उन दिनों बाज़ार आज की तरह रिलैक्स होने की जगह नहीं थी ৷ लोग तफ़रीह के लिए नहीं बल्कि ज़रूरत की चीज़ें खरीदने जाते थे ৷ दुकानदार और ग्राहक के सम्बन्ध भी दोस्ताना होते थे ৷ वे ग्राहक का चेहरे पर उसके जेब की तस्वीर देख लेते थे और यदा कदा उधार भी दे दिया करते थे ৷
अधिकांश दुकानें दोस्तों की बैठक के अड्डे हुआ करती थीं ৷ हर दुकान में बाहर की ओर बेंचें रखी रहती जिन पर बैठकर लोग शामों को दुकान में जलते हुए चराग देखते थे ৷ कट चाय और खर्रा पान भी आसपास की दुकानों से आ जाते थे ৷ गांधी चौक शाम को दोस्तों की महफ़िलों से गुलज़ार रहता था ৷ बाबूजी की बैठक नंदू काका की दुकान में थी यद्यपि बहुत सी चीज़ें वे अन्य दुकानों से भी खरीदते थी ৷चीज़ों के मामले में बाबूजी की चॉइस काफी अच्छी थी ৷ वे वस्तुएँ सस्ती ख़रीदते थे लेकिन गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं करते थे ।
भंडारा के बाज़ार में हर वस्तु के लिये बाबूजी ने कुछ विशेष दुकानें तय कर रखी थीं । किराने का सामान नंदू काका की दुकान के अलावा वे कभी कभी मकनजी जीवनलाल की दुकान से भी लाते थे । मकनजी भाई गुजराती थे जो दुकान से विदा लेते समय बाबूजी को ‘फिर आउजो’ कहा करते थे ৷
दवाइयाँ गणेश मेडिकल स्टोर्स से आती थी जिसके मालिक किशनलाल तलदार जी बाबूजी के दोस्त थे । बाद में उनके बेटे टिल्लू से मेरी दोस्ती हुई ৷ कपड़े पंजाब क्लॉथ स्टोर्स से खरीदे जाते थे जहाँ बाबूजी को गद्दी पर बैठने का सम्मान मिलता ৷ कपड़े सूर्यवंशी टेलर से सिलवाये जाते ৷ चप्पल जूतों के लिए हिन्दुस्तान बूट हाऊस तय था ।
स्टेशनरी और किताबों के लिये गभने गुरूजी की दुकान थी जिसका नाम था विजय बुक डिपो ৷ बाद में गभाने गुरूजी का नाता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय से जुड़ गया था ৷ विजय बुक डेपो के ठीक नीचे डोमाजी की दुकान थी जहाँ चूना,रंगोली और हार्डर्वेयर का सामान मिलता था ।
छुटपुट वस्तुओं धागा, सुई, मनिहारी के लिए लीलाधर वसाणी की दुकान थी जिसका नाम था सौभाग्य कंगन स्टोर । मिठाई दिल्ली होटल से और पीतल के बर्तन निर्वाण की दुकान से आते थे । मटन वे दयाराम की दुकान से खरीदते थे और हँसते हुए कहते थे कि देखो उसका नाम तो दयाराम है लेकिन वह प्राणियों पर कोई दया नहीं करता ।
भंडारा की इस मेन रोड पर मिठाई की एक ऐसी दूकान थी जिसमे केवल पेड़ा बिकता था ৷इस दुकान पर एक बोर्ड लगा था ‘ केसरी पेढ़ा ‘ इसके अलावा दुकान में कोई फर्नीचर नहीं, शोकेस नहीं, दुकान के सामने स्टील के एक बाउल में सफ़ेद कपड़े से ढंके पांच- सात किलो पेड़े रखे रहते थे जो शाम तक बिक जाते थे ৷इतना संतुष्ट दुकानदार मैंने नहीं देखा ৷ आजकल इस दुकान का नाम ‘रानी पेढ़ा’ हो गया है ৷
छोटे बाज़ार से बड़े बाज़ार की ओर जाते हुए नानक चंद पंजाबी के पिताजी की किराने की दुकान थी यद्यपि नानक मेरा अच्छा दोस्त था लेकिन किराना उसके यहाँ से कभी नहीं खरीदा गया उसी तरह मेरे क्लासमेट घनश्याम कौरानी के पिता हेमनदास की कपड़े की दुकान थी ৷ लेकिन कपड़े वहां से कभी नहीं खरीदे गए ৷ बाबूजी इस मामले में बहुत सख्त थे बेटे के दोस्तों की दुकानों से उन्हें कोई मतलब नहीं था यहाँ तक कि बाद में मेरी स्टेट बैंक में नौकरी लग जाने के बावजूद उन्होंने कभी स्टेट बैंक में खाता नहीं खुलवाया ৷
मेन रोड पर पटाखों की एक दुकान अवश्य मेरी पसंद की थी राजेश फटाका, फिर उसके आगे विष्णुचंद्र शर्मा की साइकिल की दुकान थी ৷ विष्णु भैया स्कूल में मेरे सीनियर था मैट्रिक करने के बाद उन्होंने पैतृक व्यवसाय संभाल लिया ৷ फिर कुछ आगे निखार की इलेक्ट्रिकल दुकान थी ৷
भंडारा की यह मेन रोड बहुत बड़ी नहीं थी , बस चंद क़दमों में ही बड़ा बाज़ार आ जाता था यहाँ सब्जी मंडी थी, किराना व गल्ले की थोक दुकाने थीं, ताले चाबी की दुकानें थीं और एक ‘बिसेन होटल’ थी जहाँ खारा मीठा मिलता था৷ चौंकिए नहीं , महाराष्ट्र में नमकीन को खारा कहा जाता है ৷
उत्तर भारत के अन्य भागों की तरह बिसेन होटल में भी आलूबोंडे और समोसे की विशेष डिमांड होती थी ৷ समोसे के साथ कढ़ी का कॉम्बिनेशन सबसे अधिक पसंद किया जाता था ৷ कभी कभी देसी चने की सब्जी अर्थात ‘मिसल’ भी बनती थी ৷ पाव के संग भाजी के चलन के पहले मिसल परोसने का चलन था यह तीखी रसेदार मिसल पोहे के साथ भी दी जाती थी ৷
बाबूजी भंडारा के प्रतिष्ठित नागरिक थे और उन्हें सभी लोग गुरूजी कह कर बुलाते थे । कभी कभी मुझे भी उनके साथ साइकिल के कैरियर पर बैठकर बाज़ार जाने का अवसर प्राप्त होता था ৷ जब कई कई लोग उन्हें गुरूजी कहकर नमस्ते कहते तो मुझे अच्छा लगता । उनका सम्मान देखकर मुझे गर्व महसूस होता था , मैं सोचता था, मनुष्य के पास पैसा हो न हो उसकी इज़्ज़त और सम्मान अवश्य होना चाहिए ।
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