10 जून 2026

87 . अँधेरा होने से पहले घर लौटना ज़रूरी है




आप ने कभी शाम को  अस्त होते हुए सूरज  का चेहरा देखा है ? उस समय सूरज अक्सर दुखी रहता  है, लेकिन वह खुश भी होता है, काम से लौटते हुए मजदूरों और खेत से लौटते हुए किसानों को देखकर ৷सबसे ज़्यादा खुश होता है वह  खेल के मैदान से बच्चों को घर लौटता हुआ देखकर ৷ 


उन दिनों सारे ही बच्चे स्कूल से घर लौटते ही बस्ता पटककर,ड्रेस बदलकर सीधे खेल के मैदान पहुँच जाते थे ৷ ज़ाहिर है आज की तरह बच्चों को घर में रोकने के लिए टीवी या मोबाइल जैसे आकर्षण नहीं होते थे ना ही उनके माता –पिता “ पहले होमवर्क पूरा करो, फिर खेलने जाना” जैसे फरमान जारी करते थे ৷ खेल के मैदान पर सबसे पहले पहुँचने वाले बच्चे को जैसे दौड़ में प्रथम आने का अहसास होता था ৷ हम लोग भी उसी ज़माने के बच्चे थे ৷ हमारी टोली के सदस्य थे  मैं, शरद व प्रमोद भोयर, हमारे हमउम्र केशव  मामा , नरेश उर्फ़ गुल्लू और अनिल झाडे ৷ 


वैसे तो शरद भोयर के घर के पीछे का जोगी तलाव का मैदान हमारा परमानेंट प्ले ग्राउंड था लेकिन कभी कभी गलियों और दूर शुक्रवारी या, निर्माणाधीन सहकार नगर वाले एरिये तक उसका विस्तार हो जाता था ৷ 


एक दिन हमें पता चला कि घर के पास स्थित मराठी प्रायमरी स्कूल में शाम को एक शिक्षक आते हैं जो आसपास के बच्चों को एकत्रित कर वहाँ के प्रांगण में उन्हें तरह तरह के खेल खिलवाते हैं ৷  एक दिन मैं भी अपनी टोली के साथ जिज्ञासावश  वहाँ पहुँच गया । सचमुच एक शिक्षक वहाँ उपस्थित थे जो खाकी हाफ पैंट और सफ़ेद शर्ट पहने हुए थे तथा उनके सर पर एक काली टोपी थी ৷ अनेक बच्चे भी वहाँ दिखाई दिए लेकिन वे हमारे मोहल्ले के बच्चे नहीं थे ৷ उन्होंने कई तरह के खेल हमें खिलाये लेकिन वे भी हमारे रोज़मर्रा के खेल नहीं थे ৷ खेल समाप्त होने के पश्चात अन्धेरा घिरने से पहले सब लोग एक जगह एक भगवे ध्वज के सामने खड़े हो गए और “नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे ..” यह प्रार्थना गाने लगे ৷ फिर सब लोग अपने घर चले गए  । मुझे यह सब कुछ बहुत अच्छा लगा ৷


घर लौटकर मैंने माँ से कहा “ माँ, वहाँ एक सर हैं जो बहुत अच्छे अच्छे खेल खिलवाते हैं, बहुत मज़ा आता है ৷” फिर तो यह हम लोगों का नित्य का क्रम हो गया ৷ एक दिन वहाँ से लौटने के पश्चात बाबूजी ने मुझे बुलाया और कहा “यह अच्छी बात है कि वहाँ खेलना तुम्हे अच्छा लगता है, लेकिन तुम्हे वहाँ नहीं जाना चाहिये । “ हमेशा की तरह मैंने पूछा “क्यों ?“ तो उन्होंने जवाब दिया कि वे एक सरकारी कर्मचारी हैं और सरकार द्वारा इस संगठन को मान्यता नहीं दी गई है । मुझे संगठन, मान्यता, जैसे भारी भरकम शब्द समझ में नहीं आये लेकिन प्रत्युत्तर में कुछ तो मुझे कहना ही था सो मैंने कहा “ लेकिन वहाँ तो अच्छे अच्छे खेल खिलाते हैं ? “ बाबूजी ने इससे आगे कुछ नहीं कहा । 


संयोगवश अगले ही दिन स्कूल में तिमाही परीक्षा का टाइम टेबल आ गया और  शाम को वहाँ जाना अपने आप बन्द हो गया । बाद में ज्ञात हुआ कि शरद और प्रमोद के यहाँ भी पिता पुत्र वाले इस नाटक का यह अंक घटित हुआ था ৷ वहाँ जाना तो बंद हो गया लेकिन अपनी टोली में, अपनी मर्ज़ी से,अपने जाने पहचाने खेल  खेलना तो जारी रहा ৷ 



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