आप में से शायद ही कोई ऐसा होगा जिसने बचपन में बरसात के दिनों में बहते हुए पानी में कागज़ की नाव न चलाई हो स्कूल शिक्षा को हमारे देश में तीन भागों में बाँटा गया है ,प्राइमरी,मिडिल और हाई स्कूल ৷ महाराष्ट्र में प्रायमरी स्कूल चौथी कक्षा तक ही होता है उसके बाद प्रारंभ होता है मिडिल स्कूल ৷ कुछ राज्यों में मिडिल स्कूल पाँचवी की बजाय छठी कक्षा से प्रारंभ होता है ৷ महाराष्ट्र में एक साल पहले मिडिल में जाने का लाभ यह होता है कि हिंदी माध्यम वालों की अंग्रेजी की शिक्षा एक साल पहले ही प्रारंभ हो जाती है ৷
तीन साल में चार कक्षाएँ पास कर लेने के बाद पाँचवी कक्षा से मैं ढोला स्कूल से निकलकर गांधी विद्यालय में आ गया था ৷ दो साल वहाँ बीत चुके थे ৷ सातवीं कक्षा से नया सत्र प्रारम्भ होने ही वाला था ৷ पहले ही दिन जब हम लोग स्कूल पहुँचे तो हमें फरमान सुनाया गया कि हमें फिर से ढोला स्कूल वाली इमारत में जाना है ৷ वैसे तो गाँधी विद्यालय की इमारत काफी बड़ी थी लेकिन शायद मराठी मीडियम की क्लासेस बढ़ जाने के कारण हाइस्कूल वाली इमारत में जगह की समस्या हो गई थी और हम लोगों को पुनः प्राथमिक शाला वाली इमारत में जाना था । यह दोनों इमारतें नगर निगम की ही थीं इसलिये वे अपनी इच्छानुसार ऐसा परिवर्तन कर सकते थे ।
इस इमारत में हमारा प्रवेश कुछ इस तरह से था जैसे एक बार किराये का कोई मकान खाली कर देने के बाद दुबारा उसी मकान में रहने जाना ৷वैसे भी हम लोग वहाँ अवांछित तत्व थे इसलिए हमें दूसरी मंज़िल पर एक जीर्ण शीर्ण कमरा मिला ৷ नीचे की मंजिल पर पहली से चौथी तक की कक्षाओं का अधिकार था ৷ खैर बेमन से ही सही पढ़ना तो वहीं था ৷
वह नये सत्र का पहला ही दिन था ৷ गुरूजी ने पढ़ाना प्रारम्भ ही किया था कि बादल गरजने लगे और ज़ोरदार बारिश शुरू हो गई ৷ हम कानों की क्षमता का पूरा उपयोग करते हुए गुरुजी की आवाज़ सुनने का प्रयास कर ही रहे थे कि अचानक छत टपकने लगी ৷ हम लोगों ने तुरंत आपदा प्रबंधन करते हुए अपने बस्ते उन डेस्कों पर जमाये जहाँ पानी नहीं टपक रहा था ৷ लेकिन न बारिश बंद हुई न छत से पानी का टपकना बंद हुआ ৷
जैसे ही कमरे की फर्श पर पानी भरना प्रारंभ हुआ कक्षा के सारे बच्चे भागकर नीचे आ गए । उस दिन तो हमें छुट्टी मिल गई लेकिन फिर ऐसा अक्सर होने लगा ৷ किसी दिन रात में तेज़ बारिश होती तो अगले दिन स्कूल पहुँचने पर कक्षा में चार चार इंच पानी भरा हुआ मिलता । उस समय मुझे कक्षा कप्तान नियुक्त किया गया था । मैंने बहुत कोशिश की कि हमें दूसरा कमरा मिल जाए लेकिन आश्वासन के सिवाय हमें कुछ नहीं मिला ।
बारिश से हम लोग शुरू शुरू में परेशान अवश्य हुए लेकिन फिर उस बारिश को एंज्वॉय करने लगे । क्लास रूम में पानी भर जाने पर हम लोग उस पानी में कागज़ की नाव चलाते थे और शोर मचाते थे फलस्वरूप हमें दिन भर के लिये छुट्टी मिल जाती थी । वर्षा ऋतु के उपरांत यह समस्या खुद- ब-खुद हल हो गई और हमारी क्लास उसी कमरे में नियमित रूप से लगने लगी ।
शरद कोकास
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