यह वो ज़माना था जब किसी शहर या कसबे का विकास का पैमाना वहाँ सिनेमाघरों की संख्या पर निर्भर होता था ৷ सामान्यतः दो सिनेमाघरों वाला क़स्बा शहर की श्रेणी में आता था ৷ भंडारा में आदर्श टाकीज़ के अलावा एक और टाकीज़ थी जिसका नाम था श्रीकृष्ण टाकीज़ । इस टाकीज़ का उदघाटन फिल्म सम्पूर्ण रामायण के साथ सन उन्नीस सौ इकसठ में हुआ था ৷
श्रीकृष्ण टाकीज़ की विशेषता यह थी वह टू इन वन थी यानी वैसे तो वह सिनेमाघर था लेकिन ज़रुरत पड़ने पर वह ड्रामा थियेटर भी बन जाता था ৷ श्रीकृष्ण टाकीज का निर्माण कुछ इस तरह हुआ था कि वहाँ परदे के सामने की ओर काफी बड़ा एक स्टेज बना हुआ था जिसपर नाटक भी खेले जा सकते थे । माह दो माह में मुंबई, पुणे जैसे शहरों से नाट्य मंडलियाँ यहाँ आती थीं और एक सप्ताह तक प्रतिदिन उनके शो होते थे । महाराष्ट्र में नाटक मंचन की समृद्ध परम्परा है इसलिए यहाँ केवल मराठी नाटक ही मंचित किये जाते थे ৷
नाटक के मंचन के एक माह पूर्व ही उसका प्रचार और एडवांस बुकिंग प्रारंभ हो जाती थी । नाटक के प्रचार के लिए नए नए तरीके अपनाये जाते थे, जैसे किसी नाटक के लिए कहा जाता “इस नाटक में देखिये मुंबई की सबसे ऊँची इमारत” या “इस नाटक में देखिये किस तरह विमान स्टेज पर उतरता है ।“ यह नाटक मुफ़्त में नहीं दिखाए जाते थे बल्कि नाटक की टिकट भी सिनेमा की टिकट से कुछ अधिक ही होती थी ।
नाटक और सिनेमा देखने में सबसे बड़ा अंतर यह है कि नाट्यगृह में जो दर्शक मंच के सबसे निकट होते हैं वे नाटक का सबसे अधिक आनंद ले सकते है इसलिए कि वे पात्रों के चेहरे और उनके हाव भाव अच्छी तरह देख सकते हैं और संवाद भी साफ साफ सुन सकते हैं जबकि सिनेमा में सबसे पीछे बैठने वालों को सामने वालों की तुलना में अधिक अच्छा दिखाई देता है । श्रीकृष्ण टाकीज़ में नाटक के दौरान सबसे सामने यानी थर्ड क्लास की टिकट सबसे अधिक मूल्य की होती थी और सबसे पीछे यानी बालकनी की टिकट सबसे कम कीमत की होती थी । जबकि इसके विपरीत सिनेमा में पीछे की टिकट का मूल्य अधिक होता है और सामने थर्ड क्लास की टिकट का मूल्य सबसे कम ৷
मेरा उद्देश्य सिनेमाघर के बहाने केवल अतीत के दिनों में लौटना मात्र नहीं है इसलिए कुछ बातें मराठी नाटकों के इतिहास पर भी कहना चाहता हूँ ৷ उन दिनों महाराष्ट्र में हिन्दी रंगमंच उतना समृद्ध नहीं हुआ था और मुंबई नागपुर जैसे बड़े शहरों में ही हिन्दी नाटक खेले जाते थे ৷ लेकिन मराठी रंगमंच तो कस्बों और गाँवों तक पहुँच चुका था ।
अपनी ऐतिहासिक परम्परा में मराठी रंगमंच की शुरुआत उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य से मानी जाती है । प्रारंभ में इन नाटकों के विषय ऐतिहासिक, और पौराणिक ही अधिक होते थे और इनका स्वरूप भी संगीत नाटक या ऑपेरा, भजन कीर्तन, लोक नाट्य, या तमाशा, जैसा हुआ करता था । इस प्रकार के अंतर्गत उन दिनों सन अठारह सौ अस्सी में अन्नासाहेब किर्लोस्कर का लिखा हुआ ‘संगीत शाकुंतल’ नामक नाटक बहुत प्रसिद्ध हुआ था ।
बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में मराठी नाटकों का स्वरूप बदलता है और लोकमान्य तिलक आदि की प्रेरणा से इसमें राष्ट्र प्रेम, स्वतंत्रता की भावना जैसे विषयों का समावेश होता है । इस दौर में इसके अलावा सामाजिक कुरीतियों और मान्यताओं पर कुठाराघात करने वाले नाटक भी रचे गए जिसमे किर्लोस्कर , कृष्णाजी खाडीलकर जैसे लेखकों द्वारा लिखे नाटकों के साथ राम गणेश गड़करी का लिखा ‘एकच प्याला’ आज भी याद किया जाता है ।
मराठी नाटकों के प्रारंभिक दौर में स्त्रियाँ इस क्षेत्र में आगे नहीं आई थीं इसलिए स्त्री पात्रों की भूमिका भी पुरुष ही किया करते थे । जिन पुरुषों की आवाज़ सुरीली होती थी और देह यष्टि कमनीय होती थी उन्हें यह भूमिकाएँ दी जातीं थीं । ऐसे पात्रों की भूमिका करने वालों में नारायण राव राजहंस का नाम बहुत प्रसिद्ध हुआ । इनकी ख्याति ‘बालगंधर्व’ के नाम से अधिक है ।
मराठी रंगमंच के संस्थापकों में स्वर सम्राज्ञी लता मंगेशकर के पिता दीनानाथ मंगेशकर, नाना साहेब फाटक, भालचंद्र पेंढारकर आदि के नाम बहुत प्रसिद्ध रहे । प्रारंभ के दिनों में मराठी नाटक, लोकनाट्य खड़ा तमाशा या पोवाड़े की तरह रातभर खेले जाते थे । यह पांच अंकी नाटक कहलाते थे और इनमे पांच बार पर्दा गिरता था । कुछ वर्षों बाद इनकी अवधि तीन घंटे तक सीमित कर दी गई और यह तीन अंकी नाटक कहलाने लगे । अब तो एक अंकी और दो अंकी नाटक भी खेले जाते हैं ।
मराठी रंगमंच में उन्नीस सौ साठ से अस्सी तक का दौर नए प्रयोगों का दौर था । इस दौर में विद्याधर गोखले , वसंत कानेटकर जैसे निर्देशकों ने नाटक में संगीत पक्ष को प्रमुख रूप से उभारा । इस दौर में प्रशांत दामले, श्रीकांत मोघे जैसे अभिनेता आये और ‘लेकरे उदंड जाहली’, ‘अश्रुंची झाली फुले’, ‘अबोल झालीस का’ ‘एक लग्नाची गोष्ट’ जैसे नाटक बहुत प्रसिद्ध रहे । मैंने इस दौर के कई नाटक श्रीकृष्ण टाकीज़ में देखे ।
मराठी रंगमंच में जिन निर्देशकों लेखकों का योगदान रहा उनकी एक लम्बी फेहरिस्त है लेकिन इनमे प्रह्लाद केशव अत्रे, रांगणेकर, पु.ल.देशपांडे जैसे नाम काफी चर्चित रहे। देशपांडे का हास्य नाटक ‘बटाट्याची चाळ’ तो दर्शकों को विशेष प्रिय रहा । उस समय तक इन नाटकों में महिला कलाकारों का भी प्रवेश हो चुका था जिनमे ज्योत्स्ना भोले,जयमाला शिलेदार, मीनाक्षी आदि के नाम उल्लेखनीय हैं ।
मराठी रंगमंच का सबसे प्रमुख आकर्षण रहा है फार्स या प्रहसन । अपने चुटीले संवादों, जीवन से ली गई हास्य व्यंग्य की स्थितियों और नाटकीय घटनाओं की वज़ह से मराठी भाषी दर्शकों के बीच यह फार्स बहुत लोकप्रिय रहे । इनमे ‘करायला गेलो एक’, ‘काका किशाचा’, ‘दीनू च्या सासुबाई राधाबाई’,’लफड़ा सदन’, ‘बासुंदी चा मनोरंजक फार्स’, ‘झोपी गेलेला जागा झाला’ जैसे फार्स अत्यधिक लोकप्रिय रहे हैं । बबन प्रभु, आत्माराम भेंडे जैसे कलाकारों का फार्स के क्षेत्र में उल्लेखनीय नाम रहा है ।
मराठी रंगमंच स्त्रियों के अधिकारों की बात शुरू से करता आ रहा है । ऐसे कई नाटक खेले गए जिनमे ‘संगीत शारदा’ और शराब के विरुद्ध ‘एकच प्याला’, से लेकर ‘कुलवधू’,’आई रिटायर होतेय’ , ‘चारचौघी’ जैसे नाटक उल्लेखनीय रहे । मराठी का बाल रंगमंच भी बहुत प्रसिद्ध रहा है जिनमे ‘लिटिल थिएटर’ , ‘कुमार कला केंद्र’, नागपुर की ‘रंगस्वानंद’ जैसी संस्थाओं की प्रमुख भूमिका रही है । मराठी रंगमंच से आये अनेक कलाकारों ने हिन्दी सिनेमा में भी बहुत नाम कमाया जिनमे श्रीराम लागू, मोहन आगाशे,रमेश देव, सीमा देव, रोहिणी हट्टनगड़ी, सदाशिव अमरापुरकर, मोहन जोशी, नाना पाटेकर जैसे मशहूर नामों से हमारा परिचय है ।
सॉरी.. कुछ अधिक ही हो गया चलिए फिरसे श्रीकृष्ण टाकीज़ के नाट्यगृह की बात करते हैं ৷ दरअसल मराठी नाटकों की बातें करते हुए मैं टाइम मशीन में बैठकर मराठी रंगमंच के इतिहास में चला गया था ।
श्रीकृष्ण टाकीज़ कम ड्रामा थियेटर में मराठी नाटक देखने की कुछ मज़ेदार स्मृतियाँ मेरे अवचेतन में हैं ৷ मैंने इस थियेटर में अनेक प्रसिद्ध नाटक देखे । बाबूजी फिल्म देखने के लिए भले ही मुझे साथ ले जाएँ न ले जाएँ लेकिन नाटक देखने के लिए अवश्य ले जाते थे । टिकट भी वे पहले से ही खरीद कर रख लेते थे । सबसे सामने की टिकट खरीदने लायक पैसे उनकी जेब में कभी नहीं हुए इसलिए सबसे कम मूल्य की यानी बालकनी की टिकट वे खरीदते थे और उसमे भी आगे की सीट लेते थे । बालकनी में बैठकर सिनेमा न देख पाने की ग्लानि इससे कम हो जाती थी । बालकनी की कुर्सियाँ वैसे तो गद्देदार होती थीं लेकिन स्टेज वहाँ से कुछ दूर हो जाता था ।
इस दूरी को कम करते हुए दूर मंच पर अभिनय करते हुए पात्र बिलकुल करीब दिखाई दें इसके लिए बाबूजी ने एक तरीका खोजा था । वे नाटक देखने जाते समय अपने साथ एक बायनाकुलर ले जाते थे और उससे नाटक देखते थे । इस जुगाड़ से मंच पर उपस्थित पात्र बिलकुल सामने खड़े दिखाई देते यहाँ तक कि उनके चेहरे का एक एक भाव स्पष्ट दिखाई देता था । साउंड की कोई प्रॉब्लम नहीं थी उसके लिए बड़े बड़े साउंड बॉक्स थे । मुझे बिना बायनाकुलर के नाटक देखना ज़्यादा अच्छा लगता था फिर भी कौतुहल वश बीच बीच में मैं भी कुछ देर देख ही लेता था ।
श्रीकृष्ण टाकीज़ में सिनेमा और नाटकों का यह सिलसिला बरसों तक चला ৷ फिर एक दौर ऐसा आया जब लोगों में सिनेमाघरों में सिनेमा देखने की रूचि कम होने लगी ৷ आदर्श टाकीज़ तो अपने मालिक महादेव राव दलाल के प्रयासों से संभल गई लेकिन श्रीकृष्ण टाकीज़ यह आघात सहन नहीं कर पाई और एक दिन बंद हो गई ৷ श्रीकृष्ण टाकीज़ के मालिक अमरावती शहर के कोई फिल्म डिस्ट्रीब्यूटर थे उन्हें भी इसके जीर्णोद्धार में रूचि नहीं थी ৷ आज यह श्रीकृष्ण टाकीज़ खँडहर में तब्दील हो चुकी है और आँसू बहते हुए पुराने ज़माने के गीत गा रही है .. दिल जलता है तो जलने दे आँसू न बहा फ़रियाद न कर ..

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
आइये पड़ोस को अपना विश्व बनायें