आप ज़िंदगी भर देश विदेश की यात्राएँ करें लेकिन बचपन के दिनों में अपने क्लासमेट्स के साथ पहली पहली यात्रा या पिकनिक हमेशा याद रहती है ৷ वह दिन भी मेरे जीवन का एक ऐसा दिन था जो बरसों मेरी स्मृतियों में बसेरा करने वाला था ৷ उस दिन सुबह आठ बजे हम सभी बच्चे स्कूल के सामने एकत्रित हो गए ।
ठंड का कोई रंग मुझे दिखाई नहीं दे रहा था लेकिन सब उसे गुलाबी ठण्ड कह रहे थे ৷ हम लोग जुलुस की शक्ल में पैदल पैदल ही ढोला स्कूल से निकले, फिर वहाँ से शीतला माता मंदिर पहुँचे और वहाँ से रिंग रोड से आगे बढ़ कर खामतालाव, शुक्रवारी, मनरो स्कूल चौक से होते हुए शहर से बाहर एक ईट भठ्ठे पर पहुँचे । यह ईट भठ्ठा हमारी कक्षा की एक पंजाबी लड़की विनोद मदान के पिता निहालचंद जी मदान का था ।
हमारा कोई तयशुदा पिकनिक स्पॉट नहीं था लेकिन हमें आगे सूर नदी के किनारे तक जाना था ৷ यह जगह हमें इतनी अच्छी लगी कि हमने कुछ देर यहीं रुकने का फैसला किया । अचानक देखा ईट भठ्ठे में काम करने वाली कुछ महिलाएँ अखबार के कागज़ पर गर्मागर्म पोहा लेकर चली आ रही हैं ৷ मदान अंकल ने हम लोगों के लिए नाश्ते में पोहे की व्यवस्था पहले ही कर रखी थी ৷ अनुमान ने आश्चर्य से कहा ‘घड़ोले सर पहले ही मदान साहब से मिलकर सब कुछ तय कर चुके हैं ৷’
यहाँ तक पहुंचते पहुंचते भूख तो लग ही गई थी सो जमकर पोहा खाया और उसके बाद मस्ती शुरू ৷ माँ कहती थी ‘ पेट में गया दाना, मुर्गी करे धिंगाना ‘ सही बात थी ৷ हमने देखा आसपास बेर के कई पेड़ थे । पेट भरा था फिर भी हम लोगों ने बेर तोड़ कर खानी शुरू कर दी । इसके बाद अंकल हम बच्चों को ईट भठ्ठे पर ले गए मिट्टी से किस तरह साँचे में ढलकर ईट बन जाती है , उसे किस तरह पकने के लिए भट्ठी में रखा जाता है यह सब हमने पहली बार देखा ৷ ईट भठ्ठे के मजदूरों से भी हमारा परिचय हुआ जो वहीं टिन शेड में घर बनाकर रह रहे थे ৷
हमारा अगला पड़ाव था सूर नदी ৷ तीन- चार किलोमीटर पैदल चलने के बाद हम लोग थकावट महसूस कर रहे थे लेकिन नाश्ते ने हमारे लिए एनर्जी बूस्टर का काम किया था । नदी का बहता हुआ पानी देखकर सारी थकावट ग़ायब हो गई ৷ मैं नदी से कुछ दूर ही था लेकिन मुझे लगा नदी मुझे अपने पास बुला रही है ৷ इस निमंत्रण को मैं कैसे अस्वीकार कर सकता था ৷ मैंने अपने मित्रों के साथ सर से अनुमति ली और नदी में छलांग लगा दी । कुछ सीनियर और अनुभवी छात्रों की सलाह पर हम लोग अंतर्वस्त्र,टावेल आदि साथ लेकर गए थे ৷ हालाँकि नदी में पानी कम और रेत अधिक थी इसलिए डुबकी लगाने के आनंद से हम लोग वंचित रहे ৷ मुझे याद है मेरे मित्र नरेश मदान की सैंडल उस रेत में फँस गई थी जिसे बहुत मुश्किल से हम लोगों ने निकाला ।
नहा धोकर फिर हम लोग आगे बढ़े और एक संतरे के बाग में पहुँचे । उसके निकट ही अमरुद का एक बाग़ भी था ৷ हम लोगों ने ईमानदारी से इन बागों से संतरे और अमरुद खरीदे । यद्यपि खरीदना सिर्फ नाम के लिए था, खरीदकर खाने से ज़्यादा आनंद चुराकर खाने में आया ৷ हालाँकि यह चोरी छुपी नहीं रही, बहरहाल संतरे और जाम इतने मीठे थे कि चौकीदार की गालियाँ भी हमें मीठी लगीं ।
इस पिकनिक का सबसे ज़ोरदार आइटम था लड़कियों द्वारा सूजी का हलुआ बनाना ৷ हम लोग अपने साथ हलुआ बनाने का सामान भी ले गये थे । भोजन की अन्य सामग्री विनोद के पिताजी के सौजन्य से आई थी ৷ सबसे पहले हम लोगों ने एक पेड़ के नीचे ईटों का एक चूल्हा बनाया । फिर लकड़ियाँ इकठ्ठी की और आग जलाई ৷ आगे कढ़ाई चढ़ाने से लेकर हलुआ बनाने तक का काम लड़कियों के ज़िम्मे था सो लड़के निश्चिन्त होकर खेलते रहे ।
थोड़ी देर में आवाज़ आई, ‘हलुआ तैयार है’ । पेट तो वैसे ही सबके भरे हुए थे फिर भी सभी ने बहुत चटखारे लेकर हलुआ खाया । हालाँकि उसमे पानी की मात्रा अधिक हो जाने के कारण हलुआ थोड़ा सा पतला हो गया था । कुछ लड़कों ने मज़ाक में कहा कि अगर पतंग बनाने के ताव ( कागज़ ) ले आते तो इससे पतंग भी बना लेते । उसके बाद मनोरंजन कार्यक्रम शुरू हुआ । वैसे भी खाने के बाद गाना होना ही था ৷ किसीने गीत गाया, किसीने चुटकुला सुनाया ।
अर्चना ने अपने तैयार किये हुए दोनों गीत सुनाये । मैं तो शास्त्रीय संगीत वाला गायक था लेकिन मैंने उन दिनों चर्चित एक गीत सुनाया ..”सुन ले बापू ये पैगाम मेरी चिठ्ठी तेरे नाम , चिठ्ठी में सबसे पहले लिखा तुझको राम राम ৷” इस गीत की यह पंक्तियाँ मुझे अब भी याद हैं .. “तेरी लकड़ी ठगों ने ठग ली तेरी बकरी ले गए चोर, साबरमती सिसकती तेरी तड़प रहा है सेवाग्राम ৷” मुझे क्या पता था कि अगले अनेक वर्षों तक इस परिदृश्य में कोई परिवर्तन नहीं होने वाला है ৷
खैर, नहाना-धोना, घूमना-फिरना, खाना-पीना,गाना - बजाना ख़त्म हुआ ৷ पिकनिक को परिभाषित करने वाले सभी कार्य संपन्न हुए ৷ ठण्ड के दिन थे इसलिए जल्द ही घर लौटना था ৷ जैसे गंजे का माथा कहाँ तक होता है पता नहीं चलता वैसे ही ठण्ड के दिनों में सुबह दोपहर के बीच कहाँ तक चली जाती है समझ में नहीं आता ৷ इधर शाम बिना ओवरटाइम किये जल्द ही घर लौट जाना चाहती है ৷ हम लोगों को अँधेरा होने से पहले घर पहुंचना था इसलिए दोपहर की साँस टूटने से पहले ही हम लोग ईट भठ्ठे पर लौट आये । विनोद के पिताजी ने हम लोगों के लिये चाय बिस्कुट की व्यवस्था कर रखी थी ৷ अब हमें पैदल नहीं लौटना था, वापसी की यात्रा के लिए उन्होंने एक ट्रक की व्यवस्था भी कर दी थी । ट्रक के डाले में बैठकर हम लोग स्कूल के सामने तक आये और फिर वहाँ से सब बच्चे शाम ढलने से पूर्व ही अपने अपने घरों को लौट गए ।
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