मस्जिद वाले मार्ग से रात अकेले घर लौटते हुए बालक शरद
बचपन के वे दिन जब मैंने अंधेरे से डरना बंद कर दिया
स्नेह सम्मेलन के दौरान दिसंबर के उन दिनों में रोज़ रात दो बजे तक सांस्कृतिक कार्यक्रम होते थे । वापसी में मैं अकेला ही घर लौटता था ৷ खामतालाव वार्ड की मस्जिद तक तो बहुत से लोगों का साथ रहता था लेकिन उसके आगे का लगभग एक किलोमीटर का रास्ता मुझे अकेले ही तय करना होता था । अन्धेरे में दूर दूर तक कोई नहीं दिखाई देता था ৷ कभी कभी तो मुझे अपनी ही पदचाप सुनकर ऐसा लगता जैसे कोई मेरे पीछे आ रहा है ৷ मैं ठहरता तो पदचाप बंद हो जाती ৷
मुझे लगता मुझे रुकता हुआ देखकर वह व्यक्ति भी रुक गया है ৷ फिर एक दो रोज़ बाद ही मुझे इसकी आदत हो गई और मेरा डर ख़त्म हो गया ৷ उसके बाद तो कुछ ऐसा हुआ कि रात के अँधेरे में अकेले भटकने में ही मज़ा आने लगा लेकिन वह बहुत बाद की बात है यानी कॉलेज के दिनों की । बचपन में दो बजे रात को घर लौटते हुए मुझे डर नहीं लगता था इस बात की डींग तो मैं अब भी हाँका करता हूँ ।
किसी प्रकार की भी चिंता से मुक्त बचपन के वे दिन कुछ इसी तरह बीत रहे थे ৷ बचपन अपने पूरे शबाब पर था । उन दिनों और बच्चों की तरह मुझे भी नये नये शौक लग गये थे , जैसे डाकटिकटें इकठ्ठा करना । यह शौक पूरा करने के लिये हम लोग जाने कहाँ कहाँ की खाक छानते थे, कभी कभी तो कूड़ाघर में भी लिफाफों को उलट-पलट कर देखते और जैसे ही उनपर कोई नया टिकट दिखता उसे उखाड़ लेते । मैंने एक एलबम भी बनाया था और हम दोस्त आपस में टिकटों की अदलाबदली भी करते थे । एक कॉपी और बनाई थी मैंने जिसमें मैं दादी माँ के नुस्खे जैसी चीज़ें लिखा करता था ।
इसके अलावा अखबारों और पत्रिकाओं में छपने वाले महापुरुषों के अनमोल वचन इकठ्ठा करने का भी मुझे शौक था । इन सूत्रवाक्यों को मैं एक नोटबुक में उतार लिया करता था । कभी कभी मुझे भी अपना कोई विचार पसन्द आता तो मैं उसे कॉपी में लिख लिया करता था । इस तरह मेरे लेखन की शुरुआत विचारों से ही हुई थी,जिसे बाद में मैंने निबन्ध के रूप में लिखना शुरू किया । कविता तो मैंने कॉलेज जाने के बाद ही लिखी । बचपन का लिखा हुआ वह सब कुछ जाने कहाँ चला गया । परीक्षा हो जाने के बाद पुरानी कॉपियों को घर के काम में उपयोग में लाया जाता था, या माँ उन कागज़ों की लुगदी से टोकनी बना लेती थी । इसलिये मेरा लिखा हुआ कुछ भी शेष न रहा । जिन पन्नों में मेरे विचार इकठ्ठा होते थे उनकी लुगदी से बनी टोकरियों में चने, मूंगफल्ली के दाने इकठ्ठा होने लगे ৷
मैं किशोरावस्था में प्रवेश कर रहा था ৷ पाँचवी छठवीं के वे दिन मेरे अवचेतन में नए अनुभवों का समावेश कर रहे थे ৷ मैं अपने अलग अस्तित्व की पहचान कर उसे भलिभाँति समझने लगा था ৷अपने परिवेश और आसपास के वातावरण को जानने समझने लगा था ৷ दुनिया के रहस्य धीरे धीरे समझ में आ रहे थे । यह वे दिन थे जब प्रेम, वात्सल्य,मित्रता,अपनापन,उत्साह,सपने,उमंग, सुख दुख,खुशी,परेशानी,चिंता,संघर्ष,जिज्ञासा, जैसी मनुष्य के जीवन की विभिन्न अवधारणाओं से मेरा परिचय हो रहा था ।
शरद कोकास
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