बचपन के वे दिन नन्हे नन्हे पाँवों के ज़मीन से पहचान के दिन थे ৷ स्कूल के सामने का बागीचा, सामने की मज़ार, जेल के पिछवाड़े के खजूर के पेड़, बाँस के झुरमुट, दुर्गा मंदिर के पीछे छतरियों के खँडहर, हाथीखाने के सामने बनी गलियां , चिचबन मैदान, खामतालाव के दूसरी ओर का जंगल, पारस मेटल वर्क्स तक रेल की पटरियों वाला रास्ता ৷ नन्हे पाँव धीरे धीरे इन सबसे परिचय प्राप्त कर रहे थे ৷ था । सुबह घर से निकलकर स्कूल तक का रास्ता तो मैं सीधे ही तय करता था लेकिन लौटते हुए मानो पाँव आज़ाद हो जाते थे और सीधे न लौटकर अलग अलग रास्तों से भटकते हुए मुझे घर ले आते थे ।
बचपन को मैंने इसी तरह रास्तों पर भटकते हुए ही जाना ৷ हमारी गली से निकल कर दाहिनी ओर जाने वाला रास्ता सीधे स्कूल जाता था । लगभग डेढ़ किलोमीटर के उस रास्ते में आने वाले प्रत्येक मकान और दुकान को मैं ध्यान से देखा करता और कोशिश करता कि उनके भीतर चल रही ज़िंदगी का जायज़ा ले सकूँ ।
कस्बाई रिहायश में मकान सड़क से ही शुरू हो जाते थे वे ऐसे मकान नहीं होते थे कि बाहर का दरवाज़ा बंद तो सबसे संपर्क समाप्त ৷ अधिकतर मकानों में आंगन थे और कोई बाउंड्रीवाल जैसी कोई चीज़ नहीं होती थी ৷ सुबह खुलने वाले घर के दरवाज़े रात के पहले बंद नहीं होते थे इसलिए मेरा यह ताका झाँकी का काम जिसे सभ्य शब्दों में ऑब्जरवेशन कहते हैं भलीभांति संपन्न हो जाता था ৷
आज आप लोगों के साथ, अपने उन्ही नन्हे कदमों से, फिर एक बार बचपन के उसी रास्ते पर चलने का मन कर रहा है जिन रास्तों ने मेरे वज़ूद जो एक पहचान दी ৷ सोच रहा हूँ इस रास्ते पर आने वाले घरों और उन घरों में रहने वाले लोगों से भी आपका परिचय करवाता चलूँ ৷
यह पहला घर भागवत जी का है जो हमारी गली से निकलकर मुख्य सड़क पर पहुँचते ही सबसे पहले दाहिनी ओर पड़ता है ৷ भागवत जी बच्चों पर बहुत चिल्लाया करते थे इसलिये बच्चों ने उनका नाम ‘ बोम्बल्या भागवत ’ रख दिया था । मराठी में बोम्बलने का अर्थ चिल्लाना होता है । भागवत जी बरसों यहाँ रहे बाद में उन्होंने यह मकान सम्पत्ति सम्बन्धी किसी विवाद के कारण खाली कर दिया था ।
चलिए अब हम सबसे पहले दाहिनी और रहने वालों से परिचय प्राप्त करते हैं ৷ भागवत के मकान के बाद एक बड़े से आंगन वाला मकान आता है जिसमें दादा हलमारे के रिश्तेदार रहते थे । वह एक कच्चा झोपड़ीनुमा मकान था और उसमे एक बड़ा सा आंगन था । उसके बाद हलमारे का मकान था । मकान मालिक हलमारे जी जिन्हे सब दादा कहते थे ,शिक्षा विभाग में अधिकारी थे । उनका ड्राइंग रूम सुसज्जित था और मुझे बहुत अच्छा लगता था । उनके घर के सामने बैठने के लिए पत्थर की दो बेंचें बनी थीं ৷
उसके बाद एक केश कर्तनालय था जिसके मालिक को हम भैया कहते थे ৷ उससे अगले मकान में बहुत सारी गायें हुआ करती थीं । फिर ‘लोक वाणी ‘ के संपादक पंडितराव का मकान और उसके बाद बेसिक ट्रेनिंग कॉलेज । फिर एक मन्दिर जिसे ‘नागठाना’ कहते थे ,उसके बाद भाट्या की किराने की दुकान जहाँ लगभग सभी वस्तुएँ मिल जाया करती थीं ।
उसके बाद पंडित लक्ष्मण प्रसाद शुक्ला का मकान जहाँ मैं तीज के अवसर पर सीदा पहुँचाने जाया करता था । ‘ सीदा’ अर्थात पंडित को पूजा के एवज में दिया जाने वाला रसोई का सामान । माँ किसी किसी त्यौहार पर मुझे एक सूप में रखकर चावल, गेहूँ का आटा ,दाल , शक्कर और आलू देती थी उसे मैं पहुंचा आता था । पहले साल जब मैं सूप में यह सब लेकर गया तो मुझे बहुत शर्म आई सो अगले साल से माँ ने यह सब सामग्री पुड़िया में बान्धकर थैले में देना शुरू कर दिया । पंडित लछमन प्रसाद शुक्ल बहुत साफ हिन्दी बोलते थे और बहुत रोचक तरीके से सत्यनारायण की कथा सुनाते थे । बाद में नीलू जीजी का विवाह भी उन्होंने ही करवाया था । उसके एक दो मकान बाद एक माड़ी वाला मकान था जहाँ हमारे ही स्कूल की एक लड़की रहती थी । वह मुझसे सीनियर थी और उसका नाम सन्ध्या था । उसकी एक छोटी बहन और एक भाई था , बस इतना मुझे याद है ।

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