जिस तरह उन दिनों बड़ों की पत्रिकाएँ ‘धर्मयुग’ और साप्ताहिक हिंदुस्तान’ थी उसी तरह बच्चों की पत्रिकाओं के नाम पर ‘पराग’ और ‘नंदन’ यह दो मशहूर पत्रिकाएं प्रकशित हुआ करती थीं ৷ इन पत्रिकाओं में बच्चों के लिए कहानियाँ और कविताओं के अलावा कभी कभी नाटक भी प्रकाशित हुआ करते थे ৷ ‘धर्मयुग’ और ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ तो बाबूजी कॉलेज से ले आया करते थे लेकिन पराग कभी कभी वे बस स्टैंड से ख़रीदकर लाते थे ৷ एक बार ‘पराग’ में ‘भूख हड़ताल’ नामक एक बाल नाटक छपा ৷ हमारे शिक्षक प्यारेलाल फुलसुंगे की नज़र उस नाटक पर गई । उन्होंने पत्रिका से वह स्क्रिप्ट कागज़ पर उतारी और हम बच्चों को बुलाकर कहा “हम लोग स्कूल के वार्षिकोत्सव के लिए यह ड्रामा तैयार करेंगे ।“
इस नाटक का कथानक बहुत मज़ेदार था ৷ इसमें दो बच्चे अपनी ज़िद पूरी करवाने के लिये अपने ही घर में झूठ मूठ की भूख हड़ताल का अभिनय करते हैं । माता पिता शुरू में तो उन पर ध्यान देते हैं लेकिन फिर यह सोचकर कि जब बच्चों को भूख लगेगी वे स्वयं ही हड़ताल करना बंद कर देंगे, उन पर ध्यान देना बंद कर देते हैं ।
साहित्य के विषय में अक्सर एक वाक्य कहा जाता है कि साहित्य समाज का दर्पण होता है इस नाटक के कथानक में भी उस समय के मध्यवर्गीय परिवार की एक झलक मिलती है आज तो मध्यवर्गीय माता पिता किसी भी तरह अपने बच्चों की ज़िद पूरी करने को तत्पर रहते हैं लेकिन वह समय ही ऐसा था कि बच्चों की हर जिद पूरी नहीं की जाती थी ৷
ओह, मैं नाटक की बात कर रहा था ৷ इस नाटक में फिर कुछ ऐसा होता है कि यह झूठ मूठ की हड़ताल अचानक सच में बदल जाती है इसलिए कि माता पिता के बीच सांठगाँठ हो जाती है और उन बच्चों के लिए घर में खाना ही नहीं बनता ৷ अंत में जब भूख के मारे बच्चों का दम निकलने लगता है वे इधर उधर से किचन से कुछ जुगाड़ करने का प्रयास करते हैं, बहन भी उन्हें दिखा दिखा कर कुछ खाती है और उन्हें ललचाती है , अंततः वे हार मान लेते हैं और इस तरह माँ-बाप के सामने उनके झूठ की पोल खुल जाती है ।
प्यारेलाल सर ने दोनो बच्चों की भूमिका के लिए छठवीं कक्षा से दो बच्चों का चयन किया एक मैं और एक मेरा दोस्त नानकचन्द । हमारी छोटी बहन का रोल किया था हमारी कक्षा की ही एक लड़की हर्षबाला ने जिसे हम लोग प्यार से गुड्डी कहते थे । माँ का रोल किया था यशोदा की भूमिका का निर्वाह करने वाली ललिता दीदी ने और हम बच्चों के पिता का रोल किया था हमसे सीनियर छात्र विपिन भट्ट ने ।
नाटक ‘भूख हड़ताल’ छोटा सा था लेकिन फुलसुंगे सर के निर्देशन में सभी ने इतना सधा हुआ अभिनय किया कि नाटक की धूम मच गई । एक दिन सर का आदेश हुआ कि यह नाटक तुम लोगों को इंटर डिस्ट्रिक्ट टूर्नामेंट में भंडारा से बाईस किलोमीटर दूर तुमसर नामक स्थान में भी करना है । हमसे सीनियर छात्रों ने उस वर्ष के स्नेह सम्मेलन के लिये तीन फुल लेंथ ड्रामे भी तैयार किये थे एक था ‘ बहादुर शाहज़फर ‘एक ‘ खून की आवाज़ ‘ और तीसरे ड्रामे का नाम ‘मेरा वतन’ या ऐसा ही कुछ था । लेकिन टूर्नामेंट के अंतर्गत सांस्कृतिक कार्यक्रम के लिए हमारे नाटक का ही चयन हुआ ,इसलिये कि वह एक छोटा ड्रामा था ।
हमारा नाटक ‘ भूख हडताल ‘ के दो शो हो चुके थे ৷ यह नाटक इतना प्रसिद्ध हुआ कि बाबूजी ने बेला स्थित अपने बेसिक ट्रेनिंग कॉलेज में आयोजित स्नेहसम्मेलन में भी उस नाटक का मंचन करवाया । इस तरह इस नाटक का तीसरा मंचन भी हुआ ৷ उस नाटक के पारितोषक स्वरूप मुझे एक प्लास्टिक का नीले रंग का डिब्बा मिला था , जो बाद में बहुत दिनों तक बाबूजी के पान के डिबे के रूप में हमारे घर में मौज़ूद रहा । एक सात खंडों वाला लाल रंग का प्लास्टिक का डिब्बा और मिला था जिसमें माँ सुई और धागे की रंगबिरंगी रीलें रखा करती थी , उस डिब्बे के ढक्कन पर मैंने सफेद पेंट से ‘ इन्द्रधनुष ‘ लिख दिया था ।
इंद्रधनुष्य के वे सात रंग आज भी मेरे अवचेतन में स्मृतियों के रूप में उपस्थित हैं
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