10 जून 2026

80 ज़िंदगी और मौत के खौफ़ से बेखौफ़ रहने के दिन





बचपन के वे दिन ज़िंदगी और मौत के खौफ़ से बेख़ौफ़ रहने के दिन थे । स्नेह सम्मेलन के दौरान दिसंबर के उन दिनों में रोज़ रात दो बजे तक सांस्कृतिक कार्यक्रम होते थे । वापसी में मैं अकेला ही घर लौटता था ৷ खामतालाव वार्ड की मस्जिद तक तो बहुत से लोगों का साथ रहता था लेकिन उसके आगे का लगभग एक किलोमीटर का रास्ता मुझे अकेले ही तय करना होता था । अन्धेरे में दूर दूर तक कोई नहीं दिखाई देता था ৷ कभी कभी तो मुझे अपनी ही पदचाप सुनकर ऐसा लगता जैसे कोई मेरे पीछे आ रहा है ৷ मैं ठहरता तो पदचाप बंद हो जाती ৷ मुझे लगता मुझे रुकता हुआ देखकर वह व्यक्ति भी रुक गया है ৷ फिर एक दो रोज़ बाद ही मुझे इसकी आदत हो गई और मेरा डर ख़त्म हो गया ৷ उसके बाद तो कुछ ऐसा हुआ कि रात के अँधेरे में अकेले भटकने में ही मज़ा आने लगा लेकिन वह बहुत बाद की बात है यानी कॉलेज के दिनों की । बचपन में दो बजे रात को घर लौटते हुए मुझे डर नहीं लगता था इस बात की डींग तो मैं अब भी हाँका करता हूँ ।


किसी प्रकार की भी चिंता से मुक्त बचपन के वे दिन कुछ इसी तरह बीत रहे थे ৷ बचपन अपने पूरे शबाब पर था । उन दिनों और बच्चों की तरह मुझे भी नये नये शौक लग गये थे , जैसे डाकटिकटें इकठ्ठा करना । यह शौक पूरा करने के लिये हम लोग जाने कहाँ कहाँ की खाक छानते थे, कभी कभी तो कूड़ाघर में भी लिफाफों को उलट-पलट कर देखते और जैसे ही उनपर कोई नया टिकट दिखता उसे उखाड़ लेते । मैंने एक एलबम भी बनाया था और हम दोस्त आपस में टिकटों की अदलाबदली भी करते थे । एक कॉपी और बनाई थी मैंने जिसमें मैं दादी माँ के नुस्खे जैसी चीज़ें लिखा करता था । 


इसके अलावा अखबारों और पत्रिकाओं में छपने वाले महापुरुषों के अनमोल वचन इकठ्ठा करने का भी मुझे शौक था । इन सूत्रवाक्यों को मैं एक नोटबुक में उतार लिया करता था । कभी कभी मुझे भी अपना कोई विचार पसन्द आता तो मैं उसे कॉपी में लिख लिया करता था । इस तरह मेरे लेखन की शुरुआत विचारों से ही हुई थी,जिसे बाद में मैंने निबन्ध के रूप में लिखना शुरू किया । कविता तो मैंने कॉलेज जाने के बाद ही लिखी । बचपन का लिखा हुआ वह सब कुछ जाने कहाँ चला गया । परीक्षा हो जाने के बाद पुरानी कॉपियों को घर के काम में  उपयोग में लाया जाता था, या माँ उन कागज़ों की लुगदी से टोकनी बना लेती थी । इसलिये मेरा लिखा हुआ कुछ भी शेष न रहा । जिन पन्नों में मेरे विचार इकठ्ठा होते थे उनकी लुगदी से बनी टोकरियों में चने, मूंगफल्ली के दाने इकठ्ठा होने लगे ৷   

 

मैं किशोरावस्था में प्रवेश कर रहा था ৷ पाँचवी छठवीं के वे दिन मेरे अवचेतन में नए अनुभवों का समावेश कर रहे थे ৷ मैं अपने अलग अस्तित्व की पहचान कर उसे भलिभाँति समझने लगा था ৷अपने परिवेश और आसपास के वातावरण को जानने समझने लगा था ৷ दुनिया के रहस्य धीरे धीरे समझ में आ रहे थे  । यह वे दिन थे जब प्रेम, वात्सल्य,मित्रता,अपनापन,उत्साह,सपने,उमंग, सुख दुख,खुशी,परेशानी,चिंता,संघर्ष,जिज्ञासा, जैसी मनुष्य के जीवन की विभिन्न अवधारणाओं से मेरा परिचय हो रहा था । 


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