10 जून 2026

92 .बुद्धि के देवता गणेश और शक्ति की देवी दुर्गा



शिकार संग्रहण, पशुपालन और कृषि की अवस्था से होते हुए हम होमोसेपियंस आज की स्थिति तक पहुंचे हैं ৷ मनुष्य के जीवन में पेट भरने के बाद दिमाग़ की भूख का इंतज़ाम करने की स्थिति आती है और इनके समाधान के लिए उसके जीवन में मनोरंजन, युद्ध, धर्म आदि प्रवेश करते हैं ৷ सूक्ष्मता से देखा जाए तो हर सिलसिला मनुष्य की भूख तक ही पहुँचता है ৷ भोजन की तलाश में मनुष्य जंगलों और गुफाओं से निकलता है और  मैदानों में बस जाता है ৷  धीरे धीरे कबीले गाँवों में बदलते हैं और गाँव शहरों में ৷ फिर शहर वर्गों में बंट  जाते हैं ৷ कुछ मनुष्य अमीर हो जाते हैं और कुछ ग़रीब ही रह जाते है ৷


हमारे शहर भंडारा की यह गली भी एक तरह से गरीबों की ही बस्ती थी ৷ इस  गली में निम्न और निम्न मध्यवर्गीयों की बहुलता थी । मुख्य सड़क पर अधिकतर नौकरीपेशा लोग रहते थे ৷ यह सभी लोग साधारण मनुष्यों की तरह अपने दुखों का निवारण ईश्वर की आराधना  में ढूँढते थे इसलिये घरों के अलावा सामूहिक रूप से भी मोहल्ले में साल भर तरह तरह के धार्मिक आयोजन हुआ करते थे । इन सब आयोजनों में दुर्गा और गणेश उत्सव के आयोजन प्रमुख होते थे ৷ वर्षा ऋतु  की समाप्ति के पश्चात कृषक अपने कृषि कार्यों से निवृत हो जाते वहीं मौसम में भी तब्दीली आ जाती और सुहावनी शरद ऋतु का आगमन हो जाता ৷ यही समय ऐसे उत्सवों हेतु अनुकूल होता था ৷


महाराष्ट्र में गणेशोत्सव की एक समृद्ध परंपरा है जिसकी शुरुआत लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने अंग्रेज़ों के खिलाफ़ आम जनता को लामबंद करने हेतु की थी ৷ वे जनता को पूजा पाठ के बहाने एक स्थान पर एकत्रित करते और उनके कानों में आज़ादी का मन्त्र फूंकते ৷ अंग्रेज़ सरकार धार्मिक कार्य समझकर इसमें कोई दख़ल नहीं देती थी ৷ धीरे धीरे गणेश उत्सव के यह आयोजन पूरे महाराष्ट्र में होने लगे ৷ स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भी महाराष्ट्र में यह आयोजन चलते रहे ৷ यद्यपि बाद में इसका उद्देश्य पूजा पाठ और मनोरंजन तक सीमित रह गया ৷


जैसे जैसे प्रजा संपन्न होती गई और लोगों के पास पैसा आने लगा यह उत्सव और अधिक धूम धाम से मनाया जाने लगा ৷ पूजा और उत्सव प्रायोजित भी होने लगे ৷ भक्ति में धनाढ्यों के धन और उसके प्रदर्शन का यह समावेश अनायास और निरुद्देश्य नहीं था ৷ लेकिन जनता को इन बातों से कोई मतलब नहीं था ৷ उसके लिए यह उत्सव ही था और आज भी है ৷ बाद में उत्सव के अंतर्गत प्रतिमा स्थल को सजाने की भी होड़ लगने लगी, साथ ही दस दिनों तक विभिन्न मनोरंजन कार्यक्रम आयोजित करने का भी सिलसिला प्रारंभ हुआ ৷ तिलक द्वारा शुरू किये गए बुद्धिजीवियों के व्याख्यानों और बौद्धिक कार्यक्रमों के स्थान पर ऑर्केस्ट्रा, फ़िल्मी नृत्य, यानी रेकॉर्डिंग डांस,नक्कल,जादू के प्रयोग जैसे मनोरंजन के कार्यक्रम होने लगे ৷ यद्यपि ग्रामीण क्षेत्रों में खड़ा तमाशा,लावणी,पोवाड़ा जैसी लोक कलाओं का बोलबाला रहा ৷


उत्सव के अंतर्गत स्थल सजावट की प्रतियोगिता भी प्रारंभ हुई और जिस तरह गणतंत्र दिवस पर दिल्ली में राजपथ पर राष्ट्रीय महत्व के विषयों और राज्यों की उपलब्धियों पर झाँकियाँ दिखाई जाती हैं उसी तरह गणेशोत्सव में पौराणिक दृश्यों पर झाँकियाँ सजाई जाने लगीं ৷ विदर्भ में  उन दिनों गणेशोत्सव के अंतर्गत झाँकियों के लिये चालिसगाँव नाम की एक मशहूर जगह थी । भंडारा से लगभग तीस किलोमीटर दूर तुमसर के करीब स्थित चालिसगाँव गणेशोत्सव की अपनी झांकियों के लिये प्रसिद्ध था । यहाँ हरिश्चंद्र के पुत्र की मृत्यु, शिवजी का विवाह, सीताजी का अग्निप्रवेश, राजा शिवी का बाज को दिया गया अंग दान,जैसे अनेक पौराणिक दृश्यों को बिजली की मोटर से चलने वाले पुतलों के अंग संचालन द्वारा साकार किया जाता था ।

 

मुझे याद है उन्हीं दिनों हमारे देशबंधु वार्ड में  दुर्गा उत्सव मनाना प्रारम्भ किया गया । इसकी शुरुआत बच्चों ने की थी इसलिये इसका नाम बालपुरी नवदुर्गा उसव रखा गया । बाद में इस समिति में कई बड़े लोग भी शामिल हो गये । बाबूजी चूँकि मोहल्ले के एक वरिष्ठ और पढ़े लिखे व्यक्ति थे उन्हें भी समिति में रखा गया था । उत्सव हेतु चंदा जमा करने का कार्य काफी दिनों पूर्व ही प्रारंभ हो जाता था ৷ एक रसीद बुक बाबूजी को भी थमाई जाती ৷ मैं वह रसीद बुक लेकर  बाबूजी के कॉलेज के हॉस्टेल जाता था और चन्दा जमाकर ले आता था । 


यह गरीबों की बस्ती थी इसलिए अधिक चंदा जमा नहीं होता ৷ इसलिए ऑर्केस्ट्रा जैसे महंगे कार्यक्रम नहीं करवा सकते थे ৷अतः  दुर्गा उत्सव के इन  दस दिनों के आयोजन में अधिकतर भजन आदि के कार्यक्रम ही हुआ करते थे । अंतिम दिन बच्चों के सांस्कृतिक कार्यक्रम होते थे जिसमें मैं भी भाग लेता था । बच्चों को इनाम में पेन,स्केल,कम्पस बॉक्स,चाकलेट,जैसी वस्तुएँ मिलती थीं सार्वजनिक उत्सव के अलावा गणेश पक्ष में घर में गणपति और जन्माष्टमी पर घर में ‘कान्होबा’ रखने का चलन भी था ৷ सत्यनारायण की कथा तो आये दिन हर घर में होती ही रहती थी ৷


कुछ वर्षों बाद हमारे मोहल्ले की सार्वजनिक दुर्गा उत्सव की इस परम्परा में गणेशोत्सव और शारदोत्सव के आयोजन भी जुड़ गये । मोहल्ले के इन कार्यक्रमों में मैं पूरे उत्साह से भाग लेता था और उतने दिनों तक पढ़ाई ठप्प रहती थी । शहर में विभिन्न स्थानों पर गणेश और दुर्गा उत्सव के आयोजन होते थे ৷ रात्रि भोजन के उपरांत  मैं मोहल्ले के अपने मित्रों गुड्डू वानखेड़े,सुशील माहुले आदि के साथ शहर में निकल जाता था, जहाँ भी कोई अच्छा कार्यक्रम देखने को मिलता हम लोग देखते और फिर देर रात घर लौटकर चुपचाप सो जाते ।  इस तरह के आयोजनों में मेले जैसा माहौल होता था, चाट पकौड़ी की दुकानें लगती थीं , बच्चों के लिये तरह तरह के खिलौने मिलते थे इसलिए इन दिनों पूरे शहर के आकर्षण का केंद्र यही आयोजन होते थे और यहाँ शहर के ही नहीं आसपास के गाँवों से भी ग्रामीण जन,महिलाएँ बच्चे  पैदल चलकर शहर आते थे । 



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