कुछ बच्चे खेलकूद में अधिक ध्यान देते हैं और कुछ बच्चे पढाई-लिखाई में ৷ लेकिन बड़े हमेशा चाहते हैं कि वे खेलकूद में कम और पढाई में अधिक ध्यान दें ৷ वे बच्चों के दिमाग में भी यही बात भर देना चाहते हैं ৷ चाहे उन्हें समझ में आये न आये ৷ वस्तुतः बच्चों का अवचेतन खाली पेन ड्राइव की तरह होता है जिसकी कैपेसिटी का हमें कोई अंदाज़ नहीं होता है । अवचेतन तो हम बड़ों का भी पेन ड्राइव की तरह ही होता है लेकिन एक उम्र के बाद हम मान लेते हैं कि अब वह भर गया है । फिर हम अपने दिमाग़ी पेन ड्राइव की फाइल्स के बच्चों के दिमाग़ के पेन ड्राइव में डालना शुरू करते हैं,अच्छी तरह पढ़ाई करो,शरारत मत करो,ठीक से बैठो,ज्यादा दांत मत दिखाओ,जिद मत करो,शिकायत मत करो ।
इतने पर भी हमारा फाइल ट्रांसफर का कार्यक्रम रुकता नहीं है, बच्चा जैसे जैसे बड़ा होता जाता है नई नई फाइलें आने लगती हैं तुम्हे क्लास में फर्स्ट रैंक लाना है, तुम्हे डॉक्टर बनना है, तुम्हे इंजीनियर बनना है। लड़कियों के लिए कुछ एक्स्ट्रा फाइलें होती हैं जैसे ढंग के कपड़े पहनो,ज़्यादा फैशन मत करो,घर के सारे काम सीखो,बड़ों से बहस मत करो,अधिक सवाल मत पूछो,लड़कों से ज़्यादा बात मत करो आदि ।
कुछ फ़ाइल मैनेजर तो इससे भी ज़्यादा खतरनाक होते हैं ৷ वे बच्चों के अवचेतन में बचपन से ही ऐसी फ़ाइल डालना शुरू करते हैं जो बड़े होने के बाद उन्हें कट्टर, क्रूर,असंवेदनशील और नफ़रत करने वाला इंसान बनाती हैं ৷ इन फाइलों की हेडिंग होती है, वो हमारे धर्म का नहीं है, उसके बच्चों के साथ मत खेलो, वो गंदा है, मांस खाता है, वो हमारे भगवान को नहीं मानता, वो किसी और भगवान की पूजा करता है आदि आदि ।
फाइल मैनेजर की इस भूमिका का निर्वाह केवल माता-पिता ही नहीं करते बल्कि ,काका, मामा, अंकल जैसे पड़ोसी,करीबी रिश्तेदार,स्कूल के शिक्षक,घर आने वाले पंडित जी, मौलवी जी, और उम्र से बड़े या हम उम्र बच्चे भी करते हैं । जैसे जैसे बच्चे बड़े होते हैं यह सब लोग अपने अपने दिमाग़ की पुरानी धुरानी रूढ़ीवादी फाइलें उन बच्चों के दिमाग़ में ट्रांसफर करने में लग जाते हैं । वैसे तो संस्कार देने के नाम पर वे अच्छी फाईलें भी ट्रांसफर करते हैं लेकिन उन्हें बिलकुल नहीं पता चलता कि कौनसी फाइल सही सही ट्रांसफर हो गई है और कौनसी फाइल करप्ट हो गई है ।
जैसे सारे बड़े एक जैसे नहीं होते वैसे ही सभी बच्चे भी कहाँ एक जैसे होते हैं ৷हमें समाज में सामान्यतः दो तरह के बच्चे दिखाई देते हैं एक वे जो बहुत हँसमुख, हमेशा खिलखिलाने वाले, शरारती, बहिर्मुखी, अपनी ज़िद पूरी करवाने वाले बच्चे होते हैं और दूसरे कुछ दब्बू किस्म के,हमेशा गुमसुम रहने वाले या रोते रहनेवाले, अकेले अकेले खेलने वाले, जो मिले वह खा लेने वाले बच्चे होते हैं । कुछ बच्चे पढ़ाकू भी होते हैं और क़िताबों में सर घुसाए रहते हैं । कुछ बच्चे ऐसे होते हैं जिनमे इन दोनों वर्गों के बच्चों के लक्षण कम अधिक मात्रा में होते हैं । कुछ बच्चे शांत, शर्मीले, स्थिर मनोवृति के होते हैं ।
दरअसल बच्चों के व्यक्तित्व का निर्माण उनके जन्म लेने के तुरंत बाद प्रारंभ हो जाता है और इसके निर्माता बड़े लोग ही होते हैं । कोई व्यक्ति कैसा है इसके लिए उसकी युवावस्था नहीं बल्कि उसका बचपन ज़िम्मेदार होता है । सामान्य लोग भले न जान सकें लेकिन मनुष्य के मन को जानने वाले मनोविज्ञानी यह बात अच्छी तरह जान जाते हैं कि इस इंसान के बचपन में इसके दिमाग़ में कौन कौन सी फाइलें ट्रांसफर की गई हैं अथवा इसके माता पिता ने या समाज ने इसके साथ कैसा सलूक किया है । इसी आधार पर मनोवैज्ञानिक एच जे आइसेंक ने मनुष्य के व्यक्तित्व को निराशावादी यानी मेलोंकोलिक, आशावादी यानी सैन्ग्युइन, भावनाप्रधान यानी कोलेरिक तथा फ्लेग्मेटिक यानी शांत व संतुलित जैसे वर्गों में बाँटा है । यद्यपि अधिकांश लोग किसी एक वर्ग के न होकर मिले जुले वर्ग के होते हैं ।
मैंने बात खेलकूद से शुरू की थी और बाल मनोविज्ञान की गुत्थियों में उलझ गया ৷ चलिए अब सचमुच खेल कूद की बात करते हैं ৷ मैं अपने बचपन में ऐसा ही एक पढ़ाकू किस्म का अंतर्मुखी बालक था । खेलकूद में मेरी खास रुचि नहीं थी । यद्यपि रोज शाम नियम से मोहल्ले के बच्चों के साथ खेलने ज़रूर जाता था । इन सामूहिक खेलों में एक खेल था जिसमें जिस पर दाम होता था वह अपनी लकड़ी दोनों हाथ उठाकर वेट लिफ्टर की भांति ऊपर की और रखता फिर कोई उसके पीछे से उसकी लकड़ी को उछल देता बाकी खिलाड़ी फिर उसे उछालते हुए दूर तक ले जाते इससे पहले कि दाम देने वाला उन्हें छू कर आउट करे वे अपनी लकड़ी किसी पत्थर पर रख देते थे । अगर कोई व्यक्ति आउट हुआ तो उसे दाम देना पड़ता था लेकिन पहले वाले खिलाड़ी को स्टार्टिंग पॉइंट तक एक पांव से उचकते हुए आना पड़ता था । एक बार मुझ दाम देना पड़ा था और अन्य साथी मेरी लकड़ी को उछालते हुए मैदान के अंतिम सिरे तक ले गये थे । अंत तक जब मैं किसी को आउट नहीं कर पाया तो मैं रो पड़ा । यह पराजय को स्वीकार न कर पाने और बड़ी उम्र के बच्चों द्वारा सताए जाने के फलस्वरूप हुआ था । यह फाइल मेरे अवचेतन में हमेशा के लिए दर्ज हो गई ।
इसके अलावा सामूहिक खेलों में ‘गुप्पस’ जिसमे बरसात के दिनों में गीली ज़मीन पर लोहे की छड़ गाड़नी होती है , भौरा,कंचे आदि खेल भी मैं खेलता था अक्सर बड़े बच्चे रोंटाई करते , बेईमानी करते तो मुझे बहुत गुस्सा आता । फिर कुछ दिनों बाद शरद और प्रमोद भोयर, उनके केशव मामा, अनिल झाड़े, नरेश तिवारी जैसे मित्र आ गए तो हम लोगों ने क्रिकेट खेलना शुरू कर दिया।
पतंग उड़ाने का भी मुझे खास शौक नहीं था फिर भी कभी कभार पतंग उड़ा लिया करता था । कभी इस शौक के पीछे मैंने पैसे बरबाद नही किये । कभी पाँच पैसे वाली पतंग ले आया करता था तो कभी दस पैसे वाली । घर से ही माँ के सुई धागे वाले डिब्बे से तागा लेता था और जोगीतालाव मैदान में जाकर अकेले ही पतंग उड़ाया करता था । पतंग के अलावा कभी कभी मैं अकेले भौरा भी खेला करता था लेकिन मैं उसे अकेले ही घुमाया करता और उसका आनंद लिया करता । उस समय बच्चों में लट्टू या भौरे के इस खेल में एक ऐसा नियम था कि जीतने वाले बच्चे अपने लट्टू की नोक से हारने वाले के लट्टू को गोद गोद कर उसे तोड़ देते थे । मुझे खेल में यह क्रूरता या हिंसा बिलकुल पसंद नहीं थी । बड़े होने के बाद जब मैंने किताबों में पढ़ा कि रोम में ऐसे ही ग्लेडिएटर के खेल में हारने वाले को जान से मार दिया जाता था तो मुझे यही खेल याद आया ।
पतंगबाज़ी का एक रोचक किस्सा मेरे खजाने में है । एक बार श्याम काका बैतूल से भंडारा आये थे । वे बाज़ार से कागज़ लेकर आये और उन्होंने दो पतंगे बनाईं । माँ जिस धागे से कथरी या गुदड़ी सिलती थी वह धागा उन्होंने लिया और मुझे लेकर जोगीतालाव के मैदान में पतंग उड़ाने चल दिये । पतंग खूब ऊँची उड़ी और कुछ देर बाद धागा टूट गया । अब कथरी सिलने के कच्चे धागे से तो यही होना था । घर लौटने के बाद पता चला कि माँ बहुत नाराज़ है, उनका धागा जो हम लोग लेकर चले गये थे । वैसे पतंग उड़ाने से ज़्यादा मज़ा कटी हुई पतंग लूटने में आता था । हालाँकि पतंग लूटने वाले लड़के मुझसे ज़्यादा लम्बे और तगड़े होते थे इसलिये मेरे हिस्से पतंग कभी नहीं आई , कभी कभार धागे का कोई टुकड़ा आ जाता था जिसे एक विशेष तरह की गठान के साथ मैं अपनी चरखी के धागे में जोड़ लेता । ऐसे ही एक बार दिनेश काका बैतूल से आये थे । वह जून का महीना था और जामुन का सीज़न था । दिनेश काका एक जादू दिखाया करते थे जामुन की गुठली से जामुन पैदा करने का । हम बच्चों को उनकी इस हाथ की सफाई वाले जादू में बहुत मज़ा आता था ।
कई बार ऐसा हुआ कि मैं खेल से अलग होकर चुपचाप जोगी तलाव की नर्म घास में लेट जाता और आसमान की ओर देखता । बादलों की ओर लगातार देखते हुए उनमें विभिन्न आकृतियाँ ढूँढने की कोशिश किया करता । मेरे मन में अक्सर यह ख्याल आता कि भगवान आसमान में कितनी दूर रहते होंगे, क्या उनके यहाँ भी ऐसे ही खेल के मैदान होंगे और उनके बच्चे खेलते हुए आपस में लड़ते होंगे । अक्सर शाम को कई बार जब मैं अन्य बच्चों के साथ नहीं खेल रहा होता अपने आप में ही मगन रहता था ।
जोगीतालाव का वह खेल का मैदान, बरसात के दिनों में वहाँ उगने वाली घास की गंध, पूरे मैदान में एक अकेला किसी का क्वार्टर, जकातदार कन्या शाला की दीवार और उसके पास बहती मिट्टी की कच्ची नाली, जहाँ कभी तालाब हुआ करता था उस स्थान के बड़े बड़े गड्ढे, वरठी जाने वाली सड़क से आती बसों की रौशनी, दिन भर का काम खत्म हो जाने के बाद अपने बैलों को घर की ओर ले जाते हुए शुक्रवारी के किसान, मुझे घर लौट जाने का संकेत देते हुए घर लौटते हुए पंछी, यह सब चित्र मेरे अवचेतन में आज भी हैं । आज भले ही भौतिक रूप से उस मैदान में इमारतें बन गई हों मेरी फाइल में वह जस का तस है ।
जोगीतालाव का मैदान जहाँ समाप्त होता था वहाँ से एक टेकड़ी शुरू होती थी इसी टीले पर रूपचन्द का कच्चा मकान था । रूपचन्द के पिता बीड़ी के कारखाने में मुनीम थे और माँ कहीं मज़दूरी करती थी । उसके घर के आसपास मिट्टी के घरों में बीड़ी मजदूर रहा करते थे । बीड़ी मजदूरों की यह बस्ती मुझे बहुत अच्छी लगती थी । खाली दोपहरियों में मैं जोगीतालाव का मैदान पार कर उस बस्ती में चला जाता और गलियों में भटकता रहता ।
पाँचवी कक्षा में मुझे कम मार्क्स मिले थे लेकिन छठवीं कक्षा में मैं फिर प्रथम आया । मैंने जो प्रण पाँचवीं में किया था उसे पूरा कर लिया । उस साल रूपचन्द को अच्छे मार्क्स नहीं प्राप्त नहीं हुए थे और इस बात का मुझे बहुत दुख हुआ था । नानकचन्द उस साल भी चोपकर सर के यहाँ ट्यूशन के लिये गया था लेकिन मुझे बिना ट्यूशन के ही उससे ज़्यादा मार्क्स मिले थे ।

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