छात्र जीवन के शब्दकोष में पढाई-लिखाई,क्लास,सर,मैडम,कॉपी,किताब,पैन, घंटी,पीरियड,प्रेयर,लैब
लायब्रेरी,अटेंडेंस,होमवर्क,प्रैक्टिकल,एग्जाम,हॉलीडेज,खेलकूद,शरारत,छेड़खानी,नाटक,गाना,पिकनिक,फंक्शन
के अलावा एक ऐसा शब्द और होता है जिसे ‘बंक’ कहते हैं ৷ वाक्य में इसका प्रयोग ‘क्लास से बंक मारना’ में होता है ৷
यह एक ऐसा कार्य होता है जिसके अंतर्गत सारे छात्र छात्राएँ आपस में सलाह कर लेते हैं कि आज इस इस पीरियड में नहीं जाना है ৷ एक साथ क्लास से गोल मारने का लाभ यह होता है कि पढ़ाई का नुकसान नहीं होता ৷ यह कार्य साहस की पृष्ठभूमि में योजनाबद्ध तरीके से परस्पर सहयोग और विश्वास पर आधारित होता है और इसमें धोखा देने वाले का सामूहिक बहिष्कार होने की संभावना हो सकती है ৷ अलग अलग क्षेत्रों में इस क्रिया के अलग अलग नाम हो सकते हैं जैसे हम लोग स्कूल में इसे ‘कॉमन चाट’ और कॉलेज में ‘जनरल गोल’ कहते थे ৷
हम लोग भंडारा जैसे छोटे से शहर के छोटे से स्कूल में पढ़ते थे ৷ यहाँ कॉमन चाट का कल्चर नहीं के बराबर था इसलिए सामूहिक बंक मारने की ऐसी नौबत ही नहीं आई ৷ जिसको जब कोई काम होता या स्कूल आने का मन नहीं होता तो वह वैसे ही स्कूल नहीं आता था ৷ पढ़ाई-लिखाई से सरोकार भी बहुत कम लोगों को था ৷ वैसे कभी किसी रोज़ पढ़ने का मन नहीं होता था तो हम लोग टीचर से निवेदन कर लेते कि सर आज मन नहीं है, क्लास छोड़ दीजिए ৷ हमारे कुछ टीचर इतने भले थे कि कई बार हमारी भावनाओं का मान रखते हुए ख़ुद ही पढ़ाने नहीं आते थे ৷ वैसे भी वे लोग साल भर टीकाकरण, जनगणना, मत गणना, पशुगणना, मलेरिया उन्मूलन, कुष्ठ उन्मूलन,चेचक उन्मूलन जैसे सरकारी महत्त्व के कार्यक्रमों में लगे रहते थे ৷
इसी तारतम्य में एक बार सब बच्चों का बंक मारकर फिल्म देखने का प्रोग्राम बन गया ৷ यद्यपि संवैधानिक रूप से इसके लिए बंक मारना शब्द उचित नहीं होगा इसलिए कि यह पहले ही घोषित किया जा चुका था कि अगले दिन शिक्षकों के किसी अन्य कार्य में व्यस्त होने के कारण दोपहर बाद कक्षायें नहीं लगेंगी । बच्चों ने तय किया कि इस समय का सदुपयोग पढाई लिखाई, नोट्स बनाने या किसी शिक्षक का सर खाने जैसे व्यर्थ के कामों में न कर फिल्म देखने में किया जाये ৷ वैसे भी उन दिनों श्रीकृष्ण टाकीज़ में ‘हाथी मेरे साथी’ जैसी फिल्म लगी थी और माना जा रहा था कि चंद प्रणय दृश्यों को यदि नज़र अंदाज़ कर दिया जाए तो यह फिल्म बच्चों के मनोरंजन के लिए ही बनी है ৷
समय का सदुपयोग करने में लड़कों की बुद्धि ज़रा कम चलती है इसलिए फिल्म देखने का प्रोग्राम उनके द्वारा पहले नहीं बनाया गया लेकिन जैसे ही किसी गुप्त भेदिये द्वारा लड़कों को यह पता चला कि अगले दिन कक्षा की तमाम लड़कियों का मैटिनी शो में फिल्म जाने का प्रोग्राम है ‘हम क्या लड़कियों से कम हैं’ की प्रतिस्पर्धा भावना से उन्होंने भी अपना प्रोग्राम भी बना लिया । सिनेमाहाल में लड़के लडकियाँ भले ही अलग अलग क्लास में बैठते लेकिन मासूमियत भरा यह अहसास तो बना रहता कि लड़कियों के साथ पिक्चर देखने गए थे ৷
वह राजेश खन्ना उर्फ़ ‘काका’ का युग था । उस समय शहर में राजेश खन्ना की दो फिल्मे लगी थीं, आदर्श में ‘कटी पतंग’ और श्रीकृष्ण में ‘हाथी मेरे साथी’ । कटी पतंग के बारे में सुन रखा था कि वह रोने धोने वाली फिल्म है ৷ वैसे भी हमारा फर्स्ट प्रेफरेंस तो ‘हाथी मेरे साथी’ ही थी ৷ तयशुदा कार्यक्रम के अनुसार दोपहर तीन बजे हम लोग श्रीकृष्ण टाकीज़ पहुँचे ৷ बुकिंग विंडो पर भारी भीड़ थी लेकिन हमारी क्लास में कुछ ऐसे छात्र थे जिन्हें बुकिंग विंडो के जंगले के ऊपर चढ़कर, खिड़की में हाथ घुसाकर टिकट प्राप्त कर लेने में महारत हासिल थी ৷
उस ज़माने में शहर में चल रही फ़िल्म का मनोवैज्ञानिक प्रभाव यह होता था कि शहर में जिस हीरो की फिल्म जितने दिन चलती थी उतने दिन लड़के उसी स्टाइल में चलते फिरते व बात करते थे ৷ हालाँकि टिकट खिड़की पर इन मित्रों के शौर्य एवं बल प्रदर्शन को देखकर मुझे लग रहा था कि वे राजेश खन्ना को नहीं बल्कि हाथियों को इस फिल्म का हीरो समझ रहे थे ৷ वैसे कमोबेश यह बात सच भी थी ৷
टिकट कटाकर फुर्ती से हम लोग भीतर प्रवेश कर गए ৷ फर्स्ट क्लास के पीछे ही लेडीज़ क्लास था ৷ इंटरवल तक तो कोई चांस नहीं था लेकिन जैसे ही प्रोजेक्टर बंद हुआ और हाल में लाइट जली हम लोगों ने तपाक से गर्दन घुमाई और कनखियों से पीछे देखना शुरू किया ৷ हमें अपनी क्लास की एक भी लड़की वहाँ नहीं दिखाई दी ৷ क्षण भर के लिए यह ख्याल भी आया कि कहीं बालकनी में ना चली गई हों लेकिन उन दिनों हायर सेकंडरी के पहले यह वर्ग परिवर्तन संभव ही नहीं था ৷ लेडीज़ क्लास में झांकना अभद्रता थी लेकिन जब कोई न दिखा तो हम पूरा घूम गए और आँखें फाड़ फाड़कर भी देखा, लेकिन फिर भी कोई न दिखा ৷
शेष फिल्म हम लोगों ने घनघोर दुःख और निराशा में देखी ৷ हमारा दुःख उस दुःख से कम नहीं था जैसा कि राजेश खन्ना को अपने प्रिय हाथी रामू के मर जाने के बाद रहा होगा ৷ हमारी इच्छाएँ भी तो हाथी जैसी ही थीं जिन्हें सहेजकर रखना बहुत कठिन था ৷ परदे पर ‘दी एंड’ आने के पहले ही उनका ‘दी एंड’ हो चुका था ৷ शो खत्म होने पर हाल की बत्तियां जलते ही हम लोग सर झुकाए हुए भारी मन और भारी कदमों से बाहर निकले ৷ किसी चमत्कार की आशा में एकाध निगाह लेडीज़ क्लास की ओर भी डाली ৷
श्रीकृष्ण टाकीज़ से बाहर आकर गाँधी चौक की ओर बढ़ते हुए जैसे ही हम लोग आदर्श टाकीज़ के सामने पहुँचे अचानक एक लड़का चीखा ..”वो देख लडकियाँ” सबके झुके हुए सर तत्काल ऊपर उठे, हमने देखा ‘कटी पतंग’ का शो छूट चुका था और आदर्श टाकीज़ से बाहर आने वाली दर्शकों की भीड़ में हमारी क्लास की लड़कियां भी चली आ रही थीं ৷ हमें समझ में आ गया कि हमारी पतंग इस तरह कटी थी ৷
अगला दिन हम लोगों के लिए खीझ और ग्लानि के पर्व की तरह था ৷ हमारा गुप्त भेदिया आधी ख़बर ग़लत लाया था लेकिन सिर्फ इसलिए पिटते पिटते बचा था कि उसकी आधी ख़बर सही थी ৷ उनका गुप्त भेदिया परफेक्ट था । उन्हें पहले ही पता चल गया था कि लड़के उन्ही के चक्कर में फिल्म देखने गए थे और ‘कटी पतंग’ की जगह ‘हाथी मेरे साथी’ देख आए थे ৷ यही कारण था कि हम लोग उनसे ठीक ठीक नज़रें भी नहीं मिला पा रहे थे ৷ बाद में पता चला कि उन लोगों का तो पहले से ही प्रोग्राम ‘कटी पतंग’ देखने का था ৷
हालाँकि हम लोग बहुत दिनों इस प्रश्न का उत्तर नहीं ढूंढ पाए कि ‘हाथी मेरे साथी’ जैसी भीड़खेंचू पॉपुलर फिल्म छोड़कर लडकियाँ ‘कटी पतंग’ जैसी रोनी धोनी फिल्म देखने कैसे पहुँच गईं ? सच बात तो यह थी कि हम लोग उस उम्र में भी कार्निवाल में खेल दिखाने वाले ‘ओ मेरे हाथी’ पर ही अटके हुए थे और हमारी हमउम्र लडकियाँ ‘ये जो मोहब्बत है’ तक पहुँच गई थीं ৷ इस तरह इस घटना के आलोक में हमें यह दिव्य ज्ञान प्राप्त हुआ कि लड़कियाँ शारीरिक रूप से ही नहीं मानसिक रूप से भी लड़कों की अपेक्षा पहले मेच्योर होती हैं ।

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