चौड़ी मोहरी वाली पैंट को टखने के पास से मोड़ कर बाबूजी उस पर एक क्लिप लगा देते ताकि मोहरी साइकिल की चेन में न फँसे ৷ साइकिल पर चढ़ कर वे घर से निकलते और रास्ते भर ‘कोकास गुरूजी नमस्कार’ के अभिवादनों का उत्तर देते हुए काम पर चले जाते ৷ एक मध्यवर्गीय शिक्षक का जीवन उन दिनों बहुत कठिन होता था, इज्ज़त तो बहुत मिलती थी लेकिन तनख्वाह बहुत कम ৷ पूरे परिवार के साथ गुजारा करना उतना मुश्किल तो नहीं था लेकिन बाबूजी की तरह अपने भाइयों और उनके परिवार की ज़िम्मेदारी भी जिसके पास हो उसके लिए कुछ अतिरिक्त काम करना आवश्यक होता था ৷
बाबूजी को हर साल पुणे संभाग के बोर्ड एग्जाम में मॉडरेटर का काम मिल जाता था ৷ वे हर साल मार्च अप्रेल में एक माह के लिए पुणे चले जाया करते थे । शुरू शुरू में शनिवार पेठ में ‘बादशाही लॉज’ उनका ठिकाना हुआ करता था बाद में वे ‘स्वरूप लॉज’ में ठहरने लगे । पुणे से लौटते हुए वे एकाध दिन मुंबई में दयानंद मामा के यहाँ ठहरते और वहाँ से हम लोगों के लिये कपड़े और अन्य वस्तुएँ लेकर आते थे । उनके लौटने की हम लोगों को बेसब्री से प्रतीक्षा रहती थी ।
उस साल मैं आठवीं में था ৷ पुणे जाने से पहले बाबूजी ने माँ से कहा “तुम भी चलो, तुम मुंबई में रहना, मैं एक माह पुणे में रह लूँगा৷” माँ ने कहा “बच्चों को छोड़कर कैसे जायेंगे ?” बाबूजी के पास उसका उत्तर था “बच्चों की देखभाल के लिए बैतूल से अम्मा को और नागपुर से श्यामा को बुला लेते हैं ৷” कुछ बहस के बाद बाबूजी का प्रस्ताव अंततः स्वीकृत हो गया, बैतूल से दादी माँ और नागपुर से मेरी फुफेरी बहन यानी श्यामा जीजी को भंडारा बुलवा लिया गया ৷ बबलू को छोटे होने का लाभ मिला और वह भी माँ के साथ मुंबई चला गया ৷ रह गए भंडारा में मैं और छोटी बहन सीमा । यह पहला अवसर था जब हम लोग माँ बाबूजी के बिना रह रहे थे ।
जब घर में अपने से कोई छोटा होता है तब बड़े होने का भाव अपने आप आ जाता है ৷ यह घर जब समाज और दुनिया हो जाता है तब भी यह भाव बना रहता है ৷ मैं उम्र में सीमा से बड़ा था इसलिए उसे संभालने की ज़िम्मेदारी भी मेरी थी ৷ माँ की याद तो मुझे भी आती थी लेकिन उसे देखकर चुप हो जाता ৷ उसका मन बहलाने के लिए मैं रोज शाम उसे बागीचे तक घुमाने ले जाता था । एक दिन सिनेमा दिखाने भी ले गया । दादी माँ मेरे इन प्रयासों को देखकर बहुत प्रसन्न होती थी हालाँकि सीमा उनके पास बहुत मज़े से रहती थी ।
एक माह तक माता पिता के बिना जीवन व्यतीत करने का यह दौर मुझे अनेक बातें सिखा गया ৷ बाज़ार से सब्ज़ी लाना, अपने कपड़े खुद धोना, घर में झाडू लगाना, पानी भरना,छोटी बहन की चोटी करना जैसे छोटे मोटे कामों के लिए अनेक अलिखित प्रशंसापत्र मुझे प्राप्त हुए ।
सबसे अधिक मज़े की बात यह रही कि माँ की अनुपस्थिति में मैं वे सारे नखरे भूल गया जो माँ के सामने किया करता था । अब यह मत पूछियेगा कि वे नखरे कौन कौन से थे, आप सब ने भी किये होंगे जैसे यह सब्जी नहीं खाऊंगा, यह कपड़े नहीं पहनूँगा आदि आदि ৷
कभी कभी पढ़ाई और परीक्षा की तैयारी के बीच अचानक माँ बाबूजी की याद आती फिर बस कुछ दिनों की तो बात है ऐसा कहकर अपने आप को समझा लेता ৷ मुझे अपने से ज़्यादा चिंता सीमा की रहती थी । हर तीन चार दिन बाद बाबूजी की चिठ्ठी मिल जाती और उनके अक्षरों में हम उनकी उपस्थिति को महसूस कर लेते ৷ खैर, जैसे तैसे एक माह बीत गया । मेरी व सीमा की परीक्षाएं समाप्त हो गई और माँ बाबूजी भी वापस आ गये । मुझे लगा था कि माता - पिता की अनुपस्थिति का मेरी पढ़ाई पर कुछ प्रभाव पड़ेगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ, उस वर्ष भी मेरा क्रमांक कक्षा में प्रथम ही रहा ।
जैसे किसी फिल्म का ट्रेलर होता है उसी तरह माँ बाप के बिना जीवन गुजारने की लम्बी फिल्म का वह ट्रेलर था ৷ बरसों बाद माँ हमेशा हमेशा के लिए चली गई, बाबूजी भी चले गए .. मैं भी भंडारा से बाहर इस शहर में आ गया .. लेकिन अब भी वहाँ जाता हूँ तो ऐसा लगता है, बाबूजी कुछ दिनों के लिए पुणे गए हुए हैं और माँ भी उनके साथ मुंबई, मामा के यहाँ ৷
उस रात माँ को अंतिम विदा देते समय ऐसी ही कुछ बातें मैंने माँ की मृत देह से की थी एक कविता के शिल्प में....
एक वादा करो माँ
जब भी आउंगा इस घर में
तुम यहीं कहीं मिलोगी
मैं बैठूंगा ड्राइंगरूम में
तुम रसोई में सब्ज़ी छौंक रही होगी
मैं बेडरूम में सोता रहूंगा
तुम पीछे के कमरे में
प्याज़ जमा रही होगी
जब मैं पीछे वाले कमरे में जाऊंगा
तुम छत पर टहलने चली जाओगी
मेरे छत पर जाते ही
तुम जा बैठोगी पड़ोस में
न मैं तुम्हें दिखूंगा
न तुम मुझे दिखोगी
बस ऐसी ही आँखमिचौली में
बीत जाएँगी मेरी छुट्टियाँ
एक वादा करो माँ ৷
आपको पता है माताएँ बच्चों से कभी ऐसा प्रॉमिस नहीं करतीं लेकिन हमेशा उनके आसपास रहती हैं ৷
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
आइये पड़ोस को अपना विश्व बनायें