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| बजरंग चौक भंडारा |
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| ढोला स्कूल के सामने की रोड पर मज़ार |
जेल के पिछवाड़े के खजूर के पेड़, बाँस के झुरमुट,
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| जेल के पीछे की सड़क |
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| चिचबन मैदान स्टेडियम |
| वह जो टीन का खुला हुआ दरवाज़ा है वही मेरा घर है |
हमारी गली से निकल कर दाहिनी ओर जाने वाला रास्ता सीधे स्कूल जाता था । चलिए वहीं मुड़ते हैं । पहली वाली तस्वीर पुरानी है उसमे जो टूटा फूटा घर दिख रहा हा वह डाकरे का बाड़ा का कॉर्नर है । अब नीचे का चित्र देखिए उस कॉर्नर वाली जगह एक रूम बना दिखता है हरी जाली लगी है जिस पर ।
| दाहिनी ओर गली और सामने का रास्ता |
वैसे आपको बता दूँ कि घर से स्कूल तक लगभग डेढ़ किलोमीटर के उस रास्ते में आने वाले प्रत्येक मकान और दुकान को मैं ध्यान से देखा करता और कोशिश करता कि उनके भीतर चल रही ज़िंदगी का जायज़ा ले सकूँ ।
कस्बाई रिहायश में मकान सड़क से ही शुरू हो जाते थे । वे ऐसे मकान नहीं होते थे कि बाहर का दरवाज़ा बंद तो सबसे संपर्क समाप्त ৷ अधिकतर मकानों में आंगन थे और कोई बाउंड्रीवाल जैसी कोई चीज़ नहीं होती थी ৷ सुबह खुलने वाले घर के दरवाज़े रात के पहले बंद नहीं होते थे इसलिए मेरा यह ताका झाँकी का काम जिसे सभ्य शब्दों में ऑब्जरवेशन कहते हैं भलीभांति संपन्न हो जाता था ৷
आज आप लोगों के साथ, अपने उन्ही नन्हे कदमों से, फिर एक बार बचपन के उसी रास्ते पर चलने का मन कर रहा है जिन रास्तों ने मेरे वज़ूद जो एक पहचान दी ৷ सोच रहा हूँ इस रास्ते पर आने वाले घरों और उन घरों में रहने वाले लोगों से भी आपका परिचय करवाता चलूँ ৷
तो चलिए आगे बढ़ते हैं
गली से बाहर निकलते हुए और मुख्य सड़क पर पहुंचते हुए जो दाहिनी ओर जो यह पहला घर आता है वह भागवत जी का है । भागवत जी मोटा स चश्मा लगाते थे , हमेशा सैंडो बनियान मे दिखते थे । वे बच्चों पर बहुत चिल्लाया करते थे इसलिये बच्चों ने उनका नाम ‘ बोम्बल्या भागवत ’ रख दिया था । मराठी में बोम्बलने का अर्थ चिल्लाना होता है । भागवत जी बरसों यहाँ रहे बाद में उन्होंने यह मकान सम्पत्ति सम्बन्धी किसी विवाद के कारण खाली कर दिया था । लेकिन अभी भी शायद इसमे कोई रहता नहीं है ।
| 2012 मे बोम्बल्या भागवत का घर |
| 2023 मे बोम्बल्या भागवत का घर |
चलिए अब हम सबसे पहले दाहिनी और रहने वालों से परिचय प्राप्त करते हैं ৷ भागवत के मकान के बाद एक बड़े से आंगन वाला मकान आता है जिसमें दादा हलमारे के रिश्तेदार रहते थे । वह एक कच्चा झोपड़ीनुमा मकान था और उसमे एक बड़ा सा आंगन था । उसके बाद हलमारे का मकान था । मकान मालिक हलमारे जी जिन्हे सब दादा कहते थे ,शिक्षा विभाग में अधिकारी थे । उनका ड्राइंग रूम सुसज्जित था और मुझे बहुत अच्छा लगता था । उनके घर के सामने बैठने के लिए पत्थर की दो बेंचें बनी थीं ৷ बाबूजी अक्सर हलमारे काका के यहाँ जाते थे और सीमेंट की इन बेंचों पर बैठकर गपियाया करते थे । अब तो इस घर मे कोई रहता नहीं , घर भी टूट फूट चुका है और यह बेंच भी अब वहाँ नहीं है अलबत्ता टीन का दरवाज़ा अवश्य वहाँ है , देखिए 2012 के बाद की 2023 की यह तस्वीर
| 2012 मे दादा हलमारे का घर |
| 2023 मे सीमेंट की बेंचें नहीं रहीं |
आगे बढ़ाने पर उसके बाद एक केश कर्तनालय मिलता है , मेरे बचपन के दिनों मे तो उसका कोई नाम नहीं था , बस नाई की दुकान कहते थे लेकिन अभी देखा मैंने वहाँ "विजय सेलून" ऐसा एक बोर्ड लगा है | 2012 मे जब मैं भंडारा गया था बचपन के मित्रों पड़ोसियों सेलून के मालिक भैया, अशोक तिवारी के साथ एक फ़ोटो खिंचवाया था।
| 2012 मे भैया अशोक तिवारी के साथ |
| 2023 मे विजय सेलून |
इसके बाद एक कच्चा मकान आता है दाहिनी ओर जिसमे गायें बंधी रहती थीं देखिए चित्र मे
| भैया का घर |
| भैया जी |
उसके बाद आगे बढ़ने पर दाहिनी ओर ‘लोक वाणी ‘ के संपादक पंडितराव का मकान आता था उसमे भी एक चारदीवारी मे टीन का दरवाज़ा था , फिर आँगन , बगीचा और उनका घर जिसके अहाते मे प्रिंटिंग मशीन रखी थी जिस पर साप्ताहिक अखबार लोकवाणी छपता था । अब इस मकान का रूप बदल गया है । यहाँ कोई स्मृति सभागृह है ।
| 2023 लोकवाणी |
पंडित राव के घर के बाद एक पतली सी गली थी जो आगे रवि रेहपाड़े के घर के पास निकलती थी । आगे बढ़ने पर दाहिनी ओर ही बेसिक ट्रेनिंग कॉलेज या डी एड कॉलेज आता था , जिसका बड़ा भारी शायद दस फुट का गेट था , उसमे एक छोटा दरवाज़ा भी था । अब यहाँ बेसिक प्राथमिक शाला है , चित्र मे देखिए ।
। फिर आगे बढ़ने पर एक मन्दिर नुमा इमारत आती थी जिसे ‘नागठाना’ कहते थे ,इसकी तस्वीर आप नीचे देख सकते हैं ।
| 2023 नागठाना |
नागठाना के बाद एक झोपड़ी थी आश्चर्य की बात यह कि हमारे बचपन में यह झोपड़ी जैसी थी वैसे ही आज भी है
यह देखिए 2023 की यह तस्वीर
उसके बाद आती थी भाट्या की किराने की दुकान जिसके जिक्र मे मैंने लिखा था कि जहाँ लगभग सभी वस्तुएँ मिल जाया करती थीं । यहाँ देखते हैं आजकल क्या है , चलो भाई गूगल अर्थ का स्ट्रीट व्यू देखते हैं ।
ओह यहाँ भी एक किराना दुकान थी जो अब कहीं और स्थानांतरित हो गई है । हालांकि इस की एक तस्वीर मेरे पास है उसके बाद उससे लगा हुआ पंडित लक्ष्मण प्रसाद शुक्ला का मकान था जहां अभी दरवाज़ा दिख रहा है वहीं गली के अंदर जो पीछे एक आँगन मे खुलती थी । जहाँ मैं तीज के अवसर पर सीदा पहुँचाने जाया करता था । ‘ सीदा’ अर्थात पंडित को पूजा के एवज में दिया जाने वाला रसोई का सामान । माँ किसी किसी त्यौहार पर मुझे एक सूप में रखकर चावल, गेहूँ का आटा ,दाल , शक्कर और आलू देती थी उसे मैं पहुंचा आता था । पहले साल जब मैं सूप में यह सब लेकर गया तो मुझे बहुत शर्म आई सो अगले साल से माँ ने यह सब सामग्री पुड़िया में बान्धकर थैले में देना शुरू कर दिया । पंडित लछमन प्रसाद शुक्ल बहुत साफ हिन्दी बोलते थे और बहुत रोचक तरीके से सत्यनारायण की कथा सुनाते थे । बाद में नीलू जीजी का विवाह भी उन्होंने ही करवाया था ।
उसके एक दो मकान बाद एक माड़ी वाला मकान था जहाँ हमारे ही स्कूल की एक लड़की रहती थी । वह मुझसे सीनियर थी और उसका नाम सन्ध्या था । उसकी एक छोटी बहन और एक भाई था , बस इतना मुझे याद है । वही मकान जहां अभी विवेक ट्रेडिंग कंपनी का बोर्ड लगा है ।
ठीक इनके सामने अजय पनके का घर है , अजय भाई 1976 मे बाबूजी के स्टूडेंट थे बी एड कॉलेज मे आजकल रिटायर होकर अपने घर के सामने इस तरह बैठे रहते हैं
इसके आगे बढ़ते जाते हैं गुर्जर चौक आता था यहाँ पर गुर्जर जी का मकान था जो कि एक पेट्रोल पंप के मालिक थे। उनके घर के भीतर हरसिंगार का एक पेड़ था मराठी मे जिसे पारिजात कहते हैं । स्कूल जाते हुए मैं देखता था कि उस पेड़ की एक डाल सड़क पर आ गई है वहाँ से गुजरते हुए रोज सुबह बहुत सारे फूल जमीन पर बिछे हुए मिलते थे । इसी टीन के दरवाजे के बाईं ओर था हरसिंगार ।
यहीं एक भैंसों का तबेला भी था जिसमे भैंसे बंधी रहती थीं आज यह उजाड़ पड़ा है
अब आगे बढ़ते हैं यहाँ चित्र मे जो इमारत दिखाई दे रही है वहाँ पर एक मकान था जिसमें बाद में शंगरपवार वकील आकर रहने लगे थे।उसके बाद आगे बढ़ने पर बिल्डिंग के बाद एक पुराना मकान दिखाई देता है यहाँ पर कभी राहांगडाले वकील रहा करते थे यह अब भी वैसा का वैसा ही हैइसके बाद बजरंग चौक जहाँ से लगभग चार रास्ते यह कहें कि गलियां अलग दिशाओं में जाती थीं । एक भारतीय संगीत विद्यालय या सूर्यवंशी टेलर वाले चौक में एक योगेश काले मामा के घर के सामने से होते हुए नानोटी के घर तरफ एक बीच से निकलकर फ़त्तू जी के घर की ओर इस वाली गली में हांडे सर रहते थे। इसके बाद मुस्लिम आबादी शुरू होती थी आगे मस्जिद और मांझावाले अब्बास भाई का मकान यहाँ पर किसी पीर की गद्दी भी थी देखते हैं पहले क्यास्थिति थी और आज क्या स्थिति है । यहाँ पर एक रिक्शेवाले का मकान भी था मुस्लिम रिक्शा वाला था जिसके घर के आँगन मे रिक्शा खड़ा रहता था
यह सड़क आज ऐसी दिखती है ।




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