स्कूल शुरू होने के दिन बहुत रोमांच से भरे होते हैं, नई कक्षा, नए शिक्षक, नई ड्रेस, नया बस्ता, नई किताबें, और नई कापियाँ ৷ इस नयेपन की अजनबीयत में राहत की बात यह थी कि दोस्त पुराने ही होते थे ৷ उन दिनों अलार्म लगाने का चलन नहीं था फिर भी दिनचर्या बन्धी हुई होती थी । सुबह जल्दी जागना, फिर पढ़ाई, दोपहर में स्कूल ,शाम पाँच बजे स्कूल से आने के बाद थोड़ा सा नाश्ता, चाय, फिर लायब्रेरी या मोहल्ले के दोस्तों के साथ खेलकूद ।
वे सुरक्षा की उष्णता और वात्सल्य की नमीं से भीगे हुए दिन थे ৷ बरसात की उन शामों में बरसात भी हमें घर में रहने के लिए विवश नहीं कर सकती थी ৷ शाम को खेल के मैदान में जब झींगुरों के आगमन का समय हो जाता मैं अपने कपड़ों में नम घास और गीले पत्तों की गंध लिए घर लौट आता ৷ शाम अन्धेरा घिरने से पहले घर वापस लौटने का एक अलिखित नियम था जिसे तोड़ने पर बाबूजी से डांट खाना तय था ।
घर आकर हाथ-मुँह धोकर सीधे पढ़ने बैठना होता था । लेकिन उससे पहले होने वाली शाम की आरती में उपस्थित रहना अनिवार्य था । वैसे भी मुझे आरती गाने में बहुत आनन्द आता था । मेरी आवाज़ अच्छी थी और मैं गायन का विद्यार्थी रह चुका था इसलिये इस बहाने गाने का अभ्यास भी हो जाया करता था । अगरबत्ती की सुगन्ध और जलते हुए दीपक का प्रकाश मेरे लिए किसी स्वप्न दृश्य की तरह होते थे ৷ मूलगाँवकर के बनाये शिवजी के चित्र में नीले रंग के शिवजी मुझे दुनिया के सबसे सुन्दर मनुष्य के रूप में दिखाई देते ৷ आरती के बाद ईश्वर से कक्षा में प्रथम आने के लिए गुहार करना फिर माता पिता के चरण स्पर्श करना मुझे जीवन में एक सुख देने वाला कार्य लगता था ৷
उन दिनों ओम जय जगदीश हरे यह आरती बहुत प्रचलित थी ৷बाबूजी ने बताया था कि इस आरती की रचना हिन्दी के कवि श्रद्धाराम फ़िल्लौरी ने की है ৷ मेरी परेशानी यह थी कि जिस तरह ‘यह कदम का पेड़’, और ‘खूब लड़ी मर्दानी’ जैसी कविताएँ मुझे कंठस्थ थीं ‘ओम जय जगदीश हरे’ से आगे की पंक्तियाँ मुझे याद ही नहीं होती थीं ৷ एक दिन बैठे बैठे मैंने दिमाग़ लगाया और आरती के विभिन्न पद याद करने का एक तरीका ढूँढ निकाला ৷ इस तरीके में मैंने आरती के प्रत्येक पद को सप्ताह के एक एक दिन से जोड़ दिया जैसे सोम ,मंगल , बुध , गुरु आदि । जैसे ही वह पद आता मैं उसे उसके की वर्ड से जोड़ देता ৷
जैसे सोमवार से पहला पद याद करता
जो (सो) ध्यावे फल पावे, दुःख विनसे मन का
स्वामी दुख विनसे मन का
सुख सम्पति घर आवे
कष्ट मिटे तन का
ॐ जय जगदीश हरे
उसी तरह मंगलवार से मात (मंत) पिता तुम मेरे
शरण गहूं किसकी
बुधवार का की वर्ड था ‘बुम’ तुम (बुम) पूरण, परमात्मा
तुम अंतरियामी
स्वामी तुम अंतरियामी ( जी हाँ अन्तर्यामी को हम ऐसे ही गाते थे )
गुरुवार तो करुणा से गुरुणा हो जाता, तुम करुणा (गुरुणा ) के सागर तुम पालनकर्ता स्वामी तुम पालन करता ৷
शुक्रवार को तुम हो एक अगोचर इसमें अगोचर की जगह शुगोचार हो जाता और शनिवार को दीन बन्धु दुःख हर्ता को मैं याद करता शीन बन्धु दुःख हर्ता
और अंतिम पद रविवार से याद किया जाता - विषय विकार ( रविवार) मिटाओ पाप हरो देवा

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