10 जून 2026

122 हो गया दिल का पुर्जा पुर्जा लगे पचासी झटके




भंडारा शहर अपनी कस्बाई अल्हड़ता के साथ धीरे धीरे शहरी यौवन में प्रवेश कर रहा था ৷ शहर के लोगों को इस बात का अहसास था कि वे गाँव से बेहतर जगह पर रह रहे हैं  ৷ नागपुर जैसे बड़े शहर से साठ किलोमीटर दूरी पर रहने और ठेठ गंवईपन का मास्क पहने रहने के बावजूद शहर की आधुनिकता का संक्रमण उनमे फैल रहा था ৷ उनका तन शहरी सुविधाओं से सुसज्जित था लेकिन मन में अभी भी गाँव बसा था जिसका परिणाम उनकी कस्बाई मानसिकता में दिखाई देता था ৷ 


कस्बे के लड़कों की ज़िंदगी में सिनेमा हवा में ऑक्सीजन की तरह शामिल था ৷ सभ्रांत घरों के लोग भी सिनेमा देखते थे लेकिन उनके मन में सिने कलाकारों के लिए उतनी इज्ज़त नहीं थी ৷ सिनेमा की ज़िंदगी को वे लोग शराब,सिगरेट, फैशन और चरित्र जैसी बातों से जोड़ते थे ৷ हमारे शहर के लड़के सिने कलाकारों जैसा जीवन तो जी नहीं सकते थे लेकिन अपने स्तर वे इन चीज़ों को पाने का प्रयास करते थे जैसे उन्हें शराब देसी वाली भी चल जाती, बीड़ी तो खैर घर घर में बनती ही थी, फैशन के लिए कपडे महँगे हों यह भी आवश्यक नहीं था, रही बात कैरेक्टर की तो वह ढीला हो या टाईट उनके लिए कोई ख़ास मायने नहीं रखता था ৷


मेरे आसपास अधिकतर ऐसे ही लडके रहा करते थे ৷ हालाँकि बाबूजी जानते थे कि उनका कोई असर मुझ पर नहीं होने वाला ৷ मुझे बचपन से ग्राइप वाटर की बोतल में घोल घोल कर यह बातें पिलाई गई थीं कि इन सभी बुरी बातों से दूर रहना है  । वैसे मुझे भी पढ़ाई के अलावा सारी बातें फिज़ूल लगती थीं । फिर मेरे मित्र भी सब पढ़ने लिखने वाले थे और जिन मित्रों को पढ़ने लिखने का शौक नहीं था मैं उनसे दो गज़ दूरी बनाकर ही रखता था ৷ स्कूल में उस जमात के अनेक लड़के थे लेकिन मेरी मित्रता नईम,घनश्याम, सुरेन्द्र,यशवंत जैसे मित्रों से ही थी ৷ वज़ह यही कि यह सब मेरे जैसे ही थे ৷ 


अचानक एक दिन अपनी छवि को ध्वस्त करने वाला एक प्रस्ताव लेकर नईम मेरे पास आया.. “आदर्श टाकीज़ में सावन भादो लगी है, मस्त पिक्चर है , नई हीरोइन है रेखा, मैटिनी शो चलते  क्या, दोपहर के बाद की क्लास गोल मारते हैं ? “ नईम ने यह प्रस्ताव इतनी शीघ्रता से रखा जितनी शीघ्रता से कभी संसद में भी कोई प्रस्ताव नहीं रखा गया होगा ৷ मैंने थोड़ी ना नुकुर की तो नईम ने कहा “भूल जाओ, घर से इस पिक्चर के लिए परमीशन नहीं मिलने वाली, घर वाले जाने ही नहीं देंगे ৷ “


“लेकिन स्कूल से भागकर ?” नईम का प्रस्ताव अच्छा था लेकिन मन में वही ग्राइप वाटर की बातें उमड़ रही थीं ৷ “ क्या फर्क पड़ता है৷ “ नईम ने हिम्मत की एक लकड़ी मेरी धधकती इच्छा के चूल्हे में लगा दी   “साढ़े पाँच तक फिल्म छूट जायेगी, घर में किसी को पता नहीं चलेगा, अगर पूछे तो बोल देना, मेरे यहाँ रुक गया था ।“ अंततः मैंने डरते डरते हाँ कर दी । 


हमारा अगला कदम आदर्श टाकीज़ की ओर था ৷ जिस तरह कुछ अधेड़ अपनी साँस भीतर खींचकर अपनी तोंद छुपाकर युवा दिखने की कोशिश करते हैं हम लोग भी उसी तरह पेट से अपने बस्ते सटाकर उन्हें छुपाने की नाकाम कोशिश करते हुए आदर्श टाकीज पहुँचे ৷ नईम ने फटाफट फर्स्ट क्लास की दो  टिकटें कटाईं  और हम लोग फुर्ती से भीतर प्रवेश कर गए ৷ दोपहर के सिनेमा में सबसे बड़ा खतरा यह होता है कि हाल में घुसते ही कुछ देर तक कुछ नहीं दिखाई देता है और सीट टटोलकर बैठते समय ध्यान देना होता है कि जिस सीट पर बैठ रहे हैं वहाँ अपने कोई काकाजी  यानी पिताजी के दोस्त तो नहीं बैठे हैं ৷

 

 खैर ऐसा कुछ नहीं हुआ, हमने सीट का जुगाड़ किया और अपना ध्यान परदे पर केन्द्रित किया ৷ फिल्म शुरू हुए कुछ देर हो चुकी थी ৷ कुछ देर में परदे पर गाना आया  ..”कान में झुमका, चाल में ठुमका, कमर पे चोटी लटके, हो गया  दिल का पुर्जा पुर्जा लगे पचासी झटके ओ तेरा रंग है नशीला..৷“ लेकिन मेरा ध्यान न नायिका के रंगों की ओर था न अंगों की ओर ৷ मन में बार बार यही ख़याल आ रहा था कि नहीं यार.. घर से परमीशन लेकर ही यहाँ आना चाहिए था ৷ 


जैसे तैसे फिल्म समाप्त हुई ৷ हाल से बाहर निकलते हुए मैं नज़रें झुकाए हुए था और कनखियों से देख रहा था कि कोई ऐसा व्यक्ति तो मुझे नहीं देख रहा है, जो घर जाकर बाबूजी को बता दे कि आपका बेटा स्कूल टाइम में सिनेमा देख रहा था ৷ गाँधी चौक से लगभग दौड़ते हुए मैं घर पहुंचा ৷ बाबूजी घर पर नहीं थे यह जानकर संतोष हुआ फिर अचानक यह ख्याल आया कहीं वे भी तो चौक के आसपास नहीं थे और उन्होंने मुझे देख लिया हो ? माँ ने अधिक पूछताछ नहीं की, मैंने खुद ही बता दिया कि नईम के घर रुक गया था । कुछ देर में बाबूजी भी आ गए ৷ उन्होंने भी कुछ नहीं कहा मैंने एक लम्बी साँस खींची और निश्चिन्त हो गया कि अपनी चोरी पकड़ी नहीं गई ৷ अपनी पुड़िया चल गई थी ৷


लेकिन सच्चाई का ग्राइप वाटर पीने वालों का मन कहाँ मानता है  ৷ रात में अचानक नींद खुल जाती और मुझे लगता बाबूजी मुझे इस झूठ के लिए डांट रहे हैं ৷ कई दिनों तक स्कूल से भागकर फिल्म देखने का यह अपराध बोध मन को सालता रहा । आखिर एक दिन मैंने माँ को वास्तविकता बता ही दी । माँ ने सिर्फ इतना कहा कि “ अगर पूछ लेते तो कोई मना करता क्या ?” मुझे पता था माँ ऐसे ही कह रही है, बाबूजी यह सिनेमा शायद ही कभी देखने देते ৷ वैसे माँ ने कभी यह बात बाबूजी से नहीं कही, और कभी कही भी हो तो बाबूजी ने मुझसे कभी कुछ नहीं कहा ৷ कुछ माँ बाप बहुत अच्छे होते हैं, वे ऐसी कुछ बातें अपने साथ लेकर ही दुनिया से चले जाते हैं ৷ 



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