आरती के बाद हाथ जोड़कर खड़े होकर मन ही मन भगवान से कुछ माँगने की परम्परा हमारे यहाँ भी थी ৷ अन्य लोगों का तो मुझे पता नहीं लेकिन मैं भगवान से कहता ..” हे प्रभु, इस साल भी मुझे क्लास में पहला नम्बर दिलाना ।“ विद्या,बुद्धि प्रदान करना,धन धान्य से संपन्न करना जैसी व्यावसायिक शब्दावली मुझे उस समय भी नहीं आती थी ৷ मेरी प्रार्थना चौथी क्लास तक तो स्वीकार हुई अर्थात क्लास में मेरा पहला नंबर आया लेकिन पांचवीं में घनश्याम बाजी मार गया ৷
मैंने घनश्याम से पूछा “ तुम भी रोज भगवान से पहला नंबर मांगते हो क्या ?” वह हँसने लगा .. “ यह सब फालतू बात है ৷ “ मुझे पता था, वह उस साल क्लास टीचर सर के यहाँ ट्यूशन के लिए गया था और उसका पहला नंबर इसी वज़ह से आया था ৷ मेरा भ्रम उसी दिन टूट गया और मैं समझ गया कि पहला नम्बर शंकर जी नहीं दिलाते हैं बल्कि उसके लिये खुद ही मेहनत करनी होती है । उसके बाद दसवीं तक क्लास तक मैंने जमकर पढ़ाई की और हर साल मेरी पहली रैंक ही आती रही ৷ अपनी सफलताओं और असफलताओं के लिए भगवान को क्रेडिट देने या दोषी ठहराने जैसी बात मेरे दिमाग से बचपन में ही साफ़ हो चुकी थी ৷
आरती के बाद माँ बाबूजी के चरण स्पर्श की परम्परा भी हमारे यहाँ थी । बाबूजी हम बच्चों को आशीर्वाद देते “खुश रहो, प्रसन्न रहों, स्वस्थ्य रहो, खूब नाम कमाओ ৷ “यह सुनकर मुझे बहुत अच्छा लगता था । माँ के चरण स्पर्श करने पर माँ कभी कुछ नहीं कहती थी ৷ हम लोग उनसे कहते “माँ, तुम भी तो कभी कुछ कहा करो ।“ उत्तर में वे कुछ नहीं कहतीं और ‘उंउं..’ कहकर मुस्कुरा देतीं । यह तो बड़े होने के बाद समझ में आया कि जब वे प्रभु के सामने हाथ जोड़कर खड़ी होती थीं तब भी वे हम बच्चों की सलामती के लिए ही प्रार्थना करती थीं ৷ धीरे धीरे यह भी जाना कि दुनिया की हर माँ ऐसी ही होती है ৷ वह अपने लिए कभी कुछ नहीं मांगती और बच्चों के लिए भी उसका आशीष कभी शब्दों का मोहताज़ नहीं होता ৷
धूप,अगरबत्ती, कपूर की गंध में डूबी ऐसी सैकड़ों शामें हवा में उड़ गईं ৷ हर शाम आरती में खड़े होने का यह सिलसिला तब तक चलता रहा जब तक मैं भंडारा से बाहर पढ़ने के लिये नहीं चला गया । बाद में सीमा ,बबलू भी अपने काम में व्यस्त हो गए ৷ माँ भी आरती के समय अपने काम में व्यस्त रहने लगी सो बाबूजी अकेले ही आरती करने लगे । उनका यह क्रम उनकी मृत्यु पर्यंत जारी रहा । यहाँ तक कि उन्होंने मेरे और लता दोनों का सहारा लेकर अपने अंतिम दिन तक खड़े होकर आरती की ৷
आज मैं श्रद्धा, ईश्वर में आस्था, पाप पुण्य, स्वर्ग-नर्क , मोक्ष जैसे शब्दों का वास्तविक अर्थ और इन्हें गढ़ने वालों के निहित उद्देश्य भलीभांति समझने लगा हूँ, मान्यताओं और संस्कारों को लेकर तर्क करने लगा हूँ लेकिन उन दिनों यह सब सहज भाव से ग्रहण करता था ৷ एक बार बैतूल में एक बीर बहूटी मेरे पाँव से दबकर मर गई थी । मैं इस बात से बहुत डर गया था इसलिये कि साथ के बच्चों द्वारा मुझे ऐसा बताया गया कि किसी भी प्राणि की हत्या से पाप लगता है ।
मैं पाप का अर्थ नहीं जानता था लेकिन भंडारा लौटने पर प्रतिदिन आरती के समय इस ‘पाप’ से मुक्ति के लिये भगवान से प्रार्थना करता था ৷ एक दिन बाबूजी से मैंने पूछा “बाबूजी पाप क्या होता है ?” बाबूजी ने कहा “किसी निरपराध, निर्दोष पर दोष मढ़ना, किसी मज़लूम को तकलीफ़ देना, चोरी करना, झूठ बोलना जैसे बुरे काम करना पाप होता है ৷” मैंने उनसे बीर बहूटी वाली बात बताई तो उन्होंने कहा “ वह हत्या तुमसे अनजाने में हुई, उसका पाप नहीं लगेगा ৷ लेकिन जानबूझकर ऐसा कभी मत करना ৷“। मैंने फिर बाबूजी से पूछा “वह मटन बेचने वाला दयाराम कसाई तो रोज़ ही बकरे काटता है, उसे पाप नहीं लगता होगा?” बाबूजी ने कहा “ वह जानबूझकर ऐसा नहीं करता , यह तो उसकी आजीविका है ৷ “
कुछ साल बाद ही बाबूजी ने कवि वरवर राव की एक कविता The Butcher का ‘कसाई’ शीर्षक से अंग्रेज़ी से हिन्दी में अनुवाद किया ৷ इस कविता में निज़ामाबाद की उस पुलिस का जिक्र है जिसने एक नौजवान को नृशंसता से पीट पीट कर मार डाला था ৷ कविता की कुछ पंक्तियाँ मुझे याद आ रही हैं ....
रोज़ रोज़, हर रोज़ मैं इन्हीं हाथों से
प्राणियों को हलाल करता हूँ
खून ने कभी भी
मेरे मन को स्पर्श नहीं किया
पर उस दिन रक्त केवल रास्ते पर ही नहीं फैला
वह तो मेरे मन पर बिखर गया
क्या तुम उसे धो सकोगे ?
तुममें से कौन इंसानियत का हाथ बढ़ाएगा ?
और मेरे मन का बोझ हल्का करेगा
उस दर्दनाक नज़ारे की भयानकता से
आज उन्मादी भीड़ द्वारा जब किसी निर्दोष व्यक्ति को पीट पीट कर मार डालने की ख़बरें सुनता हूँ तो मुझे बाबूजी द्वारा अनुवाद की गई वरवर राव की इस कविता के भीतर का यह दृश्य और पाप की परिभाषा के सन्दर्भ में कही गई उनकी बातें याद आती हैं ৷
बाबूजी एक धर्म परायण व्यक्ति थे लेकिन वे हर बात को धर्म से नहीं जोड़ते थे ৷ वे मेरे प्रश्नों का तर्क संगत समाधान प्रस्तुत करते हुए उनका उत्तर देते ৷ बाबूजी धार्मिक कर्मकांड और आडम्बरों के भी खिलाफ थे इसलिए भंडारा के उस घर में इस आरती और बाबूजी द्वारा प्रतिदिन किये जाने वाले रामचरित मानस पाठ के अलावा कोई धार्मिक आयोजन कभी नहीं हुआ ৷ यद्यपि मोहल्ले के अन्य घरों में विशेष अवसरों पर सत्यनारायण की कथा हुआ करती थी जिनमे वे पड़ोसी धर्म का निर्वाह करने के लिए शामिल होते थे । मुझे सत्यनारायण भगवान से कुछ लेना देना नहीं था लेकिन प्रसाद की लालच में मैं अवश्य जाता था ৷
प्रतिदिन होने वाली आरती के बाद हम बच्चे पढ़ने बैठ जाते थे, फिर चौके में चूल्हे के पास बैठकर माँ के हाथों बने सुस्वादु भोजन का आनंद और फिर नींद ৷ उन दिनों मेरी ज़्यादा देर तक जागने की आदत नहीं थी । साढ़े आठ बजे के लगभग भोजन हो जाता था फिर सवा नौ बजे विविध भारती से आने वाला रेडियो नाटक ‘ हवामहल ‘ सुनकर मैं साढ़े नौ बजे सोने चला जाता था ।
रेडियो नाटक में ध्वनियाँ उनके उतार चढ़ाव , संवाद अदायगी आदि सुनते हुए मैं अक्सर उस दृश्य की कल्पना किया करता था । इमेज करने की क्षमता मुझमें यहीं से उत्पन्न हुई । मैं हर दृश्य को बहुत गहराई से सोचता था, स्थान व पात्रों की कल्पना किया करता था । उन दिनों ज़िन्दगी बहुत मज़े से गुज़र रही थी, लेकिन कभी कभी भविष्य को लेकर असुरक्षा की भावना पैदा हो जाती थी । कई बार यह मुझमें निराशा को जन्म देती थी और मैं दिवास्वप्नों में खो जाता था ৷ ऐसे समय मैं कामना करता काश कोई दैविक शक्ति मुझे प्राप्त हो जाए । यद्यपि बाद में मुझे पता चल गया कि दैविक शक्ति चमत्कारी शक्ति नाम की कोई चीज़ नहीं होती बल्कि जो कुछ होता है वह मनुष्य के मस्तिष्क द्वारा ही निर्मित होता है चाहे वह सत्य हो या भ्रम ৷

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