10 जून 2026

83. भंडारा : मस्जिद के पास मंडराती बत्तखें

सप्ताह में एक बार किसी शाम मुझे गेहूँ पिसवाने के लिए फाये की आटा चक्की जाना पड़ता था ৷ साइकिल के कैरियर पर गेहूँ का पीपा रखकर पैदल पैदल मैं चक्की तक जाता और एक पटिये पर लाइन में रखे  डिब्बों के पीछे अपना पीपा रखकर,  चावल से भूसा निकालने की विशालकाय मशीन के लिए लगी लकड़ी के पटिये वाली सीढ़ी पर बैठकर अपनी बारी का इंतजार करता ৷

फाये की यह आटा चक्की एक बड़े से हाल में थी जहाँ पीली मरियल रौशनी वाला एक बल्ब टिमटिमाता रहता था ৷ वह मरियल सी उदास रौशनी और चक्की के कैनवास के पट्टों से आती ‘फट फटा फट फट, फट फटा फट फट’ की मोनोटोनिक आवाज़ शाम को गहरी उदासी से भर देती ৷ मैं टाइम पास करने के लिए उस ‘फट फटा फट’ की लय में कोई भी गीत फिट करके मन ही मन उसे गुनगुनाता रहता ৷

जैसे ही चक्की की खड़ खड़ की आवाज़ में किंचित परिवर्तन होता मैं समझ जाता एक जन का गेहूं पिस गया है ৷ फिर जब मेरा नंबर आता मैं सीढ़ी से उतरकर नीचे आ जाता और फिर अपना पीपा उठाने से पहले  उड़ते हुए आटे से सनी भौंहे और बालों वाले फाये को गिनकर पैसे दे देता ৷ भरी जवानी में इस तरह सफ़ेद भौंहों और सफ़ेद बालों वाले फाये को देखकर मेरी ऊब पूरी तरह समाप्त हो जाती ৷ लौटते हुए पीपे को बहुत संभालकर लाना होता था ৷कैरियर पर पीपा रखकर दाहिने हाथ से पीपा और बाएँ हाथ से साइकिल का हैंडल पकड़कर पैदल चलते हुए साइकिल घर तक लाना बहुत कठिन काम होता था ৷ फिर लौटते समय पीपा भी बहुत गर्म रहता था जिसे न पूरी तरह पकड़ सकते थे न पूरी तरह छोड़ सकते थे ৷

फाये आटा  चक्की की जगह अब फाये ज्वेलर्स है 

आटा चक्की के बाद पनके का मकान आता है ৷ उसके बाद एक बाड़ा था जहाँ खड़तकर रहा करते थे ৷ मिसेस खड़तकर बाबूजी को भाई मानती थीं और उनके यहाँ हमारा आना जाना था ৷ यहीं वह चौराहा  आता है जिससे सीधे जाएँ तो हमारा स्कूल आता है ৷ चौराहे से दाहिनी ओर का रास्ता खामतालाव  जाता है और बाईं ओर का रास्ता गांधी चौक ৷

लेकिन अभी तो यह नन्हे पाँव स्कूल की ओर बढ़ रहे हैं ৷ इस चौक पर पेट्रोल पम्प वाले गुर्जर का मकान है इसलिये यह चौक ‘गुर्जर चौक’ भी कहलाता है । गुर्जर के घर के सामने की ओर लकड़ी की जालियां लगी थी जिसके पीछे शायद उनका ड्राइंग रूम था ৷ मेरे नन्हे पाँव उनके घर के पिछवाड़े पारिजात  के एक पेड़ के नीचे अक्सर ठहर जाते थे ৷ वैसे तो यह पेड़ उनके घर के भीतर आंगन में था लेकिन उसकी डालियाँ बाहर सड़क तक आ गई थीं ৷ शनिवार की सुबह स्कूल जाते हुए नीचे बिछे हुए नारंगी डंडी वाले सफ़ेद फूलों को चुनने का मोह मैं कभी नहीं त्याग पाया ৷ 

बरसों बाद मैंने दुष्यंत का एक शेर पढ़ा था “ तूने ये हरसिंगार हिलाकर बुरा किया , पांवों की सब ज़मीन को फूलों से ढँक दिया “ आज भी जब मैं इस शेर को याद करता हूँ तो मुझे भंडारा के गुर्जर चौक पर गुर्जर  के मकान में लगे हरसिंगार के सड़क पर बिछे  हुए वे फूल याद आते हैं ৷ 

इस चौक के बाद अगला चौक बजरंग चौक है जहाँ पीपल का एक बड़ा सा पेड़ है और उसके नीचे गोल चबूतरा यह फुरसतिया लोगों का गप लड़ने का अड्डा है  । मेरे मन में चौपाल का बिम्ब इसी चबूतरे का बिम्ब है  ৷ बजरंग चौक से आगे बढ़ते ही दाहिनी ओर भँवरे सर का जाली वाला मकान मिलता था, भँवरे सर हमें हिन्दी पढ़ाते थे, साथ ही स्कूल में एन सी सी ऑफिसर भी थे ৷ उनकी बेटी का नाम रजनी था । 

यहीं था भवरे सर का मकान जाली वाला 

बजरंग चौक के बाद मुस्लिम बस्ती शुरू हो जाती है  ৷ जहाँ बाईं ओर एक मस्जिद है और दाहिनी ओर अन्य मकानों के साथ पतंग वाले अब्बास मियाँ का मकान । अब्बास मियाँ पहलवान भी थे और पतंगबाज़ भी ৷ वे पतंग और मांझा बेचने का धंधा भी किया करते ৷ चौखाने वाला तहमत पहने अब्बास मियाँ मस्जिद के सामने वाले बिजली के दो खम्भों के बीच धागा बांधते और रंगीन लुगदी लगाकर मांझा सूतते थे । मैं अक्सर उनके पास रुक कर उनका मांझा सूतना देखा करता ৷

उस मोहल्ले में रहने वाले मेरे सहपाठी  बताते थे कि अब्बास मियाँ पके हुए चावल में अरारोट और रंग के अलावा काँच का महीन चूरा भी मिलाते हैं और फिर उससे पतंग के धागे को सूतते हैं । उनका दावा था कि उनके बनाये हुए मांझे को किसी का भी बनाया हुआ मांझा नहीं काट सकता । मेरे पास मांझा खरीदने के लिए कभी पैसे नहीं रहे ৷ हालाँकि अब्बास मिया से प्रेरित होकर मैंने  भी एक बार मांझा सूतने की कोशिश की थी लेकिन लुगदी बनाने के लिए काँच पीसने की कोशिश में पहले ही काँच से हाथ कट गया था ।  

अब्बास मियाँ के मकान में हरी चादर से ढकी हुई मज़ार की तरह दिखाई देने वाली किसी पीर बाबा की गद्दी भी है ৷ फिर  एक कच्चा सा मकान है जिसमें एक बड़ा सा दालान है ৷ इस दालान की छत बांस की बल्लियों पर टिकी हुई है । इस मकान के आंगन में जहाँ अमरुद का एक पेड़ है  वहाँ अक्सर एक साइकिल रिक्शा खड़ा रहता है  ৷ इस मकान के सामने से गुजरते हुए मैं हमेशा उस रिक्शे को देखा करता ৷ मस्जिद की चारदीवारी ठीक इसी मकान के सामने से शुरू होती है ৷ मस्जिद के मुख्य द्वार के सामने एक  गली है जिसमें स्कूल का मेरा दोस्त अशरफ रहा करता था । 

इस गली के बाद दाहिनी ओर मेरे मित्र नईम का मकान आता है  । पहले नईम के यहाँ जाने के लिये पीछे की गली से जाना होता था,बाद में नईम के अब्बा ने सामने की ओर एक लकड़ी की टाल डाल दी थी सो हम लोग वहीं से आना जाना करने लगे । नईम का मकान पार करते ही एक दो मकानों और सड़क की ढलान के बाद ढोला प्रायमरी स्कूल आ जाता है  । इस स्कूल के सामने जो बड़ी सी पानी की टंकी है उसकी वज़ह से इसे ढोला स्कूल कहा जाता था । वैसे इसका नाम विवेकानंद प्राइमरी स्कूल  था ৷इससे आगे बढ़ने पर नगर परिषद गांधी विद्यालय आता है लेकिन वहाँ तो हम बाद में जायेंगे ৷ अभी तो यहाँ नालियों के आसपास घूमती और क्वैक क्वैक  करती बत्तखों से थोडा बतिया लेते हैं ৷ तिथि दानी की कविता ‘प्रार्थनारत बत्तखें ’ पढ़ते हुए मुझे भंडारा की उस मस्जिद के पास मंडराती यही बत्तखें याद आती हैं ৷ 


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