मेढ़ी गलियों वाले किसी छोटे शहर में जब कोई कॉलोनी बन जाती है तो वह शहर वासियों के गौरव का हिस्सा बन जाती है लेकिन उन्हें नहीं पता वर्गभेद की शुरुआत भी यहीं से होती है ৷ जब सहकार नगर के क्वार्टर्स बन गये तो मध्यवर्गीय लोगों ने वहाँ रहना प्रारम्भ किया ৷ हमारी गली से वहाँ जाने का शॉर्टकट रास्ता था इसलिए हमारी गली में स्कूटरों का आना जाना शुरू हो गया ।
हम सहकार नगर के सुव्यवस्थित क्वार्टर्स देखते और सोचते क्या हम लोग कभी इनमें रह पाएंगे ৷ देशबन्धु वार्ड का किराए का मकान छोड़ने के बाद खुद का मकान बनाने से पहले सन चौरासी में माँ - बाबूजी दो तीन साल के लिये सहकार नगर में रहने गये थे, लेकिन तब तक मेरी नौकरी लग चुकी थी और मैं दुर्ग आ गया था । सहकार नगर का घर मेरे लिए शनिवार रविवार का अड्डा था ৷
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