उन दिनों यह एक परंपरा थी कि अंतरशालेय क्रिड़ा प्रतियोगिता अर्थात डिस्ट्रिक्ट टूर्नामेंट के अंतर्गत विभिन्न शालाओं के विद्यार्थियों के बीच रात्रि के समय सांस्कृतिक कार्यक्रमों की प्रतियोगिता भी होती थी और उसमे नृत्य,नाटक,इत्यादि प्रस्तुतियों के लिए अलग अलग स्कूलों को प्रथम द्वितीय,तृतीय पुरस्कार दिया जाता था ৷ मुझे खेल के मैदान की बजाय नाटक का मंच अधिक प्रिय था इसलिए टूर्नामेंट में बच्चों के साथ मैं केवल दर्शक की भूमिका में तालियाँ बजने के लिए उपस्थित रहता था ৷ उस वर्ष कुछ ऐसा संयोग हुआ कि नाटक ‘भूख हड़ताल’ के बहाने हमारी टीम को टूर्नामेन्ट में भाग लेने का अवसर प्राप्त हुआ ৷ यह टूर्नामेंट भंडारा शहर से बाईस किलोमीटर पर स्थित तुमसर नामक स्थान में आयोजित था ৷
तुमसर मेरे लिए नई जगह थी इसलिए वैसे भी जाने का उत्साह बहुत था ৷ नियत तिथि पर हमारी डांस ड्रामा की कल्चरल टीम बस से वहाँ के लिए रवाना हुई ৷ लड़कियाँ और उनकी अभिभावक मैडम सुजाता रॉय तथा एक शिक्षक श्री हीरालाल फुलसुंघे पहले ही जीप में चले गये थे और हमें सीनियर छात्रों के साथ आने के लिए कहा गया था । वरिष्ठ छात्रों के साथ बस में स्कूल के शिक्षकों के विषय में ‘गुप्त ज्ञान’ की बातें सुनते हुए हम लोग दोपहर में ही तुमसर पहुँच गए ৷
अपने खिलाड़ी साथियों वाले कमरे में अपने कास्ट्यूम और मेकअप आदि का सामान रखकर सीनियर्स के साथ मैं और नानक शहर घूमने निकल पड़े ৷ शहर छोटा सा था लेकिन औद्योगिक केंद्र होने के कारण वहाँ मजदूरों की बस्तियां अधिक थीं ৷ लौटते हुए हमने देखा तुमसर के उस खेल के मैदान के बाहर एक बहुत बड़ा मंच बनाया गया था जहाँ सभी सांस्कृतिक कार्यक्रम सम्पन्न होने वाले थे ৷ दिन में क्रिड़ा प्रतियोगिताएँ संपन्न होने के पश्चात रात्रि में सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रारंभ हुए ৷
हमारा नाटक विभिन्न कार्यक्रमों के अंत में होना था इसलिए हम लोग निश्चिन्त होकर परिसर में टहलते रहे ৷ मंच भी एक खुले स्थान पर बना था जहाँ बाहर की ओर मेला जैसा लगा था ৷ यहाँ अनेक प्रकार की दुकानें भी थीं ৷ वहाँ पहली बार मैंने ‘लौंग लता’ नामक एक मिठाई खाई थी । यह मिठाई मैदे की कई परतों की बनी होती थी जिसके बीचोबीच एक लौंग लगी होती थी इसे तेल में तलकर चाशनी में डुबो दिया जाता था । मैदे की अनेक परतों को देखते हुए हमारे एक सीनियर अहमद ने इस मिठाई का नाम ‘लौंग लपेटा’ रख दिया था ।
हम लोग एक के बाद एक विभिन्न शालाओं की प्रस्तुतियां देख रहे थे कि मंच पर अनाउंसमेंट हुआ “ अब प्रस्तुत है भंडारा के गाँधी विद्यालय की ओर से एक नृत्य” ৷ यह प्रतियोगिता के अंतर्गत था इसलिए प्रस्तुति से पूर्व कलाकार का नाम नहीं लिया जाता था, केवल स्कूल का नाम घोषित होता था ৷
पर्दा उठा और मंच पर पहने एक नृत्यांगना ने प्रवेश किया ৷ उस समय की प्रसिद्ध फिल्म ‘ लव इन टोकियो ‘ का एक प्रसिद्ध गीत हवाओं में गूंजने लगा .. ‘सायोनारा सायोनारा, वादा निभाउंगी सायोनारा’ । मैदान में बैठे शोहदों की सीटियों के आवाज़ के बीच उसने नृत्य शुरू किया .. इठलाती और बल खाती कल फिर आउंगी सायोनारा ৷
नृत्य के चलते अन्य जगहों से आये कुछ छात्र जो जानते थे कि हम गांधी विद्यालय भंडारा से आये हैं पूछने लगे कि यह खूबसूरत लड़की कौन है ? हम लोग उनका प्रश्न सुनकर केवल मुस्कुराते रहे ৷ हमें पता था कि इस गीत में जापानी लड़की की वेशभूषा और मेकअप में, हाथ में पंखा लिए स्टेज पर उतरने वाली यह नृत्यांगना कौन है ৷ नृत्य समाप्त होने के बाद अनाउंस किया गया “ अभी आप गाँधी विद्यालय भंडारा की यह प्रस्तुति देख रहे थे , प्रस्तुत कर रहे थे मोहम्मद अकरम ৷ हमने देखा आश्चर्य से सबके मुँह खुले रह गए हैं ৷ ৷ सबके मुंह पर एक ही सवाल था ”इस सुन्दर लड़की का नाम मोहम्मद अकरम कैसे हो सकता है ?” किसी को विश्वास ही नहीं हुआ कि कोई लड़का लड़की बनकर इतना अच्छा नृत्य कैसे कर सकता है
मोहम्मद अकरम स्कूल में हमसे एक कक्षा आगे था । अकरम के पिता एक पुलिस ऑफिसर थे । मुझे याद है सभ्रांत घरों के बच्चों की भांति अकरम बहुत अच्छे और महँगे कपड़े पहनकर स्कूल आता था । उसके पास एक ऐसा स्वेटर था जिसे भीतर बाहर दोनों ओर से पहना जा सकता था, एक ओर से उसका रंग गहरा लाल था और दूसरी ओर से गहरा नीला । अकरम दिखने में बहुत सुन्दर था, चेहरा बिलकुल लड़कियों की तरह और रंग झक्क गोरा । उसकी आवाज़ भी लड़कियों जैसी ही पतली थी । उसकी इन विशेषताओं को देखते हुए स्कूल के स्नेह सम्मलेन में ‘बहादुर शाह ज़फर’ इस नाटक में उसे शाहज़फर की बेगम का रोल दिया गया था ।
अभिनय के अलावा अकरम नृत्य कला में भी माहिर था ৷ उन दिनों शास्त्रीय संगीत और नृत्यों का चलन तो था ही लेकिन फ़िल्मी गानों पर नृत्य का चलन आम था ৷ स्नेह सम्मलेन के अवसर पर सर ने अकरम से कुछ गीतों पर नृत्य भी तैयार करवाया था । नृत्य के बाद हम लोगों का नाटक हुआ स्कूल की धाक पहले ही जैम गई थी इसलिए लोगों ने बहुत ध्यान से नाटक देखा ৷ कहना न होगा कि नाटक बहुत बढ़िया रहा ৷
कार्यक्रम के बाद तुमसर से लौटते हुए काफी रात हो गई थी इसलिये मैं फुलसुंगे सर के घर रुक गया था । बड़े बाज़ार में उनका मकान था और उनका कमरा तीसरी मंज़िल पर था । वह कमरा मुझे अभी तक याद है इसलिए कि बहुत सुन्दर ढंग से उन्होंने उसे सजाया था । उनका कमरा देखकर उस समय मेरे मन में विचार आया था कि यदि बड़े होकर मुझे अलग कमरा मिला तो मैं उसे ऐसे ही सजाउंगा । मेरी यह इच्छा नौकरी लगने के बाद दुर्ग में बक्षी जी के मकान के किराये के कमरे में पूरी हुई । हालाँकि होस्टेल के कमरों को भी मैं इसी तरह सजाता था ।

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
आइये पड़ोस को अपना विश्व बनायें