इंदौर की शादी में न जा पाने का दुख वीरेंद्र काका की शादी में शामिल होने के आनंद में तिरोहित हो गया था ৷ बचपन के विंड स्क्रीन पर दुख अथवा पश्चाताप की चाहे जितनी बारिश हो उत्सवों का वाइपर एक झटके में उसे पोछ देता है और चमचमाते हुए मन स्क्रीन पर शेष रह जाता है निर्मल आनंद ৷
शादियों में एन्जॉय करने का सिलसिला उस वर्ष नागपुर में बाबूजी की बड़ी बुआ की बेटी राजकुमारी के विवाह से प्रारंभ हुआ ৷ बच्चे चाहे जिस समारोह में जाएँ वे सबसे पहले अपने जाने पहचाने बच्चों के चेहरे ही ढूँढते हैं और कुछ देर में ही अपनी एक अलग दुनिया बसा लेते हैं ৷ उस विवाह में दादा फूफाजी के रिश्तेदार और उनके परिवार के लोगों की संख्या ही अधिक थी और बच्चे तो न के बराबर, इसलिए आनंद ने मुझे उस विवाह में अपने आप से वंचित रखा ৷ मैंने अपनी बोरियत के बारे में माँ से कहना चाहा, लेकिन उनका मूड तो और अधिक ऑफ था, उस शादी में उनके बैग से एक साड़ी जो चोरी हो गई थी ।
आनंद प्राप्ति की अगली मंज़िल बैतूल थी ৷ उस वर्ष वहाँ हमारे वीरेंद्र चाचाजी का विवाह संपन्न होना था ৷ हमारे सारे चचेरे,फुफेरे,मौसेरे,ममेरे भाई बहन पहले ही पहुँच चुके थे ৷ वैसे भी वहाँ हर साल गर्मियों में इतने लोग जुटते थे कि मोहल्ले वाले भ्रम में पड़ जाते थे, इनके यहाँ कोई विवाह समारोह तो नहीं है ৷ तदनुसार वे उस सप्ताह का अपना डाईट प्लान बनाते थे ৷ रायचंद टाइप के कुछ पड़ोसी तो भेद जानने के लिए रोज़ ही घर के चक्कर लगाने लगते और मौका पाते ही कहते “वो पिछली बार मदन हलवाई ने रायता बहुत स्वादिष्ट बनाया था, इस बार भी उसीको बुलाना ৷”
वीरेंद्र चाचा उस समय वेस्टर्न रेलवे में फायरमैन के पद पर कार्यरत थे और उनकी पोस्टिंग गुजरात के भावनगर शहर में थी ৷ हमारी होनेवाली चाची के माता पिता मुम्बई के रहने वाले थे लेकिन मुंबई से विवाह करना व्यवस्था एवं आर्थिक दृष्टि से सुविधाजनक न होने के कारण वे लोग अमरावती से अपने किन्ही रिश्तेदार के यहाँ से यह वैवाहिक कार्यक्रम संपन्न कर रहे थे ।
तय हुआ कि शादी से एक दिन पूर्व बारात बस द्वारा बैतूल से अमरावती के लिए प्रस्थान करेगी ৷ बारात में जाने के लिए सबसे अधिक लालायित थे हम बच्चे ৷ वैसे भी बड़े भाइयों और चाचाओं द्वारा पिछली बारातों के किस्से इतनी चाशनी लगाकर सुनाए जा चुके थे कि हम लोगों को लगने लगा था अगर ऐसा ही कोई चटपटा किस्सा अगर हमारे जीवन में नहीं है तो हमारा जन्म लेना व्यर्थ है ৷ वैसे बता दूँ कि बचपन की यह प्रवृत्ति कई लोगों में बड़े होने के बाद भी शेष रहती है विशेषकर कवि, लेखकों में जिसके चक्कर में वे झूठे किस्से भी गढ़ते रहते हैं ৷ लेकिन यकीन कीजिये, यह किस्सा एकदम सच्चा है ৷
खैर ..नियत तिथि पर रात्रि भोजन के पश्चात, बस के टायर के नीचे नारियल रखकर और बस के सामने ‘कोकाश मैरिज पार्टी’ का बैनर लगाकर बारात ने बैतूल से अमरावती के लिए प्रस्थान किया ৷ अमरावती में यह फ्रेज़रपुरा नाम का एक मोहल्ला था जहाँ एक सरकारी स्कूल में बारातियों के ठहरने की व्यवस्था की गई थी । गर्मी के उन दिनों में चुनाव, प्रशिक्षण शिविर, टीकाकरण शिविर के अलावा जनवासे के रूप में स्कूलों का यह सबसे अच्छा उपयोग था ৷ लड़की वालों का घर भी पास ही था जहाँ से दुल्हन द्वारा भेजे गए ऐयार बच्चे बीच बीच में ‘दूल्हा कैसा है’ देखने आ जाते थे ।
हम लोग सुबह ही अमरावती पहुँच गए थे । दिन भर का समय हमारे पास था इसलिए मैं अपने बड़े भाइयों यानि बिन्नू भैया,मुल्लू भैया, माया बुआ के बेटे राजू भैया आदि के साथ अमरावती दर्शन के लिये निकल गया । शाम को जनवासे पहुँचे तो देखा हमारे वरिष्ठ जन मुफ्त में हजामत बनवाकर और पॉलिश किये जूतों पर फिर से पॉलिश करवाकर सूट बूट ,धोती कुर्ता आदि पहन कर तैयार खड़े हैं ৷ हम लोगों को इसकी कोई ज़रूरत ही नहीं थी बस कपड़े बदलकर फटाफट तैयार हो गए ৷ पेट्रोमैक्स के सहारे स्थानीय बैंड बाजे के साथ, नागिन धुन पर डांस करते हुए, फ्रेजरपुरा की संकरी गलियों से होती हुई बारात लड़की के दरवाज़े पर पहुँची ৷
द्वार पर बारातियों का स्वागत उन दिनों खश के हरे रंग के घनघोर मीठे शरबत के साथ किया जाता था ৷ अशोक कुमार और शम्मी कपूर वाले पान पराग का उस समय कोई अस्तित्व नहीं था ৷ हमारे वरिष्ठ भ्राता, काका एवं उनके मित्र गण शरबत वगैरह पीकर डांस में बहे हुए पसीने की वज़ह से हुई जल की कमी को पूरा कर चुके थे और द्वारचार के समय द्वार पर खड़ी कन्या की सखियों पर दृष्टिपात करते हुए शरारत की मधुरता से भरे वचनों के तीर चला रहे थे ৷ इस द्वंद्वात्मक प्रक्रिया में जवाब उधर से भी आ रहे थे ৷ उनके इस कार्य व्यवहार से जब जवानी से रिटायर हो चुके पंडित जी के मंत्रोच्चारण में व्यवधान उपस्थित हुआ उन्होंने क्षुब्ध होकर सब युवाओं को डांट लगाई “आप लोग कुछ देर शांत नहीं रह सकते क्या ?
पंडित जी को नहीं पता था कि मरखने सांडों से यह वचन कहकर उन्होंने बड़ी मुसीबत मोल ले ली है, अब वे उनका टारगेट बन गए थे ৷ इधर द्वारचार प्रारंभ हुआ और उधर हमारे बड़े भाइयों ने पंडित जी को चिढ़ाना शुरु कर दिया ৷ चिढ़ाने के अलावा वे अक्षत हेतु रखे चावल भी मिसाइल की तरह उनकी चाँद पर फेंकने लगे ৷ पंडित जी चिढ भी रहे थे और उन्हें गुस्सा भी आ रहा था ৷ वे एक मन्त्र द्वारचार का पढ़ते और फिर तुरंत युवाओं को बुरा भला कहने लगते ৷ जो भी हो डबल रेडिओ स्टेशन वाले इस दृश्य से हम बच्चों का बहुत मनोरंजन हो रहा था ।
अचानक इस दृश्य में एक नया दृश्य उपस्थित हुआ ৷ मेरी नज़र द्वार पर उपस्थित एक युवती पर पड़ी৷ वह माँ की वही साड़ी पहने हुए थी जो नागपुर में चोरी हो गई थी । आसमानी रंग की जार्जेट की साड़ी, मैं अपनी माँ की साड़ी को अच्छी तरह पहचानता था ৷ मैंने ध्यान दिया तो उस युवती की सूरत भी मुझे जानी पहचानी सी लगी ৷ लेकिन कुछ देर बाद वह मुझे नहीं दिखाई दी ৷ मैं भी कुछ देर में सब भूल गया, आखिर बच्चा ही तो था ৷
कोहबर में जूता पुजाई, कुंवर कलेवा और मंडप में भोजन इत्यादि संपन्न होने के पश्चात अगले दिन शाम को बारात की वापसी थी ৷ लौटते समय बस में दो सदस्य और बढ़ गये थे, एक देवकी चाची और दूसरी उनकी बहन हेमा । उन दिनों बारात में लडकियाँ नहीं जाती थीं अतः दुल्हन के साथ उसकी सहायिका के रूप में किसी लड़की के आने का चलन था ৷ घर लौटने के बाद कई तरह के कार्यक्रम हुए कोहबर पूजा, बाती मिलाई और वह पीतल की परात में पानी में हल्दी घोलकर वर वधू द्वारा अंगूठी ढूँढने वाला मैच भी ।
सब कार्यक्रम भलीभांति संपन्न होने के पश्चात घर से बिजली के नन्हे रंगीन बल्बों की झालरें उतार ली गईं, अधिकांश मेहमान भी ‘सब कुछ निर्विघ्न संपन्न हुआ’ कहते हुए वापस लौट गए ৷ नव वर वधू के लिए आरक्षित पुराने घर में ऊपर की ओर बना ढाबे से लगा दादा भैया वाला कमरा उन्हें सौंप दिया गया । बाँस और मिट्टी के फर्श पर बना यह ऐसा ढाबा था जहाँ बड़े लोग अमूमन नहीं जाते थे लेकिन बच्चे अष्टा चंगा, लूडो आदि के लिए कभी कभार दोपहर में अपना अड्डा वहाँ जमाया करते थे ।
यह सहज मानव स्वभाव है कि घर में कोई नई वस्तु आए तो बार बार उसे देखने की इच्छा होती है ৷ जैसे हम लोग किसी बच्चे के जन्म लेने पर उसे देखने के लिए बार बार ‘माँ की कोठरी’ के आसपास मंडराया करते थे उसी बालसुलभ आकुलता में हम लोग भी नई चाची के कमरे के आस पास मंडराने लगे ৷
एक दिन खेलते हुए बिन्नू भैया ने मुझसे कहा “नई चाची हमेशा दरवाज़ा क्यों बंद रखती है ?” मैंने सोचा शायद नई चाची से उनका ठीक से परिचय नहीं हुआ है ৷ मुझे तो नई चाची से पर्याप्त दुलार पहले ही मिल चुका था ৷ इससे पहले मैं कुछ कहता उन्होंने कहा “और चाचाजी भी ..जब देखो तब इसी कमरे में रहते हैं ?” यह उसी किस्म की बालसुलभ इर्ष्या या आशंका थी जैसी घर में नए बच्चे के आगमन के पश्चात उससे बड़े भाई को अपना अधिकार छिन जाने के भय से होने लगती है ৷ उन दिनों चाचाजी की कृपा दृष्टि हम लोगों पर कम हो गई थी और टॉफ़ी वगैरह भी बराबर नहीं मिलती थी ৷
फिर एक दिन वे आये और मुझसे कहने लगे “मुझे चाचाजी से यह उम्मीद नहीं थी ।“ उनके इस कथन में आवेश कम और निराशा अधिक थी ৷ बालसुलभ इर्ष्या या आशंका का कोई चिन्ह उनके चेहरे पर नहीं था৷ “क्यों, क्या हुआ ? “ अबकी बार मैंने चौंककर पूछा । “मुझे लगता है यह लोग कोई अच्छा काम नहीं कर रहे हैं .. हमारे खानदान में आज तक ऐसा किसी ने नहीं किया ।“ बिन्नू भैया के चेहरे पर तनाव था ৷
मुझे समझने में तनिक देर लगी फिर मैं पेट पकड़ पकड़ कर हँसने लगा । बिन्नू भैया गुस्से से मेरी ओर देख रहे थे ৷ मैं समझ गया कि उन्होंने अपने अल्पज्ञान और अपने मित्रों से प्राप्त आधी अधूरी जानकारी के आधार पर मन ही मन कोई ताना बाना बुन लिया है ৷ यह वो ज़माना था जब बच्चे भय, निद्रा,आहार,मैथुन जैसी जैविक इच्छाओं के साथ जन्म लेने के बावजूद इस अंतिम इच्छा की मानव जीवन में उपयोगिता के बारे में बड़े होने की उम्र तक कुछ नहीं जानते थे ৷ कई युवाओं को तो उनके विवाह से एक दो दिन पहले उनके विवाहित मित्रों द्वारा आयोजित कार्यशाला में सहभागिता के पश्चात ही यह दिव्य ज्ञान प्राप्त होता था ৷
मैंने उनसे कहा ..”यह तो सामान्य बात है । नए दूल्हा दुल्हन इसी तरह साथ रहते हैं, तभी तो उनमे आपस में सामंजस्य उत्पन्न होता है ৷” फिर अगले दो दिनों तक मैं उनके दिमाग़ में स्थापित इस अवधारणा को स्पष्ट करने के अपने भागीरथ प्रयास में लगा रहा ৷ बिन्नू भैया बार बार आश्चर्य चकित होकर मुझसे पूछते “ लेकिन, यह सब तुम्हे कैसे मालूम है ? “ तब मैंने उन्हें बताया कि मैं मराठी की मासिक पत्रिका ‘मनोहर’ पढ़ता हूँ, उसमे बच्चों को सेक्स संबंधी ज्ञान प्रदान करने के लिए ‘कौतुहल’ नामक एक कॉलम नियमित रूप से प्रकाशित होता है ।
बचपन में मानस में बोया गया ज्ञान का वह बीज अंकुरित होकर धीरे धीरे बढ़ता रहा ৷ यही एक ऐसा विषय है जिससे सम्बंधित कुतूहल किसी उम्र में समाप्त नहीं होता, अतः नई नई जिज्ञासा जन्म लेती रही और अच्छी पुस्तकों से उनका समाधान होता रहा ৷ बड़े होने के बाद ‘बाल लैंगिकता’ संबंधी कोर्स भी मैंने किया और कामसूत्र से लेकर फ्रायड,जुंग और साइकोथेरेपिस्ट,हिप्नोथेरेपिस्ट प्रो.श्याम मानव द्वारा सुझाई गई विश्व प्रसिद्ध पुस्तक Masters and Johnsons on Sex and Human Loving पर नोट्स भी पढ़े ৷ युवाओं और मित्रों की काउंसिलिंग करने, विभिन्न समस्याओं में उनकी मदद करने और इस विषद विषय के बारे में इतना कुछ जान लेने के बावजूद लगता है अभी बहुत कुछ जानना शेष है ৷
फिर दिन बीतते गए ৷ सब अपने अपनी ज़िंदगी में वापस लौट गए ৷ हम सब की शादियाँ हुईं मेरी और मेरे भाइयों की ज़िंदगी में बारात में जाने के किस्सों में कुछ किस्से और जुड़ गए ৷ चाचीजी चार संतानों को जन्म देने के पश्चात पच्चीस- तीस वर्ष पहले कैंसर का शिकार होकर दुनिया से चली गई ৷ चाचाजी भी अपने बच्चों को मुंबई में सेटल करने के पश्चात अभी दस वर्ष पहले गुजर गए ৷ एक इंजिनियर बेटे के पिता बिन्नू भैया अभी कुछ समय पहले हाईस्कूल प्रिंसिपल पद से रिटायर होकर बैतूल में ही सेटल हो गए ৷
दुनिया में उत्सव चल रहे हैं, चलते रहेंगे जन्मोत्सव ,विवाहोत्सव .. और अब तो मृत्यु भी एक उत्सव है ৷ बारातें भी आती रहेंगी, जाती रहेंगी ৷ जैसे मैं चाचाजी की बारात में गया था वैसे ही वे भी मेरी बारात में आये थे लेकिन उनकी भूमिका एक वरिष्ठ सदस्य की थी ৷ जैसे वे दुनिया से चले गए .. वैसे ही हम सब भी अपनी अपनी भूमिका निभाकर एक दिन दुनिया से चले जाएँगे ৷ जीवन की यही परम्परा है, मृत्यु तक जिसका निर्वाह हर एक को करना ही है अनिवार्य रूप से ৷
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