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10 जून 2026

149. भंडारा : चार आने में इतना सारा सोना


उन दिनों दादियाँ और नानियाँ ही हमारे ऑडियो चैनल थे, जिनसे हम रोज़ ही नए नए एपिसोड की तरह नए नए किस्से, महाभारत रामायण की कहानियाँ, पुराण कथाएँ आदि सुना करते । पड़ोस में दादा नाना की उम्र के भी कुछ लोग थे जिनके धारावाहिकों में वीरों की गाथाएँ, मुहावरे और कहावतें हुआ करतीं थीं । कुछ दादा नाना चैनल ऐसे भी थे जिनके पास फूहड़ और अश्लील प्रोग्रामों के अलावा कुछ नहीं होता था । घर में हमें उनसे बचकर रहने की सलाह दी जाती ।

इन कथाओं के पेशेनज़र हमें बचपन में ही बता दिया गया था कि हमारा लक्ष्य उसी तरह स्पष्ट होना चाहिए जैसे अर्जुन के सामने उसका लक्ष्य चिड़िया की आँख था । हालाँकि मैं इससे कभी सहमत  नहीं हुआ और आँख के अलावा भी सब कुछ देखता रहा , चिड़िया देखी तो उसका दुःख भी देखा,पेड़ देखा तो उसका बूढ़ा होना देखा,आसमान देखा तो उसका रहस्य जानने की कोशिश की । इसी तरह अपनी ज़िंदगी के साथ चलते हुए आसपास के लोगों की ज़िन्दगी भी देखता रहा और उनके दुःख दूर करने को ही अपना लक्ष्य मान लिया ।

महाभारत की अनेक कथाओं में से एक कथा हमें दशहरे के दिन ज़रूर सुनाई जाती कि पांडवों ने  अज्ञातवास पर जाने से पूर्व अपने अस्त्र शस्त्र शमी वृक्ष की टहनियों में छुपा दिए थे । अज्ञात वास समाप्त होने के पश्चात अपने अस्त्रों के साथ वे कुछ शमी पत्र भी लेते आए ,वनवास समाप्त होने की सूचना के साथ जिन्हें उन्होंने नगर वासियों को प्रतीक के रूप में प्रदान किया ।

मैंने बाबूजी से पूछा “लेकिन इसे सोना क्यों कहते हैं ?” उन्होंने बताया कि महाभारत के इस प्रसंग के अलावा दशहरे से जुड़ा एक प्रसंग और है । राम द्वारा लंका पर विजय प्राप्त करने के बाद जब उनकी सेना वापस अयोध्या आने लगी तब विजय के प्रतीक स्वरूप सैनिक अपने साथ लंका से सोना भी ले आये जिसे अयोध्यावासियों को देते हुए उन्होंने विजय की बधाई दी । इसी घटना की स्मृति में आज के दिन इन शमी पत्रों को एक दूसरे को देते हैं और कहते हैं हैप्पी विजयादशमी ।

बच्चों को उनके बचपन में जैसा बताया जाता है वे उसे उसी रूप सच मान लेते हैं । यह प्रश्न तो बहुत बाद में मन में आया कि पाँच हजार साल पहले तो लोहे की खोज भी नहीं हुई थी तब पांडवों के हथियार किस चीज के बनते थे ? और अगर लोहे के थे तो इतने दिनों तक पेड़ पर रखे रहने के बावजूद  उनमे ज़ंग क्यों नहीं लगा और रही लंका की बात तो जब उस समय लंका में इतना सोना था तो बाद में वह सोना गया कहाँ ?और यह भी कि युद्ध समाप्त हो जाने के पश्चात पराजित के शहर को इस तरह लूटना क्या उचित है ? बचपन में तो इन सवालों के जवाब नहीं मिले लेकिन बड़े होकर मैंने जवाब ढूंढ लिए ।

बहरहाल,  दशहरे का दिन हम लोगों के लिये बहुत उत्साह का दिन होता था । शुरुआत सुबह साइकिल धोने से होती थी । महाराष्ट्र में यह परम्परा है कि दशहरे के दिन अपने वाहन धोये जाते हैं और उन्हे फूलों से सजाया जाता है । इसी दिन कामगार अपने औजारों की पूजा भी करते हैं । बाबूजी भी घर के औजार जैसे हथौड़ी, बसूला, आरी, कुदाल, फावड़ा, पेंचिस, जैसी वस्तुएँ निकाल लेते थे और उन्हें धो पोछकर पूजास्थल पर रख देते । उसके बाद हम बच्चे शाम की प्रतीक्षा करते लगते  । शाम को कचहरी के उस पार यानि भंडारा शहर की सीमा के बाहर दशहरे का मेला लगता था । 


साइकल के डंडे पर मुझे बिठाकर मेला ले जाते हुए बाबूजी बताते कि जिस तरह राम अपने राष्ट्र की सीमा पार कर लंका गए थे उसी के प्रतीक के रूप में हम लोग शहर की सीमा से बाहर जाते हैं । उस समय प्रतीक मुझे अधिक समझ में नहीं आते थे, मुझे तो बस मेले में बिकने वाले खिलौने दिखाई देते थे । मिट्टी के शेर,भालू,सिपाही,रंगीन कागज़ की बनी हुई चकरी, काले धागे वाली प्लास्टिक की नाचने वाली गुड़िया,लट्टू, पिटपिट करने वाली टीन की पिटपिटी,मुँह से फूँककर बजाने वाली पुंगी,टीन की खँजरी और मिटटी की रबर बैंड लगी चकरी पर धागा लपेटे हुए रेंगने वाला कागज़ का सांप । 

फिर एक दिन मैंने प्रेमचंद की कहानी ‘ईदगाह’ पढ़ी । हामिद की तरह मुझे भी ख्याल आया कि यह सब फालतू के खिलौने खरीदने की बजाय क्यों न माँ के लिए एक लोहे का चिमटा खरीद लूँ । मैंने माँ से कहा तो माँ हँसने लगी “ चिमटा तो मेरे पास है और फुंकनी भी , तुम अपने लिए खिलौने ही खरीदा करो । “ हामिद बनने का मेरा स्वप्न वही चूर चूर हो गया । 

मेले से लौटते हुए साइकल के डंडे पर बैठकर मैं चकरी थाम लेता था जो हवा के साथ गोल गोल घूमती थी । बाद में जब मैं बड़ा हो गया तब डंडे पर बैठने की सुविधा सीमा को प्राप्त हुई और मेरी नियुक्ति  पीछे कैरियर पर कर दी गई  । यह प्रमोशन था या डिमोशन पता नहीं । उसके बाद जब बबलू की उम्र मेला जाने लायक हुई तो मुझसे वह कैरियर भी छिन गया और मैं मोहल्ले के अन्य बच्चों के साथ ठाकरे काका की टोली में शामिल होकर  पैदल ही मेला देखने जाने लगा ।   

मेले में खिलौनों और खाने पीने की वस्तुओं के अलावा सोना पत्ती या शमीपत्र भी बिकते थे । “चार आने  का सोना दो” कहने के बाद जब सोना बेचनेवाली महिला ढेर सारा सोना थमा देती तो मज़ा आ जाता । घर लौटकर मैं माँ से कहता “माँ देखो, चार आने में इत्ता सारा सोना लाया हूँ ।“ माँ हँसती और कहती “असली सोना भी अगर इतना ही सस्ता मिलता तो कुछ बात होती ।“ माँ इस देश की एक समझदार नागरिक थी, उन्हें इस तरह के प्रतीकों से नहीं भरमाया जा सकता था । 

सीमोलंघन से लौटकर सबसे पहला काम होता था हाथ मुँह धोकर आरती करना । आरती के बाद बाबूजी मेले से लाये हुए शमी पत्र दादाजी की तस्वीर पर चढ़ाते । हम लोग बाबूजी व माँ को सोना देकर उनके चरण स्पर्श करते और फिर मोहल्ले में निकल जाते । सामने वाले भोजराम दादाजी,शिवराम ठाकरे काका , पांडुरंग काका, बोपचे काका, हलमारे काका, डाकरे बाई , भेदरे काका, लीलाताई फिर शंगर्पवार वकील और बस । हमारा दायरा इतना ही था इसलिए कि सोने के ऐवज में आशीर्वाद के साथ मिलने वाली बिस्किट चॉकलेट   से हमारा पेट भर जाता था ।   

शरद कोकास 


66 भंडारा : देह राग में जन्म आरोह है अवरोह मृत्यु

यहीं था भारतीय संगीत महाविद्यालय 

जिन बच्चों के जीवन में दादा दादी, नाना-नानी सभी का अस्तित्व होता है उनके संस्कार उन बच्चों की अपेक्षा बेहतर होते हैं जिन्हें यह सुख नहीं मिला होता है ।दादा दादी की उपस्थिति तो मेरे जीवन में थी लेकिन नाना नानी को मैंने कभी नहीं देखा था । वे लोग माँ के विवाह से पूर्व ही वे गुजर गए थे । इसलिए सबसे बड़े मामा ही मेरे लिए नाना जैसे थे, उन्हीने माँ की देखभाल की थी और उन का विवाह संपन्न करवाया था । 

1964 के उस साल हम लोग जून की शुरुआत में ही बैतूल से लौट आये मुम्बई से बड़े मामा अपने परिवार सहित भंडारा आने वाले थे । 

मामा मामी और और उनके बच्चे यानि लाल दादा, मन्जू दीदी, मणि दादा, बेबी दीदी और पप्पू का वह भंडारा प्रवास मेरे जीवन के अविस्मरणीय क्षणों में से है । वैनगंगा का तट, अम्भोरा, कोरम्बी जाने कितनी जगहों पर हमारे पाँव पड़े । तस्वीरें खींचने का दायित्व बाबूजी के कॉलेज के ही एक शिक्षक श्री योगेश काले का था  । वे माँ को दीदी कहते थे सो हम बच्चे उन्हें मामा कहते थे । काले मामा एक अच्छे चित्रकार व फोटोग्राफर भी थे । मेरी पायडल वाली मोटर में भी उन्होंने ही पेंट किया था । 

1964 जून की यह तस्वीर 
उन दिनों एक जुलाई का दृश्य आम दिनों से भिन्न होता था सड़क पर स्कूल ड्रेस पहने बच्चों की भीड़ टन टन घंटी बजाते साइकिल और रिक्शे वाले । मेरे पाँव पहले ही दिन रास्ता नापते हुए देशबंधु वार्ड और खामतालाव वार्ड पार कर मस्जिद से कुछ आगे बने ढोला स्कूल की इमारत में पहुँच गए ।
ढोला प्राइमरी स्कूल 
बाईं ओर के पहले कमरे में चौथी कक्षा लगती थी और प्रधान अध्यापक शिवहरे गुरूजी क्लास टीचर थे । उस  साल बोर्ड के इम्तिहान होने थे और गुरूजी ने साल के प्रारम्भ से ही मुझे पढ़ाई करने की हिदायत दे दी थी । कक्षा में पहला नंबर आने के लिए कोंचने वालों में बाबूजी के साथ गुरूजी भी शामिल थे । तीसरी कक्षा में बीमारी की वज़ह से मेरी रैंक  चौथी आई थी सो उसकी भी भरपाई करना था  । 

दोपहर में स्कूल से लौटने के बाद मैं पढाई करता और शाम को खेलने निकल जाता । मेरे अवचेतन में दबे शब्द जो पहले बड़बड़ाहट के रूप में निकलते थे अब गुनगुनाहट में बदल गए । बाबूजी ने एक दिन मुझे कोई गीत गुनगुनाते हुए देखा तो भारतीय संगीत विद्यालय के संचालक अपने मित्र सुधाकर हांडे से यह बात बताई। हांडे सर ने मुझे अपने विद्यालय की शास्त्रीय गायन की प्रवेशिका कक्षा में  भरती कर लिया । हांडे सर दृष्टिबाधित थे लेकिन बहुत सुन्दर थे । उनका गौर वर्ण और मीठी आवाज़ मेरे कानों में अब भी गूंजती है । उन्होंने प्रेम विवाह किया था और उनके दो बेटे थे । 

बेला के बेसिक ट्रेनिंग कॉलेज में बाबूजी के साथ एक शिक्षक श्री गजानन राव नानोटी भी थे । वे तबले में विशारद थे ৷ बाबूजी ने उनसे जब मेरी संगीत में रूचि के विषय में बात की तो उन्होंने बाबूजी से कहा कि वे मुझे तबला सीखने के लिये उनके पास भेजें ৷ बाबूजी ने मुझसे कहा लेकिन मेरी रुचि गायन में थी इसलिए मैंने गायन की कक्षा ही ज्वाइन की । 

नानोटी काका का निवास 
मेरी शामें अब खेल के मैदान की बजाय  राग रागिनियों की सोहबत में गुज़रने लगीं । शाम होते ही मैं अपनी कॉपी उठाता और संगीत विद्यालय की ओर कदम बढ़ा देता । 

इधर शरद,प्रमोद,गुल्लू,बाबा, मन्या,और रामकिशन खुप्पस, कंचे और भौरा खेलने के लिए मेरी राह देखते और मैं संगीत विद्यालय में आलाप,तान,आरोह अवरोह, वादी,संवादी, ध्वनि ,नाद, लय, मात्रा, ताल, स्वर, चल स्वर, अचल स्वर, शुद्ध स्वर, विकृत स्वर जैसे दोस्तों के साथ अल्हैया बिलावल,यमन खमाज,भूपाली,बागेश्री  जैसे रागों के खेल खेलता  रहता । 

हांडे सर मुझे बहुत चाहते थे, वे अक्सर कहते थे जीवन एक राग की तरह ही है । जीवन की शुरुआत बचपन के आरोह से होती । फिर हम युवावस्था तक पहुँचते हैं और उसके बाद जीवन का अवरोह प्रारंभ होता है वृद्धावस्था आती है जहाँ हमारी स्थिति फिर बचपन जैसी होती है । इसी बीच सुख दुःख के आलाप, तान ,लय आदि आते हैं । 

हांडे सर ने बहुत मनोयोग से मुझे संगीत की शिक्षा दी । मेरे पास एक कॉपी थी जिसमें कई राग रागिनियों के बोल लिखे थे । अक्सर ऐसा होता था कि घर में कोई आता तो बाबूजी मुझे कोई राग गाने के लिये कहते । यद्यपि बिना साज के गाना कठिन होता था लेकिन मैं बोल सुनाकर ही प्रसन्न हो जाता था । 

इस तरह वह साल भी बीत गया और परीक्षा का समय आ गया । सर ने एक तारीख दी और कहा कि इस दिन सभी लोगों को आना है इस दिन बाहर से एक्ज़ामिनर आयेंगे और परीक्षा लेंगे उसके बाद सभी को एक प्रमाणपत्र मिलेगा । अब पता नहीं कैसे मुझे तारीख को लेकर कंफ्यूज़न हो गया । जो तिथि मुझे याद थी उस दिन मैं पहुँचा तो पता चला कि गायन की परीक्षा तो एक दिन पूर्व ही हो गई है । मैं बहुत निराश हो गया और रुआँसा भी हो गया । 

लेकिन हाँडॆ सर ने कहा “ निराश होने की कोई आवश्यकता नहीं है , हम ही तुम्हारी परीक्षा ले लेंगे ৷ “ फिर उन्होंने कई राग रागिनियाँ मुझसे गवाईं और इस तरह मेरी परीक्षा सम्पन्न हुई । हालाँकि यह मुझे बहुत बाद में पता चला कि मूल परीक्षा में मुझे अनुपस्थित बताया गया था और उस दिन मेरा मन रखने के लिये ही मुझसे गवाया गया था । इसलिए उस परीक्षा का कोई प्रमाणपत्र मेरे पास नहीं है ৷

सर्दियों की शुरुआत हो चुकी थी और दिन धोने के बाद सिकुड़ जाने वाले सूती कपड़े की तरह कुछ छोटे हो गए थे ।

 उस साल फिर बैतूल में पुराने मकान के उपरी कमरे में लक्ष्मीजी हमारी राह देख रही थीं । पटाखे छुड़ाकर और गन्ने खाकर हम लोग भंडारा लौट आये । आते समय बाबूजी दादा दादी यानी  बापू और अम्मा को भी साथ ले आये थे । बापू ने भंडारा पहुँचते ही घर में ही छपरी में एक अस्थायी दवाखाना खोल दिया और मोहल्ले के तमाम लोग उनके पास अपने दुख दर्द लेकर आने लगे । बापू उन्हे निशुल्क परामर्श व दवाएँ दिया करते थे । 

दादा दादी के सान्निध्य मे कुछ दिन 

सामने की गली से शुरू होने वाले हमारे घर का पिछला दरवाज़ा पीछे की गली में खुलता था जहाँ बंद गली के आख़िरी मकान के रूप में सहसराम और गजराबाई का मकान था । घर के  आँगन में  पकी मिटटी की एक नान्द थी, जिसे मिट्टी में आधा गाड़ दिया गया था  । उसमें वे लोग घर का बचा हुआ खाना डाल दिया करते थे । शाम को जब सहसराम अपने खेत से हीरा मोती की जोड़ी लिए घर लौटते तो वे बैल  उस नांद में मुँह डालकर अपना भोजन तलाशने लगते । जानवर बिना कुछ कहे हमारा जूठन खा लिया करते थे, यह तो बाद में मुझे मालूम हुआ कि उस वक़्त भी हमारे देश में ऐसे कई लोग थे जिन्हें जानवरों की तरह जूठन भी नसीब नहीं होता था ।

बापू की सुबह चिड़ियों के चहचहाने से होती । मुझे साथ लेकर वे मुंह अँधेरे गजरा बाई के खेत की ओर निकल जाया करते और खेत से ज्वार का एक भुट्टा तोड़कर उसके दाने चिडियों को खिलाया करते । मैं उनके साथ ‘आ’ ‘आ’ कहता हुआ चिड़ियों को मनुष्यों की भाषा सिखाने का प्रयास करता ।  गजराबाई के घर में एक गाय थी और गाय जैसी एक बिटिया जिसका नाम शांति था ।


वह गाय का दूध दुहती थी । प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व की कक्षा में जब मैंने बेटी के लिए संस्कृत शब्द ‘दुहिता’ पढ़ा तो मेरे मानस पटल पर दूध दुहती हुई शांति का चेहरा ही उभरा । शांति अभी भंडारा में ही अपने नाती पोतों के साथ उसी घर में रहती है । कुछ दिनों बाद अम्मा और बापू  वापस बैतूल चले गये ।

उस वर्ष का जाड़ा प्रेमचंद की कहानी पूस की रात के जाड़े की तरह ही हाड़ कंपा देने वाला था । 

वह जनवरी का महीना था । सुबह स्कूल से लौटा तो देखा दरवाज़े पर पोस्टमैन खड़ा है और उसके हाथों में एक तार है । उन दिनों टेलीग्राम आने का अर्थ होता था किसी की मृत्यु की सूचना । बाबूजी ने काँपते हाथों से तार खोला । तार बैतूल से आया था और उसमें बापू के निधन का समाचार था । हम लोगों ने जल्दी जल्दी तैयारी की और नागपुर के लिए रवाना हो गए । नागपुर में स्टेशन पर ही अन्य रिश्तेदार भी मिल गए । हम सब पेसेन्जर से बैतूल के लिए रवाना हुए लेकिन बैतूल की परम्परा के अनुसार अग्निसंस्कार तो शाम को ही हो चुका था । वहाँ पहुँचने के बाद बाबूजी चिता के दर्शन के लिए गए । बापू की मृत्यु के उपरान्त दसवें दिन दशगात्र हुआ और हम सभी के सर मुंडा दिए गए । दशगात्र के तीसरे दिन तेरहवीं हुई । 

दादाजी का अंतिम चित्र 
ग़नीमत कि ठण्ड उसके बाद कम हो गई थी वर्ना सर पर लगी टोपी भी सर की रक्षा नहीं कर सकती थी । सब बच्चों के बीच घुटा हुआ सर लेकर जाना भी बहुत अटपटा सा लगता था इसलिए कि  बच्चे चमनगोटा या टकलू कहकर मजाक उड़ाते थे । ऐसे में मेरी दोस्ती नानक चंद पंजाबी से हुई । वह बिलकुल भी मज़ाक नहीं उड़ाता था । नानक के पिता की गांधी चौक में मेन रोड पर किराने की एक दुकान थी, जहाँ कभी कभी मैं नानक के साथ बैठा करता था ।

मैंने अपने अकेलेपन में फिर शब्दों से दोस्ती कर ली । चाक पर पात्र रखने से पहले मिटटी गूंदने की तरह मैं कागज़ पर कुछ कुछ लिखने लगा था । फिर एक दिन पोस्टकार्ड पर एक छोटी सी कहानी लिखकर नागपुर से निकलने वाले अखबार  ‘नवभारत’ के बच्चों के कालम ‘बच्चों की फुलवारी’ में भेज दी । 

नानक के घर नवभारत आता था उसने स्कूल में बताया कि तुम्हारी कहानी “सुनो सबकी करो मनकी‘ अखबार में छपी है । फिर मैंने उसे मैंने नानक की दुकान पर ही देखा । मेरी पहली प्रकाशित कहानी की कोई कॉपी मेरे पास नहीं है यहाँ तक कि यह भी याद नहीं कि उसमे मैंने क्या लिखा था । 

नानक से मेरी दोस्ती सातवीं क्लास तक चली । फिर स्कूल से निकलने के बाद उससे मिलना जुलना कम हो गया । नौकरी लगने के बाद छुट्टियों मे कभी भंडारा जाता तो उसकी दुकान पर जाता था लेकिन हमेशा उसे नशे में धुत पाता । मैंने और घनश्याम ने उसे समझाने की बहुत कोशिश की लेकिन वह शराबियों की तरह हमें भरोसा देता रहा  । इधर मौत घात लगाये बैठी थी एक दिन उसे अपने साथ ले गई बड़े होने के बाद नानक को पीने की लत हो गई थी जिसकी वज़ह से उसका असामयिक निधन हो गया ।  

शरद कोकास