10 जून 2026

86 कविता में अर्थ तक पहुँचने के लिए कोई शॉर्टकट नहीं होता




“ज़िंदगी की राहों में रंजो ग़म के मेले हैं, भीड़ है क़यामत की और हम अकेले हैं ৷” कव्वाली की उस रात को ‘हैरा’ साहब की आवाज़ में सुना ग़ज़ल का यह मिसरा आज भी मेरे जेहन में गूंजता रहता है ৷  हम लाख इंकार करें लेकिन हम जैसे लोग भीड़ में भी कभी कभी अपने आप को अकेला महसूस करते हैं  ৷ 


घर से स्कूल जाने वाले पर रास्ते पर आप लोगों को अपने साथ ले चलते हुए मैं उस अतीत के भविष्य में ज़िंदगी की राह पर भी आगे बढ़ गया था और गुर्जर चौक से दायें बाएँ जाने वाले दो रास्तों और उनके किनारे के मकानों का ज़िक्र रह ही गया था ৷ दरअसल इन दो रास्तों पर मेरा जाना बहुत कम हुआ इसलिए कि यह दोनों रास्ते जहाँ पहुंचाते हैं वहाँ तक पहुँचने के लिए मेरे घर से अपेक्षाकृत कम दूरी के रास्ते भी हैं ৷ 


ऐसा ज़िंदगी में हमेशा होता है कि जब हमारे पास मंजिल तक पहुँचने के शार्टकट  रास्ते उपलब्ध हों तो हम लम्बे रास्तों से जाना पसंद नहीं करते ৷ हालाँकि कभी कभी शॉर्टकट रास्तों से जाने में नुकसान भी बहुत होता है ৷ कई बार कविता के अर्थ तक पहुँचने के लिए भी हम इसी तरह शॉर्टकट रास्तों से आगे बढ़ते हैं लेकिन पहुँच नहीं पाते ৷ किसीने पूछा था कभी कि आप लम्बी कविताएँ क्यों लिखते हैं ? मैंने जवाब दिया था कि मैं कविता के जिस संसार में आप लोगों को ले जाना चाहता हूँ वहाँ अपेक्षाकृत कम लम्बी कविता के माध्यम से नहीं पहुँचा जा सकता ৷  


गुर्जर चौक से एक रास्ता खाम तलाव की ओर जाता है और एक बाज़ार की ओर ৷ खामतालाव जाने वाले रास्ते पर दाहिनी ओर गुप्ते का बाड़ा है । बाड़ा यानी एक चारदीवारी के भीतर अनेक मकानों का समूह ৷ इस बाड़े में बाबूजी के बेला कॉलेज के सहकर्मी घटवई रहा करते थे और नीचे की ओर मनरो स्कूल के प्रिंसिपल बापट । बापट सर का बेटा शिरीष बालकमन्दिर में  मेरा बालसखा था । हम लोग एक बार घटवई काका के यहाँ गये थे और काकू ने हमें  बेसन से बना एक व्यंजन खिलाया था । उसके आकार की वज़ह से घर आकर हम लोगों ने उसका बहुत मज़ा लिया था ।  बाड़े के सामने की और बैस का मकान था , किशोर बीस वहाँ रहता था  । आगे यह रास्ता रिंग रोड से मिल जाता है जिसके आगे झाँसी की रानी की प्रतिमा  और शिवमंदिर है ৷


गुर्जर चौक से बाज़ार जाने वाले रास्ते पर व्यवहारे का दवाखाना है और उससे पहले खड़तकर का मकान । डॉक्टर व्यवहारे के दवाखाने के बाद एक गली आती है ৷ उसके बाद  वझलवार सर का मकान है जिनका बेटा मुकुन्द बालकमन्दिर में मेरे साथ था ।  इसी रोड पर आगे ‘शिंगणापुरकर की माड़ी’ है और ढगे सर का मकान भी । ‘शिंगणापुरकर की माड़ी’ यह वही मकान हैं जहाँ भंडारा आने के बाद बाबूजी को सबसे पहले ठिकाना मिला था ৷ मेरे जन्म के बाद मेरी पहली पहचान इसी मकान की दीवारों से हुई थी ৷  

     


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