10 जून 2026

77 .बस कृष्ण जी का दम घुटने ही वाला था




श्रीकृष्ण टाकीज़ के मंच पर नाटक देखते हुए मैं अनेक अनुभवों से गुजरता था । मैं देखता था कि थियेटर की रौशनियाँ मंच पर घूमते हुए अचानक किसी एक पात्र पर केन्द्रित हो जाती हैं और  हाल के सारे दर्शकों की निगाह उस पर जाकर ठहर जाती है । यह सब कुछ मुझे बहुत रोमांचक लगता और मैं सोचता क्या कभी मेरे जीवन में भी कोई ऐसा भी दिन आयेगा जब मैं इसी तरह मंच पर रौशनियों के घेरे में रहूँगा और लोग इसी तरह सब भूलकर एकटक मेरी ओर देखेंगे । 


             अभिनय के बीज तो शिवहरे गुरूजी ने चौथी क्लास में ही बो दिए थे । एक दिन उन्होंने मुझे बुलाया और कहा “ इस बार शाला के वार्षिक सांस्कृतिक कार्यक्रम में ‘मैया मोरी मैं नहीं माखन खायों ‘पर तुम्हे अभिनय करना है । तुम सांवले से हो और थोड़े नटखट भी दिखाई देते हो इसलिए तुम्हे कृष्ण बनायेंगे और ललिता को यशोदा । मैंने प्रश्नवाचक दृष्टि से गुरूजी की ओर देखा  “मतलब मुझे गाना भी गाना पड़ेगा?”  “नहीं, गाना नहीं है तुम्हे “ गुरूजी ने कहा । “मंच पर गायक मंडली उपस्थित रहेगी, तुम्हे सिर्फ अभिनय करना है।“


मुझे विश्वास था कि  कृष्ण का अभिनय तो मैं बढ़िया कर लूँगा । लेकिन इस बात पर  संदेह था कि छठवीं कक्षा में पढने वाली ललिता उजवने दीदी यशोदा मैया का अभिनय ठीक से कर पायेंगी या नहीं । बहरहाल, सर ने गायक मंडली के साथ हमारी तीन चार बार रिहर्सल करवाई और हम प्रस्तुति हेतु तैयार हो गए ।


ढेर सारे सांस्कृतिक कार्यक्रम जैसे कोली गीत, पोवाडा, देशभक्ति के गीत आदि संपन्न होने के बाद जब हमारी प्रस्तुति का अवसर आया तब तक मैं कृष्ण का परिधान पहने पहने, सर पर बंधा मोरपंख सँभालते सँभालते बहुत ऊब चुका था । वैसे भी मेकअप किये नंगे बदन बैठा था, क्लास के कुछ शरारती बच्चे आते जाते गुदगुदी लगा जाते या च्यूँटी काट लेते । जैसे ही हमारा कार्यक्रम अनाउंस हुआ, मैं और ललिता दीदी मंच पर आ गए । गायन मंडली ने सूरदास का यह प्रसिद्ध पद गाना प्रारंभ किया ..


“मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो ....

भोर भयो गैयन के पाछे मधुवन मोहिं पठायो । चार पहर बंसीबट भटक्यो साँझ परे घर आयो ॥“ बाल कृष्ण बना बालक शरद यहाँ पर थक कर घर लौटने का अभिनय कर रहा है ।


“मैं बालक बहिंयन को छोटो छींको किहि बिधि पायो ।“ इस अभिनय में पंजों के बल उचक कर छींके तक पहुँचने का अभिनय करना था,  वह भी बैलेंस बनाते हुए बढ़िया रहा ।


“ग्वाल बाल सब बैर परे हैं बरबस मुख लपटायो ॥“ कोई ग्वाल बाल तो मंच पर था नहीं, मैंने सामने बैठे उन शरारती बच्चों की ओर इशारा किया जो मुझे च्यूंटी काटकर भाग गए थे और इस तरह अपनी समझ से अपना बदला मैंने निकाल लिया । 


जनता मुग्ध भाव से हम लोगों की ओर देख रही थी । इसके बाद था सबसे मार्मिक प्रसंग,गायक मंडली ने गाना शुरू किया .. “सूरदास तब बिहँसी यशोदा ले उर कंठ लगायो...” ललिता दीदी का प्रेम इतनी देर में उमड़ आया था उन्होंने दोनों बाहें फैलाईं और पूरी ताकत से मुझे गले लगा लिया । लेकिन इस चक्कर में पता नहीं कैसे उनकी बाहें मेरे गले पर ज़ोर से कस गईं । मैं चौंका, रिहर्सल में तो ऐसा नहीं हुआ था । 


कुछ क्षण बाद उन्हें मुझे छोड़ देना था ..लेकिन गायक मंडली ‘उर कंठ लगायो’ से आगे ही नहीं बढ़ रही थी ।मुझे अपना दम घुटता सा महसूस हुआ .. मैं कुछ बोल भी नहीं पा रहा था .. आखिर मैंने उन्हें ज़ोर का एक धक्का दिया और पैर पटकते हुए मंच से भाग गया । 


यशोदा मैया बड़ी मुश्किल से खुद को संभाल पाई । उन्होंने गुस्से से मेरी ओर  देखा । हाल में बैठी जनता हँस हँस कर लोट पोट हुए जा रही थी,  उधर गायक मंडली अपनी ही धुन में गाये जा रही थी .... ‘मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो ... मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो।‘ ज़ाहिर है नाटक ख़त्म होने के बाद मैंने इस बात को लेकर ललिता दीदी से खूब लड़ाई की l ललिता दीदी का छोटा भाई सुरेश उजवने मेरा क्लास मेट था और बहन से लड़ाई में वह मेरे पक्ष में था ।



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