10 जून 2026

74 .भंडारा : आदर्श टाकीज़ के रुपहले परदे पर दो खेलों में


    आँगन में बैठकर सुबह की धूप सेंकते हुए अचानक कानों में बैंड बाजे की आवाज़ आने लगती हम बच्चे दौड़कर गली के मुहाने पर पहुंचते, पटले की बिल्डिंग से इस ओर आता  हुआ एक जुलूस , आगे आगे बैंड वाले पीछे एक चार चक्कों वाली गाड़ी जिस पर सिनेमा के पोस्टर लगे हैं । उसके पीछे एक रिक्शा और रिक्शे में बैठा सखाराम माइक पर चीखता हुआ .. आदर्श टाकीज़ के रुपहले परदे पर....देखिये ... रोजाना दो खेलों में, जेमिनी का महान शाहाकार, महान सामाजिक पारिवारिक चित्रपट ...गृहस्थी .. जिसमे हैं शानदार सितारे अशोक कुमार, मनोज कुमार, निरूपा राय , राजश्री, ललिता पवार, शोभा खोटे  और हँसी का बेताज बादशाह मेहेमूद । 

सत्तर के दशक में कस्बों और शहरों में यह दृश्य आम था ৷ इसमें एक बात गौर करने लायक थी राज्य की भाषा कोई भी हो लेकिन हिंदी सिनेमा का प्रचार हिन्दी भाषा में ही होता था ৷ हम बच्चों को सिनेमा से कोई विशेष मतलब नहीं होता था लेकिन पीले लाल ताव के कागज़ पर छपी सिनेमा के एक्टरों की तस्वीरें हमें अच्छी लगती थीं उन दिनों बाज़ार में बायनाकुलर की तरह दिखाई देने वाला एक खिलौना भी मिलता था जिसमे सिनेमा की कटी हुई फिल्म का एक टुकड़ा लगाकर हम लोग सिनेमा का मज़ा ले लेते थे 

उस समय तक सिनेमा माँ के साथ लेडीज़ क्लास में ही देखा था इसलिए कि गोद के बच्चों की एंट्री फ्री होती थी और पांच साल तक के बच्चों की आधी टिकट लगती थी । वैसे भी वहाँ बेंचें लगी थीं इसलिए सीट जैसा कोई चक्कर नहीं था । बचपन में माँ के साथ सिनेमा देखने के बाद फिर एक लम्बा गैप रहा । फिर कुछ बड़ा होने पर बाबूजी के साथ जेंट्स क्लास में जाना शुरू किया और नवीं दसवीं तक आते आते दोस्तों के साथ सिनेमा का आनंद लेना शुरू हो गया जो कॉलेज के ज़माने तक चलता रहा ।

अपने जीवन का पहला सिनेमा मैंने भंडारा की आदर्श टाकीज़ में देखा था ।  भंडारा  में उस समय दो टाकीज़े हुआ करती थीं एक का नाम था आदर्श जो गांधी चौक पर थी और दूसरी श्रीकृष्ण जो उससे निकट ही महल जाने के रास्ते पर थी । श्रीकृष्ण टाकीज की जगह अब एक भव्य काम्प्लेक्स बन चुका  है लेकिन आदर्श टाकीज़ अपने बदले हुए रूप में उसी स्थान पर विराजमान है । 

उस समय के सिनेमाघर आज के सिनेमाघरों से बिलकुल ही भिन्न थे । इन सिनेमाघरों में पांच क्लास हुआ करती थीं, सबसे सामने थर्ड क्लास, उसके पीछे सेकन्ड और उसके पीछे फ़र्स्ट । सबसे आखिर में लेडीज़ क्लास होती थी  जिसके ऊपर बालकनी होती थी । कस्बों के सिनेमाघरों में नीचे की ओर  बनी क्लास में पुरुष व स्त्रियाँ साथ साथ बैठकर फिल्में नहीं देखते थे लेकिन सभ्रांत वर्ग के लोग सपरिवार बालकनी में जाया करते थे । 

जब हम लोग सिनेमा जाते थे तो बाबूजी फ़र्स्ट क्लास में सबसे पीछे की लाइन बैठते थे और मैं माँ के साथ लेडीज़ क्लास में सबसे सामने की बेंच पर । दोनों क्लासों के बीच छोटा सा एक लकड़ी का पार्टीशन था । पूरी फिल्म में मैं कभी माँ की गोद में रहता कभी बाबूजी की गोद में । जब माँ के पास ऊब जाता तो माँ मुझे पार्टीशन के उस पार बाबूजी को थमा देती कुछ देर बाद मैं फिर माँ के पास लौट आता । इस तरह आवागमन करते हुए मैंने ढेर साडी फिल्मे देखीं जिनके नाम याद नहीं हैं फिर भी माँ के साथ लेडीज़ क्लास में बैठकर देखी हुई फिल्मों में से कुछ फिल्मों के नाम स्मृति में हैं जैसे ‘संत ज्ञानेश्वर’ , ‘सम्पूर्ण रामायण‘ , ‘हम हिन्दुस्तानी‘ , ‘मैं चुप रहूँगी’ ‘दादी माँ’ आदि । 

जब समझदार हो जाने की उम्र में आ जाने के कारण सिनेमा प्रशासन द्वारा मुझे लेडीज़ क्लास से बेदख़ल कर दिया गया  तब मैं बाबूजी के साथ फ़र्स्ट क्लास में बैठ कर सिनेमा देखने लगा । वैसे भी मेरी जगह माँ की गोद में बैठने का सुख मेरी छोटी बहन को मिलने लगा था । लेकिन बीच में एक खराब दौर ऐसा भी आया जब मैं न हिंदुस्तान का रहा न पाकिस्तान का । हुआ यह कि शुरू शुरू में तो बाबूजी माँ को और हम बच्चों को साथ लेकर सिनेमा जाते थे लेकिन कस्बों में विद फैमिली देखने की वैसी परम्परा न होने के कारण यह क्रम शीघ्र ही समाप्त हो गया । अब बाबूजी अकेले ही सिनेमा चले जाते थे और माँ कभी कभार पड़ोसनों के साथ । मेरा नम्बर दोनों पार्टी में नहीं आता था इसलिए साल भर के इस अभाव की पूर्ति मैं दो महीनों की छुट्टियों में बैतूल में अपने भाइयों के साथ सिनेमा देखकर कर लिया करता था । वैसे भी बैतूल में इतना बड़ा कुनबा था कि  किसी को पता ही नहीं होता था कौन कहाँ किसके साथ जा रहा है ।

बाबूजी भी इस बात को जानते थे इसलिए कुछ नहीं कहते थे । लेकिन भंडारा लौटकर आने के पश्चात सिवाय पंद्रह अगस्त छब्बीस जनवरी को बच्चों वाला सिनेमा फ्री में देखने के अलावा जुलाई से अप्रेल तक सिनेमा देखने का कोई चांस नहीं होता था । एक बार एक अप्रत्याशित सी बात हुई । बाबूजी शाम को ड्यूटी से लौटकर आये और मुझसे कहा चलो सिनेमा देखकर आते हैं । मुझे आश्चर्य हुआ लेकिन बाबूजी के साथ सिनेमा देखने का अवसर लम्बे समय के बाद आ रहा था इसलिए ख़ुशी भी मुझसे छुपाई नहीं जा रही थी ।

बाबूजी मुझे साईकिल की पिछली सीट पर बिठाकर आदर्श टाकीज ले गए । उन्होंने  फर्स्ट क्लास की दो टिकटें कटवाई और हाल में प्रवेश कर गए । मैंने पोस्टर में देख लिया था, वह फिल्म थी राजकपूर की ‘मेरा नाम जोकर’ । यह उसका पहला वर्शन था जो लगभग साढ़े चार घंटे का था और उसमे दो इंटरवल होते थे । उस के पहले भाग में एक पब्लिक स्कूल का दृश्य था , जिसमे खाते पीते घरों के साफ सुथरे, सजे धजे बच्चे , मुझ जैसे नगर निगम के स्कूल में पढने वाले बच्चे के भीतर एक काम्प्लेक्स पैदा कर रहे थे । अचानक परदे पर एक दृश्य आता है जिसमें बालक ऋषि कपूर अपनी टीचर को कपड़े बदलते हुए देखने के बाद उसके नग्न शरीर की कल्पना करता है । बाबूजी के साथ बैठकर वह दृश्य देखते हुए मैं अचानक असहज हो गया  ।  

बाबूजी तन्मयता से फिल्म देख रहे थे लेकिन मेरा मन नहीं लग रहा था । अचानक मेरी नज़र पड़ी तो देखा मेरे स्कूल के दो सीनियर बच्चे पास की कुर्सियों पर बैठे हैं । उन्होंने मुझे पहचानकर आवाज़ लगाई.. शरद .. और पास आने का इशारा किया । मैंने बाबूजी से कहा मैं वहाँ बैठूँगा उन्होंने कुछ नहीं कहा , सो शेष फिल्म मैंने दोस्तों के साथ बैठकर देखी । वैसे भी वह फिल्म फ्लॉप थी इसलिए पूरी टॉकीज़ लगभग खाली थी । 

बहुत से लोगों को यह बात ज्ञात नहीं होगी कि साढ़े चार घंटे लम्बाई की दो इंटरवल वाली यह फिल्म उस समय बिलकुल नहीं चली थी । राजकपूर को इस फिल्म से बहुत घाटा हुआ जिसे पूरा करने के लिए फिर उन्होंने बॉबी फिल्म बनाई। बरसों बाद को फिल्म को सम्पादित कर छोटा करने के बाद जब यह फिल्म दोबारा रिलीज़ हुई तब इस फिल्म ने एक इतिहास रच दिया । आज इस फिल्म की गणना राजकपूर की क्लासिक फिल्मों में होती है । 


शरद कोकास 

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